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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। मूल्याँकन ।।

 

 

 

विभाजनोपरान्त मुस्लिम रचनाकारों की अनुभूतिजन्य अभिव्यक्ति


डॉ. मो. फिरोज़ अहमद

 

चनाकार द्वारा निर्मित पात्र, उसका आचार-विचार सामाजिक प्राणी जैसा ही होता है। रचनाकार इसे अपने अनुभवों के आधार पर निर्मित करता है। किसी भी पात्र से जुड़ी आत्मीयता, संवेदना तथा अपनत्व रचनाकार के मानस से जुड़ना होता है। उपन्यास, कहानी, निबंध एवं नाटक आदि रचनाकार की अनुभूतिगत कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह घटनायें एवं परिस्थितियाँ जिससे रचनाकार प्रभावित हुआ तथा उसे अभिव्यक्ति देने हेतु प्रेरित हुआ जो कि रचना के सृजन हेतु यह तथ्य विशेष रूप से महत्तवपूर्ण है। रचनाकार की सफलता उसकी समसामयिक संदर्भों से जुड़ी सशक्त अभिव्यक्ति में निहित है। भारत विभाजन की घटना, देश के लिये सबसे बड़ी त्रासदी थी जिसने पूरे देशवासियों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया, स्वातंत्र्योत्तर उपन्यासों में उपन्यासकारों द्वारा विभाजन का भोगा गया तिक्त अनुभव जीवन्त रूप से चित्रित किया गया है। इस त्रासदी ने सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को ही नहीं साथ में सम्पूर्ण जनसामान्य की मानसिकता को भी प्रभावित किया जिसे सर्जक ने गहराई से अनुभव किया है और उसे अपनी कृति में अभिव्यक्ति प्रदान की है।

 

राही मासूम रज़ा ने विभाजनोपरान्त व्याप्त स्थिति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि - ''हर कैफियत अकेली थी हर ज़ज्बा तन्हा था। दिन से रात और रात से दिन का ताअल्लुक टूट गया था।''3

 

प्रेमपूर्वक रहने वाले भारतवासी एक झटके में केवल हिन्दू और मुसलमान बनकर रह गये। जैसे दिशायें स्तब्ध सी इस घटना को मौन देख रही थी।

 

विभाजन की त्रासदी से जन्मी कड़वाहट ने धर्म की रेखा ही नहीं खिंची बल्कि भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर भी आशंका व्यक्त की जाने लगी जिसे भारतीय मुस्लिम उपन्यासकारों ने न केवल अनुभव किया अपितु इस सत्य को इस पीड़ा के साथ नासिरा शर्मा ने व्यक्त किया है कि - ''वह तर्जुबा कितना तकलीफ़देह होता है कि जहाँ आप पैदा हों जिस ज़मीन को आप अपना वतन समझें उसे बाकी लोग आपका गलत कब्जा बतायें। और साथ ही यह प्रश्न किया जाय कि वह कहाँ रहना चाहता है।''4

 

बद्दीउज्ज़मा ने 'छाको की वापसी' उपन्यास में विभाजन के पश्चात् भारत सरकार द्वारा भारतीय मुसलमानों से निवास सम्बन्धी किये जाने वाले प्रश्न और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जन्म लेने वाली सोच को व्यक्त करते हुए छोटी अम्मा के माध्यम से व्यक्त किया है जिन्हें अपना वतन छोड़कर जाना स्वीकार नहीं है। वह कहती हैं कि हमें पाकिस्तान-वाकिस्तान नहीं जाना है। हम अपना घर-बार छोड़कर परदेस क्यों जायें?5

 

पाकिस्तान के निर्माण के साथ नफ़रत जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गयी थी। आदमी-आदमी का शत्रु बना घूम रहा था। डॉ. राही मासूम रज़ा का मानस भी विभाजन की इस पीड़ा से प्रभावित हुआ था उन्होंने भी इस सत्य को भोगा था। उनका मानस भी पाकिस्तान निर्माण के समर्थन में न था। राही ने अपने उपन्यास 'आधा गाँव' में लिखा है कि नफरत और ख़ौफ की बुनियाद पर बनने वाली कोई चीज़ मुबारक नहीं हो सकती।6

 

मानवीय सोच के विविध स्तर को दिखाने के लिये रचनाकार दो विपरीत विचारों वाले पात्रों के मध्य संवाद प्रक्रिया का आयोजन करता है। इस प्रकार मानस के विविध स्तर उद्धाटित होते हैं। विभाजन के पश्चात् बने नवीन देश पाकिस्तान के प्रति जहाँ कुछ भारतीय मुसलमानों में अविश्वास और विद्रोह था वहाँ कुछ मुसलमानों को मज़हब, इस्लाम, समान संस्कृति वाले नवनिर्मित राष्ट्र से बड़ी आशायें थी।'छाको की वापसी' उपन्यास में छोटी अम्मी पाकिस्तान जाने के पक्ष में नहीं है। परन्तु बद्दीउज्ज़मा ने उपन्यास के दूसरे पात्रों में पाकिस्तान के प्रति रूचि एवं आशायें भी दिखाई हैं। उपन्यास के पात्र कहते हैं कि हिन्दू पाकिस्तान से भागकर हिन्दुस्तान आ रहे हैं। उनकी जगह यहाँ से जाने वालों को मिलेगी और फिर मुसलमानों का अपना मुल्क है। वहाँ न हिन्दू का डर होगा न दंगों का खतरा।7

 

'जिन्दा मुहावरे' उपन्यास में नासिरा शर्मा ने भी बद्दीउज्ज़मा के समान ही पाकिस्तान से जुड़ी आशायें और अपनी सुरक्षा का सन्तोष व्यक्त करने वाली सोच नासिरा शर्मा के उपन्यास 'जिन्दा मुहावरे' के पात्र निज़ाम में दिखाई पड़ता है। द्रष्टव्य है - ''जहाँ जात है अब वही हमार वतन कहलइहे। नया ही सही अपना तो होइहे। जहाँ रोज़-रोज़ ओकी खुद्दारी को कोई ललकारिये तो नाही। कोई ओके गरिबान पर हाथ डालै की जुर्रत तो न करिहे।''8

 

पाकिस्तान का निर्माण साधारण जनता की इच्छा न होकर राजनीतिक स्वार्थ का परिणाम था। यही कारण है कि भारतीय मुसलमान विभाजन से अप्रसन्न थे, साथ ही वह भारत छोड़कर जाने को तैयार न थे। मनुष्य की यह सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपनी जमीन, सम्बन्धी, पड़ोसी, समाज और देश के प्रति प्रेम रखता है। परिस्थितिवश प्रेम का स्वरूप बदल भी सकता है। यह सब कुछ मानस से प्रभावित सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है। राही मासूम रज़ा का छोटा सा गाँव गंगौली भी विभाजन से प्रभावित था। गाँव के कुछ लोग पाकिस्तान चले गये थे तो कुछ अपने पूर्वजों की धरती छोड़कर जाने को तैयार न थे। कुछ सम्बन्धियों के कारण देश छोड़कर जाने पर विवश हुए। भारत विभाजन के पश्चात् भारतीय मुसलमान द्वन्द्वात्मक पीड़ा की यातनायें सह रहा था। राही मासूम रज़ा ने सब कुछ बहुत निकट से देखा था और महसूस भी किया था जो उनके मानस पर चित्रित हो गया था। वही उपन्यास में घटना और प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त हुआ। उन्होंने आधा गाँव उपन्यास में कृषक वर्ग की मातृभूमि के प्रति प्रेम दिखाने का प्रयास किया है, जैसे - ''हम ना जाय वाले हैं ... जहाँ हमरा खेत हमरी जमीन तहाँ हम।''9

 

परम्परावादी, ईश्वरवादी, भारतवासी अपने देश की मिट्टी में ही अपना अन्त चाहता है। 'ओंस की बूंद' उपन्यास में भी राही का यही भाव व्यक्त हुआ हैं'' मैं एक गुनहगार आदमी हूँ और उसी जमीन पर मरना चाहता हूँ जिस पर मेंने गुनाह किये हैं।''10

 

राही मासूम रज़ा के उपन्यासों में पाकिस्तान को लेकर बार-बार आक्रोश और विरोध व्यक्त हुआ है जिससे उनके भीतर का देशप्रेम दिखाई पड़ता है। वह बार-बार अपने देश के प्रति अपने लगाव को अलग-अलग शब्दों में अभिव्यक्ति प्रदान करते दिखाई पड़ते हैं। 'आधा गाँव' उपन्यास के पात्रा का संवाद पुन: राही मासूम रज़ा के देशप्रेम का प्रमाण प्रस्तुत करता है - ''अच्छा हम कह दे रहे हैं कि हमरे सामने तू पाकिस्तान का नाम मत ली हो। तू है बहुत शौक चर्राया है तो जाओ बाकी हम अपनी लड़कियन को लेके इहहँ रहिहै।''11

 

विभाजन के पश्चात् प्रभावित मुस्लिम समाज का उल्लेख नासिरा शर्मा, राही मासूम रज़ा, बद्दीउज्ज़मा आदि बहुत सारे उपन्यासकारों ने किया है। विवेच्य संवादों में व्यक्त मानसिकता से स्पष्ट है कि अधिकांश मुसलमान न ही पाकिस्तान के निर्माण के पक्ष में थे और न ही पाकिस्तान के प्रति उनमें रूचि थी, यदि कुछ लोगों में पाकिस्तान से जुड़ी अपेक्षायें थी भी तो उसका कारण अपने ही देश में मिलने वाली उपेक्षा और असुरक्षा की आशंका थी।विभाजन के पश्चात् अर्थ की समस्या सामने आ गई थी। बदलते समाज और बदलते जीवन मूल्यों के साथ जीने का तौर तरीका बदलता जा रहा हैं माँ-बाप द्वारा दिये जाने वाले सुख में खोयी सन्तान उनके त्याग, बलिदान से पूरी तरह अनभिज्ञ है। उसे आभास कराने के लिये माँ-बाप समय-समय पर सचेत करते हैं। अपने जीवन के संघर्षों की घटना सुनाकर नयी पीढ़ी में विश्वास, शक्ति तथा त्याग पैदा करना चाहते हैं। 'छाको की वापसी' में अब्बा के माध्यम से बद्दीउज्ज़मा ने ऐसे ही तथ्यों पर प्रकाश डाला है। उपन्यास के पात्र अपने जीवन के अनुभवों एवं संघर्षों के सम्बन्ध में कहते हैं कि - ''तुम लोगों को क्या पता कितनी मुसीबतें झेलकर पढ़ा है। टयूशन कर करके पढ़ाई और खाने पीने का खर्च निकाला है। अक्सर फीस के लिए मेरे पास पैसे नहीं होते थे।''12

संदर्भः

1.डॉ0 बदरीप्रसाद, हिन्दी में तुलनात्मक आलोचना, पृ0 43

2.वही, पृ0 138

3.राही मासूम रज़ा, आधा गाँव, पृ0 336

4.नासिरा शर्मा, जिन्दा मुहावरे, पृ0 101

5.बदीउज्ज़मा, छाको की वापसी, पृ0 17

6.आधा गाँव, पृ0 256

7.छाको की वापसी, पृ0 17

8.जिन्दा मुहावरे, पृ0 11

9.आधा गाँव, पृ0 218

10.राही मासूम रज़ा, ओस की बूँद, पृ0 19

11.आधा गाँव, पृ0 315

12.छाको की वापसी,पृ0 12

एक - दो - तीन

 

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