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सभ्यताओं का टकराव
मूलःनोम चॉम्स्की, अनुवादः अनिल एकलव्य
5
नवंबर, 2001
हंटिंगटन के सिद्धांत का प्रसंग याद करें जिसमें इसे पेश किया
गया था। यह शीत
युद्ध के बाद की बात है। पचास साल तक,
संयुक्त राज्य तथा सोवियत संघ दोनों ने शीत
युद्ध को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया था,
उन सब अत्याचारों के लिए जो वे करना
चाहते थे। तो अगर रूसी पूर्वी बर्लिन में टैंक भेजना चाहते थे
तो उसका कारण शीत
युद्ध था। और अगर अमरीका दक्षिण वियतनाम पर आक्रमण करना चाहता
था तथा हिंद-चीन को
तबाह करना चाहता था तो वो शीत युद्ध के कारण था। अगर आप इस दौर
के इतिहास पर नज़र
डालें तो बहाने का कारणों से कोई लेना-देना नहीं था।
अत्याचारों के जो कारण थे उनका
मूल तो घरेलू सत्ता स्वार्थों में था,
पर शीत युद्ध ने एक बहाना दे दिया। आप जो भी
अत्याचार करें,
आप कह सकते थे कि यह दूसरे पक्ष से बचाव के लिए है।
सोवियत संघ के पतन के बाद वो बहाना तो चला गया। नीतियाँ वही
हैं,
सिर्फ़ हथकंडों
में कुछ बदलाव के साथ,
लेकिन अब आपको चाहिए एक नया बहाना। और असल में तो बहानों की
खोज हो भी रही है काफ़ी लंबे समय से। सही में तो इसकी शुरुआत
बीस साल पहले हुई थी।
जब रीगन प्रशासन सत्ता में आया,
तब ही यह बिल्कुल साफ़ था कि रूसियों के खतरे का
बहाना ज़्यादा समय चलने वाला नहीं था। तो वे यह कहते हुए सत्ता
में आए कि उनकी
विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य होगा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के
प्लेग के विरुद्ध
संघर्ष करना
यह बीस साल पहले की बात है। इसमें नया कुछ नहीं है। हमें
आतंकवादियों से अपना
बचाव करना है। और उस प्लेग के विरूद्ध प्रतिक्रिया में
उन्होंने दुनिया में
अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का सबसे असाधारण जाल बुनना शुरू किया,
जिसने मध्य अमरीका
में तथा दक्षिणी अफ़्रीका में और बाकी सारी जगह भी भयंकर
आतंकवादी गतिविधियाँ चलानी
शुरू कर दीं। सच तो यह है कि यह जाल इतना अतिवादी था कि उसकी
गतिविधियों की निंदा
विश्व न्यायालय तथा सुरक्षा समिति के द्वारा भी की गई।
1989
के आते-आते आपको कुछ
नये कारण चाहिए थे। यह बात कोई ढकी-छुपी नहीं थी। याद रखें,
बुद्धिजीवियों का एक
काम,
एक गुरू-गंभीर काम,
यह होता है कि वे लोगों को ना समझने दें कि क्या चल रहा
है। और इस काम को पूरा करने के लिए आपको,
उहाहरण के लिए,
सरकारी दस्तावेजों को
नज़रअंदाज़ करना होता है जो आपको बता सकते हैं कि असल में
क्या-क्या चल रहा है। ऐसा
ही मामला यह भी है।
आपको सिर्फ़ एक मिसाल देता हूँ। व्हाइट हाउस हर साल कौंग्रेस
के सामने एक लिखित
बयान पेश करता है यह बताने के लिए कि हमें विशाल सैनिक बजट की
ज़रूरत क्यों है। हर
साल यह एक ही चीज़ होती थी: रूसी आ रहे हैं। रूसी आ रहे हैं
इसलिए हमें इस
दैत्याकार सैनिक बजट की ज़रूरत है। वो सवाल जो हर उस व्यक्ति
को अपने-आप से पूछना
चाहिए था जिसकी अंतर्राष्ट्रीय मामलों में रुचि है,
वो सवाल यह है कि ये लोग मार्च
1990
में क्या कहने वाले हैं?
वह कौंग्रेस के सामने पहली प्रस्तुति थी तब जब रूसी
निश्चित तौर पर नहीं आ रहे थे
–
वो मैदान में थे ही नहीं। तो यह एक बहुत ही
महत्वपूर्ण तथा अत्यंत रोचक दस्तावेज़ है। और जाहिर है इसका
कहीं ज़िक्र नहीं होता,
क्योंकि यह बहुत ही रोचक है। वो मार्च
1990
था और पहला बुश प्रशासन कौंग्रेस के
सामने अपली प्रस्तुति दे रहा था।
बात इस बार भी हर साल वाली ही थी। हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए।
हमें हस्तक्षेप
के लिए ढेर सारी सेना चाहिए,
ज़्यादातर मध्य-पूर्व की तरफ डटी हुई। हमें उस चीज़ की
रक्षा करनी है जिसे 'रक्षा
औद्योगिक आधार'
कहा जाता है। हमें यह सुनिश्चित करना है
कि जनता उच्च-तकनीकी उद्योग का खर्चा देती रहे,
सैनिक प्रतिष्ठान के माध्यम से,
रक्षा के बहाने पर।
तो बात तो एकदम पुरानी वाली ही थी। अंतर सिर्फ़ पेश किए गए
कारणों में था। पता
चला कि हमारे यह सब चाहने का कारण यह नहीं था कि रूसी आ रहे थे
–
मैं उद्धरित कर
रहा हूं –
बल्कि कारण था 'तीसरी
दुनिया की बढ़ती हुई तकनीकी सक्षमता'।
इसलिए हमें
विशाल सैनिक बजट चाहिए। जो ढेर सारी सेना मध्य-पूर्व की तरफ
डटी है उसमे वहीं डटे
रहना है,
औरयहाँ आता है एक रोचक वाक्यांश। यह है कि उन्हें अभी भी
मध्य-पूर्व की
तरफ डटे रहना है जहाँ
'हमारे
हितों को खतरा क्रेमलिन के दरवाजे पर नहीं डाला जा
सकता'।
दूसरे शब्दों में,
माफ़ करें,
मैं आपसे पचास साल से झूठ बोलता रहा हूं,
पर
अब क्रेमलिन है ही नहीं तो मुझे आपको सच बताना पड़ेगा:
'हमारे
हितों को खतरा
क्रेमलिन के दरवाजे पर नहीं डाला जा सकता'।
याद रहे,
इसे ईराक़ के दरवाजे पर भी नहीं डाला जा सकता था,
क्योंकि उस समय
सद्दाम हुसैन संयुक्त राज्य का करीबी मित्र और साथी था। वह
अपने सबसे बुरे अत्याचार
कर चुका था,
जैसे कुर्दों पर ज़हरीली गैस की बमबारी करना और दूसरी तमाम
चीज़ें,
लेकिन वह अभी एक भला बंदा था,
जिसने अभी तक आदेशों की अवहेलना नहीं की थी
–
एकमात्र
अपराध जिससे फ़र्क पड़ता है। तो कुछ भी ईराक़ के दरवाजे पर
नहीं डाला जा सकता था,
या क्नेमलिन के दरवाजे पर।
असली खतरा हमेशा की तरह यह था कि कहीं वो क्षेत्र अपने भाग्य
का निर्णायक खुद ना
बन जाए,
अपनी संपदाओं सहित। और ऐसी बात को तो किसी भी हालत में
बर्दाश्त नहीं किया
जा सकता। तो हमें आतताई राज्यों,
जैसे सऊदी अरब तथा अन्य,
का समर्थन करना था,
यह
सुनिश्चित करने के लिए कि वे यथास्थिति बनाए रखें जिसमें तेल
से मिला लाभ (तेल से
ज़्यादा तेल से मिला लाभ) उन लोगों तक जाए जो उस के हकदार हैं:
धनवान पश्चिमी निगम
या संयुक्त राज्य का राजकोष विभाग या बेकटेल कंस्ट्रक्शन
वगैरह। तो यह असली कारण है
जिसके लिए हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए। उसके अलावा सारी कहानी
वही है।
इस सब का हंटिंगटन के सिद्धांत से क्या लेना है?
बात यह है कि वे एक सम्मानित
बुद्धिजीवी हैं। वे ऐसा कह नहीं सकते। वे कह नहीं सकते कि,
देखो,
जिस तरीके से
संपन्न लोग दुनिया को चलाते हैं वो तो बिल्कुल पहले जैसा ही है,
और सबसे बड़ा टकराव
वही है जो हमेशा था: संपन्नता तथा शक्ति के छोटे संकेंद्रित
खंड बनाम बाकी सारे
लोग। आप ऐसा नहीं कह सकते। और वास्तव में अगर आप सभ्यताओं के
टकराव के उन
अनुच्छेदों को देखें तो उनका कहना है कि भविष्य में संघर्ष
आर्थिक आधार पर नहीं
होगा। तो उसको तो हमें अपने दिमाग से निकाल ही देना चाहिए। आप
संपन्न शक्तियों तथा
निगमों द्वारा लोगों का शोषण करने के बारे में नहीं सोच सकते,
वह तो संघर्ष हो ही
नहीं सकता। संघर्ष को कुछ और ही होना पड़ेगा। तो यह
'सभ्यताओं
का टकराव'
होगा –
पश्चिमी सभ्यताएं बनाम इस्लामिक एवं कन्फ्यूशियसवाद।
अब आप चाहें तो इसकी जाँच कर सकते हैं। यह अजीब सा विचार है
लेकिन आप इसकी जाँच
कर सकते हैं। उदाहरण के लिए,
आप यह पूछ कर जाँच कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य,
जो
पश्चिमी सभ्यता का नेता है,
की इस्लामिक बुनियादपरस्तों के तरफ़ क्या प्रतिक्रिया
रही है। तो जवाब यह है कि वह उनका प्रमुख समर्थक रहा है। मिसाल
के तौर पर उस समय
विश्व का सबसे अधिक बुनियादपरस्त राज्य सऊदी अरब था। शायद उसकी
जगह अब तालिबान ने
ले ली है,
पर वह भी सऊदी अरब की वहाबीयत से निकली एक शाखा है।
सऊदी अरब अपने जन्म से ही संयुक्त राज्य का एक ग्राहक रहा है।
और कारण यह है कि
वह अपनी सही भूमिका निभाता है। वह इस बात को सुनिश्चित करता है
कि क्षेत्र की संपदा
सही लोगों तक जाए: काहिरा की झुग्गियों में रहने वाले लोगों तक
नहीं बल्कि
न्यूयॉर्क के ऐग्ज़ेकेटिव सुइट्स में रहने वालों तक। जब तक वे
ऐसा करते रहते हैं,
सऊदी अरब के नेता महिलाओं के साथ चाहे जैसा बुरा बर्ताव कर
सकते हैं,
वे अस्तित्व
के सर्वाधिक अतिवादी बुनियादपरस्त हो सकते हैं,
और वे एकदम भले लोग हैं। यह तो बात
हुई विश्व के सर्वाधिक अतिवादी बुनियादपरस्त राज्य की।
दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम राज्य कौनसा है?
इंडोनेशिया। और संयुक्त राज्य तथा
इंडोनेशिया के बीच क्या संबंध है?
ऐसा है कि 1965
तक तो संयुक्त राज्य के संबंध
इंडानेशिया से खराब थे। वो इसलिए कि इंडोनेशिया गुटनिरपेक्ष
आंदोलन में शामिल था।
संयुक्त राज्य नेहरू से घृणा करता था,
उनसे चिढ़ता था,
बिल्कुल उसी कारण के लिए। तो
वे इंडोनेशिया से चिढ़ते थे। वह स्वतंत्र था। यही नहीं,
वह एक खतरनाक देश था
क्योंकि वहाँ एक जनवादी राजनीतिक दल था,
पी. के.आई.,
जो गरीबों का दल था,
मूलतः
किसानों का दल। और वह खुली जनतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत
शक्ति हासिल कर रहा था,
इसलिए उसे रोकना ज़रूरी था।
संयुक्त राज्य ने 1958
में एक विद्रोह का समर्थन करके उसे रोकने की कोशिश की। वो
प्रयास असफल हो गया। तब उन्होंने इंडोनेशियाई सेना का समर्थन
करना शुरू किया,
और 1965
में सेना ने जनरल सुहार्तो के नेतृत्व में सत्ता-पलट करने में
सफलता हासिल कर
ली। उन्होंने लाखों,
शायद दस लाख,
लोगों (ज़्यादातर भूमिहीन किसान) को व्यापक
हत्याकांड में मार डाला,
और एकमात्र जनवादी दल को मिटा डाला। इसका स्वागत पश्चिम
में निरंकुश उन्माद के साथ हुआ। संयुक्त राज्य में,
ब्रिटेन में,
ऑस्ट्रेलिया में –
यह इतनी शानदार घटना थी कि वे खुद पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे
थे।
समाचारों के शीर्षक थे,
'एशिया
में प्रकाश की किरण',
'एक
उम्मीद जहाँ पहले कोई
नहीं थी', 'इंडोनेशियाई
मॉडरेटों द्वारा एक उबलता हुआ रक्तपात'।
मेरा मतलब है वे जो
हुआ था उसे छिपा भी नहीं रहे थे
– 'भयंकर
हत्याकांड', 'इतिहास
की महानतम घटना'।
सी.
आई. ए. ने इसकी तुलना स्टॉलिन तथा हिटलर के हत्याकांडों से की,
और यह सब अद्भुत था।
और उस समय के बाद से इंडोनेशिया संयुक्त राज्य का पसंदीदा साथी
बन गया।
उसका रिकॉर्ड बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में सबसे खूनी में से एक
रहा है (पूर्वा
तीमोर में व्यापक हत्याकांड,
असहमत लोगों को भयानक यातनाएं देना,
वगैरह),
लेकिन यह
सब ठीक था। यह दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामिक राज्य था पर इसमें
कोई दिक़्क़त नहीं
थी। सुहार्तो 'हमारी
तरह का बंदा'
था,
जैसे कि क्लिंटन ने उसके बारे में कहा,
नब्बे
के दशक के मध्य में अपनी यात्रा के दौरान। और वह संयुक्त राज्य
का दोस्त बना रहा जब
तक कि उसने एक गलती नहीं कर दी। उसने गलती की आई. एम. एफ़. के
आदेशों पर अपने कदम
घसीटने में।
एशियाई आर्थिक गिरावट के बाद आई. एम. एफ़. ने बहुत सख्त आदेश
जारी किए,
और
सुहार्तो ने वैसे उनका पालन नहीं किया जैसी उससे उम्मीद थी। और
उसने समाज पर
नियंत्रण भी खो दिया। यह भी एक गलती है। तो इसी बिन्दु पर
विदेश मंत्री मैडेलीन
ऑलब्राइट ने सुहार्तो को फ़ोन किया और बिल्कुल इन्हीं शब्दों
में कहा, 'हमारा
विचार
है कि अब जनतांत्रिक बदलाव का वक़्त आ गया है'।
महज संयोग से,
चार ही घंटे बाद उसने
सत्ता छोड़ दी,
पर इंडोनेशिया संयुक्त राज्य का पसंदीदा साथी बना रहा।
ये तो हुए दो मुख्य इस्लामिक राज्य। उन ग़ैर-सरकारी अतिवादी
इस्लामिक
बुनियादपरस्त दलों का क्या,
मिसाल के लिए अल-क़ायदा का जाल। उन्हें किस ने बनाया?
उनकी रचना की सी. आई. ए.,
ब्रिटिश खुफ़िया दलों,
सऊदी अरब वित्त,
मिस्र वगैरह ने।
वे सर्वाधिक अतिवादी रैडिकल बुनियादपरस्तों को जहाँ से भी हो
सका,
ढूंढ के लाए,
उत्तरी अफ़्रीका या मध्य पूर्व से,
और उन्हें प्रशिक्षित किया,
हथियारबंद किया,
उनका पोषण किया ताकि वे रूसियों को तंग करें
–
अफ़ग़ानों की सहायता करने के लिए
नहीं। ये बंदे शुरू से ही आतंकवाद चला रहे थे। उन्होंने बीस
साल पहले राष्ट्रपति
सादात की हत्या की थी। लेकिन वे ही प्रमुख समूह थे जिनका
समर्थन संयुक्त राज्य कर
रहा था। तो,
सभ्यताओं का टकराव है कहाँ?
चलिए हम थोड़ा आगे चलते हैं।
1980
के दशक में संयुक्त राज्य ने मध्य अमरीका में
एक बड़ा युद्ध चलाया था। कई लाख लोग मारे गए थे,
चार देशों को लगभग नष्ट कर दिया
गया,
कहने का मतलब है यह एक व्यापक युद्ध था। उस युद्ध का निशाना
कौन था?
प्रमुख
निशानों में से एक था कैथोलिक चर्च।
1980
के दशक की शुरुआत हुई थी एक आर्चबिशप की
हत्या से। उसका अंत हुआ छः प्रमुख जेसूट बौद्धिकों की हत्या से,
जिनमें एक मुख्य
विश्वविद्यालय के रेक्टर भी शामिल थे। उनकी हत्या की गई मूलतः
उन्हीं लोगों द्वारा –
आतंकवादी दल जिन्हें संगठित करने,
हथियार देने तथा प्रशिक्षित करने का काम किया
था संयुक्त राज्य ने।
इस अवधि के दौरान ढेर सारे चर्च के लोग मारे गए। लाखों किसान
और गरीब लोग भी
मारे गए,
हमेशा की तरह,
पर एक मुख्य निशाना था कैथोलिक चर्च। क्यों?
हुआ यह कि
कैथोलिक चर्च ने लैटिन अमरीका में भारी पाप कर डाला था। सदियों
से यह अमीरों का
चर्च था। तब तक सब ठीक था। लेकिन
1960
के दशक में लैटिन अमरीकी पादरियों ने एक
विचार को अपना लिया जो था
'गरीबों
के लिए बेहतर विकल्प'।
उसी क्षण वे इंडोनेशिया के
उस जनवादी दल के जैसे बन गए जो गरीबों और किसानों का दल था और
जाहिर है जिसे मिटा
डालना ज़रूरी था। तो कैथोलिक चर्च का विध्वंस करना ज़रूरी था।
शुरुआत पर वापस आते हुए,
यह सभ्यताओं का टकराव है कहाँ,
किस जगह?
मेरा मतलब है
टकराव तो ज़रूर है। टकराव है उन लोगों के साथ जो गरीबों के लिए
बेहतर विकल्प की बात
करते हैं, |