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दो
सरस प्रसंग- वैज्ञानिकों के
बेमिसाल जवाब
सर
आशुतोष एक बार सीधे-सादे कपड़ों में प्रथम श्रेणी के डिब्बे
में यात्रा कर रहे थे । उसी डिब्बे में एक अँगरेज़ भी बैठा था
। उसे अपने साथ एक भारतीय का सफ़र करना अच्छा नहीं लगा । उसने
कई बार सर आशुतोष से डिब्बा बदलने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने
उसकी बात पर कोकई ध्यान नहीं दिया।
अँगरेज़ का गुस्सा बढ़ता गया और रात में जब सर आशुतोष सो गए,
तो उसने जूता उठाकर खिड़की से बाहर फेंक दिया ।
थोड़ी देर मे सर आशुतोष की नींद खुली तो उन्हें अपना जूता
नदारद मिला । उन्हें यह समझते देर नही लगी कि यह हरकत किसने की
है । अँगरेज़ खर्राटे भर रहा था । उन्होंने उसका टँगा कोट
उठाकर बाहर फेंक दिया और बैठकर आराम करने लगे ।
थोड़ी देर बाद जब अँगरेज़ उठा तो उसने चारों ओर देखकर पूछा-
‘मेरा
कोट कहाँ है
? ’
‘आपका
कोट?’-सर
आशुतोष ने मुस्कराते हुए जवाब दिया-
‘आपका
कोट मेरा जूता लाने गया है।’
जवाब के लहजे से अँगरेज़ को यह भाँपते देर नहीं लगी कि वह कोई
मामूली आदमी नहीं है । इसीलिए उसने उलझना अच्छा न समझा और
बुदबुदाते हुए अपना मुँह फेर लिया ।
प्रतिष्ठा की रक्षा
बात तब की है, जब आचार्य राय ने
‘बंगाल
केमिकल्स’
की स्थापना की थी । उस समय लोगों की आम धारणा थी कि विदेशी
दवाओं के सामने देशी दवाएँ टिक नहीं पाएँगी । मगर आचार्य राय
थे संकल्पी पुरूष । उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि इस
प्रतिष्ठान में बनी कोई भी दवा किसी विदेशी दवा से किसी भी
मामले मे कम नहीं होगी ।
एक बार कई सौ बोतलों का आसव किसी कारणवश बिगड़ गया । कारखाने
के एक कर्मचारी ने कहा-
‘आसव
थोड़ा ही बिगड़ा है, किसो को पता भी नहीं चलेगा । बाज़ार मे
आसानी से बिक जाएगा, अन्यथा कंपनी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा
।’
आचार्य राय उस पर बिगड़े और दृढ़ता से इसका विरोध किया –
‘ज़रा
से नुकसान से हमारी प्रतिष्ठा पर आँच आए, यह मैं बर्दाश्त नही
कर सकता ।’
अंत में बिगड़ी हुई औधषि की सारी बोतलों के आसव फेंकवा देने में
प्रफुल्ल चंद्र राय को कतई दुःख नहीं हुआ ।
शुकदेव प्रसाद
34, एलनगंज, इलाहाबाद -
2110021
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