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बीसवीं शती
का सर्वेक्षण
प्रभाकर
श्रोत्रिय
31
दिसंबर, 2000 के बाद
बीसवीं शती इतिहास हो जाएगी। इतिहास होने का अर्थ मनुष्य की
अवधारणा में निहित है जो समय के बीते भाग को नेपथ्य में डाल
देती है, क्योंकि नया समय अभिनय के
लिए मंच पर उतर आया है। समय के बदलाव को रेखांकित करने की सही
दृष्टि शायद यही है, क्योंकि काल का न
निधन होता है, न जन्म। नई शती का आना
और कुछ नहीं है, आत्म-प्रबोधन है। कुछ
नया, कुछ अपूर्व करने की कामना है।
क्योंकि मनुष्य द्वारा घोषित किए बिना भ्ज्ञी दुनिया में ऐसी
कई तिथियाँ आई हैं, जब भौतिक या
घटनात्मक परिवर्तन हुए, रातोरात प्रलय
हो गया, सत्ताएँ पलट गई,
देश स्वाधीन या पराधीन हो गए,
सहसा कोई सेब ज़मीन पर टपका और विज्ञान के नए
सिद्धांत ने जन्म ले लिया। वह एक क्ष्ज्ञण ही था विराट्
ब्रम्हाण्ड में महाविस्फोट (बिग बैंग) हुआ और हमारी पृथ्वी
टूटकर अलग हो गई। उसने दस अरब साल की कालयात्रा की है जिसमें
करिश्मे या बदलाव के अनगिनत क्षण आए हैं। कई बार परिवर्तन इतने
आकस्मिक और अप्रत्याशित हुए हैं कि उनका पूर्वाभास तक नहीं
था। ये सब नए संवत्सर ही थे। ऐसे में
अपने बनाए संवत्सर को किसी विच्छेद या परिवर्तन का सूचक मान
लेना-खुद ही प्रिज्म बनाना और खुद ही उसमें चकरघिन्नी खाना है।
इतिहास से निकलकर नई शती में हमारा आना केवल अवधारणा या चेतना
पर निर्भर नहीं है,
उन उपलब्धियों पर भी निर्भर है जो हमें अद्यतन
होने की सूचना देती हैं। उदाहरण के लिए विक्रम संवत् की
इक्कीसवीं शती आधी से अधिक बीत गई। वह हमारी अपनी कालगणना है,
फिर भी संवत्सर के उस परिवर्तन पर हमने ध्यान
नहीं दिया। इसलिए कि तब हमने अपने को सूचित ही नहीं किया कि हम
इक्कीसवीं शती में पहुँच गए हैं-संभवत: सूचित करने लायक
उपलब्धियाँ हमारी नहीं थी या अपनी उपलब्धियों को हमने इस सूचना
के योग्य नहीं माना था। आज हम पश्चिम की इक्कीसवीं शती से अपने
को सूचित कर रहे हैं, क्योंकि हमारे
लिए भी यह अद्यतन है।
ठीक है कि भारत का एक संपूर्ण वैभवशाली अतीत रहा है।
ज्ञान-विज्ञान-दर्शन-साहित्य-कला-विचार के क्षेत्र में इसकी
उपलब्धियाँ कमाल की थीं,
लेकिन आज के ज्ञान-विज्ञान-संचार-शक्ति के
स्रोत या परिणितियो में भारत की प्रत्यक्ष भागीदारी लगभग नहीं
रही। इसे यदि हम अपनी अस्मिता बनाए रखने के अभिमान की तरह लें
तो वह हमारा इतिहासाभिमान ही होगा,
जबकि स्वयं के अर्जित नवीन को हम जब तक मंच पर नहीं उतारते या
कोई अपूर्वरंग-सृष्टि नहीं करते, तब तक
वर्तमान हमारा नहीं होगा, भले ही हम
वर्तमान में हों। अपने संवत्सर को भूल जाना और पराए संवत्सर का
उत्सव मनाना यही दिखाता है है कि फिलहाल हमने स्वीकार कर लिया
कि हमारा अद्यतन हम नहीं 'वे'
निर्धारित कर रहे हैं,
या जो 'वे'
निर्धारित कर रहे हैं, वही हमारा
'आज' है। यदि
हम इस कटु सत्य से इंकार करें तो या तो हम पाखंड करेंगे या
आत्म-छल, जिससे हम वर्तमान चुनौतियों
का सामना करके ही मुक्त हो सकते हैं। उपनिषद् का यह कथन भारत
जैसे प्राचीन देश के लिएसटीक है कि जो करनाहै उसे याद करो और
जो कर चुके हो उसे भूल जाओ-'कृतं स्मर।
कृतो समर॥' क्योंकि जब हम सृजन संकल्प
में होते हैं तब अतीत तो बिना स्मरण किए ही हमारी शक्ति बन
जाता है। क्या सौ साल के भीतर ही कोई भाषा और साहित्य बिना
आनुवंशिक शक्ति के उस जगह खड़ा हो सकता था,
जहाँ आज हिंदी है?
बीसवीं शती के समस्त महामानवों को बिना ईत-स्तवन के ही उसका बल
मिला है, क्योंकि वर्तमान कासक्रिय
संकल्प अपने आप उन्हे पीढ़ियों के गतिशील संकल्प से जोड़ देता
है। इस अंतर्निहित शक्ति के बल पर यदि अब भी हम अपनी काट और
स्वभाव की विशिष्ट आधुनिकता रच सकें तो कोई आश्चर्य नहीं कि
43 साल बाद ही अपने को बाईसवीं शती में
सूचित करें। यदि बहुत-से विदेशी अन्वेषकों और चिंतकों ने
भारतीय मनीषा और अन्वीक्षा से प्रेरणा लेकर अपने नवीनतम सोच और
अन्वेषण से संसार को आधुनिक दृष्टि दी है तब भारत के लिए तो
यह स्वभाव सिद्ध है।
एक शब्द में पिछली शतियों से बीसवीं शती को अलग करना हो तो वह
शब्द है-
'गति'
जैसे ज़मीन पर चलते हुए वायुयान ने इस शती में
उड़ान (टेक ऑफ) भरी है यह उड़ान तेज़-ही-तेज़ होती गई। 'मशीनी
पहिए' या भाप के इंजन से प्रारंभ
विज्ञान का इतिहास साइबर स्पेस तक पहुँच गया। सिलिकॉन के एक
अणु में ब्रम्हाण्ड का रहस्य समा गया। बिंदु में गति,
गति में ऊर्जा, ऊर्जा
में बल का रहस्य समाधि में सृष्टि केरहस्य की तरह आर-पार खुल
गया। गति ने द्रव्य, द्रव्य ने पदार्थ,
पदार्थ ने संचार में बदलते हुए कम्प्यूटर,
सुपर कम्प्यूटर,
इंटरनेट, ई.काम की दुर्लभ गति अर्जित
की, जो अब भी ठहरने को तैयार नहीं।
सूचना का विस्फोट किसी परमाणु-विस्फोट से कम नहीं। सारी दुनिया
सूचनाओं के असंख्य 'फ्लाय ओवर'
बन गए। विज्ञान की मुट्ठी में वह सब समा गया
जो ज्ञेय है। रोबोट और रोबोनेट के रूप में प्रतिमानव की सृष्टि
हुई जो मानव से ज़्यादा आज्ञाकारी,
ज़्यादा वफ़ादार, ज़्यादा विश्वसनीय
माने गए। 'टेस्टटयूब'
माँ की कोख में बदल गई। बिना धारण के सृजन,
बिना पीड़ा के सृजन! मातृत्व का सौंदर्य,
राग, मधुर वेदना,
सपने और संवेग सब एक साक्षी भाव में बदल गए।
'क्लोन'
जीवनसाथी हो गए! तो क्या अब मनुष्य के परस्पर संबंध रोबोट
संबंधों में बदलने को हैं? श्रम का
गर्व, पसीने की सृष्टि,
आवेग का उछाह,
आत्माहुति की तृप्ति-उँगली के स्पर्श में केंद्रित हो गए।ऐसे
मे चिंतनीय यह है कि असंख्य मनुष्यों का अस्तित्व,
उनके होने का दैहिक अर्थ,
इंद्रियों और मन के व्यापार,
जीवन और प्राण की सक्रियता का क्या होगा?
ये जीवंत स्फुल्लिंग क्या किसी दैत्य के
विशालकाय जबड़े में समा जाएँगे? क्योंकि
जब इलेक्ट्रॉनिक यंत्र एक उँगली के पोर से वह सब कर लेंगे जो
करोड़ों मनुष्य मिलकर करते थे, तो वे
करोड़ों कहाँ जाएँगे, जीवन यापन कैसे
करेंगे? शक्तिशाली ही अगर जिएँगे,
तो क्या चंद देश या चंद शक्तियाँ हीधरती पर
जीवित रहेंगी और दुनिया प्रलय के बाद की खोखल जैसी रह जाएगी?
परम मेधा क्या सर्वभक्षी साबित होगी?
कहते हैं, ब्रम्हा ने
अपने को दो और फिर अपार में फैलाया था,
तो क्या यह अपार अपने को फिर बिंदु में बदलने जा रहा है?
अब तक तो कोई सुपर कम्प्यूटर मनुष्य के
मस्तिष्क की बराबरी नहीं कर सका लेकिन कोईआश्चर्य न हीं कि
'अल्टीमेट कम्प्यूटर'
मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हो जाए। प्रतिमानव
के बाद अपनी मेधा से अतिमानव की सृष्टि कर मनुष्य एक दिन अपनी
सृष्टि से ही हार जाए तो क्या अचरज? आज
भीप्रतिदिन बदलने वाली कम्प्यूटर -भाषा और नए पैकेजों से
विशेषज्ञों में भी आत्महीनता घर करने लगी हैं,
आख़िर वे कहाँ तक दौड़ लगाएँगे ?
अर्थपिशाचों की शह पर कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी
की नित नई खोज करने, नित नई भाषा गढ़ने
और पढ़ने वालों का जीवन तो चुसे हुए गन्ने की तरह नीस हो ही
चुका है। इसी शुष्कता का क्या तेज संक्रमण होगा?
वैज्ञानिक उपलब्धि की हड़बड़ी के इस युग में सी.वी. रमन और
जगदीशचंद्र बसु जैसे भारतीय वैज्ञानिकों के बारे में सोचना,
जिन्होंने विज्ञान में एक नई सोच दी थी,
एक पिछड़ा हुआ चिंतन लग सकता है,
परंतु इसके अर्थ बहुत दूर तक हमारे अतीत और
भविष्य में जाते हैं। क्योंकि विज्ञान की आश्चर्यजनक प्रगति
जिस क दर अर्थोन्मुख होती जा रही है,
वह भयावह है। मस्तिष्क ज्ञान और धन की विचित्र संग्राम-भूमि बन
गया है। ज्ञान से मुक्ति के संबंध पीछे छूट गए हैं। हर युवक
बिल गेट्स बनना चाहता है, विवेकानंद
कोई नहीं-कैसा होगा वह भविष्य? ऐसे में
हमें अन्वेषण की उक्त मानवीय दृष्टियों पर भी गौर करना चाहिए।
आधुनिकतम चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य के जटिल मस्तिष्क और देह
के भीतर का एक-एक रेशा प्रत्यक्ष देख लिया है। शरीर को मशीन
की तरह पुर्जे-पुर्जे खोलकर फिर से जमा देना आज बाएँ हाथ का
खेल है। जेसे टूस्टयूब बेबी की माँ अपनी संतान की सिर्फ साक्षी
होती है,
वैसे ही एक रोगी अपनी ऑंखें से अपना शरीर
खोलते हुए इस तरह देखता है जैसे वह पराया शरीर हो। यह देखना
मनुष्य को निर्वैयक्तिक बनाएगा या निष्करुण ?
क्योंकि माँ और रोगी के साक्षी भाव में से
पीड़ा का वह तत्व निकल गया है जो संलग्नता पैदा करता है। नतीजा
क्या होगा? दूसरे को कटते,
प्रसव करते, कुचलते,
पिटते और तड़पते देखकर भी मनुष्य साक्षी ही बना
रहेगा, क्योंकि संवेदना के लिए पीड़ा की
अनुभूति ही गायब हो जाएगी। चिकित्सा विज्ञान ने अभी रहस्य का
जो एक कोना नहीं देखा है, वह है प्राण
का, आत्मा के स्वरूप का शायद वही उसे
असीम शक्ति के अहंकार से बचाएगा और शेष मानवता को भी। सारे
साधनो ंके बावजूद अभी उसे मृत्यु पर विजय नहीं मिली है। वह
अपनी सामर्थ्य में कहीं न कहीं सीमित हैं। अगर न होता तो
हाकिंग इस तरह अपंग और लाचार कुर्सी पर देह झुलाए क्यों बैठे
रहते? वे तो दुनिया के महान्
मस्तिष्कों में है। उपचार की उन्हें क्या कमी है?
वाक् का विकल्प, जीवन
धारण का विकल्प तो उन्हें मुहैया है,
लेकिन स्वाभाविक वाक्, सहज जीवन,
मस्तिष्क का शिराओं पर नियंत्रण उन्हें कहाँ
उपलब्ध हो सकाँ हाकिंग की देह इस गतिमान उपलब्धि के लिए चुनौती
है, और शायद चरम की ओर बढ़ती
वैज्ञानिकता को एक चेतावनी भी।
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आगे.......
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