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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।।मॉरीशसकीडायरी।।

 

 

मॉरीशसीय हिन्दी कहानियाँ: एक सामान्य झलक


विनय गुदारी

 

मॉरीशस की डायरी के 2008 वाले पन्ने में आप सभी का स्वागत है। 

इस बार मैंने कुछ साहित्यिक नोट्स तैयार किए है जो आपके साथ बाँटना चाहता हूँ।  1987 में महात्मा गांधी संस्थान के प्रेस द्वारा मॉरीशसीय हिन्दी कहानियाँ  नामक कुछ स्थानीय प्रतिनिधि कहानियों का प्रकाशन हुआ था।  इस कहानी-संग्रह का संपादन मॉरीशस के सुप्रसिद्ध कथाकार अभिमन्यु अनत द्वारा हुआ है।  इसी पुस्तक की कुछ कहानियों का परिचय देते हुए उनका विश्लेषण सतही ढंग से किया जाएगा तथा इनमें मॉरीशसीय तत्त्वों को रेखांकित किया जाएगा। 

 

इस कहानी संग्रह में 15 कहानियाँ हैं जो इस प्रकार हैं – विष-मंथन (रामदेव धुरन्धर), चक्कर (महेश रामजियावन), एम.बी.ई (भानुमति नागदान), मिन्नत (साहेबा बीबी फ़र्ज़ली), हिन्दी अध्यापक (बीरसेन जागासिंह), वह चालू ठीक (पूजानन्द नेमा), स्कूल नहीं, कालिज (लक्ष्मी प्रसाद रामयाद), कॉनफेशन (लोचन विदेशी), समस्या (सोनालाल नेमधारी), फिसलन (पुष्पा बम्मा), गुरुजी (दीपचन्द बिहारी), चाहे-अनचाहे (जय जीऊत), मौत का सौदागर (मुनीश्वरलाल चिंतामणि), बिछुरत एक प्राण हरि लेहीं (ठाकुरदत्त पाण्डेय) और टूटा पहिया (अभिमन्यु अनत)। 

 

उपर्युक्त सभी कहानियों में मॉरीशसीय जन-जीवन का सजीव चित्रण हुआ है। विष मंथन  रामदेव धुरन्धर की सर्वचर्चित कहानियों में से एक है।  परिवार में ठण्डेपन, संस्कारों का हनन, पशिचिमी मूल्यों का आगमन तथा परम्पराओं का परित्याग इस कहानी की विषयवस्तु को सुदृढ़ बनाते हैं।  किसी परिवार के मुखिया की अनुपस्थिति से उस घर की दुर्दशा कैसी होती है, इसका सजीव वर्णन विष मंथन में मिलता है।  चक्कर  कहानी में अस्पताल की व्यवस्था पर अनेक सवाल उठाए गए हैं।  व्यवस्था के चक्कर में पड़कर रोगग्रस्त व्यक्ति अस्पताल में चक्कर लगाता जाता है और उसका निदान भी उसे नहीं मिल पाता है।  सरकारी संस्थाओं की कार्य-नीति पर भी प्रश्नचिह्न उठाए गए हैं।  समस्या कहानी मॉरीशस में आने वाले पर्यटकों के साथ उनकी विसंगतियों का प्रभाव स्थानीय समाज में दर्शाया गया है।  अपनी पुत्री के भविष्य के लिए एक चिंतित पिता समुद्र-तट पर बसे हुए अपने घर को इसलिए छोड़ देता है ताकि वहाँ के होटलों के निर्माण के साथ साथ पनपने वाली वेश्यावृति की समस्या से अपनी बेटी को सुरक्षित रख सके।  ममता से भरे हृदय पिता अपनी बेटी के साथ पहाड़ पर जा बसता है जहाँ पर दोनों बनावटी जीवन से राहत पा सके।  प्रक़ृति की गोद में जीवन व्यतीत करते हुए दोनों अपने संसार में बहुत ही प्रसन्न हैं और उनके जीवन की इस सादगी के प्रति आकृष्ट होता है एक युवा अध्यापक।  यह कहानी जहाँ एक ओर पर्यटन उद्योग द्वारा फैली कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य करती है वहीं जीवन की नैसर्गिकता व सादगी का प्रतिपादन करती है। 

 

किसी भी विकसित देश को सामाजिक विसंगतियों के स्तर पर अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।  उनमें से ड्रग सम्पूर्ण मानव व मानवता को नष्ट-भ्रष्ट करने वाला एक ऐसा ही घातक पदार्थ है जो समाज को धीरे-धीरे खोखला बनाता जा रहा है।  मौत का सौदागर ऐसी ही एक कहानी है जहाँ पूजीपति वर्ग के लोग ड्रग की तस्करी साधारण व गरीब लोगों द्वारा करवाते हैं।  और अंतत: जब अपनी छोटी सी छोटी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसे लोग इस गर्त में फँस जाते है और उनको पुलिस गिरफ्त में ले लेती है तो उनसे पूँजीपति हाथ धो बैठते हैं।  परंतु स्कूलों, कॉलेजों आदि में ब्राउन शुगर का व्यापार दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। इसके निवारण के लिए कोई सार्थक कदम भी नहीं उठाए जा रहे है, यही लेखक की चिंता है। टूटा पहिया में पश्चिमी सभ्या का मॉरीशसीय समाज पर नकारत्मक प्रभाव देखने को मिलता है।  लेखक ने भइवा युसूफ के माध्यम से दिखाया है कि देश की स्वतंत्रता से पूर्व मूल्यों व संस्कारों का बड़ा महत्त्व था परंतु आज़ादी मिलने से ऐसा आभास होता है कि विसंस्कृतिकरण के सारे द्वार खुल-से गए हों। तांगे चलाने वाले इस पात्र का अब कोई अस्तित्व नहीं रहा।  लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आ गया है और बूढ़े व अनुभवी लोग हाशिये पर रखे जा रहे हैं। 

 

भाषा की दृष्टि से इन कहानियों में स्थानीय भाषाई उपलब्धियाँ तथा विविधताएँ मिलती हैं।  मॉरीशसीय हिन्दी जो यहाँ की भोजपुरी और क्रियोली शब्दों को भी समाविष्ट की हुई है, इन रचनाओं के स्तम्भ-आधार मानी जा सकती है। स्थानीय भोजपुरी के अनेक शब्दों का प्रयोग इस संग्रह की कहानियों में पाया जाता है। भाषा में आलंकारिकता की झलक भी मिलती है। प्रकृति के साथ जोड़कर लेखक (कहानी: चाहे-अनचाहे, जय जीऊत),  अपने पात्र की मनोदशा प्रस्तुत करता है (पृ. 123) –

 

सूरज कब अस्त हो चुका था और अन्धकार की काली चादर घाटियों को आच्छादित करती जा रही थी। उस ढलती रात के धुँधलके में भी मैं हाहाकार करते समुद्र के तट पर एक पाल-नौका बंधी देखी।  विद्रोही लहरों की लपेट में आकर नौका हिचकोले खाने लगती और कुछ लम्हों के लिए स्थिर एवं सामान्य हो जाती।  लहरों का एक और ज़ोरदार रेला आता और नौका पुन: हिचकोले खाने लगती।  उस नौका को देखकर न जाने क्यों मीनू का स्मरण हो आया।  कितनी आश्चर्यजनक समानता थी दोनों में... दोनों के भाग्य में! 

 

इस प्रकार से मॉरीशसीय हिन्दी कहानियाँ कहानी-संग्रह इस टापू के यथार्थ को प्रतिबिम्बित करता है। स्थानीय जन-जीवन का स्पन्दन, उनकी मानसिकता, उसके आचार-व्यवहार आदि को बड़ी खूबी के साथ ये कहानियाम प्रस्तुत करती हैं।  सुन्दर शैली व मिश्रित हिन्दी में जड़ित इन रचनाओं में अनेक सामयिक विषयों को स्थान दिया गया है। 

 

Vinaye Goodary

Senior Lecturer (Hindi Studies),

Dept of Languages,

Mahatma Gandhi Institute

Moka, Mauritius

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