vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। संस्मरण ।।

 

 

सागर मध्य पहाड़ी आश्रय - काप्रि


सुभाष काक

 

काप्रि के लिये हम नापोलि (अँगरेज़ी में नेपल्स) से रवाना हुए।  वहाँ से हवरक्राफ्ट पर यह छोटा पहाडी द्वीप ४५ मिनट दूर है। दिसम्बर की हल्की सरदी थी, लेकिन हम लोग गर्म कोट पहने निश्चिन्त थे। दिन था उज्जवल, और धूप मधुर। हमें लोगों ने डरा रखा था कि नापोलि के टेक्सी ड्रैवर धोखेबाज हैं, और नगर में माफ़िया के गुटों के बीच झगडे कभी-कभी हिंसात्मक रूप ले लेते हैं, इसलिये यह निर्णय हुआ कि हम केवल सार्वजनिक परिवहन ही लेंगे। रेलवे स्टेशन के साथ गारिबाल्डि चौक के पास हमारा होटल था; इस चौक के कोने में ही पत्तन (पोर्ट) जाने का बस अड्डा था। चौक से हमने एक खचाखच भरी बस ली जो हमें पत्तन ले आयी जहाँ हमें हवरक्राफ्ट चढना था।

 

दक्षिण में नापोलि इटली के सब स्थानों में भारत के नगरों से सबसे अधिक मिलता जुलता है। विशाल गारिबाल्डि चौक में अफ्रीकी और कोरियायी पटरी पर विभिन्न वस्तुएं बेचते हैं। सड़क के नियम कोई पालता नहीं, और लोग जब अचानक सड़क पार करते हैं, गाड़ियाँ रुक जाती हैं। माफ़िया यहाँ शक्तिशाली है, पर इसकी कार्यवाही पर्यटकों को लपेट में नहीं लाती। हाँ, पर्यटकों को जेबकतरी से सावधान रहना चाहिये, यह कहा जाता है। हमें कइयों ने सुझाव दिया कि यहाँ न आया जाये, पर हमने काप्रि और पाम्पे जाने की ठान ली थी।

 

विशाल हवरक्राफ्ट में कई सौ जापानी और इटालवी पर्यटक चढे। नापोलि की खाड़ी का जल झिलमिला रहा था। कुछ समय में पोत की खिडकी से वेसुवियस का सुप्त ज्वालामुखी प्रकट हुआ। सन् ७९ के इसके विस्फोट से पाम्पे नगर लावा और चिंगारों से ढक गया। लगभग १८०० वर्ष के बाद उत्खनित, पाम्पे अब विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में है।

 

टैबीरियस से नेरुडा तक

 काप्रि देखने की मेरी इच्छा तब बनी जब मैंने यह पढा कि रोमन सम्राट टैबीरियस ने वहाँ दस वर्ष बिताए। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उसने यह शत्रुओं द्वारा गुप्तघात से बचने के लिये किया; अन्य इतिहासकार यह कहते हैं कि हत्या का भय केवल एक बहाना था और वह विषयभोगवादी व्यक्ति यहाँ के सौन्दर्य से आकर्षित हो आया था। उसके शत्रुओं के अनुसार उसकी विशाल विल्ला में, जिसके खण्डहर अभी देखने को मिलते हैं, सब प्रकार का कुकर्म और व्यभिचार होता।

 

काप्रि का प्राकृतिक सौन्दर्य और जलवायु मनमोहक हैं। आधुनिक काल में इस वातावरण से खिंच कर कई लेखक, जैसे माक्सिम गोर्की, पाबलो नेरुडा, समरसेट माम, ग्राहम ग्रीन, वहाँ रुके।

 

मेरी कल्पना उत्तेजित हुई जब एक दिन पहले मैंने इसे वेसुवियस पर्वत के दामन में काप्रि को पाम्पे से निहारा। समुद्र के पार कुछ मील की दूरी से यह पहाडी द्वीप साधारण दीख रहा था। वहाँ सम्राट टैबीरियस क्यों रुका? क्या इसलिये कि वह मन में अपने आप को पिछले दो शासकों की तुलना में छोटा पाया? उसके पहले के दो शासक थे जूलियस कैसर और आगस्टस, जिन्होंने विश्व इतिहास पर अपनी छाप डाली।

 

जूलियस कैसर का युद्ध में विजय के पश्चात रोम की गणतन्त्र सभा को यह सन्देश वेनि, विदि, विचि यानि मैं आया, मैं देखा, मैं जीता आत्मविश्वास और अहंकार का द्योतक है। इसके कुछ ही समय के बाद उसने अधिनायक अथवा डिक्टेटर बनने की घोषणा की, और रोम की गणतांत्रिक परम्परा पर आक्रमण के लिये उसके ही मित्र ब्रूटस ने उसकी हत्या की। कैसर के उत्तराधिकारी आगस्टस ने शासन को विस्तृत कर साम्राज्य की नींव डाली और वह रोम का पहला घोषित सम्राट बना।

 

टैबीरियस आगस्टस की तीसरी पत्नी का पहले विवाह से पुत्र था। आगस्टस का अपना पुत्र नहीं था, और जिन युवकों को उसने उत्तराधिकारी बनाना चाहा, वह मर गये। अन्त में उसने टैबीरियस को चुना। उस समय टैबीरियस सुखपूर्वक वैवाहित था। आगस्टस ने आदेश दिया कि वह पत्नी को त्याग कर आगस्टस की अपनी विधवा पुत्री जूलिया से विवाह करे।  विवाह के बाद आगस्टस को एक बार समाचार मिला कि टैबीरियस अपनी भूतपूर्व पत्नी से मिला तो उसने उस अभागी स्त्री का देश-निकाला कर दिया। यहाँ जूलिया, टैबीरियस को नीचा दिखाने के लिये, फ़ोरम जा कर अन्य पुरुषों से खुले सम्बन्ध रखने लगी। हो सकता है कि इन सब घटनाओं ने टैबीरियस के चरित्र में कड़वाहट डाल दी।

 

पाबलो नेरुडा यहाँ १९५२ में अपनी प्रेमिका, चिले की गायिका माथिल्डे उरुटिया, के साथ आया। उसकी विल्ला के सामने दक्षिणी सागर का बहुत मोहक दृश्य था और वह क्रान्ति और आन्दोलन की भातें यहाँ आकर भूल गया। यहाँ उसने अपनी सर्वोत्तम प्रेम कविताएं लिखीं जो एक संकलन "कप्तान के गीत" के रूप में प्रकाशित हुईं। इस संकलन की एक कविता "तुम्हारी हँसी" का अनुवाद नीचे प्रस्तुत हैः

 

तुम्हारी हँसी

 

साँस मेरी लेलो, यदि तुम चाहो,

वायु लेलो, परन्तु

मुझसे अपनी हँसी न लेलो।

 

गुलाब न लेलो,

न तीखा फूल जो तुम तोड़ो,

पानी जो तुम्हारे आह्लाद से आ फटता है,

चाँदी का स्पन्दन

जो तुमसे उभरता है।

 

मेरा संघर्ष कठोर है और मैं लौटता हूँ

आँखें थकित

अविकारी मिट्टी को देख,

पर जब तुम्हारी हँसी आती

यह आकाश चढती मुझे ढूँढ़ती

और जीवन के सब द्वार खोलती।

 

प्रिये, अन्धकार की घड़ी में,

तुम्हारी हँसी खुलती,

यदि तुम मेरा रक्त

सड़क के पत्थरों को मैला करता पाओ,

हँसो,

क्योंकि तुम्हारी हँसी मेरे हाथ में

नई तलवार होगी।

 

शरद के समुद्र जैसी

तुम्हारी हँसी एक झाग उगलती,

और प्रियतम वसन्त में

मुझे तुम्हारी हँसी की चाह है जैसे

नील फूल की,

मेरे गूँजते देश का गुलाब।

 

रात्रि पर हँसो

दिन पर, चाँद पर,

द्वीप की मरोडती गलियों पर हँसो,

उस अनाडी बालक पर हँसो

जो तुमसे प्रेम करता है,

पर जब मैं आँखें खोलूँ

और बन्द करूँ,

जब मेरे पग जाएं

और लौटें,

मेरी रोटी रोको

वायु, प्रकाश, वसन्त,

अपनी हँसी नहीं

क्योंकि मैं मर जाऊँगा।

 

अन्त में नेरूडा ने अपनी पहली पत्नी को त्याग कर माथिल्ड उरुटिया से  १९६६ में विवाह कर लिया।

 

इटली की आत्मा का प्रश्न 

हम कई दिनों से इटली घूम रहे थे, न केवल स्थान देखने के लिये लेकिन यह भी जानने के लिये कि इटली की अंतरात्मा क्या है। यह तो सब जानते हैं कि ईसाई चर्च की यूरोप में विजय के पश्चात एक अन्धकार युग आया जिससे निकलने का पहला क़दम, यूरोप का पुनर्जागरण, इटली में ही हुआ। इसके प्रमाण इटली की वास्तुकला, चित्रकारी, और मूर्तिकला में मिलते हैं, जो इस देश ने बहुत निपुणता से अनेक संग्रहालयों में प्रस्तुत किया है।  हमारी जिज्ञासा आजकल के नव्योत्तर युग में इस देश की स्थिति के बारे में थी।

 

इस यात्रा का आरम्भ एक इटालवी विश्वविद्यालय के निमन्त्रण से हुआ। वहाँ भाषण देकर हम - पत्नी नौमी, जो आयोजक थी, और बेटी अरुषी, जो फोटोग्राफर थी, के साथ - देश की भीतरी यात्रा पर चल पड़े। फ्लोरेन्स और सियेना जैसे नगर ५०० वर्ष पूर्व के परिकल्पित काल में पहुँचा देते हैं। वेनिस का अपना अनन्य वातावरण केवल नाव में सैर के इच्छुक अथवा बाज़ार में ख़रीदार  पर्यटक के लिये ही नहीं, किन्तु उसके लिये भी जो कला मे रुचि रखता हो और जो पूँजीदारी का इतिहास समझना चाहे। वेनिस कई सौ साल पश्चिम का सबसे उन्नत नगर था। नवविवाहितों के लिये क्रीडास्थल है जहाँ अधिक लोग विदेशी हैं और जो इटालवी वहाँ रहते भी हैं वह केवल पर्यटन उद्योग से जुडे हुए हैं।

 

दूसरी ओर रोम विशाल महानगर ही नहीं, इस समूचे नगर को पाश्चात्य संस्कृति का संग्रहालय मानना चाहिये। यहाँ पुराने अवशेषों में सबसे प्रभावशाली कोलोसियम है, जहाँ रोम साम्राज्य के काल में ग्लेडियेटर और बाघ के बीच मरणांत युद्ध होता था। किन्तु प्राचीन रोम साम्राज्य कालीन प्रासाद या खण्डहर इने-गिने हैं, क्योंकि कैथोलिक चर्च ने उस काल के मन्दिरों को तोड़ दिया। केवल एक रोम-धर्म का मन्दिर बचा है। वह है पान्थियान जिसे चर्च ने इस भूल से विध्वंस नही किया कि यह तथाकथित पहले ईसाई सम्राट कान्सटंटैन का निजी मन्दिर था। भीतर यह ईसाई देवालय में परिवर्तित है।

 

इटली, यूरोप के अन्य देशों भान्ति, पिछले कुछ सालों में बहुत समृद्ध हुआ है। पर इसके साथ अकेलापन और अर्थहीनता का भाव भी बढ़ा है। इटालवी लोग अब देर से विवाह कर रहे हैं और बच्चे कम चाहते हैं, और यह आशंका है कि आप्रवासन के बिना जनसंख्या शीघ्र घटने लगेगी। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि तेज़ी से बढते आप्रवासन के कारण पूरा यूरोप धीरे धीरे यूरोबय्या (यूरोप + अरबय्या) में परिवर्तित हो जायेगा।

 

इटली के बुद्धिजीवियों को इन समस्याओं का बोध तो है, पर वह यह समझते हैं कि इतिहास की समकालीन करवट की लपेट में वह निस्सहाय हैं। जटिल प्रश्नों की बात नहीं कर, वह अलौकिक संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने मुझे समझाया कि यह काल तर्क और विवाद का नहीं, पर कालक्रम से दूर काप्रि जैसे स्थान में विश्राम का है !

 

काप्रि की गलियाँ

 कल्पना कीजिये कि शिमला अथवा मसूरी सागर के बीच ले जाया गया है, तो कुछ काप्रि जैसा होगा। पत्तन से ऊपर फ्यूनिकुलर (रज्जू-रेल) सीधे काप्रि नगर पहुँचता है। यह ऊँट की पीठ के बीच का जैसा स्थान है जहाँ से रास्ता दक्षिण के छोटे पत्तन को भी जाता है। नगर में सुसज्जित दूकानें, भोजनालय, विल्ला और होटल मरोड़ती गलियों पर हैं। चाट की दूकानें तो नहीं, पर जिलाटो (विख्यात इटालवी ऐसक्रीम) की हैं।

 

काप्रि के एक ओर ऊँचे पहाड पर दूसरा नगर है जिसका नाम अनाकाप्रि है। यहाँ के निवासी पैदल ऊपर नीचे काप्रि और अनाकाप्रि के बीच या नीचे खाड़ी तक सैर करते हैं। पानी पर सुन्दर गुफाएं हैं जिनको केवल नाव से पहुँचा जा सकता है। इनमे से सबसे सुन्दर नीली गुफा (इटालवी में ग्रोटा अज़ूरा’’) है।

 

काप्रि पहाड़ होते हुए इतिहास के भार से इतना दबा है कि यहाँ इसी इतिहास के प्रश्न कोई अर्थ नहीं रखते। यह अपने ताल पर चल रहा है, मानो यह कह रहा हो कि वस्तुएं आ और जा रही हों पर हम वहीं विद्यमान हैं। काप्रि ने निकट खाड़ी के दूसरी ओर पाम्पे को नष्ट होते देखा है। साम्राज्य आये और गये, काप्रि की गलियों का वातावरण ऐसा है कि समय के वश के बाहर हो। यहाँ धूप चकाचौंध, जल निर्मल, और वायु स्वच्छ है। यह स्थान चिन्ता को भूलने के लिये है।

   सुभाष काक

 

◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक