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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। प्रसंगवश ।।

 

 

अमेरिका का युद्ध आंतकवाद के विरूद्ध या इस्लाम के ?


तनवीर जाफ़री

 

तंक अथवा आतंकवाद इस धरती की प्राचीनतम त्रासदियों में से एक है। कहा जा सकता है कि आतंकवाद का यह सिलसिला शताब्दियों से इस पृथ्वी पर जारी है। परन्तु इसे परिभाषित किए जाने में भी हमेशा ही मतभेद देखने को मिले हैं। यदि आप आतंक फैलाने वाले पक्ष से बात करें तो दुनिया के प्रत्येक आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में आतंकवाद के भिन्न-भिन्न कारण सुनने को मिलेंगे। मोटे तौर पर यू समझा जा सकता है कि आतंकी हिंसा से प्रभावित समाज के लिए वही घटना आतंकवादी घटना कही जाती है तो आतंक फैलाने वाला पक्ष अथवा आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वाला या इसमें संलिप्त वर्ग इसे जेहाद, धर्मयुद्ध, बदले की कार्रवाई अथवा अपना विरोध दर्ज किए जाने के प्रतीक जैसी संज्ञा देता है। पूरी दुनिया में फैले आतंकवाद के स्थानीय स्तर पर भिन्न-भिन्न कारण हैं। कहीं आज़ादी  हासिल करने के लिए आतंकवादी घटनाएं अंजाम दी जाती हैं तो कहीं पूर्ण स्वायत्ता हासिल करने के लिए। कहीं अपने भूखंड को विरोधियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए आतंकवादी घटनाएं घटित हो रही हैं तो कहीं ग़रीबी, भूखमरी और बेरोजगारी भी आतंकवाद का कारण बन रही है। परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया द्वारा जिस आतंकवाद को सबसे अधिक चर्चा का विषय बनाया जा रहा है, वह है तथाकथित इस्लामी आतंकवाद।

             

दुनिया में आतंकवादी घटनाएं अमेरिका में हुए 9-11 के आतंकी हमले से पूर्व भी हुआ करतीं थीं। परन्तु उस समय के आतंकवाद का रूप आज के आतंकवाद से कुछ भिन्न था। 9-11 से पूर्व अमेरिका या तो तथाकथित इस्लामी आतंकवाद का तमाशाई था या फिर कहीं-कहीं चोरी छिपे तो कहीं खुलकर इसी आतंकवाद को अपना समर्थन भी देता था। परन्तु 9-11 के हादसे ने अमेरिका को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि वास्तव में अमेरिका स्वयं भी अपने ही द्वारा सींचे गए आतंकवाद का शिकार हो सकता है। और इसी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध छेड़ने की घोषणा कर दी। 9-11 के हादसे के बाद अमेरिका ने दुनिया से आतंकवाद को जड़ से मिटा देने का संकल्प लिया। दुनिया में अधिकांश मुस्लिम देश ऐसे हैं जो कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा के नाम पर फैलाए जाने वाले आतंकवाद का प्रबल विरोध करते हैं तथा इसे ग़ैर इस्लामी क़रार देते हैं। ऐसे मुस्लिम देशों ने 9-11 के पश्चात अमेरिका का उसकी आतंकवाद विरोधी मुहिम में खुलकर साथ दिया। यहाँ तक कि इन आतंकवादियों द्वारा आतंकवाद का विरोध करने वाले मुस्लिम देशों के शासकों पर अमेरिकी पिट्ठू होने तथा इस्लाम विरोधी होने जैसे आरोप भी मढ़े जाने लगे। आतंकवादियों द्वारा इन्हें भी अमेरिका का सहयोगी तथा अपना खुला दुश्मन महसूस किया जाने लगा। इस दौरान अमेरिका द्वारा दुनिया को यह बताने की कोशिश की गई कि उसका विरोध न तो इस्लाम से है न ही इस्लामी शिक्षाओं से और न ही दुनिया के मुसलमानों से। बल्कि उसका विरोध केवल उन लोगों या उस विचारधारा के लोगों से है जो इस्लाम के नाम का दुरुपयोग कर जेहाद की बात करते हैं तथा दुनिया में कहीं भी बेगुनाह लोगों पर हमलावर होते हैं। परन्तु क्या इस अमेरिकी दावे को पूरी तरह सही ठहराया जा सकता है कि उसका विरोध इस्लाम या मुसलमानों से नहीं बल्कि केवल आतंकवादियों से ही है?

             

इसमें कोई संदेह नहीं कि पोप बैंडिक्ट ने कुछ समय पूर्व विश्व के तमाम इस्लामी विद्वानों को एक साथ बुलाकर इस्लाम व ईसाईयत के मध्य सद्भाव क़ायम रखने के संकेत दिए थे। इतना ही नहीं बल्कि पोप ने तुर्की की एक प्राचीन मस्जिद में जाकर भी सहिष्णुता व सद्भाव का प्रदर्शन किया था। मुस्लिम देशों पर चाहे किसी सैन्य कार्रवाई के परिणामस्वरूप कोई बड़ी मुसीबत आ पड़े अथवा किसी प्राकृतिक विपदा के यह देश शिकार हों, पोप की मार्मिक अपील हमेशा ही इस बात का द्योतक रही है कि वे एक सच्चे धर्मगुरु हैं तथा केवल ईसाईयत के ही नहीं बल्कि मानवता के भी पक्षधर हैं। परन्तु इन सब बातों के बावजूद कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जो मुस्लिम जगत को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

             

उदाहरण के तौर पर गत् 9 मई को इराक़ की राजधानी बंगदाद में तैनात एक अमेरिकी सार्जेन्ट द्वारा फ़ायरिंग  प्रशिक्षण के दौरान क़ुरान शरीफ़ को निशाना बनाते हुए गोलियाँ दांगी गईं। इस घटना के लिए इराक़ में तैनात चौथी इन्फैन्टरी डिवीजन के कमाण्डर जैफरे हमॉड द्वारा क्षमा याचना भी की गई। केवल कमाण्डर ने ही नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भी इराक़ी प्रधानमंत्री नूरी अल मालिकी से इस घटना के लिए क्षमा याचना की। यह तो एक सार्जेन्ट द्वारा की गई दु:खद एवं उकसाने वाली कार्रवाई थी। इससे पूर्व लेंफ्टिनेंट जनरल विलियम जेरी बॉयकीन ने अमेरिका द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्ध को एक अध्यात्मिक युद्ध की संज्ञा दी थी। उन्होंने तो मुसलमानों को शैतान तक कहा डाला था। बॉयकिन ने यह भी कहा था कि हमारा गॉड उनके अल्लाह से बड़ा है। और तो और इस अमेरिकी जनरल ने यहाँ तक कहा कि मेरा गॉड वास्तविक है जबकि मुसलमानों का अवास्तविक। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों की साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाली कार्रवाईयाँ एक दो या चार नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर उजागर होती रही हैं। गुवांटानामो बे में स्थित अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे प्रताड़ना बंदी गृह में अमेरिकी सैनिकों द्वारा क़ुरान शरीफ़ के टुकड़े-टुकड़े कर उसे शौचालय में फेंके जाने जैसी उकसाने वाली घटना अंजाम दी गई थी। इस घटना के पश्चात इस जेल में बंद मुस्लिम क़ैदियों को जिनमें जहां कई आतंकवादी भी रहे होंगे तो अनेकों बेगुनाह अथवा विचाराधीन क़ैदी भी, उन सभी को क़ुरान शरीफ़ को शौचालय में पड़ा देखने हेतु बलपूर्वक बाध्य भी किया गया। एक अन्य घटना में इसी प्रकार पिछले दिनों एक मई को अमेरिका के पैनसिल्वेनिया में आतंकवाद विरोधी मुहिम से निपटने का एक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया। इसमें लगभग 30 विभिन्न सरकारी विभागों के ंकरीब 120 कर्मचारियों ने भाग लिया। इस प्रशिक्षण के दौरान मस्जिद के रूप का एक नकली ढांचा तैयार किया गया। मस्जिद रूपी इस ढांचे पर जमकर गोलियाँ चलाई गईं तथा आतंकवादी कार्रवाई से बचने तथा उस पर क़ाबू पाने के उपायों का प्रदर्शन किया गया।

             

उपरोक्त उदाहरण से क्या कहीं यह साबित होता है कि जॉर्ज बुश की सेना अथवा उनके नेतृत्व वाला अमेरिकी प्रशासन केवल आतंकवाद के विरुद्ध ही अपनी कमर कस रहा है, मुस्लिम जगत अथवा इस्लाम के विरुद्ध नहीं? संभव है ऐसी उकसाने वाली अमानवीय घटनाओं में बुश अथवा बुश प्रशासन की कोई सहमति न रहती हो। परन्तु अमेरिकी सेना के उच्चाधिकारियों द्वारा इस प्रकार के इस्लाम विरोधी संदेश देना निश्चित रूप से मुस्लिम जगत को यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि वास्तव में अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा है अथवा नहीं परन्तु उसकी इस्लाम या मुसलमानों के विरुद्ध वैमनस्यपूर्ण कार्रवाई अवश्य जारी है। ऐसी ही घटनाएं आतंकवादियों को भी भड़काने तथा उन्हें खुलकर अमेरिकी विरोध करने का अवसर उपलब्ध कराती हैं।

             

अत: ज़रूरत  इस बात की है कि आतंकवाद के विरुद्ध पारदर्शी व न्यायपूर्ण कदम उठाए जाएं। आतंकवाद को मात्र एक आपराधिक एवं अमानवीय कृत्य तक ही सीमित रखना चाहिए। क़ुरान, मस्जिद अथवा इस्लाम इन सभी का आतंकवाद से कोई लेने देना न तो है, न ही पहले कभी था। जिस प्रकार अमेरिकी सेना अथवा बुश प्रशासन द्वारा अफगानिस्तान व इराक़ में बेगुनाह लोगों पर बमों की बरसात किए जाने को ईसा मसीह की प्रेरणा से की जाने वाली कार्रवाई नहीं कहा जा सकता, ठीक उसी प्रकार आतंकवाद की कोई भी घटना इस्लामिक आतंकवाद अथवा इस्लाम से प्रेरित आतंकवादी घटना नहीं कही जा सकती।        

                                                                  तनवीर जाफरी

सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी

हरियाणा

 

 

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