 |
पता नहीं फिर कब आए
'बावरा
अहेरी'
स्वदेश
भारती
28
जनवरी, 1987 को
'अज्ञेय' जी बांगलादेश
से कलकत्ता पधारे। रात में उनका फोन आया- ''हैलो,
मैं वात्स्यायन बोल रहा हूँ। ''गुरुवर
प्रणाम''। मैंने अभिवादन किया। वे बोले
मैं तीन दिन कलकत्ता ठहरूँगा। पुस्तक मेला भी देखना है। मैंने
अगले दिन 4 बजे कलकत्ता पुस्तक मेले
में आयोजित 'हिन्दी-मंडप'
में आने के लिए अनुरोध किया। वे श्री
विश्वम्भर दयाल सुरेका के निवास पर ठहरे थे। मैंने कहा कि
स्वयं चार बजे आप को लेने आ जाऊँगा। अज्ञेय जी ने नपीतुली
आवाज़ में कहा- 'मैं स्वयं आ जाऊँगा'
5 बजे शाम।
29
जनवरी को रूपाम्बरा-हिन्दी मंडप स्टाल में
'अज्ञेय' जी की
पुस्तकों का एक अलग खंड सजाया गया। नामपट्टिका भी लगा दी गई
''अज्ञेय''-साहित्य।
मंडप में राजकमल, वाणी प्रकाशन,
नेशनल पब्लिशिंग हाउस,
ज्ञानपीठ, राजपालएण्ड सन्स,
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय आदि की पुस्तकों के
लिए अलग-अलग स्टाल उपलब्ध कराए गए थे। उनके प्रतिनिधियों को
सूचना दे दी गई कि वे शाम को अपने अपने स्टालों पर रहें।
'अज्ञेय' जी
आएँगे। कलकत्ता के साहित्यिक मित्रों को भी सूचित कर दिया कि
मंडप में यदि चाहें तो 'अज्ञेय'
जी से मिलें। अज्ञेय जी ठीक 5
बजे श्री विश्वम्भर दयाल, श्रीमती
कुसुम खेमानी के साथ आए। मैंने उनका सादर स्वागत किया। पत्नी
उत्तरा जी से परिचय कराया। उन्होंने परिवार,
बच्चों के बारे में पूछा आधे घंटे तक मंडप में
सजाई गई पुस्तकों का अवलोकन करते रहे फिर अचानक गंभीर होते हुए
बोले-कलकत्ता मे तो हिन्दी पुस्तकें इतनी ज़्यादा नहीं बिकती
होंगी। मैंने कहा-कलकत्ता में ही हिन्दी पुस्तकें सब से अधिक
बिकती हैं, हाँ यह जरूर है कि लोग पढ़ने
से ज़्यादा संग्रह करना पसंद करते हैं। प्रत्येक साहित्यिक
अभिरुचि वाले व्यवसायी के घर एक पुस्तकालय होता है,
जहाँ प्रति वर्ष पुस्तकें खरीद करसजा दी
जाती है। 'अज्ञेय'
जी मुस्कुराए। कुछ देर तक रवीन्द्र नाथ के
अनुवाद किए गए उपन्यासों को पलटतेर हे। मैंने पूछा-चाय या काफी
लेंगे। उन्होंने कहा हाँ चाय का समय तो है।
हम मंडप से निकल कर बाहर गेट पर रखी कुर्सियों पर आ बैठे। तब
तक सविता बैनर्जी एवं श्री बैनर्जी आ गए थे। मैंने ही सविता जी
का
'अज्ञेय'
जी से परिचय कराया। कुसुम खेमानी और सुरेका
जी भी मेला परिदर्शन कर आ गए थे। मैंने सभी के लिए चाय,
बिस्कुट, समोसे मंगा
लिए। पाँच मिनट में चाय आ गई। एक प्लेट में समोसे तथा बिस्कुट
थे। मैंने पूछा-क्या लेंगे बिस्कुट या समोसे। बस एक बिस्कुट-
'अज्ञेय' जी ने
धीरे से कहा फिर बोले-तेल भाजा कम खा पाता हूँ। सविता जी ने
पूछा- 'अज्ञेय'
जी आप बंगला भी जानते होंगे, ''तेल
भाजा'' तो बंगला शब्द है। अज्ञेय जी
-हाँ कलकत्ते में काफी पहले कुछ अर्से तक रहा। यही भवानीपुर
में। बंगला सीखने का प्रयास भी किया था। तब तो टूटी-फूटी बंगला
बोल भी लेता था किन्तु किसी भी भाषा को बिना अच्छी तरह जाने
गलत बोलना एक तरह से अपराध है। भाषा का सम्मान हर हालत में
करना चाहिए। मैं रवीन्द्र नाथ, शरत
चन्द्र और बंकिमचन्द्र को पढ़ना चाहता था। इसलिए बंगला सीखने का
यत्न किया परन्तु कलकत्ता से इलाहाबाद जाने के बाद जो कुछ सीखा
था भूलता गया। कोई बंगला बोलता है तो समझ लेता हँ। अभी
'बंगला-देश' में मेरी
कविताओं का बंगला-अनुवाद जिन सान ने किया कुछ शब्दों को छोड़
दिया, कुछ अपने आप जोड़ दिया। मैंने
उन्हें टोंका। हिन्दी कविता का बंगला अनुवाद करना कोई कठिन बात
नहीं। हिन्दी और बंगला दोनों भाषाएं बहुत करीब है। शब्दावली
में कुछ खास भिन्नता नहीं। बँगला,
संस्कृत और हिंदी से ही बनी है। भाषा तत्व भी दोनों में लगभग
एक से हैं। तब तक कालेज की कुछ वयस्क छात्राएं हाथों में
अज्ञेय-साहित्य लिए खड़ी थी। एक ने मेरे कान में कहा- सर जी का
आटोग्राफ दिलवा दीजिए न! हमने उनकी किताबें खरीदी हैं। मैंने
उन्हें कहा-एक एक कर किताबें देती जाओ फिर 'अज्ञेय'
जी से अनुरोध किया- गुरुवर,
हस्ताक्षर कर दें।......
''भर
लो आलोक किरण मन में
जिनमें बाँट सको उसे ही
जन जन में''
'अज्ञेय'
जी ने अपनी पुस्तक ''आत्मने
पद'' में लिखा और हस्ताक्षर कर दे
दिया।
दूसरी छात्रा ने
''आँगन
के पार द्वार'' हस्ताक्षर लेने के लिए
उनके हाथों में बढ़ा दिया वे क्षण भर सोचते रहे फिर आशीवर्चन
लिख दिए:-
''पहचान
से सहमना-
सहमने की पहचान से झिझकना
मन को खुली नाव मत समझना''
तीसरी छात्रा के हाथ में
''नदी
की बांक पर छाया'' तथा ''महावृक्ष
के नीचे'' थी 'अज्ञेय'
ने पहली पुस्तक में लिखा,
''प्रसन्नता
ही जीवन का अर्थ, बाकी सब व्यर्थ''।
दूसरी पुस्तक पर केवल हस्ताक्षर कर दिये। उन्होंने कहा-बस यानी
हस्ताक्षर देना समाप्त। छात्राएं उन्हें प्रणाम कर प्रसन्न मन
चली गई। सविता बैनर्जी भी श्री बैनर्जी के साथ नमस्कार कर चली
गई। अब तक मैंने देखा कलकत्ता के
''चपरकनाती''
साहित्यकार गिरोह बनाकर दूर खड़े हमारी ओर देख
रहे थे। वे 'अज्ञेय'
को बस देखने आए थे,
मिलने नहीं, उस देखने में अजीब सा
संकोच, हीन भावना और बौनापन दिखाई दे
रहा था। जैसा कि लगभग तीस वर्षों से तथाकथित साहित्य लिखने
वाले छोटे कद वाले शब्दाचारी कुछ भी लिखकर अपने खास गिरोह में
चर्चा संगोष्ठियाँ कराते रहे और ''चाय-घर''
या 'काफी हाउस'
में अड्डा लगाकर साहित्य को बाँटने की साजिशों
में समय व्यर्थ गंवाते रहे। शायद यही उनका प्राप्य है,
यही उनकी उपलब्धि है। यही साहित्य का विखंडित
आत्मबोध हैं, यही उनका परिचय है,
यही उनको बेहद संक्षिप्त संस्कार है।
''अज्ञेय'' से पता
नहीं क्यों ऐसे लोग दूरी रखते आए हैं। कहते हैं 'अज्ञेय'
संभ्रान्त, पश्चिमी
चिन्तन धारा के लेखक हैं। प्रयोगवादी हैं। अहंवादी हैं। अपने
सामने दूसरों को दीन-हीन समझते हैं। वे पश्चिम चिन्तन को
भारतीय साहित्य पर थोपना चाहते हैं। वे एक विशेष समाज के लेखक
हैं। बम्बई, दिल्ली,
कलकत्ता, कानपुर,
इलाहाबाद, लखनऊ,
भोपाल, बनारस में ऐसे
लोग बहुत सारे शिगूफे, मनगढन्त
कहानियाँ लतीफे बनाकरशाम होते ही अपने गिरोह में,
किसी खलासी टोला,
बारादरी में नशे में चूर अथवा 'काफी
हाउस' के फुटपाथ पर आस-पास किसी पान
की दुकान के सामने अति आधुनिकता का ढोंग रचाते हुए हंसी ठहाके
लगाते हुए, लड़खड़ाते कदमों से अपने-अपने
घरों में लौटकर मध्ययुगीन सभ्यता को जीते भोगते हैं और सबेरे
दिमाग का कसैला कसावदार भारीपन लिए किसी स्कूल कॉलेज में या
टयूशन पढ़ाने या किसी अख़बार में प्रूफ रीडरी करने निकल जाते
हैं। यही हिन्दी के अधिकांश बँटे-छँटे बुद्धिवादियों को
जीवन-चिन्तन लेखन रहा है। सिवान से शहर तथा विस्थापित मूल्यों
का ताना-बाना बुनते हुए रचनाशीलता के नाम पर द्वन्द,
इर्ष्या, प्रवंचना,
आचार-हीनता, मौलिक
चिन्तन की अभाव ग्रस्तता, दायरों में
बंटे जीवन को आत्मसात करते हुए साहित्य की पतंग उड़ाने की
बाजीगरी से उपजी प्रसन्नता और स्तरहीन लेखकीय मानसिकता को
दूसरों पर लादने की छोटी-छोटी कोशिशें,
दूसरे तीसरे सोपान पर खड़े लेखकों की विशेषताएँ हैं। यदि ऐसे
लोग अपने दायरे में प्रसन्न है तो फिर चाहे 'अज्ञेय'
को गालियाँ देकर अपनी इच्छा तृप्त करें,
चाहे उन्हें प्रयोगवादी,
पश्चिमी चिन्तन का पक्षधर मानें,
चाहें उन्हें पूँजीवादी खेमे का लेखक माने,
'अज्ञेय' की ऊंचाई तक
पहुँच पाना उनके लिए दुर्लभ है। 'अज्ञेय'
की रचनात्मक उपलब्धियों से कोई क्लेश पाता है
तो इसमें 'अज्ञेय'
क्या कर सकते थे।
उन्होंने कभी रेखा खींच कर साहित्य का विभाजन
नहीं किया, धर्मवीर भारती,
शमशेर बहादुर सिंह,
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मुक्तिबोध,
डॉ. रामविलास शर्मा तथा पूर्वी चिन्तन से
प्रभावित विरोधी खेमों के कई कवियों को भी ''सप्तक''
में स्थान दिया। ''वत्सलनिधि''
शिविरों में आमंत्रित करते रहे जो सामने आकर
'अज्ञेय' ने
उन्हें खड़ा किया, वही एक गिरोह बनाकर,
झंडा बरदार बन कर उनपर कीचड़ फेंकने का काम भी
और फिर बाएं हाथ की काँख में लोभ की पोटली दबाए हुए क्षमायाचना
माँगने उनके पास चले गए। पचास और सत्तर के बीच कुछ ऐसे भी लेखक
सतहर पर दिखाई दिए जो यत्किंचित वामपक्षी विचारों से प्रभावित
थे किन्तु साहित्य की पगडंडी पर चलने के लिए अज्ञेय को बैसाखी
के रूप में इस्तेमाल करने के लिए बहुत सारे यत्न करते रहे। ऐसे
कई रचनाकार जो कवि थे, उनकी प्रबल
मनोकामना रही कि वे भी ''सप्तक''
में छापे जाएं। ''अज्ञेय''
के पास कविताओं का पुलिन्दा संग्रह प्रस्तुत
करते रहे किन्तु वे कवि के रूप में ''सप्तक''
में शामिल नहीं किए गए। फिर ऐसे लोग ''अज्ञेय''
की विरोधिता में खड़े हो गए। कुछ और भी लोग थे
जो कविता लिखने में असफल जेबी आलोचक बन गए। डॉ. नामवर सिंह,
परमानन्द श्रीवास्तव,
जगदीश चतुर्वेदी, डॉ. गंगाप्रसाद विमल,
डॉ. नरेन्द्र मोहन,
डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी आदि संभवत: कहीं न कहीं ''अज्ञेय''
के ''सप्तक''
से न जुड़ पाने की असमर्थता के कारण अज्ञेय के
विरोध का कारण बने रहे। बौद्धिक-इन्द्रजाल का कारण भी रहा।
शाम के छ: बज गए थे। कलकत्ता पुस्तक मेला मे ऐसे समय भीड़ बढ़
जाती है
'अज्ञेय'
अब तक मौन भाव से बैठे थे। उन्होंने ही मौन
तोड़ते हुए पूछा- कलकत्ता में शंभूनाथ भी रहते हैं। मैंने कहा-
हाँ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। फिर कुछ पल का मौन। तभी
बंगला के सुप्रसिद्ध कवि शक्ति चट्टोपाध्याय पत्नी मिनाक्षी
3-4 कवि मित्रों के साथ आए।
''स्वेदश
कैमन वाचो''
''भालो।
तुमि 'अज्ञेय'
जी के जानो तो''
''कोविता
पोढ़ेचि। भालो नागे। देखा हृवायनी''
मैंने 'अज्ञेय'
जी का परिचय कराया। शक्ति के नमस्कार करने पर मीनाक्षी ने भी
हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। शक्ति के साथ आए अन्य मित्रों का
परिचय भी हुआ। कुर्सियाँ कम थीं। अज्ञेय जी उठकर खड़े हो गए। उस
दिन मुझे लगा 'अज्ञेय'
किस तरह से शिष्टाचार और लेखकों के साथ समरसता
का संबंध निभाते हैं। 'अज्ञेय'
जी के भव्य व्यक्तित्व और मौन के कारण उनका कद
काफी ऊँचा हो जाता था। मैंने देखा हिन्दी के साहित्यकार अभी
भी गिरोहबद्ध कुछ दूरी पर खड़े 'अज्ञेय'
की चर्चा विचर्चा में मगन थे। मुझे कोफ्त हुई-
बंगला का लेखक 'अज्ञेय'
जी से मिलकर प्रसन्नता अनुभव कर सकता है।
लेकिन हिन्दी का लेखक दूर खड़ा तमाशा देखता है। कितनी बड़ी
विसंगति है। जीने और लिखने में,
व्यवहार और सदाचार में, संबंधों को
छोटा करने में, दिमागी ग्रन्थि पालकर
हमेशा अपने ही दायरे में सोचने समझने में। शक्ति ने हमारे मौन
की जड़ता तोड़ी- ''खूब भालो हो तो''
1
-
2
आगे
पढ़े....
|