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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

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।। इतिहास ।।

 

 

1857 का सच


रमणिका गुप्ता

 

1857 का संग्राम भारत का प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष था या स्वत:स्फूर्त सिपाही विद्रोह या धर्मयुद्ध अथवा जैसा कि आजकल कहा जा रहा है, दो सभ्यताओं, ईसाइयत और इस्लाम,का संघर्ष? अगर यह पहला स्वतंत्रता संग्राम था तो उसके पहले के विद्रोहों को क्या कहेंगे, जो कुछ इसी तरह साम्राज्यवाद के विरूद्ध फूटे थे और जिनमें से ज़्यादातर का नेतृत्व आदिवासी समुदाय के लोगों ने किया था? उन विद्रोहों को नकार कर सिपाही विद्रोह को ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम क्यों माना गया? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके आलोक में 1857 के संघर्ष पर विचार किया जाना चाहिए।

 

यह सही है कि 1857 का संघर्ष आज विवाद के घेरे में हैं पर इसमें कोई संदेह नहीं कि यह विद्रोह था और यह अँगरेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ था। सारे विवादों के बावजूद यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस विद्रोह ने अँगरेज़ों के खिलाफ़ देश भर में नफ़रत का माहौल बना कर दिया था, भले अपने-अपने स्वार्थ के लिए ही सही। यही नफ़रत तत्काल तो नहीं,पर कुछ वर्षों बाद फिर स्वतंत्रता की निश्चित ध्येय लेकर उभरी। 1858 के तत्काल बाद तो दहशत की चुप्पी छा गई थी, जिसे साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने तो नहीं तोड़ा पर आदिवासी योद्धा अँगरेज़ों के खिलाफ़ शस्त्र उठाकर ज़रूर इस सन्नाटे को अगली सदी के शुरू होने के बाद तक तोड़ते रहे। दरअसल विवाद इसके स्वतंत्रता संग्राम या इस विद्रोह की मंशा पर है। उसी पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि,

 

1    क्या यह पहला स्वतंत्रता संग्राम था? क्या इससे पहले भी विद्रोह हुए थे? उन्हें स्वतंत्रता संग्राम क्यों नहीं कहा गया? क्या इसके पीछे कोई साज़िश या दुर्भावना थी?

 

2   दूसरा विवाद इस पर है कि यह स्वतंत्रता-संग्राम था भी या नहीं और यह भी कि क्या यह साम्राज्यवाद के विरोध में लड़ा गया था अथवा यह मात्र स्वत:स्फूर्त सिपाही विद्रोह या धर्मयुद्ध था, जिसके पीछे धार्मिक सेन्टीमेंट, सभ्यताओं का टकराव तथा राजा-महाराजा-नवाबों के व्यक्तिगत या निजी-राजनैतिक स्वार्थ थे?

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि मुख्य विवाद दो बिन्दुओं पर है, विद्रोहों की एक लम्बी श्रृंखला को नज़रअंदाज़ कर केवल सिपाही विद्रोह को ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित करना तथा उसका स्वतंत्रता संग्राम होना ही संदिग्ध माना जाना। हम एक-एक कर इसका ज़ायज़ा लेने जा रहे हैं।

 

यह तो निश्चित है कि 1857 के सिपाही विद्रोह के पहले भी अँगरेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ विद्रोह हुए थे और वे राजा-महाराजाओं ने नहीं बल्कि जनता की एक अनुसूचित ज़मात ने, जिन्हें आदिवासी कहते हैं, छेड़े थे। ये विद्रोह कोई राज पाने के लिए नहीं थे। ये तो अँगरेज़ों द्वारा लादी गयी एक नयी व्यवस्था व उसे लागू कराने के लिए अँगरेज़ों तथा उनके कारिन्दों व दलालों की मार्फ़त किये गये ज़ुल्मों व शोषण के खिलाफ़, अपने बल-बूते पर, अपने औजार और हथियार से लैस जनता ने छेड़े थे। उनके पास अपनी समानता आधारित सामूहिक जीवन-शैली और वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था तथा तौर तरीका था, जिसे वे बरक़रार रखना चाहते थे।

 

यह एक निर्विवाद सत्य है कि 1857 से पहले झारखण्ड के आदिवासियों और महाराष्ट्र के खानदेश ने विद्रोह का बिगुल फूँका था,राजा-महाराजाओं ने नहीं, आम जनता ने। 1857 के घोषित तथाकथित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले ही आदिवासी जनसमुदायों ने भारत के कोने-कोने में ब्रिटिश इंडिया को अपने यहाँ जड़ न जमाने देने के लिए अपने-अपने स्तर पर अनेक हैरतअंगेज लड़ाईयाँ लड़ी थीं। झारखण्ड में अँगरेज़ों के विरुद्ध सबसे पहला विद्रोह 1857 से नब्बे वर्ष पहले यानी 1766 में ही पहाड़िया लोगों ने शुरू कर दिया था, जो 1778 तक चला। फिर तो झारखंड में विद्रोहों की झड़ी लग गयी।

 

आदिवासियों के इलाकों के जंगल व ज़मीन पर, राजा-नवाब या अँगरेज़ों का नहीं, जनता का कब्जा था। राजा-नवाब तो उन्हें लूटकर चले जाते थे। वे उनकी संस्कृति और व्यवस्था में दखल नहीं देते थे। अँगरेज़ भी शुरू में वहाँ जा नहीं पाए थे। रेलों के विस्तार के लिए जब उन्होंने पुराने मानभूम और 'दामिन-ई-कोह' (वर्तमान संथाल परगना) के इलाकों में जंगल काटने शुरू किये और बड़े पैमाने पर आदिवासी विस्थापित होने लगे तो आदिवासी चौंके और मंत्रणा शुरू हुई। साथ-ही-साथ अँगरेज़ों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गाँव, जहाँ वे सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बाँटकर, राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी थी। तब बड़े पैमाने पर लोग आन्दोलित हुए। उस व्यवस्था के खिलाफ़ विद्रोह शुरू हुए। आदिवासियों ने अपना शत्रु अँगरेज़ों, उनके क़ारिन्दों और दलालों को माना, जो अपनी नई व्यवस्था जबरन उन पर लागू कर रहे थे। ये युद्ध महाजनों और ज़मींदारों के खिलाफ़, अँगरेज़ अधिकारियों के खिलाफ़, यानी अँगरेज़ों के हर प्रतीक के खिलाफ़ था। चाहे वह उनका कार्यालय, थाना, कमिश्नरी हो या अधिकारी, क़ारिन्दा, दलाल व गुमाश्ता अथवा सामन्त-साहूकार। यह था जनता का विद्रोह। इस संघर्ष में न धर्म था न राजसत्ता की ललक। इसमें थी अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को जारी रखने की चाह, जीवनशैली, संस्कृति, भाषा, जंगल, ज़मीन और जनताके अधिकार तथा मुक्ति की सुरक्षा समानता और भाईचारे की अभिलाषा। राज-पाट हथियाना उनका लक्ष्य नहीं था। इस जन-विद्रोह या जन-संघर्ष को इतिहासकारों द्वारा दर्ज ही न किया जाना, एक षडयंत्र था। आदिवासियों के ये विद्रोह जहाँ जबरन थोपी जा रही एक व्यवस्था के विरोध में दूसरी प्रचलित वैकल्पिक व्यवस्था का राजनैतिक विद्रोह था, वहीं यह दूसरी व्यवस्था आदिवासियों की सामूहिक जीवनशैली थी, जो समानता, भाइचारे व आज़ादी में विश्वास करती थी और उसे व्यवहार में लाती थी। दरअसल आदिवासियों में सम्पत्ति की कोई अवधारणा ही नहीं थी पूरा का पूरा गाँव और उसकी ज़मीन सामूहिक रूप से गाँव वासियों की होती थी।

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