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हिंदी ग़ज़लों में विचार हैं, मिज़ाज नहीःहस्तीमल हस्ती
साक्षात्कारःजयप्रकाश मानस
मानस -
हिंदी ग़ज़लकारों की ईमानदार फ़ेहिरस्त में इधर आपका नाम बड़े
ही अदब से लिया जाने लगा है, आप इस मुकाम तक पहुँचने की यात्रा
के बारे में विस्तार से बताएंगे।
हस्तीमल जी - आपके
इस सवाल का जवाब इस तरह देना चाहूँगा। पहले तो मैं यह स्पष्ट
कर दूँ मेरे परिवार और बिरादरी का साहित्य से तो दूर शिक्षा से
भी बहुत वास्ता नहीं रहा। स्कूली पढ़ाई करके व्यवसाय संभाल
लेना यही परंपरा लगभग मेरे परिवार में रही। उस दौर के सभी
कस्बाई परिवारों की लगभग यही स्थिति थी। हाँ मेरे छोटे से
कस्बे में डाक के माध्यम से दो-चार अख़बार ज़रूर आते थे, उनमें
से एक अख़बार मेरे घर में भी आता था। मेरा किशोर मन उनमें आने
वाली चित्र कथाओं एवं व्यंग्य चित्रों का बड़ा रसिक था। स्कूल
के पुस्तकालयों में बाल पत्रिकाएँ भी आती थीं। उनको बड़े चाव
से पढ़ता था। कुल मिलाकर उस वक्त मेरा किशोर मन शब्दों की
दुनिया से परिचित हो गया था। नियति ने जब मेरे स्वभाव में
काव्य विधा का अंकुरण किया तो संवेदनाएँ शब्दों के माध्यम से
आकार लेने लगी। मेरी पहली कविता
‘अणुव्रत’
नाम की लघुपत्रिका में लगभग 35 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई। पहली
रचना के प्रकाशन की खुशी को हर रचनाकार जानता है। प्रारंभ में
कुछ मुक्तक लिखे फिर कुछ गीत, कुछ कहानियाँ भी लिखीं। इस
अंतराल में एक गुजराती शायर बरकत विराणी
‘बेफाम’
के ग़ज़ल संग्रह ने मेरे अचेतन को इस क़दर प्रभावित किया कि
मैं सब कुछ छोड़कर ग़ज़ल विधा पर उतर आया। दोहे भी साथ-साथ
चलते रहे। मेरे काव्य-सृजन में आत्मसंघर्ष की उपस्थिति पहले
संकलन तक रही। वैसे संघर्ष किसी का भी था वह मेरे निजी अनुभूति
बनकर शब्दों में ढलता रहा।
मानस - आप अपनी
ग़ज़लों को समकालीन ग़ज़लकारों से एक पृथक और स्पष्ट पहचान के
रूप में किस तरह देखते हैं ?
(खासकर अपनी कृतियाँ, विषय-वस्तु, शिल्प और भाषा के मुआमले
में)
हस्तीमल जी - सबसे
पहली बात तो यह है कि मैं ग़ज़लों का सृजन इन सब बातों को अलग
से सोच कर नहीं करता। विषय-वस्तु और शिल्प की जहाँ तक बात है
सिर्फ़ ग़ज़ल के लिए ही नहीं हर विधा के ये आवश्यक तत्व हैं।
जो कुछ अब तक लिखा गया है, उससे हटकर अगर सृजन नहीं होगा तो
कलमकारों की इस भीड़ में पहचान नहीं बन पाएगी। मेरे अचेतन में
शुरू से यह बात पैठी हुई है। अतः मेरी ग़ज़लों में कहीं न कहीं
सहज रूप से नयापन दिखाई पड़ता है। समीक्षकों का भी यही कहना
है। मेरे एक शेर से यह बात स्पष्ट हो जाएगी
–
‘जब
खुद से मिला मैं तो सभी कर दिए सीधे
जितने भी वरक मेरी किताबों के मुड़े थे।’
जहाँ तक भाषा की
बात है मैं सहज भाषा का हिमायती रहा हूँ। इसे हिंदुस्तानी भाषा
भी कहा जा सकता है। ग़ज़ल की समृद्धि इसी भाषा के प्रयोग से
संभव है। न क्लिष्ट उर्दू न क्लिष्ट हिंदी से।
मानस - कहते हैं कि
कभी-कभी एक ही बैठक में पूरी ग़ज़ल की सर्जना हो जाती है, और
कभी-कभी महीनों और साल तक गुज़र जाते हैं, आप अपनी
रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएंगे
?
हस्तीमल जी - आपका
कहना सही है ग़ज़ल विधा सुनने-पढ़ने में जितनी आसान लगती है,
उतनी है नहीं। जिन आवश्यक तत्वों
–
बहर, काफिया, रदीफ का निर्वाह ग़ज़ल विधा में आवश्यक है उस
हिसाब से प्रत्येक शे’र
की बुनावट में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। कभी शे’र
बन जाते हैं, तो मतला अटक जाता है, कभी मतला बन जाता है तो
रदीफ, काफिये, लय की बंदिश की वजह से शेर नहीं बन पाते हैं।
क्योंकि बात लंबी होती है और बहर छोटी।
हर रचनाकार प्रसव की पीड़ा से गुज़रता है। यह प्रसव बड़ी
व्याकुल प्रक्रिया है। दिनचर्या, फिर मुंबई की ज़िंदगी।
भागती-दौड़ती ज़िंदगियों को हर वक्त देखना, उससे गुज़रना। कहीं
न कहीं ये बातें भई, जोआज का मेरा परिवेश है, भूगोल है, मुझे
उलझाती रहती हैं। पर मेरे मन में ये बातें उमड़ती-घुमड़ती रहती
है। तब तक, जब तक वे मुकम्मल शे’र
में तब्दील न हो जाएँ। फिर आप जानते हैं कि वहाँ शिल्प का भी
पूरा ख़याल रखना होता है।
मानस - अभी आपने
दिनचर्या में एक बड़े व्यवसाय का जिक्र किया, फिर आप मुंबई
जैसे व्यस्ततम शहर में रहते हैं। आप अपनी संवेदना को किस तरह
इतना उम्दा बनाए रखे हुए हैं
?
हस्तीमल जी - सबसे
पहले यह ‘बड़ा’
शब्द हटा लीजिए। बेशक मैं एक व्यवसायी रहा हूँ, लेकिन छोटा।
मैंने व्यवसायिकता का निर्वाह एक दफ्तरी बाबू की तरह किया। 10
से 6 बजे तक आफिस फिर अपनी निजी जिंदगी। मैंने व्यवसाय का
निर्वाह इसी तरह किया है, मेरे व्यवसाय में कविता तो आड़े आई
है, लेकिन कहीं व्यवसाय आड़े नहीं आया। इस संबंध में मेरा एक
दोहा देखें –
‘तन
बुनता है चदरिया, मन बुनता है पीर
दास कबीरा सी रही, अपनी तकदीर’
मानस - मुंबई आपकी
ग़ज़लों में कितना उपस्थित हैं, यदि उसकी जगह सारी दुनिया,
सारी मानवता, समूची पीड़ा है तो क्यों कर
?
क्या आपके अतीत के समय-चित्र अधिक आकर्षित करते रहे हैं आपको
और जिसके इमेज से आप स्वयं को अधिक करीब पाते हैं
?
हस्तीमल जी -
कोई भी इंसान शहर में रहता हो या गाँव में उनकी परेशानियाँ,
बेचैनियाँ, मजबूरियाँ एवं उनकी तनहाइयों में बहुत ज्यादा अंतर
नहीं होता। मेरी ग़ज़लों में शब्द रूप से भले बम्बई नहीं आया
है, लेकिन जो तत्व मेरे शेरों के प्रेरणातत्व बने हैं, वे
बम्बई शहर ने ही दिए हैं, जो हर शहर और हर आदमी के लगते हैं।
मानस जी, अतीत तो हर वर्त्तमान की स्मृति में आता-जाता रहता
है। शब्द बहुत जल्दी नहीं गायब होते हैं। इन शब्दों में हमारी
समूची दुनिया आगे बढ़ती रहती है। हर शब्द किसी न किसकी दृश्य,
घटना, कहानी, मर्म का बयान देता है। भले ही यह निजी तौर पर हो।
पर हमारे जीवन में शब्द एक चित्र तो दे ही जाते हैं, जो भविष्य
की भी बात करते हैं।
मानस - ग़ज़ल लिखते
वक्त आपके मन-मनीषा में हिंदी ग़जल की कैसी संरचना आपको
उत्प्रेरित करती रहती हैं ?
क्या उसे आप हिंदी ग़ज़ल की आदर्श संरचना कहना
चाहेंगे ?
आपकी दृष्टि में एक मुकम्मल ग़ज़ल की पहचान
?
हस्तीमल जी -
जहाँ तक हिंदी ग़ज़ल की बात है मैंने हिंदी-ग़ज़ल और
उर्दू-ग़ज़ल में कभी स्पष्ट विभाजन नहीं देखा। उर्दू जगत के
लोग भी सरल हिंदी शब्दों का प्रयोग करते देखे गए हैं और हिंदी
ग़ज़ल में तो बोल-चाल में प्रयुक्त होने वाले उर्दू शब्दों का
प्रयोग धड़ल्ले से हो ही रहा है। जो कोशिश करके हिंदी ग़ज़लें
(शुद्ध रूप हिंदी शब्दों का प्रयोग) लिख रहे हैं, वे कर्णप्रिय
कभी नहीं लगीं। काव्य सृजन हमेशा म्युजिकल शब्दों के प्रयोग से
ही निखरा है। ग़ज़ल के लिए तो यह एक आवश्यक तत्व भी है। जहाँ
तक मुकम्मल ग़ज़ल की बात है रदीफ, काफिया, बहर ग़ज़लियत आदि का
निर्वाह करने वाली ग़ज़ल ही मुकम्मल ग़ज़ल कहलाएगी। मुकम्मल
ग़ज़ल के लिए किसी विशेष विषय-वस्तु की अनिवार्यता नहीं है। एक
मुकम्मल ग़ज़ल रुमानी भी हो सकती है, रूहानी भी एवं दुष्यंत
कुमार की शैली वाली भी हो सकती है।
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