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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। विचार ।।

 

 

पाला चुनने का अधिकार


संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

 

जीवन एक खेल है। हम सब इसके खिलाड़ी हैं। खेल से खिलवाड़ करने वाला पछताता है, जबकि खेल को खेल भावना से खेलने वाला प्राणी न केवल खेल का आनन्द उठाता है वरन् पुरस्कार भी पाता है। हम जानते हैं कि प्रत्येक खेल में कम-से-कम दो पक्ष अवश्य होते हैं। जीवन रूपी खेल में भी सृष्टिकर्ता ने कम-से-कम दो पक्ष तो अवश्य ही बनाए हैं। कहा भी जाता है - `प्रत्येक सिक्के के दो पहलू होते हैं। हम संसार में अपने आस-पास या दूरदराज़ कहीं भी देखें, हमें दो पक्ष तो अवश्य ही दिखाई दे जाते हैं। दो ही हों, यह आवश्यक नहीं। ज्ञान-विज्ञान की बातें करना या ग्रह-नक्षत्रों की बातें करना या अध्यात्म की बातें करना, उपयुक्त नहीं पाता। गंभीरता की बात करके या सिद्धान्तों का राग अलाप करके मैं जीवन रूपी खेल के इस आलेख को दुरूह या गंभीर बनाकर पाठकों के खेल के आनन्द को कम नहीं करूँगा। मैं एक साधारण आदमी हूँ और साधारण ही रहना चाहता हूँ। मेरे आसपास जो भी मौजूद है या दूरदराज़ से जो भी ख़बरें विभिन्न माध्यमों से मिल जाती हैं, उन्हीं के आधार पर लेखन के क्षेत्र में भी अपनी लेखनी से खेलने की कोशिश करता हूँ। कबीरदास के शब्दों में, `सब कहते कागद की लेखी, मैं कहता आखिंन की देखी´

 

हाँ, तो हम अपने आस-पास देखें तो हमें कम-से-कम दो पक्ष तो दिख ही जाते हैं। अब इस आलेख को ही लें, विचार करें, मुझे इसका लेखक कहा जायेगा और आपको प्रकाशक, पाठक, समीक्षक, या और कुछ, जो भी आप बनना चाहें। आप क्या बनना पसन्द करेंगे ये आपके ऊपर छोड़ता हूँ? चुनने का अधिकार तो आपको भी है, अत: आपके ऊपर पाठक का ठप्पा थोपने का प्रयत्न क्यों करूँ? हाँ, मान लो आप पाठक बनने का विकल्प चुनते हैं तो उस विकल्प के भी दो पक्ष हो सकते हैं- आप महिला पाठक हैं या पुरूष पाठक। आलेख को पढ़कर भी आप की धारणा दो प्रकार की हो सकती है, आप लेखक को घृणा करने लगेंगे या प्रेम या हो सकता हैं आपके भीतर एक अदद हृदय ही न हो और आप प्रेम व घृणा कुछ भी न कर सकें( आजकल ऐसे बुध्दिमान प्राणियों की भी इस धरा पर कोई कमी नहीं है। इसी प्रकार अन्य अनेक पक्ष हो सकते हैं, आप युवा हैं या वृद्ध, आप पसन्द करते हैं या नापसन्द, आप पुस्तक माँगकर पढ़ते हैं या ख़रीदकर इत्यादि। यह जीवन है इसे हम कई प्रकार से जी सकते हैं - रोकर या हँसकर, सहानुभूति के पात्र बनकर या सहानुभूति देकर, हमारा जीवन रूपी खेल हर्ष प्रदान करने वाला भी हो सकता है, विषाद पैदा करने वाला भी। वस्तुत: हम एक खेल के मैदान में हैं, जिसमें हमें अनेक खेल खेलने के विकल्प उपलब्ध हैं। हम जिस खेल को भी खेलना चाहें उसमें प्रवेश कर सकते हैं किन्तु उस खेल को खेलना तो सीखना ही होगा। उसमें दक्षता हासिल किये बिना हम टीम नहीं बना पायेंगे। हमारे साथ खिलाड़ी नहीं आयेंगे और अकेले कोई भी खेल खेलना संभव ही नहीं। हमें किसी ना किसी के साथ रहना ही होगा। तभी तो कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।

 

अब हम मैदान में आ ही गए हैं तो खेलना भी पड़ेगा। बिना खेले भी रहा नहीं जा सकता। हाँ, कुछ समय के लिए केवल दर्शक बना जा सकता है, किन्तु उसके बाद फिर मैदान में उतरना ही होगा। यह हमारे ऊपर है कि हम अपने मन से खेलें या बेमन से खेल को ढोयें। यदि हम मन से खेलेंगे तो हमें अनेक विकल्प मिलेंगे, मसलन खेल चुनने का विकल्प, टीम चुनने का विकल्प, साथी चुनने का विकल्प, कोच चुनने का विकल्प इत्यादि। सभी प्रकार के चुनाव हमें संजीदगी के साथ करने होंगे। चुनाव करने के बाद पीछे हटना ठीक उसी प्रकार से माना जाता है, जिस प्रकार युद्ध से पीठ दिखाकर भागना। अत: खेल का चुनाव सोच-विचार कर करें और चुनने के बाद उसे समर्पण की भावना से खेलें, कुछ पाने की भावना से नहीं, देने की भावना से भी नहीं, केवल खेलने के उद्देश्य से खेलें। कभी भी खेल को वास्तविकता व अपने आप को खेल के मैदान का मालिक समझने की भूल न करें अन्यथा आपके लिए जीवन रूपी खेल एक बोझ बनकर रह जायेगा। जो लोग अपने को इस खेल के मैदान का मालिक या अधिकारी समझने लगते हैं, वे लोग जीवन भर न केवल स्वयं रोते हैं वरन् अपने साथी को भी रूलाते रहते हैं। ऐसे लोग ही आत्महत्या तक करते हुए देखें जाते हैं। हमें कभी भी खेल का नियन्ता बनने का अहम् नहीं पालना चाहिए।

 

संसार में आदि काल से ही सब कुछ रहा है। कोई भी जीवधारी इस सृष्टि को परिवर्तित नहीं कर पाया। यहाँ सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय, पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, सदाचार और कदाचार, प्रेम और घृणा, समानता और असमानता, देव और दानव, नर और मादा, भाजी और खाजा, छत और दरवाज़ा, मज़ा और सज़ा आदि सभी कुछ रहें हैं, और अनादि काल तक रहेंगे। जाने कितने आये, कितने गये ( जाने कितनों के दिन लद गये). यहाँ राम भी हुए हैं और रावण भी, यहाँ कंस भी हुए हैं और कृष्ण भी, यहाँ युधिष्ठिर भी हुए हैं और दुर्योधन भी, यहाँ पतिव्रता भी हुईं हैं और पत्नीव्रता भी, यहाँ पंच कन्या भी हुईं हैं और विषकन्या भी। भारत भूमि ही नहीं विश्व के कण-कण पर कितने महापुरूषों, समाज सुधारकों, धर्मोपदेशकों, अवतारों, पीरों, पैगम्बरों, दुराचारियों, दानवों व दैत्यों आदि का जन्म हो चुका हैं किन्तु आज तक कोई भी न तो सत्य को समाप्त कर पाया और न ही असत्य को, न पाप समाप्त हुआ और न ही पुण्य, न धर्म समाप्त हुआ और न ही अधर्म, न प्रेम मिटा और न ही घृणा। वास्तविकता यह है कि यह सृष्टि विविधताओं से भरी हुई हैं किसी के लिए भी यह संभव नहीं कि वह इस सृष्टि के किसी भी रंग को समाप्त कर सके। यहाँ सभी प्रकार के रंग रहे हैं, और सभी प्रकार के रहेंगे। हम केवल इतना कर सकते हैं कि हम कौन से रंग में रंगना चाहते हैं? इसका चुनाव कर सकते हैं। यह चुनाव भी तभी सफल होगा, जब हम चुने हुए रंग को खोजने के लिए प्राण-पण से जुट जायें। यहाँ प्रत्येक रंग के लिए कोई न कोई क़ीमत चुकानी ही पड़ती हैं। कोई भी रंग मुफ़्त में नहीं मिलता, न श्वेत और न ही काला; पता नहीं कौन सा रंग निकाल दे आपका दीवाला। आपको रस पीना है, जीवन जीना है, आगे बढ़ो उठा लो प्याला, आपके ऊपर है, इसमें दुग्ध डालो या हाला। किसी न किसी का हाथ तो थामना ही होगा, पत्नी हो या मधुबाला।

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