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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। मूल्याँकन ।।

 

 

ग़ज़ल में व्यंग्य की धार


द्विजेन्द्र द्विज

 

किसी विषय को हास्य-प्रधान बनाकर, प्रस्तुत करके उस विषय के प्रति मनोरंजन, घृणा, रोष अथवा तिरस्कार के भावों को उभारने की साहित्यिक कला को व्यंग्य कहा जाता है । व्यंग्य, मुख्यत: सुधार की अपेक्षा से विकृत अभिरुचियों, स्थितियों, विसंगतियों, त्रुटियों व कुप्रथाओं के उपहास की कला है। इस कला में हास्य व्यंग्योक्ति अथवा विद्रूप को एक अस्त्र की तरह एक ऐसे लक्ष्य पर प्रयोग में लाया जाता है जो सामान्यता रचना के बाहर अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखता है । व्यंग्य का यह लक्ष्य अथवा पात्र मुख्यत: व्यंग्य कलाकार का समूचा परिवेश और परिवेशजन्य यथार्थ, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक व साहित्यिक संस्थाएँ तथा उनसे जुड़े व्यक्तियों का पाखण्डपूर्ण, आडंबरयुक्त आचरण इत्यादि तथा और भी बहुत कुछ या कुछ भी हो सकता है, जिसे बड़े गणित्तीय ढंग से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता ।

 

व्यंग्य  की धार का प्रयोग समूचे विश्व के साहित्य के साहित्य तथा अन्य कलाओं की लगभग प्रत्येक विधा में होता आया है । इसे व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता ही कहेंगे कि आर्कीलोकस ( Archlochus) जैसे यूनानी कवियों के व्यंग्य-बाण अपने लक्षित व्यक्तियों को आत्महत्या तक का मार्ग सुझा देते थे । संस्कृत-साहित्य के अत्यंत समृद्ध कोष में भी असंख्य व्यंग्य-रचनाओं, सूक्तियों एवं व्यंग्योक्तियों का असीम भंडार है । हिन्दी-साहित्य में भी दोहे जैसी प्राचीन एवं लोकप्रिय काव्य-विधा(जिसे कबीर जैसे सुधारक संतों ने भी अपनी अपनी अभिव्य्क्ति का माध्यम बनाया) में भी व्यंग्य का प्रयोगघाव करें गंभीर(बिहारी) के उद्देश्य से ही किया गया था, और आज भी प्रचलित है । उर्दू साहित्य में भी ग़ज़ल के माध्यम से व्यंग्य का प्रचुर प्रयोग देखने को मिलता है ।

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता,

वगर्ना शहर मेंग़ालिब की आबरू क्या है ? ’

 

बज़्म-ए-शहंशाह में अशआर का दफ़्तर खुला

रखिओ यारब, ये दरे मग़ज़ीना-ए-गोहर खुला ग़ालिब

 

मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर में व्यंग्य-बाण तो उस्ताद ज़ौक़  पर लक्षित है लेकिन व्यंग्य के पात्र के रूप मेंग़ालिब ने अपना तख़ल्लुस ( उपनाम ) प्रयोग किया है । (उर्दू ग़ज़ल में शायर के तख़ल्लुस का प्रयोग ग़ज़ल के मक़्ते-अंतिम शे में करना अनिवार्यता भी है । ) इसी तरह मोमिन का व्यंग्य-बाण:

‘उम्र सारी तो कटी इश्क़–ए-बुताँ में ‘मोमिन’

आख़िरी उम्र में क्या ख़ाक़ मुसल्माँ होंगे’

भी कालातीत है तो अक़बर इलाहाबादी का यह व्यंग्य-बाण भी बहुतसे श्रोताओं और पाठकों की भावनाओं का विरेचन (cathars।s) कर पाने के लिए आज भी उतना ही समर्थ, सक्षम एवं प्रासंगिक है :

‘क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक़्क़ाम के साथ

रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ ’

 

अमीर मीनाई का उपदेशक महोदय (जनाब-ए-वाइज़ ) के लिए यह शेर क्या कम है? :

वाइज़ किताब-ए-वाज़ लिए हैं तो क्या हुआ

बोतल शराब की भी तो पिन्हा बग़ल में है

(उपदेशक महोदय उपदेशों की पुस्तक लिए हुए हैं तो क्या हुआ, शराब की बोतल भी तो उन्हीं की बग़ल में छुपी है )

 

हिन्दी ग़ज़ल ने भी साहित्य में अपना एक विशेष स्थान बनाया है । ग़ज़ल के शेर के दो मिसरों (पँक्तियों) की सूक्ति व दोहे जैसी मारक-क्षमता, प्रभविष्णुता, सहज सम्प्रेषण एवं उद्धरणीयता  के कारण ही तो ग़ज़ल इतनी लोकप्रिय है । साहित्य की प्रत्येक विधा अपने समय के स्वरूप को प्रतिबिंबित करती है।

 

हिन्दी ग़ज़ल ने भी अपने विशिष्ट अंदाज़ में अपने समय के यथार्थ को परिलक्षित और प्रतिध्वनित करके अपनी भाशा के साहित्य को समृद्ध किया है, हमारे वर्तमान की स्थितियों की विडम्बना, ढोंग एवं विद्रूप पर अचूक व्यंग्य-बाण साधे हैं । करोड़ों लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है । ग़ज़ल विधा ने:

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरी फ़ितरत नहीं

मेरा मक़सद है कि ये सूरत बदलनी चाहिए - दुष्यंत कुमार

के उद्देश्य से हमारे समूचे परिवेश की विसंगतियों पर अपने व्यंग्य को लक्षित किया है । कुछ उद्धरणीय शेर इसी तथ्य के साक्ष्य हैं :

`भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ

आजकल दिल्ली में है ज़ेरे-बहस यह मुद्दआ दुष्यंत कुमार

 

रोज़ अख़बारों में पढ़कर यह ख़याल आया हमें

इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार दुष्यंत कुमार

 

काजू भुनी, प्लेट में, विस्की गिलास में

उतरा है राम-राज विधायक निवास में अदम गोंडवी

 

'दस्तूर का निभाना बंदिश है मयकदे की

जो हैं गिलास ख़ाली उनको भी जाम कहिए

 

‘तुम्हें भले ही निवाला दिखाई देता है

हमें तो दाल में काला दिखाई देता है’

 

‘धृतराष्ट्र’ को पसन्द के ’संजय’ भी मिल गए

आँखों से देख कर भी जो मुकरे बयान से ’

 

सद्भाव तो कटेगा किसी पेड़ की तरह

लेंगे ये काम भी वो मगर संविधान से

 

व्यंग्य की धार जीवन और उसके यथार्थ की संशलिष्टता को अपना निशाना बना कर साहित्य को रुचिकर और पठनीय बनाती है, उसकी प्रभावोत्पादकता में गुणांक वृद्धि करती हैसंवेदनशील जनमानस का ध्यान आकर्षित करती है.

 

आज व्यंग्य अँधेरा बाँटने वाली तमाम शक्तियों (अँधेरों के सौदागरों) को आत्महत्या करने पर विवश भले ही न करता हो परंतु ऐसी शक्तियों को पहचान कर उनके विरुद्ध लंबा वैचारिक युद्ध छेड़ने के लिए संवेदनशील पाठक या श्रोता वर्ग को झिंझोड़ता अथवा आकृष्ट अवश्य करता है ।

 

हमारे वर्तमान में व्यक्तित्वलोप अथवा निर्व्यक्तिकरण (Depersonalizaton), छविविहीनता के दौर में देश के तथाकथित कर्णधारों तथा उन्हें चुनने वाली दिशाहीन भ्रमित, स्वार्थी भीड़-सत्ता की भी कोई स्वतंत्र छवि बची ही नहीं है । आदर्शों और आधारभूत जीवन-मूल्यों की बदलती हुई परिभाशाओं के परिवेश में व्यंग्य के लक्षितों में व्यंग्य का सामना कर पाने का नैतिक साहस ही नहीं बचा है कि वे स्वयं को व्यंग्य में प्रतिबिंबित होता देखकर अपने आचरण में परिवर्तन करें । दोग़ली, ढोंगी, स्वार्थी व्यवस्था और उसके नियामकों, नियन्त्ताओं तथा आधारभूत रूप से इस लचर व्यवस्था को जन्म देने वाली स्वार्थी शक्तियों के पास व्यंग्य को पढ़ने तथा सूरते-हाल को बदलने में सहायक होने का नैतिक साहस तो ही नहीं । और फिर:

 

यहाँ अँधेरों के ताजि ये चाहते ही नहीं

 धुले ये रात की काजल-सी रौशनी फिर से

 

जबसे काँटों की तिजारत ही फली-फूली है

कोई मिलता ही नहीं  फूल  उगाने  वाला

 

सूरज के रहे दुशमन वो लोग सदा जिनका

सूरज के उजाले में कोई काम नहीं होता

 

हैं धूप चुराने की साज़िश में सभी शामिल

अब शहर की सड़कों पर कोहराम नहीं होता

 

फिर भी व्यंग्य उन्हें अपना निशाना बनाकर परिवर्तन कामी / परिवर्तनाभिलाषी जागरुक जनमानस का भावाविरेचन अथवा भावोन्न्यन तो करता ही है।  व्यंग्य की यही शक्ति हिन्दी ग़ज़ल की सबसे बड़ी पूँजी है, गौरवान्वित होने के लिए भी तथा  साहित्य में अपनी भूमिका तलाशने के लिए भी ।

    द्विजेन्द्र द्विज

राजकीय पलिटेक्निक काँगड़ा

 हि्माचल प्रदेश - 176001

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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