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अतिवाद का ख़तरनाक चेहरा
:
नक्सलवाद ।।
नक्सलवाद
भटका हुआ आंदोलन है । यह अतिवाद का सबसे धुर्त तरीका है । यह
अधैर्य की उपज है । इसकी बस्ती में मानवता की कोई बयार नहीं
बहती । यह पशुयुग की वापसी का उपक्रम है जिसके मूल में है
हिंसा और सिर्फ़ हिंसा। यह जन के लुटे हुए सत्व के लिए नहीं
अपितु हितनिष्ट ताकतों की राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र
है, जिन्हें वस्तुतः जनता के कल्याण से कोई वास्ता नहीं है ।
तथाकथित समाजवादी मूल लक्ष्यों की साधना से न अब किसी कमांडर
को लेना देना है न वैचारिक सूत्रधारों को । वह पथभ्रष्ट और
सिरफ़िरे लोगों की राक्षसी प्रवृत्तियों और हिंसक गतिविधियों
का दूसरा नाम है । रहे होंगे उसके अनुयायी कभी सताये हुए लोगों
के देवता, अब तो उनका दामन आदिवासियों, गरीब और अहसाय लोगों की
लहू से रंग चुका है । उसके मेनोफेस्टो में अब
दीन-दुखी, पीडित-दलित, मारे-सताये हुए पारंपरिक रूप से शोषित
समाज के प्रति न हमदर्दी की इबारत है, न ही समानता मूलक
मूल्यों की स्थापना और विषमतावादी प्रवृतियों की समाप्ति के
लिए लेशमात्र संकल्प शेष बचा है । वह स्वयं में शोषण का
भयानकतम् और नया संस्करण बन चुका है । वह अभावग्रस्त एवं सहज,
सरल लोगों के मन-शोषण नहीं बल्कि तन-शोषण का भी जंगली अंधेरा
है । एक मतलब में नक्सलवाद शोषितों के ख़िलाफ़ हिंसक शोषकों का
नहीं दिखाई देने वाला शोषण है । कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप और
विशेष कर छत्तीसगढ़ के दर्पण में नक्सलवाद का तो यही विकृत
चेहरा नज़र आता है।
नक्सलवाद के बौद्धिक हिमायती वाग्जाल गढ़ते हैं
–
यह समाजवाद की क्रांतिकारी और अंतिम विधि है और मानववाद का
संरक्षण ही उनका चरम ध्येय है। यदि समाजवादी आंदोलन की बुनियाद
में मानव प्राण के प्रति सम्मान था तो फिर निरीह,
निर्दोष लोगों को खुलेआम कत्ल करने की वैचारिक वैधता नक्सलियों
ने कहाँ से ढूँढ़
निकाली। यह भी
प्रकारांतर से सत्तावादी मानसिकता का परिणाम हैं । इतिहास में
गवाहियाँ है कि भारतीय परंपरा में समाज के सभी वर्गों में
समानता की स्थापना के लिए संचालित हर वैचारिक आंदोलन को अंततः
जनता का भरपूर साथ मिलता रहा है । पर सलवा जुडूम(छत्तीसगढ़ के
बस्तर के आदिवासियों द्वारा संचालित जन आंदोलन) साबित करता है
कि नक्सलवाद मनुष्यता का विरोधी है । जैसा कि नक्सली मानते हैं
कि वे जनता के अधिकारों के पहरुए हैं और उन्हें शोषण से मुक्त
करना ही उनका लक्ष्य है तो वे उसी शोषित जनता की हत्या की
राजनीति क्यों चलाते हैं । यहाँ उनकी यह करतूत क्या उन्हें
वामपंथी फ़ासिज्म से नहीं जोड़ देती है?
नक्सली जिस रास्ते पर चल रहे हैं उससे अंतत: लाभकारी होगा वॉर
इंडस्ट्री को।
ख़ास कर उन्हें जो हथियारों की चोरी-छिपे भारत में
अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति को निरंतर बनाये रखना चाहते हैं ।
इनकी घोर क्रांतिकारिता जैसे शब्दावली ही बकवास है।
उसे मानवीय गरिमा की स्थापना की लड़ाई कहना नक्सलवाद का सबसे
बड़ा झूठ है । अदृश्य किंतु सबसे बड़ा सत्य तो यही है कि वह
सत्ता प्राप्ति का गैर प्रजातांत्रिक और तानाशाही (अ)वैचारिकी
का हिंसक संघर्ष है ।
नक्सलवाद की धूर्तता के सामने समाजविज्ञानियों और विचारकों का
शास्त्र भी अब पूर्णतः फेल हो चुका है जहाँ कभी यह माना जाता
रहा कि नक्सलवाद की उत्पत्ति में लोकतांत्रिक सत्ता की लुच्चाई
और टुच्चाई भी रही है । उनकी ओर से कभी तर्क गढ़ा जाता रहा कि
देश में 92
प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। मज़दूरों
के ख़िलाफ़ ठेकेदार,मालिक
या ज़मींदार की तरफ़ से हिंसा की जाती है।
जिन उत्पादक रिश्तों में हिंसा एक दैनिक कर्म हो,
वहां नक्सलवाद जैसी प्रतिरोधी गतिविधियों का
होना स्वाभाविक है।
यह भी भूल साबित हो चुका है । और इस भूल के शिकार होकर सैकड़ों
हजारों असंतुष्ट युवा, बुद्धिजीवी और बेरोजगार इस आंदोलन में
अपना जीवन व्यर्थ गवाँ चुके हैं । वे भारी भूल में थे जो यह
समझते रहे कि वे मानवीय हित के लिए लड़ रहे हैं या वे समाज के
लिए शहीद हो रहे हैं । न उनके आँगन का अंधेरा छंटा न ही
गाँव-समाज-देश का । वास्तविकता तो यही है कि जाने कितने गरीब
माँओं का आँचल सूना हो चुका है । सैकड़ों असमय वैधव्य झेल रही
हैं। हजारों बच्चे आज सामाजिक विस्थापन झेल रहे हैं । एक ओर
उन्हें हिंसावादी की संतान मान कर असामाजिक दृष्टि को झेलना
पड़ रहा है दूसरी ओर वे असमय आसराविहीन हो रहे हैं । हाँ
कभी-कभी उनके पिताओं के नाम पर बने किसी स्मृति पत्थर पर ज़रूर
दो-चार जंगली फूल ज़रूर सजा दिये जाते हैं । वह भी इसलिए कि
भावुक और आक्रोशित युवा नक्सलियों को शहीद होने का भ्रम बना
रहे । यह सिर्फ़ ढोंग और नक्सलवाद की कुटिल चालें हैं, और कुछ
नहीं । मतिभ्रष्ट भारतीय युवा नक्सलवाद के इसी ढोंग का शिकार
हो चुका है ।
नक्सलवाद से जुझती सरकारों की हालत भी पतली हो रही है । विकास
के लिए आरक्षित धनराशि का एक बड़ा हिस्सा पुलिस और सैन्य
व्यवस्था के नाम पर व्यय हो रहा है जो अनुत्पादक है । इससे
तरह-तरह की नया भ्रष्ट्राचार भी पनप रहा है । यदि खबरों पर
विश्वास करें तो नक्सल प्रभावित लोगों के लिए प्रायोजित राहत
के नाम पर फिर से बाजारवादी और लूट-घसोट में विश्वास रखने वाले
ठेकेंदारों को नई उर्जा मिल रही है ।
नक्सलवाद की मान्यता है
कि भारत अर्ध सामंती,
अर्ध औपनिवेशिक राज व्यवस्था वाला समाज है। हथियारों के माध्यम
से वे यहाँ
पीपल्स डेमोक्रेसी यानी सर्वहारा की सत्ता स्थापित की जा सकती
है । इस मुद्दे पर उग्र वामपंथी (नक्सली) और
उदार वामपंथी के देखने का नज़रिया भिन्न-भिन्न है। उदार
वामपंथी यानी सीपीआई,
सीपीएम,
सीपीआई (माले)
जैसी राजनीतिक पार्टियाँ संवैधानिक संस्थाओं में आस्था जताकर
लोकतांत्रिक तरीके से
राजसत्ता हासिल करना चाहती है जबकि इसके ठीक विपरीत नक्सली
इन्हें झूठ मानते हैं। उनकी गतिविधियों का
मुख्य उद्देश्य है पीपल्स आर्मी गठित करना। यह एक तरह का
वामपंथी सैन्यवाद है। उग्र वामपंथियों
और उदार वामपंथियों के बीच विभाजन की मुख्य वजह ही है हिंसा।
आख़िर
ये नक्सली छद्म माँग को त्यागकर लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष
के लिए तैयार क्यों नहीं होते?
निर्दोष लोगों की हत्या के पीछे आख़िर उनका कौन-सा अदृश्य
एजेंडा है ?
क्या
यह एक नैतिक
अपराध नही है ?
सबसे बड़ी बात है कि यह प्रजातांत्रिक मूल्यों का संपूर्ण
प्रतिरोध है जिसे कतई सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती । आख़िर
बातचीत हो तो भी कैसे
?
अतिवादियों का यह दर्शन भी भटकाव है, मिथ्यात्मक है कि
माओत्सेतुंग की मृत्यु के बाद यह सब हुआ । सच्चाई तो यही है कि
माओत्से
तुंग अति राष्ट्रवादी थे। माओ ने लिन प्याओ को अपना
उत्तराधिकारी बनाया। वह हमेशा राज्य के
हित में और कौमी राज्य के हित में संलग्न रहता था । फिर ये
नक्सली किन एजेंडों पर काम कर रहे हैं और किस तरह की नैशनलिज्म
की राह पर चल रहे हैं, किसी से छुपा नहीं है अब ।
नक्सली या माओवादी यदि ख़ून-खराबा और हिंसा त्याग दें और बाकी
माँगें रखें तो ज़्यादा संभव है कि उनका यह संघर्ष समाज
और देश के लिए बेहतर साबित हो ।
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