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ज्वलंत
मुद्दा
इसलिए बिदा करना चाहते
हैं, हिंदी को हिंदी के कुछ अख़बार
प्रभु
जोशी
दुनिया की हर भाषा की
ज़िंदगी में एक बार कोई निहायत ही निष्करुण वक्त दबे
पाँव
आता है और
'उसको
बोलने वालों'
के हलक़ में हाथ डालकर उनकी ज़ुबान पर रचे-बसे
शब्दों को दबोचता है और धीरे-धीरे उनके कोमल गर्भ में साँस
ले रहे अर्थों का गला घोंट देता है। एक
तरफ़
वह
'पवित्र
को ध्वंस'
में धकेलता है तो दूसरी
तरफ़
वह
'अतीत
में आग'
लगाता हुआ,
चौतरफा भय और निराशा फैला देता है। ऐसे ही वक्त
के ख़िलाफ़
अंतत: मंगल पाण्डे की बंदूक से गोली निकलती है
और
1857
का गदर (?)
मच जाता है। .....आज
हम फिर
1857
के ही निकट पहुँच गये हैं। वे तब ये कहते हुए
आए थे :
'हम,
तुम असभ्यों को सभ्य बनाने के लिए तुम्हारे देश
में घुस रहे हैं।'
मगर इस बार वे कह रहे हैं :
'हम,
तुम कंगलों को सम्पन्न बनाने के लिए तुम्हारे
यहाँ आ रहे हैं।'
.......सुनो,
हम जिस
'पूँजी
का प्रवाह'
शुरू कर रहे हैं,
वह तुम्हारे यहाँ समृध्दि लायेगी। .......लेकिन,
हक़ीक़त में यह देश को समृध्द नहीं बल्कि,
एक किस्म के
'सांस्कृतिक-अनाथालय'
में बदलने की
युक्ति है। वे धीरे-धीरे आपसे आपकी बोलियाँ और भाषा छीन रहे
हैं-तिस पर विडम्बना यह है कि उनके इस काम में हमारे कुछ अख़बार
भी तन-मन-धन से जुट गये हैं। इसी
महत्वपूर्ण
मुद्दे
को लेकर
प्रभु जोशी जी ने
जिरह छेड़ते
कुछ ज्वलंत सवाल
भी खड़े किये हैं
। प्रस्तुत है उनका विचारोत्तेजक आलेख - संपादक
भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की
सूची के शीर्ष पर हैं,
जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की
आसक्त और
अपलक
बौध्दिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का
मोक्ष है । दरअस्ल कारण यह कि वह बिरादरी अपने
'आप्तवाक्यों'
में हर समय 'इतिहास'
का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम
आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर
देखना सिखाता है, इसलिए वह
गति-अवरोधक है । जबकि भविष्यातुर रहनेवाले लोगों के लिए
गरदन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है । एक़दम
निषिध्द है। ऐसे में बार-बार इतिहास के पन्नों में रामशलाका की
तरह आज के प्रश्नों के भविष्यवादी उत्तर बरामद कर सकना असम्भव
है । हमारी सुनो,
और जान लो कि इतिहास एक रतौंध है,
तुमको उससे बचना है । हिस्ट्री इज बंक । वह
बकवास है । उसे भूल जाओ ।
बहरहाल--
'अगर-मगर
मत कर । इधर-उधर
मत तक । बस सरपट चल।'
भविष्यवाद का यह नया सार्थक और अग्रगामी
पाठ है।
जबकि इस वक्त की हक़ीक़त
यह है कि हमारे भविष्य में हमारा इतिहास एक घुसपैठिये की तरह
हरदम मौजूद रहता है । उससे विलग,
असंपृक्त और मुक्त होकर रहा ही नहीं जा
सकता। इतिहास से मुक्त होने का अर्थ स्मृति-विहीन हो जाना है,
सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है । लेकिन वे हैं
कि बार-बार बताये चले जा रहे हैं कि तुम्हारे पास तुम्हारा
इतिहास-बोध तो कभी रहा ही नहीं है। और जो है,
वह तो इतिहास का बोझ है । तुम लदे हुए हो।
तुम अतीत के कुली हो और फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए अपना
पेट भर पालने की जद्दोजहद में हो,
जबकि ग्लोबलाइजेशन की फ्यूचर एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी है
और सीटी बजा चुकी है । इसलिए तुम इतिहास के बोझ को अविलम्ब
फेंको और इस ट्रेन पर लगे हाथ चढ़ जाओ ।
जी हाँ,
अधीरता पैदा करने वाली नव उपनिवेशवाद की
यही वह मोहक और मारक ललकार है, जो
कहती है कि अब 'आगे'
और 'पीछे'
सोचने का समय नहीं है । अलबत्ता,
हम तो कहते हैं कि अब तो 'सोचने'
का काम तुम्हारा है ही नहीं। वह तो हमारा
है । हम ही सोचेंगे तुम्हारे बारे में । अब हमें ही तो सब कुछ
तय करना है तुम्हारे बारे में। याद रखो हमारे पास वह छैनी है,
जिस के सामने पत्थर को भी तय करना पड़ता कि
वह क्या होना चाहता है -- घोड़ा या कि सांड । उस छैनी से यदि हम
तुम्हें घोड़ा बनायेंगे तो निश्चय ही रेस का घोड़ा बनायेंगे ।
यदि हमें सांड बनाना होगा तो तुम्हें वो सांड बनायेंगे जो
अर्थव्यवस्था को सींग पर उछालता हुआ सेंसेक्स के ग्राफ में
सबसे ऊपर
हुँकारता
हुआ दिखाई पड़ेगा ।
इन्हीं चिन्तकों की इसी नई नस्ल ने हिन्दी के तमाम दैनिक
अख़बारों के पन्नों पर रोज़-रोज़ लिख लिखकर सारे देश की
आँख
उस
तरफ़
लगा दी है,
जहाँ विकास दर का ग्राफ बना हुआ है और
उसमें दर-दर की ठोंकरे खाता आम आदमी देख रहा है कि येल्लो,
उसने छ:, सात,
आठ और अब तो नौ के अंक को छू लिया है । इसी
दर के लिए ही तमाम दरों-दीवारों को तोड़कर महाद्वार बनाया जा
रहा है । इसे ही ओपन-डोअर-पॉलिसी कहते हैं । और,
कहने की ज़रूरत नहीं कि चिन्तकों की ये फौज,
इसी ओपन-डोअर से दाखिल हुई है । यही उसकी
द्वारपाल है, जो घोषणा कर रही है कि
तुम्हारे यहाँ मही (पृथ्वी) पाल आ रहे हैं। तुम्हारे यहाँ
विश्वेश्वर आ रहे हैं। दौड़ो और उनका स्वागत करो। तुमने तो
आपातकाल का भी स्वागत किया था, तो
इसका 'स्वागत'
करने में क्या हर्ज है ?
मज़ेदार बात यह कि इसके स्वागत में,
इसकी अगवानी में,
सबसे पहले शामिल है,
हिन्दी के अख़बार । वे बाजा
फूँक
रहे हैं और
फूँकते-फूँकते
बाज़ारवाद
का बाजा बन गये हैं । ये अख़बार पहले विचार देते थे। विचार की
पूँजी
देते थे,
लेकिन अब
पूँजी
का विचार देने में जुट गये हैं । एक अल्प उपभोगवादी भारतीय
प्रवृत्ति को पूरी तरह उपभोक्तावादी बनाने की व्यग्रता से भरने
में जी-जान से जुट गये हैं,
ताकि भूमण्डलीकरण के कर्णधारों तथा
अर्थव्यवस्था के महाबलीश्वरों के आगमन में आने वाली अड़चनें ही
ख़त्म
हो जाये और इन अड़चनों की फेहरिस्त में वे तमाम
चीज़ें
आती है,
जिनसे राष्ट्रीयता की गंध आती हो ।
कहना न होगा कि इसमें इतिहास,
संस्कृति और सभी भारतीय भाषाएँ
शीर्ष पर हैं। फिर हिन्दी से तो
'राष्ट्रीयता'
की सबसे तीखी गंध आती है । नतीज़तन
भूमण्डलीकरण की विश्व-विजय में सबसे पहले निशाने पर हिन्दी ही
है । इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद,
संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी
है। दूसरे इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की
संवैधानिक भूल गांधी की उस पीढ़ी ने कर दी,
जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी
राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता ।
चूँकि
भाषा सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं,
बल्कि चिन्तन प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास
और विस्तार का भी हिस्सा होती है । उसके नष्ट होने का अर्थ एक
समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का
नष्ट हो जाना है । वह प्रकारान्तर से राष्ट्रीय एवं
जातीय-अस्मिता का प्रतिरूप भी है । इस अर्थ में,
भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक
धरोहर भी है । अत: उसका संवर्ध्दन और संरक्षण एक अनिवार्य
दायित्व है ।
जब देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अख़बार ने
विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में बाकायदा सुनिश्चित व्यावसायिक
रणनीति के तहत अपने अख़बार के कर्मचारियों को हिन्दी में
40
प्रतिशत
अँगरेज़ी
के शब्दों को मिलाकर ही किसी
ख़बर
के छापे जाने
के आदेश दिये और इस प्रकार हिन्दी को समाचार पत्र में हिंग्लिश
के रूप में चलाने की शुरूआत की तो मैं अपने पर लगने वाले सम्भव
अरोप मसलन प्रतिगामी,
अतीतजीवी अंधे,
राष्ट्रवादी और फासिस्ट आदि जैसे लांछनों से डरे बिना एक पत्र
लिखा । जिसमें मैंने हिन्दी को हिंग्लिश बना कर दैनिक
अख़बार
में छापे जाने से खड़े होने वाले भावी ख़तरों
की
तरफ़
इशारा करते हुए लिखा --
'प्रिय
भाई, हमने अपनी नई पीढ़ी को बार-बार
बताया और पूरी तरह उसके गले भी उतारा कि अँगरेज़ों
की साम्राज्यवादी नीति ने ही हमें ढाई सौ साल तक गुलाम बनाये
रक्खा । दरअसल ऐसा कहकर हमने एक धूर्त-चतुराई के साथ अपनी कौम
के दोगलेपन को इस झूठ के पीछे छुपा लिया । जबकि,
इतिहास की सचाई तो यही है कि गुलामी के
विरूध्द आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नायकों को,
अँगरेज़ों
ने नहीं,
बल्कि हमीं ने मारा था । आज़ादी के लिए
'आग्रह'
या 'सत्याग्रह'
करने वाले भारतीयों पर
क्रूरता
के साथ लाठियाँ बरसाने वाले बर्बर हाथ,
अँगरेज़ों
के नहीं,
हम हिन्दुस्तानी दारोगाओं के ही होते थे ।
अपने ही देश के वासियों के ललाटों को लाठियों से लहू-लुहान
करते हुए हमारे हाथ ज़रा भी नहीं
काँपते थे
। कारण यह कि हम चाकरी बहुत वफ़ादारी
से करते हैं और यदि वह गोरी चमड़ी वालों की हुई तो फिर कहने ही
क्या
?
पूछा जा सकता है कि इतने निर्मम और निष्करूण साहस की वजह क्या
थी
?
तो कहना न होगा कि दुनिया भर के मुल्कों के
दरमियान 'सारे जहाँ से अच्छा'
ये हमारा ही वो मुल्क है,
जिसके वाशिन्दों को बहुत आसानी से और सस्ते
में खरीदा जा सकता है । देश में
जगह-जगह घटती आतंकवादी गतिविधियों की घटनाएँ,
हमारे ऐसे चरित्र का असंदिग्ध प्रमाणीकरण
करती हैं । दूसरे शब्दों में हम आत्म स्वीकृति कर लें कि
'भारतीय',
सबसे पहले
'बिकने'
और
'बेचने'
के लिए तैयार हो जाता है और,
यदि वह संयोग से व्यवसायी और व्यापारी हुआ
तो सबसे पहले जिस चीज़ का सौदा वह करता है,
वह होता है उसका ज़मीर । बाद इस सौदे के,
उसमें किसी भी किस्म की नैतिक-दुविधा शेष
नहीं रह जाती है और 'भाषा,
संस्कृति और अस्मिता'
आदि
चीज़ों
को तो वह खरीददार को यों ही
मुफ़्त
में बतौर भेंट के दे देता है । ऐसे में यदि कोई हिंसा के लिए
भी सौदा करे तो उसे कोई अड़चन अनुभव नहीं होती है । फिर वह
हिंसा अपने ही
'शहर',
'समाज', या
'राष्ट्र'
के खिलाफ़
ही क्यों न होने जा रही हो ।
बहरहाल,
मेरे प्यारे भाई अब ऐसी हिंसा सुनियोजित और
तेजगति के साथ हिन्दी के
खिलाफ़
शुरू हो चुकी है । इस हिंसा के जरिए भाषा की हत्या की सुपारी
आपके
अख़बार
ने ले ली है । वह भाषा के
ख़ामोश
हत्यारे की भूमिका में बिना किसी तरह का नैतिक-संकोच अनुभव किए
खासी अच्छी उतावली के साथ उतर चुका हैं । उसे इस बात की कोई
चिंता नहीं कि एक भाषा अपने को विकसित करने में कितने युग लेती
है । (डेविड क्रिस्टल तो एक शब्द की मृत्यु को एक व्यक्ति की
मृत्यु के समान मानते हैं ।
अँगरेज़ी
कवि ऑडेन तो बोली के शब्दों को इरादतन अपनी कविता में शामिल
करते थे कि कहीं वे शब्द मर न जायें- और महाकवि टी.एस. एलियट
प्राचीन शब्द,
जो शब्दकोष में निश्चेष्ट पड़े रहते थे,
को उठाकर समकालीन बनाते थे कि वे फिर से
साँस
लेकर हमारे साथ जीने लगे।) आपको शब्द की तो छोड़िये,
भाषा तक की परवाह नहीं है,
लगता है आप हिन्दी के लिए हिन्दी का
अख़बार
नहीं चला रहे हैं,
बल्कि
अँगरेज़ी
के पाठकों की नर्सरी का काम कर रहे हैं । आप हिन्दी के डेढ़
करोड़ पाठकों का समुदाय बनाने का नहीं,
बल्कि हिन्दी के होकर हिन्दी को
ख़त्म
करने का इतिहास रचने जा रहे हैं । आप
'धन्धे
में धुत्त' होकर जो करने जा रहे हैं,
उसके लिए आपको आने वाली पीढ़ी कभी
माफ
नहीं करेगी । आपका
अख़बार
उस सर्प की तरह है,
जो बड़ा होकर अपनी ही पूँछ
अपने
मुँह
में ले लेता है और
ख़ुद
को ही निगलने लगता है । आपका
अख़बार
हिन्दी का
अख़बार
होकर हिन्दी को निगलने का काम करने जा रहा है,
जो कारण जिलाने के थे वे ही कारण मारने के
बन जाएँ इससे बड़ी विडम्बना भला क्या हो सकती है । यह आशीर्वाद
देने वाले हाथों द्वारा बढ़कर गरदन दबा दिये जाने वाली जैसी
कार्यवाही है । कारण कि हिन्दी के पालने-पोसने और या कहें कि
उसकी पूरी परवरिश करने में हिन्दी पत्रकारिता की बहुत बड़ी
भूमिका रही आई है ।
जबकि,
आपको याद होना चाहिए कि सामाजिक-राजनीतिक
दृष्टि से उपजी 'भाषा-चेतना'
ने इतिहास में कई-कई लम्बी लड़ाइयाँ लड़ी हैं
। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप पायेंगे कि आयरिश लोगों ने
अँगरेज़ी
के
खिलाफ़
बाकायदा एक निर्णायक लड़ाई लड़ी,
जबकि उनकी तो लिपि में भी भिन्नता नहीं थी।
फ्रेंच, जर्मन,
स्पेनिश आदि भाषाएँ
अँगरेज़ी
के साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरूध्द न केवल इतिहास में अपितु
इस
'इंटरनेट
युग' में भी फिर नए सिरे से लड़ना
शुरू कर चुकी हैं । इन्होंने कभी
अँगरेज़ी
के सामने समर्पण नहीं किया ।
बहरहाल मेरे इस पत्र का उत्तर
अख़बार
मालिक ने तो नहीं ही दिया,
और वे भला देते क्या ?
और देते भी क्यों ?
सिर्फ़
उनके सम्पादक और मेरे अग्रज ने कहा कि हिन्दी में कुछ जनेऊधारी
तालिबान पैदा हो गये हैं,
जिससे हिन्दी के विकास को बहुत बड़ा
ख़तरा
हो गया है । यह सम्पादकीय चिंतन नहीं
अख़बार
के कर्मचारी की विवश टिप्पणी थी ।
क्योंकि उनसे तुरंत कहा जायेगा कि श्रीमान् आप अपने हिंदी
प्रेम और नौकरी में से कोई एक को चुन लीजिए।
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