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मेरा क्या अपराध?
मूल तमिल - आर॰ विलिनाथन्
मुझसे
क्या गलती हुई
?
मुझे नौकरी से क्यों सस्पेंड (निलम्बित) किया गया
?
बहुत सोच-विचार करने के बाद भी मैं इसका कारण ढूँढ़ न पाया ।
अगर आप जान पाएँ तो मुझे बताएँ । थोड़ा सा सोचिए ।
मैं झूठ क्यों कहूँ
?
चाय तैयार करते समय जिस प्रकार ये काग़ज के टुकड़े जल रहे हैं,
ठीक उसी प्रकार उस दिन मेरा हृदय जलने लगा था ।
साधारणतः मैं रद्दी लिफ़ाफ़े जलाकर चाय तैयार करता हूँ ।
किन्तु इस दफ़्तर में एक अफ़वाह उड़ गई है कि मैं चिठियाँ
जलाकर चाय तैयार करता हूँ । मैं तो बारंबार कहता हूँ कि यह
अभियोग ग़लत है । किन्तु दूसरों की नज़र में यह ठीक है ।
फिर आप पूरी घटना ही सुन लीजिए । आप असली बात जान पाएँगे ।
"न
जाने वह कब आयेगा" - इस प्रकार का उद्वेग भरा मन लेकर शायद
प्रेमिका प्रेमी का बाट जोह रही है । इतने में ही प्रेमिका के
लिए चिट्ठी आती है - नया स्वप्निल संदेश लेकर । नौकरी से
संबंधित दौरे पर गया हुआ विरहविदग्ध पति शायद नये शहर के किसी
होटल की किसी कोठरी से चिट्ठी लिखता है अपनी प्राणप्रिया पत्नी
के पास । माँ को खर्च के लिए रुपये भेजनेवाले बेटे का
स्नेहपूर्ण पत्र आता है । कन्या चिट्ठी देती है माँ का
हानि-लाभ जानने के लिए । पदोन्नति के लिए व्यग्र कर्मचारी
चिट्ठी भेजता है अपने जाने-पहचाने किसी ऊपर के हाकिम के पास ।
इन बातों के अलावा निकट संबंधी का मृत्यु संवाद लिए आता है कोई
दुःखदायक पत्र । इन सभी प्रकार के चिट्ठी-पत्र को बाँटने के
काम में लगा हूँ मैं । मैं एक डाकिया हूँ ।
मेरा नाम दामोदर है । मैं अपने कर्म में लगा हूँ,
फल की आशा नहीं करता । मैं जानता हूँ - "कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन ।"
छोटे-छोटे बच्चों को खुश करने के लिए मैंने जो कुछ किया है,
क्या वह ग़लत है
?
मेरी समझ में यह ठीक है । किन्तु अन्य लोगों की दृष्टि में यह
ग़लत है । विवाह के अनेक दिन के बाद भी कोई संतान न होने के
कारण मैं अन्य लोगों के बच्चों को देखकर खुश हो जाता था । उनके
ओठों पर हँसी लाने के लिए मैं जो कुछ करता था,
वह लोगों की आँखों का काँटा क्यों बन गया,
यह मेरी समझ में नहीं आया । मैं करता भी क्या था
?
रास्ते पर अनेक रद्दी लिफाफे पड़े रहते हैं । मैं उन्हें एकत्र
कर लाता और
'सिद्धिरस्तु'
न जाननेवाले बच्चे को देखकर उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा धरा देता
। कहता - "ले,
तेरे मामा ने एक चिट्ठी भेजी है ।" अन्य किसी बच्चे के हाथ में
लिफ़ाफ़ा पकड़ाते हुए कहता - "ले,
तेरे नाना ने यह सुन्दर चिट्ठी भेजी है ।" बच्चे आनन्दविभोर हो
उठते ।उन्हें आनन्दित देख मैं भी पुलकित हो उठता ।
पराये बच्चों को मुझे इस प्रकार प्रसन्न करते देख भगवान शायद
दयार्द्र हो उठे । फलस्वरूप मेरे घर में जन्म हुआ एक बच्ची का
।
अन्य बच्चों के साथ मैं जिस प्रकार का खेल खेलता था,
अपनी बेटी के साथ भी उसी प्रकार का खेल खेलने लगा । एक दिन उसे
बुलाकर कहा - "ले,
तेरी चिट्ठी आई है ।"
- "चिट्ठी
?
मुझे चिट्ठी भेजी किसने
?"
तुतलाती हुई आवाज़ में वह बोली ।
- "तेरे
दुलहे ने ।"
- "सच
?"
वह हँस पड़ी ।
इसी तरह चल रहा था मेरा जीवन प्रवाह । एक दिन मेरी बेटी मेरे
हाथ में एक चिट्ठी देकर बोली - "इस चिट्ठी को डाक में डाल देना
।"
- "किसे
चिट्ठी भेज रही हो
?"
मैंने पूछा ।
- "अपने
दुलहे के पास ।" उसने
उत्तर
दिया ।
हम पति-पत्नी उसकी यह बात सुनकर मारे हँसी के बेदम हो गये ।
लड़की बड़ी होने लगी । उसके विद्यालय जाने का समय आ गया ।
मैंने सोचा कि विद्या तो हमारे भाग्य में न थी,
किन्तु अपनी बेटी को इससे वंचित क्यों करें
?
कम-से-कम बी॰ ए॰ तक उसे निश्चय पढ़ायेंगे ।
उस दिन मैं दफ़्तर से छुट्टी लेकर घर बैठा था । एक चिट्ठी आई
मेरी बेटी लता के नाम । लता उस समय कॉलेज जाती थी । चिट्ठी
पाकर मैंने सोचा,
उसके पास चिट्ठी किसने लिखी होगी
?
निश्चय उसकी किसी सहेली ने लिखी होगी । यह सोचते-सोचते मैंने
चिट्ठी खोल डाली । चिट्ठी पढ़ने पर मेरा सर चकरा गया ।
कॉलेज में आजकल क्या पढ़ाते हैं
?
खाली प्रेम से संबंधित गवेषणा चल रही है क्या वहाँ
?
मोहन नामक किसी युवक ने यह चिट्ठी भेजी थी । यह था एक
प्रेमपत्र ।
पहले तो चिट्ठी पढ़ने पर मेरा सर गरम हो गया । किन्तु बाद में
मैं शांतभाव से सोचने लगा । सोचा कि इसमें गुस्सा करने की क्या
बात है
?
आजकल युवक-युवती अपने भाग्य का फैसला खुद करने का प्रयास करते
हैं । इसमें हमें माता-पिता की हैसियत से तो उनकी सहायता करना
उचित है । व्यर्थ के अड़ँगा लगाने से क्या लाभ
?
यदि यह युवक अच्छा हो तो हमें उन्हें आगे बढ़ने में सहायता
करनी चाहिए ।
मैं गुप्त रूप से इस मोहन के बारे में विभिन्न सूत्रों से ख़बर
संग्रह करने लगा । देखा कि इस युवक का चरित्र अच्छा नहीं ।
प्रेम करना उसका एक शौक है । वह इस प्रकार अनेक लड़कियों को
प्रेमपत्र देता है,
ऐसा सुनने में आया । यह सब कुछ मेंने अपनी बेटी को बता दिया ।
मोहन के विरुद्ध जो कुछ मैंने सुना था,
उसका अच्छी प्रकार से वर्णन करके लता को सुना दिया । किन्तु यह
सब होते हुए भी मोहन के
प्रति
लता की सहानुभूति कुछ भी कम न हुई,
बल्कि उन दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ती गई । वस्तुतः प्रेम
अन्धा होता है,
इसका प्रमाण मुझे मिल गया । मैं जितना कड़ा अनुशासन बरतता,
लता उतना ही अधिक मोहन से प्रेम करती । एक दिन सभी अनुशासन को
पीछे छोड़ लता मोहन के
साथ
किसी अज्ञात स्थान में भाग गई ।
इस प्रकार की कोई दुर्घटना घटेगी, इसकी आशा मेरी पत्नी को न थी
। लता के चले जाने के दो ही दिन बाद उसने खाट पकड़ ली । हृदय
की असीम पीड़ा वह सहन न कर पायी और एक सप्ताह के अन्दर ही उसने
आँखें मूँद लीं - हमेशा के लिए । इस घटना से मैं तो अधमरा हो
गया । तथापि मेरे हृदय में एक क्षीण आशा शेष थी - शायद मेरी
लड़की जीवन के उथल-पुथल में कटु सत्य जान पायेगी, शायद वह फिर
जीवन की स्वाभाविक धारा में वापस आ जायगी ... ...।
मुझे एक प्रकार की आवाज़ सुनाई देती थी
मानो मेरी आत्मा कह रही हो - दामोदर ! इन सबका तू ही उत्तरदायी
है । बच्चों को झूठी चिट्ठियाँ देकर तूने ही उनके मन में वृथा
आशा और अभिलाषा की सृष्टि की है । उसी का तो यह परिणाम है । इस
प्रकार की घटना कितने परिवारों में घटी है, कौन जानता है ?
क्या करूँ ? मेरा तो इस प्रकार की झूठी चिट्ठियाँ बाँटना एक
आदत के रूप में परिणत हो गया है । इसलिए निश्चय किया कि डाक की
नौकरी छोड़ दूँगा । 43 साल की उम्र में बहुत परिश्रम करके मैंने
मैट्रिक की परीक्षा दी । पास करने के बाद ऊपर के हाकिम को
कह-सुनकर 'सॉर्टर' की नौकरी पा ली ।
"पोस्टल सॉर्टर" के रूप में मेरी अभिज्ञता बढ़ने लगी । अभिज्ञता
इतनी बढ़ गई कि किसी लिफाफे को हाथ में लेते ही मैं बता सकता
था कि उसका
वज़न कितना है । इसमें ठीक-ठाक टिकट लगी है या नहीं,
यह मैं उसके
वज़न से जान जाता था । केवल इतना ही नहीं, लिफाफे
के अन्दर क्या होगा, इसके बारे में ठीक-ठाक अनुमान लगाना मेरे
लिए सम्भव हो गया ।
और भी एक अभिज्ञता मैंने हासिल कर ली ।
लिफ़ाफ़ा
को देखते ही मैं भाँप लेता था कि इसमें प्रेमपत्र होगा या नहीं
। मेरा यह अनुमान शत-प्रतिशत सही उतरता था । इस प्रकार की
चिट्ठी देखते ही मुझे अपनी बेटी की घटना तरोताज़ा
हो जाती । लता जिस प्रकार दुर्भाग्य का शिकार हुई, अन्य लड़कियों
के साथ ऐसा न हो, यही मेरी आन्तरिक कामना थी । फिर इस प्रकार
की चिट्ठी देखते ही मैं उसे अलग रख देता । उसे उस दिन की डाक
में कभी न भेजता ।
आप सोचते होंगे, मेरी बेटी का क्या हुआ ? वस्तुतः मुझे जिसकी
आशंका थी, वही हुआ। वह धूर्त बदमाश छोकरा मेरी बेटी को असहाय
अवस्था में छोड़ कहीं भाग गया । उस समय मेरी बेटी दो बच्चों की
माँ बन चुकी थी । छः वर्ष की लम्बी अवधि के बाद अपनी बेटी के
बारे में यही ख़बर मुझे मिली । मैं ख़बर पाते ही उसको ले आने
के लिए उसके घर गया ।
जानते हैं, बेटी ने मुझे क्या उत्तर दिया ? उसने कहा - "
उस दिन आपकी बात न मान मैं घर छोड़ चली आयी थी । आज आपकी बात
मानकर मैं यदि पुनः आपके घर वापस आऊँ तो मान-इज्जत रहेगी तो ?
मेरे पति की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है तो क्या मैं भी बुद्धि
भ्रष्ट कर लूँ? मैं अपने पैरों पर खड़ा होकर इन दोनों बच्चों
का पालन-पोषण करूँगी । इससे मेरे पति की कुल-रक्षा होगी । मेरी
चिन्ता छोड़िये ।"
मेरी बेटी के इस तरह का दुःसाहस अन्य लड़कियों के मन में
जाग्रत हो, ऐसा मैं कदापि नहीं चाहता । इसलिए जिन चिट्ठियों के
बारे में मुझे सन्देह होता है, उन्हें बिना पढ़े कभी भी डाक
में नहीं छोड़ता । दूसरों की चिट्ठी पढ़ना अच्छी बात नहीं है,
यह मैं मानता हूँ । किन्तु खुफिया विभाग के कर्मचारी ऐसी
चिट्ठियाँ किस प्रकार पढ़ते हैं ?
मेरी आदत से आप अच्छी तरह अवगत हो गये होंगे । पहले रास्ते में
पड़े
लिफ़ाफ़े,
पोस्टकार्ड आदि एकत्र करने की जो बुरी आदत थी, वह अभी तक गई नहीं
। वस्तुतः इस प्रकार के पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े
आदि मैं अभी भी संग्रह करता हूँ और उन्हें चाय तैयार करने में
इस्तेमाल करता हूँ । चाय तैयार करते समय सन्देहास्पद पत्रों को
खोलकर मैं पढ़ लिया करता हूँ ।
मैंने तो इस क्षेत्र में यथेष्ट अभिज्ञता हासिल कर ली है ।
इसलिए सन्देह के परिसर के अन्दर आनेवाली चिट्ठियों को मैं कदापि
नहीं छोड़ता । इसका यह मतलब नहीं कि वास्तविक प्रेम के विरुद्ध
मैं अड़ँगा लगाता हूँ । वस्तुतः जहाँ सच्चा प्रेम रहता है, वहाँ
मैं दोनों प्रेमियों को विवाहसूत्र में आबद्ध करने की चेष्टा
करता हूँ । जहाँ इस प्रकार के प्रेम का अभाव देखता हूँ, वहाँ
मैं खाली
लिफ़ाफ़ा भेजकर
दोनों प्रेमियों के बीच कड़वाहट पैदा करता हूँ । फलस्वरूप उनका
विवाह नहीं होने पाता ।
इस प्रकार अनेक दिन गुजर गये । किसी पत्रप्रेषक ने अपने
गन्तव्य स्थान में न पहुँचने की डाक विभाग में शिकायत की थी ।
उस शिकायत की अर्जी पर छानबीन की गई । मैं ऑफ़िस
में लिफाफा जलाकर चाय बनाता हूँ - यह अनेक लोग सहन नहीं कर पाते
थे । उनलोगों ने अनुसंधानकारी
अफ़सर को
मेरे विरुद्ध कह दिया ।
अनेक कर्मचारियों ने बताया कि मेरी बेटी का जीवन नष्ट हो जाने
के बाद मेरा सर फिर गया है । मैं मानता हूँ, मैं दोषी हूँ ।
जवाब में मैं बहुत सारी चिट्ठियाँ ऊपर के हाकिम के सामने
प्रस्तुत करूँगा । उस समय मैं मालूम करा दूँगा कि जिस अफसर ने
मुझे अपराधी साबित किया है, उसकी बेटी को ही मिथ्याप्रेम के
फन्दे से मैंने छुड़ाया है । वह लड़की सर्वनाश के मुख से रक्षा
पा गई है । अफ़सर को जब यह बात मालूम
होगी, उस वक्त वह मन ही मन मुझ पर कृतज्ञता प्रकट करेगा ।
आप पूछ सकते हैं कि मैंने उस लड़की को बचाया है, इसका क्या
प्रमाण है ? अरे बाबू, आप जानते हैं कि यह मिथ्याप्रेमी कौन है
? जिस धूर्त बदमाश ने मेरी बेटी को फँसाकर उसकी जिन्दगी नष्ट
की, वही फिर इस अफसर की बेटी को अपने फन्दे में फँसाने की
कोशिश कर रहा है ।
बेचारी अब क्या कर रही होगी ? अजी साहब, अब मेरी लड़की को किसी
की सहानुभूति की जरूरत नहीं । अपने बाप के समान ही उसने भी डाक
विभाग में 'सॉर्टर' के रूप में कार्य आरम्भ कर दिया है ।
अनु.
नारायण प्रसाद
चीफ़ रिसर्च आफ़िसर
ई-8,
सीडब्ल्यूपीआरएस
कॉलोनी
खडकवासला, पुणे
- 411 024
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