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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। भाषांतर ।।

 

 

मेरा क्या अपराध? 


मूल तमिल - आर॰ विलिनाथन्  

 

    मुझसे क्या गलती हुई ? मुझे नौकरी से क्यों सस्पेंड (निलम्बित) किया गया ? बहुत सोच-विचार करने के बाद भी मैं इसका कारण ढूँढ़ न पाया । अगर आप जान पाएँ तो मुझे बताएँ । थोड़ा सा सोचिए ।

 

मैं झूठ क्यों कहूँ ? चाय तैयार करते समय जिस प्रकार ये काग़ज के टुकड़े जल रहे हैं, ठीक उसी प्रकार उस दिन मेरा हृदय जलने लगा था ।

 

साधारणतः मैं रद्दी लिफ़ाफ़े जलाकर चाय तैयार करता हूँ । किन्तु इस दफ़्तर में एक अफ़वाह उड़ गई है कि मैं चिठियाँ जलाकर चाय तैयार करता हूँ । मैं तो बारंबार कहता हूँ कि यह अभियोग ग़लत है । किन्तु दूसरों की नज़र में यह ठीक है ।

 

फिर आप पूरी घटना ही सुन लीजिए । आप असली बात जान पाएँगे ।

 

"न जाने वह कब आयेगा" - इस प्रकार का उद्वेग भरा मन लेकर शायद प्रेमिका प्रेमी का बाट जोह रही है । इतने में ही प्रेमिका के लिए चिट्ठी आती है - नया स्वप्निल संदेश लेकर । नौकरी से संबंधित दौरे पर गया हुआ विरहविदग्ध पति शायद नये शहर के किसी होटल की किसी कोठरी से चिट्ठी लिखता है अपनी प्राणप्रिया पत्नी के पास । माँ को खर्च के लिए रुपये भेजनेवाले बेटे का स्नेहपूर्ण पत्र आता है । कन्या चिट्ठी देती है माँ का हानि-लाभ जानने के लिए । पदोन्नति के लिए व्यग्र कर्मचारी चिट्ठी भेजता है अपने जाने-पहचाने किसी ऊपर के हाकिम के पास । इन बातों के अलावा निकट संबंधी का मृत्यु संवाद लिए आता है कोई दुःखदायक पत्र । इन सभी प्रकार के चिट्ठी-पत्र को बाँटने के काम में लगा हूँ मैं । मैं एक डाकिया हूँ । मेरा नाम दामोदर है । मैं अपने कर्म में लगा हूँ, फल की आशा नहीं करता । मैं जानता हूँ - "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।"

 

छोटे-छोटे बच्चों को खुश करने के लिए मैंने जो कुछ किया है, क्या वह ग़लत है ? मेरी समझ में यह ठीक है । किन्तु अन्य लोगों की दृष्टि में यह ग़लत है । विवाह के अनेक दिन के बाद भी कोई संतान न होने के कारण मैं अन्य लोगों के बच्चों को देखकर खुश हो जाता था । उनके ओठों पर हँसी लाने के लिए मैं जो कुछ करता था, वह लोगों की आँखों का काँटा क्यों बन गया, यह मेरी समझ में नहीं आया । मैं करता भी क्या था ? रास्ते पर अनेक रद्दी लिफाफे पड़े रहते हैं । मैं उन्हें एकत्र कर लाता और 'सिद्धिरस्तु' न जाननेवाले बच्चे को देखकर उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा धरा देता । कहता - "ले, तेरे मामा ने एक चिट्ठी भेजी है ।" अन्य किसी बच्चे के हाथ में लिफ़ाफ़ा पकड़ाते हुए कहता - "ले, तेरे नाना ने यह सुन्दर चिट्ठी भेजी है ।" बच्चे आनन्दविभोर हो उठते ।उन्हें आनन्दित देख मैं भी पुलकित हो उठता ।

 

पराये बच्चों को मुझे इस प्रकार प्रसन्न करते देख भगवान शायद दयार्द्र हो उठे । फलस्वरूप मेरे घर में जन्म हुआ एक बच्ची का ।

 

अन्य बच्चों के साथ मैं जिस प्रकार का खेल खेलता था, अपनी बेटी के साथ भी उसी प्रकार का खेल खेलने लगा । एक दिन उसे बुलाकर कहा - "ले, तेरी चिट्ठी आई है ।"

- "चिट्ठी ? मुझे चिट्ठी भेजी किसने ?" तुतलाती हुई आवाज़ में वह बोली ।

- "तेरे दुलहे ने ।"

- "सच ?" वह हँस पड़ी ।

 

इसी तरह चल रहा था मेरा जीवन प्रवाह । एक दिन मेरी बेटी मेरे हाथ में एक चिट्ठी देकर बोली - "इस चिट्ठी को डाक में डाल देना ।"

- "किसे चिट्ठी भेज रही हो ?" मैंने पूछा ।

- "अपने दुलहे के पास ।" उसने उत्तर दिया ।

हम पति-पत्नी उसकी यह बात सुनकर मारे हँसी के बेदम हो गये ।

 

लड़की बड़ी होने लगी । उसके विद्यालय जाने का समय आ गया । मैंने सोचा कि विद्या तो हमारे भाग्य में न थी, किन्तु अपनी बेटी को इससे वंचित क्यों करें ? कम-से-कम बी॰ ए॰ तक उसे निश्चय पढ़ायेंगे ।

 

उस दिन मैं दफ़्तर से छुट्टी लेकर घर बैठा था । एक चिट्ठी आई मेरी बेटी लता के नाम । लता उस समय कॉलेज जाती थी । चिट्ठी पाकर मैंने सोचा, उसके पास चिट्ठी किसने लिखी होगी ? निश्चय उसकी किसी सहेली ने लिखी होगी । यह सोचते-सोचते मैंने चिट्ठी खोल डाली । चिट्ठी पढ़ने पर मेरा सर चकरा गया ।

 

कॉलेज में आजकल क्या पढ़ाते हैं ? खाली प्रेम से संबंधित गवेषणा चल रही है क्या वहाँ ? मोहन नामक किसी युवक ने यह चिट्ठी भेजी थी । यह था एक प्रेमपत्र ।

 

पहले तो चिट्ठी पढ़ने पर मेरा सर गरम हो गया । किन्तु बाद में मैं शांतभाव से सोचने लगा । सोचा कि इसमें गुस्सा करने की क्या बात है ? आजकल युवक-युवती अपने भाग्य का फैसला खुद करने का प्रयास करते हैं । इसमें हमें माता-पिता की हैसियत से तो उनकी सहायता करना उचित है । व्यर्थ के अड़ँगा लगाने से क्या लाभ ? यदि यह युवक अच्छा हो तो हमें उन्हें आगे बढ़ने में सहायता करनी चाहिए ।

 

मैं गुप्त रूप से इस मोहन के बारे में विभिन्न सूत्रों से ख़बर संग्रह करने लगा । देखा कि इस युवक का चरित्र अच्छा नहीं । प्रेम करना उसका एक शौक है । वह इस प्रकार अनेक लड़कियों को प्रेमपत्र देता है, ऐसा सुनने में आया । यह सब कुछ मेंने अपनी बेटी को बता दिया । मोहन के विरुद्ध जो कुछ मैंने सुना था, उसका अच्छी प्रकार से वर्णन करके लता को सुना दिया । किन्तु यह सब होते हुए भी मोहन के प्रति लता की सहानुभूति कुछ भी कम न हुई, बल्कि उन दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ती गई । वस्तुतः प्रेम अन्धा होता है, इसका प्रमाण मुझे मिल गया । मैं जितना कड़ा अनुशासन बरतता, लता उतना ही अधिक मोहन से प्रेम करती । एक दिन सभी अनुशासन को पीछे छोड़ लता मोहन के साथ किसी अज्ञात स्थान में भाग गई ।

 

इस प्रकार की कोई दुर्घटना घटेगी, इसकी आशा मेरी पत्नी को न थी । लता के चले जाने के दो ही दिन बाद उसने खाट पकड़ ली । हृदय की असीम पीड़ा वह सहन न कर पायी और एक सप्ताह के अन्दर ही उसने आँखें मूँद लीं - हमेशा के लिए । इस घटना से मैं तो अधमरा हो गया । तथापि मेरे हृदय में एक क्षीण आशा शेष थी - शायद मेरी लड़की जीवन के उथल-पुथल में कटु सत्य जान पायेगी, शायद वह फिर जीवन की स्वाभाविक धारा में वापस आ जायगी ... ...।

 

मुझे एक प्रकार की आवाज सुनाई देती थी मानो मेरी आत्मा कह रही हो - दामोदर !  इन सबका तू ही उत्तरदायी है । बच्चों को झूठी चिट्ठियाँ देकर तूने ही उनके मन में वृथा आशा और अभिलाषा की सृष्टि की है । उसी का तो यह परिणाम है । इस प्रकार की घटना कितने परिवारों में घटी है, कौन जानता है ?

 

क्या करूँ ? मेरा तो इस प्रकार की झूठी चिट्ठियाँ बाँटना एक आदत के रूप में परिणत हो गया है । इसलिए निश्चय किया कि डाक की नौकरी छोड़ दूँगा । 43 साल की उम्र में बहुत परिश्रम करके मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी । पास करने के बाद ऊपर के हाकिम को कह-सुनकर 'सॉर्टर' की नौकरी पा ली ।

 

"पोस्टल सॉर्टर" के रूप में मेरी अभिज्ञता बढ़ने लगी । अभिज्ञता इतनी बढ़ गई कि किसी लिफाफे को हाथ में लेते ही मैं बता सकता था कि उसका वज़न कितना है । इसमें ठीक-ठाक टिकट लगी है या नहीं, यह मैं उसके वज़न से जान जाता था । केवल इतना ही नहीं, लिफाफे के अन्दर क्या होगा, इसके बारे में ठीक-ठाक अनुमान लगाना मेरे लिए सम्भव हो गया ।

 

और भी एक अभिज्ञता मैंने हासिल कर ली । लिफ़ाफ़ा को देखते ही मैं भाँप लेता था कि इसमें प्रेमपत्र होगा या नहीं । मेरा यह अनुमान शत-प्रतिशत सही उतरता था । इस प्रकार की चिट्ठी देखते ही मुझे अपनी बेटी की घटना तरोताज़ा हो जाती । लता जिस प्रकार दुर्भाग्य का शिकार हुई, अन्य लड़कियों के साथ ऐसा न हो, यही मेरी आन्तरिक कामना थी । फिर इस प्रकार की चिट्ठी देखते ही मैं उसे अलग रख देता । उसे उस दिन की डाक में कभी न भेजता ।

 

आप सोचते होंगे, मेरी बेटी का क्या हुआ ? वस्तुतः मुझे जिसकी आशंका थी, वही हुआ। वह धूर्त बदमाश छोकरा मेरी बेटी को असहाय अवस्था में छोड़ कहीं भाग गया । उस समय मेरी बेटी दो बच्चों की माँ बन चुकी थी । छः वर्ष की लम्बी अवधि के बाद अपनी बेटी के बारे में यही ख़बर मुझे मिली । मैं ख़बर पाते ही उसको ले आने के लिए उसके घर गया ।

 

जानते हैं, बेटी ने मुझे क्या उत्तर दिया ? उसने कहा - " उस दिन आपकी बात न मान मैं घर छोड़ चली आयी थी । आज आपकी बात मानकर मैं यदि पुनः आपके घर वापस आऊँ तो मान-इज्जत रहेगी तो ? मेरे पति की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है तो क्या मैं भी बुद्धि भ्रष्ट कर लूँ? मैं अपने पैरों पर खड़ा होकर इन दोनों बच्चों का पालन-पोषण करूँगी । इससे मेरे पति की कुल-रक्षा होगी । मेरी चिन्ता छोड़िये ।"

 

मेरी बेटी के इस तरह का दुःसाहस अन्य लड़कियों के मन में जाग्रत हो, ऐसा मैं कदापि नहीं चाहता । इसलिए जिन चिट्ठियों के बारे में मुझे सन्देह होता है, उन्हें बिना पढ़े कभी भी डाक में नहीं छोड़ता । दूसरों की चिट्ठी पढ़ना अच्छी बात नहीं है, यह मैं मानता हूँ । किन्तु खुफिया विभाग के कर्मचारी ऐसी चिट्ठियाँ किस प्रकार पढ़ते हैं ?

 

मेरी आदत से आप अच्छी तरह अवगत हो गये होंगे । पहले रास्ते में पड़े लिफ़ाफ़े, पोस्टकार्ड आदि एकत्र करने की जो बुरी आदत थी, वह अभी तक गई नहीं । वस्तुतः इस प्रकार के पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े आदि मैं अभी भी संग्रह करता हूँ और उन्हें चाय तैयार करने में इस्तेमाल करता हूँ । चाय तैयार करते समय सन्देहास्पद पत्रों को खोलकर मैं पढ़ लिया करता हूँ ।

 

मैंने तो इस क्षेत्र में यथेष्ट अभिज्ञता हासिल कर ली है । इसलिए सन्देह के परिसर के अन्दर आनेवाली चिट्ठियों को मैं कदापि नहीं छोड़ता । इसका यह मतलब नहीं कि वास्तविक प्रेम के विरुद्ध मैं अड़ँगा लगाता हूँ । वस्तुतः जहाँ सच्चा प्रेम रहता है, वहाँ मैं दोनों प्रेमियों को विवाहसूत्र में आबद्ध करने की चेष्टा करता हूँ । जहाँ इस प्रकार के प्रेम का अभाव देखता हूँ, वहाँ मैं खाली लिफ़ाफ़ा भेजकर दोनों प्रेमियों के बीच कड़वाहट पैदा करता हूँ । फलस्वरूप उनका विवाह नहीं होने पाता ।

 

इस प्रकार अनेक दिन गुजर गये । किसी पत्रप्रेषक ने अपने गन्तव्य स्थान में न पहुँचने की डाक विभाग में शिकायत की थी । उस शिकायत की अर्जी पर छानबीन की गई । मैं ऑफ़िस में लिफाफा जलाकर चाय बनाता हूँ - यह अनेक लोग सहन नहीं कर पाते थे । उनलोगों ने अनुसंधानकारी अफसर को मेरे विरुद्ध कह दिया ।

 

अनेक कर्मचारियों ने बताया कि मेरी बेटी का जीवन नष्ट हो जाने के बाद मेरा सर फिर गया है । मैं मानता हूँ, मैं दोषी हूँ । जवाब में मैं बहुत सारी चिट्ठियाँ ऊपर के हाकिम के सामने प्रस्तुत करूँगा । उस समय मैं मालूम करा दूँगा कि जिस अफसर ने मुझे अपराधी साबित किया है, उसकी बेटी को ही मिथ्याप्रेम के फन्दे से मैंने छुड़ाया है । वह लड़की सर्वनाश के मुख से रक्षा पा गई है । अफसर को जब यह बात मालूम होगी, उस वक्त वह मन ही मन मुझ पर कृतज्ञता प्रकट करेगा ।

 

आप पूछ सकते हैं कि मैंने उस लड़की को बचाया है, इसका क्या प्रमाण है ? अरे बाबू, आप जानते हैं कि यह मिथ्याप्रेमी कौन है ? जिस धूर्त बदमाश ने मेरी बेटी को फँसाकर उसकी जिन्दगी नष्ट की, वही फिर इस अफसर की बेटी को अपने फन्दे में फँसाने की कोशिश कर रहा है ।

 

बेचारी अब क्या कर रही होगी ? अजी साहब, अब मेरी लड़की को किसी की सहानुभूति की जरूरत नहीं । अपने बाप के समान ही उसने भी डाक विभाग में 'सॉर्टर' के रूप में कार्य आरम्भ कर दिया है ।

अनु. नारायण प्रसाद
चीफ़ रिसर्च आफ़िसर

 ई-8, सीडब्ल्यूपीआरएस कॉलोनी
   खडकवासला, पुणे - 411 024

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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