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प्रगतिशीलों ने प्रेमचंद
के जीवन के तथ्यों को छिपाया
कमल
किशोर गोयनका से जयप्रकाश मानस की बातचीत
मानस
–
आपको यदि मैं लघुकथा के प्रथम व्याकरणाचार्य के रूप में देखता
हूँ तो किस हद तक सही हूँ?
गोयनका जी
–
मेरा ऐसा कोई दावा नहीं है, परंतु यही सच है कि हिंदी के
आलोचकों ने लघुकथा को कभी गंभीरता से नहीं लिया और यह विधा
किसी आलोचक की प्रतीक्षा करती रही। बस मैंने इस प्रतीक्षा को
संतुष्ट किया, लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि मैंने लघुकथा
व्याकरण या शास्त्र रच दिया है। लघुकथा के विकास के साथ तथा
उसमें नई-नई संवेदनाओं के आने पर उसके शास्त्र तथा कसौटी में
भी परिवर्तन होता रहेगा। अपनी पुस्तक
‘लघुकथा
का व्याकरण’
को मैं इस दृष्टि से आरंभिक प्रस्तावना मानता हूँ, जिसमें उठाए
गए मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। इस पर लघुकथाकारों को सोचना
चाहिए।
मानस–
लघुकथा की ओर प्रवृत्त होने वाले आप पहले आलोचक भी माने जा
सकते हैं। प्रेमचंद जिसे विश्वप्रसिद्ध कथाकार के विशेषज्ञ
होने के बाद अचानक आप लघुकथा को गति देने कैसे उतर आए
?
क्या इसके पीछे आपको आलोचना जगत में एक श्रेष्ठ आलोचक या
अध्येता के रूप में मान्यता नहीं मिली या लोकप्रियता के साथ
जुड़ने का दबाव भी था
?
गोयनका जी
–
लघुकथा का मैं पहला आलोचक नहीं हूँ। मुझसे पहले कई प्रतिष्ठित
लेखकों ने लघुकथा पर प्रिय-अप्रिय टिप्पणियाँ की हैं, लेकिन
इतना सही है कि संभवतः मैं पहला आलोचक हूँ, जिसने लघुकथा की
आलोचना पर पुस्तक लिखी है। प्रेमचंद पर काम करते हुए मैंने
केवल लघुकथा पर ही काम नहीं किया है बल्कि यशपाल, हजारी प्रसाद
द्विवेदी, बच्चन, प्रभाकर माचवे, विष्णु प्रभाकर, मन्मथनाथ
गुप्त, जगदीश चतुर्वेदी, मंजुल भगत, रामकुमार वर्मा आदि पर भी
पुस्तकें आ चुकी हैं। हिंदी के प्रवासी साहित्य पर मेरी पाँच
पुस्तकें हैं। अतः यह कहना उचित नहीं है कि मैं अचानक लघुकथा
के क्षेत्र में आ गया। मेरे साथ ऐसा भी नहीं था कि प्रेमचंद
साहित्य पर प्रकाशित मेरी पुस्तकों (प्रेमचंद विश्वकोश,
प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, प्रेमचंद के उपन्यासों का
शिल्प-विधान, प्रेमचंद, प्रेमचंद और शतरंज के खिलाड़ी,
प्रेमचंद - चिंतात्मक जीवनी, प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ,
प्रेमचंद के नाम पत्र, प्रेमचंद
–
पत्र कोश आदि) ने मुझे प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि न दी हो। आप जो
मुझे प्रेमचंद विशेषज्ञ कह रहे हैं, यह उसी प्रसिद्धि का
प्रमाण है। अतः निराशा की कोई बात नहीं थी और वैसे भी मैंने
प्रसिद्धि के उद्देश्य से कोई काम नहीं किया। प्रसिद्धि चाहने
से नहीं मिलती, वह केवल साधना से मिलता है और कई बार
साधना-सिद्ध व्यक्ति भी ख्याति से वंचित रह जाता है। लघुकथा
में आने का कारण यह था कि मुझे लघुकथा से प्रेम था और प्रेमचंद
ने भी लघुकथाएँ लिखी थीं, लेकिन लघुकथा की आलोचना में अपने कुछ
मित्र लघुकथाकारों के कारण आया जिन्होंने अपने प्रेम से मुझे
विवश किया कि मैं लघुकथा पर कुछ लिखूँ तथा कहूँ।
मानस
–
प्रेमचंद को आम आदमी का कथाकार कहा जाता है। इसका मतलब क्या
ऐसा भी है कि वे खास से दूर थे। मैंने कहीं पढ़ा है कि वे तो
अपने समय में, अपने समाज में ख़ास हैसियत रखते थे। कहते हैं
उनकी बेटी की शादी में उन्होंने काफी खर्च किया था, फिर ऐसी
कौन-सी परिस्थिति, मनःस्थिति, दबाव रहा होगा, जिससे एक ख़ास
आर्थिक स्थिति वाला रचनाकार आम आदमी का विश्वस्तरीय कथाकार
बनने की ओर प्रस्थान कर जाता है
?
गोयनका जी
–
प्रेमचंद ख़ास आर्थिक स्थिति वाले रचनाकार नहीं थे, जैसे कि
टॉल्सटॉय और टैगोर थे। ये दोनों रचनाकार आभिजात्य वर्ग के थे,
किंतु प्रेमचंद एक साधारण परिवार में जन्मे थे और अपने जीवन के
अंतिम बीस वर्षों में उस समय के मध्य वर्ग में आ चुके थे। उनके
देहांत के समय उनके बैंक खातों में लगभग पाँच हजार रुपए थे, दो
बीमा पॉलिसियाँ थीं, सरस्वती प्रेस था, घर का मकान था और
हजारों रुपयों की पुस्तकों का स्टॉक था। वे 1934-35 में बम्बई
की एक फिल्म कंपनी में काम करने गए थे, तब उनका वेतन आठ सौ
रुपए मासिक था। वे जब वहाँ से लौटे तो पुत्री के लिए हीरे की
लौंग लेकर आए थे। आपने यह सही सुना है कि उन्होंने अपनी पुत्री
कमलादेवी के विवाह में, उस समय की स्थिति के अनुसार, काफी पैसा
खर्च किया था। उनकी पुत्री से हुई मेरी बातचीत के अनुसार यह
धनराशि आठ से दस हजार रुपयों के बीच थी, जो उस युग में काफी
अधिक थी। प्रेमचंद पूँजीपति नहीं थे, लेकिन वे मध्य वर्ग तक
पहुँच गए थे। उन्होंने अपने पुत्रों श्रीपतराय और अमृतराय को
हॉस्टल में रखकर पढ़ाया था जो उस समय हर व्यक्ति के लिए संभव न
था, लेकिन वे अपने जीवन में
‘ख़ास
वर्ग’
या अभिजात-वर्ग से दूर ही थे। उनका संबंध प्रायः लेखकों से था
या आर्य समाजी एवं कांग्रेसी नेताओं से, जिनके साथ उनका
उठना-बैठना था। वे धन को मनुष्य का दुश्मन मानते थे, अतः
धनियों एवं पूँजीपतियों या अभिजात-वर्ग से आत्मीयता का भाव
होना कठिन था। प्रेमचंद आम आदमी के रचनाकार थे, इसमें दो राय
नहीं हो सकती, परंतु उनके साहित्य में एक खास वर्ग
–
जमींदार, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर, वकील, अंग्रेज़ शासक, पत्रकार आदि
न हों, ऐसी बात नहीं है। प्रेमचंद ने इस अभिजात वर्ग का जो
चित्रण किया है, वह काफी यथार्थपूर्ण है। अतः प्रेमचंद को आम
आदमी के रचनाकार तक सीमित रखना मुझे उचित प्रतीत नहीं होता। जो
उन्हें इस रूप में सीमित करते हैं, वे राजनीतिक उद्देश्यों से
पीड़ित हैं एवं प्रेमचंद की अधूरी मूर्ति रखने के दोषी हैं।
मानस
–
आपने प्रेमचंद साहित्य को काफी गंभीरता के साथ अनुशीलन किया
है। आप उन्हें अन्य प्रगतिशील कथाकारों, आलोचकों की मान्यता के
बरक्स भिन्न कैसे सिद्ध करते हैं
?
गोयनका जी
–
हिंदी के प्रगतिशील आलोचकों ने मार्क्सवाद के आधार पर उनका
विवेचन किया है। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि उन्होंने
कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों को बताया कि प्रेमचंद की
मार्क्सवादी व्याख्या से उन्हें जनता तक पहुँचाया जा सकता है
और इससे समाजवाद का विस्तार होगा। पार्टी नेताओं से अनुमति
मिलने पर प्रेमचंद को मार्क्सवादी बनाने का अभियान शुरू हुआ,
जो रूस में कम्युनिस्ट सत्ता के समाप्त होने तथा चीन के
पूँजीवाद की गोद में बैठने के बाद भी चल रहा है। इन प्रगतिशील
आलोचकों ने तथा अमृतराय तक ने, प्रेमचंद के जीवन के तथ्यों को
छिपाया, गांधी से मोह-भंग होने का झूठा प्रचार किया तथा यह
स्थापित किया कि प्रेमचंद अंतिम वर्षों में खूनी क्रांति
द्वारा समाजवाद लाने के समर्थक हो गए थे। यह उसी साजिश का अंग
था जो डॉ. रामनिवास शर्मा ने शुरू की थी, लेकिन सत्य इसके
विपरीत था। प्रेमचंद ने अंतिम वर्षों में स्टालिन के रूसी
साम्राज्य पर लिखा था कि रूस भी विचार का साम्राज्य चाहता है
और यह समाजवाद, पूंजीवाद से भी भयानक है।
‘गोदान’
तक में भारतीय कम्युनिस्टों की आलोचना की गई है। प्रेमचंद के
आदर्शवाद को खंडित करने तथा उसे अतार्किक, अव्यावहारिक तथा
भावुकतापूर्ण कल्पना बताने में भी इन प्रगतिशील आलोचकों की यही
दृष्टि काम कर रही थी। इन्होंने प्रेमचंद को यथार्थवादी और
समाजवादी यथार्थवादी सिद्ध करने का प्रयत्न किया और उनकी केवल
पाँच-छः रचनाओं के आधार पर उनका मूल्याँकन किया जो किसी भी
कसौटी पर सही नहीं कहा जा सकता। प्रेमचंद की शक्ति उनके
आदर्शवाद में है, जो मनुष्य का परिष्कार करता है, उसका उत्कर्ष
करता है और उसे परिवार, समाज एवं देश के लिए उपयोगी तथा सार्थक
बनाता है। प्रेमचंद की इस शक्ति को ये प्रगतिशील आलोचक, जड़
संवेदनशीलता के सम्मुख, निम्न कोटि का सिद्ध करते हैं, जबकि
कोई भी संवेदनशील लेखक अपनी रचना को संवेदनाशून्य कैसे बना
सकता है
?
‘कफ़न’
कहानी में जो संवेदना है, उसे ये प्रगतिशील देखते ही नहीं हैं।
ऐसी स्थिति में मैंने इसके विरुद्ध अपनी मान्यताएँ रखीं और
तथ्यों एवं प्रमाण के साथ रखी। प्रेमचंद के जीवन के अनेक नए
तथ्य खोजे और
‘प्रेमचंद
विश्वकोश’
में प्रस्तुत किए, उनकी आलोचना के लिए उनके समग्र साहित्य को
आधार बनाया और लगभग 1400 पृष्ठों का नए साहित्य को खोज कर
पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया और प्रेमचंद को राजनीतिक
पूर्वाग्रहों से मुक्त करके उन्हें भारतीयता के आधार पर
विवेचित करके उनका एक राष्ट्रीय-बिम्ब प्रस्तुत किया। प्रेमचंद
ने स्वराज्य, स्व-संस्कृति, स्वभाषा तथा भारतीय अस्मिता एवं
भारतीय आत्मा के उत्थान के लिए ही साहित्य की रचना की और इसी
भारतीयता से हम उनका जीवन-दर्शन तथा रचनाओं के रचना-सूत्र समझ
सकते हैं।
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