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वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

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।। हस्ताक्षर ।।

 

128 वीं जयंतीः31 जुलाई पर विशेष

 

प्रेमचंद के सामाजिक व साहित्यिक विमर्श


कृष्ण कुमार यादव

 

1920 का दौर... गाँधी जी के रूप में इस देश ने एक ऐसा नेतृत्व पा लिया था, जो सत्य के आग्रह पर ज़ोर देकर स्वतन्त्रता हासिल करना चाहता था। ऐसे ही समय में गोरखपुर में एक अँगरेज़ स्कूल इंस्पेक्टर जब जीप से गुज़र रहा था तो अकस्मात एक घर के सामने आराम कुर्सी पर लेटे, अख़बार पढ़ रहे एक अध्यापक को देखकर जीप रूकवा ली और बडे रौब से अपने अर्दली से उस अध्यापक को बुलाने को कहा । पास आने पर उसी रौब से उसने पूछा- ''तुम बडे मगरूर हो। तुम्हारा अफ़सर तुम्हारे दरवाज़े के सामने से निकल जाता है और तुम उसे सलाम भी नहीं करते।'' उस अध्यापक ने जवाब दिया- ''मैं जब स्कूल में रहता हूँ तब मैं नौकर हूँ, बाद में अपने घर का बादशाह हूँ।'' अपने घर का बादशाह यह शख्सियत कोई और नहीं, वरन् उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द थे, जो उस समय गोरखपुर में गवर्नमेन्ट नॉर्मल स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे।

 

31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही में जन्मे प्रेमचन्द का असली नाम धनपत राय था। आपकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम अजायब राय था। बचपन में ही उन्होंने संघर्ष की जो दास्तां देखी थी वो कालान्तर में उनके साहित्य में भी प्रतिबिम्बित हुई । मात्र आठ वर्ष की अल्पायु में मातृ-वियोग एवं तत्पश्चात पिता द्वारा दूसरा विवाह व पुनश्च चौदह वर्ष की आयु तक आते-आते पितृ-वियोग ने प्रेमचन्द को जीवन के मंझधार में अकेले छोड़ दिया। ऐसे में सौतेली माँ एवं उसके दो बच्चों का भार भी उन्हीं के कन्धों पर आ पड़ा । सौतेली माँ का व्यवहार उनके प्रति कठोर रहा परन्तु उन्होंने अपने व्यवहार में किसी भी प्रकार की कटुता नहीं उत्पन्न होने दी। पत्नी पक्ष से भी प्रेमचन्द को कोई सुखद अनुभूति नहीं प्राप्त हुयी। पिताजी अपनी मृत्यु से एक वर्ष पूर्व ही प्रेमचन्द की शादी उनसे उम्र में बड़ी लड़की से कर गये थे जो बदसूरत होने के साथ-साथ जुबान की भी कड़वी थी । अंतत:, प्रेमचन्द ने गृह कलह से तँग आकर पत्नी को उसके मायके छोड़ दिया। इन परिस्थितियों में घर वालों ने उन्हें दूसरी शादी करने हेतु ज़ोर दिया , अंतत: ना-ना करते वह शादी के लिए तैयार तो हुए पर एक शर्त के साथ कि विवाह वह किसी विधवा के साथ ही करेंगे। इस शर्त पर घर वालों की नापसन्दगी के बावजूद उन्होंने समाज के बंधे-बंधाये नियमों को ठुकराकर और बिना घर वालों को बताये शिवरानी नामक एक महिला के साथ शादी कर ली, जो कि विवाह के मात्र तीन-चार माह पश्चात ही विधवा हो गयी थी।

 

यहाँ पर इस तथ्य का उल्लेख समाचीन होगा कि दूसरे विवाह के समय उन्होंने इस तथ्य को छुपाये रखा कि प्रथम पत्नी को उन्होंने त्याग दिया है। अपनी दूसरी पत्नि को यह कहकर उन्होंने लम्बे समय तक भ्रम में रखा कि उनकी प्रथम पत्नि की मौत हो चुकी है। एक लम्बे अन्तराल पश्चात जब उनकी पहली पत्नि के भाई उनसे मिलने आये और शिवरानी जी ने अचानक उनकी बातें सुन लीं तो उन्हें प्रथम बार मालूम हुआ कि उनकी सौत दुनिया में ही है। शिवरानी इस सच्चाई को जानने के बाद रह न सकीं और उन्होंने अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए प्रेमचन्द से प्रथम पत्नी को लाने पर ज़ोर दिया। पर अपनी प्रथम पत्नी के व्यवहार से वाकिफ़ प्रेमचन्द इस हेतु तैयार न हुए। यहाँ तक कि शिवरानी ने स्वयं अपनी ओर से उनकी प्रथम पत्नी को पत्र लिखकर आने का आमंत्रण दिया, पर जवाब में आया कि- ''जब वे ख़ुद लेने आयेंगे तभी मैं चलूँगी।'' ख़ैर वह दिन कभी न आया। कालान्तर में शिवरानी देवी ने प्रेमचन्द की मृत्यु के बाद एक किताब 'प्रेमचन्द घर में' लिखी।  

                

इसमें कोई शक़ नहीं कि प्रेमचन्द का जीवन दुखों और संघर्षों से भरा रहा। अपनी ज़िंदगी में भोगे गये यथार्थ को ही पन्नों पर वे विभिन्न रूपों में ढालकर अभिव्यक्त करते रहे। ''उपन्यास सम्राट'' की उपाधि से प्रसिध्द प्रेमचन्द का जीवन ख़ुद एक जीता-जागता उपन्यास था, जिसमें ज़िंदगी के अंतर्द्वन्दों के बीच एक कृशकाय व्यक्ति कभी मजबूती से खड़ा नज़र आता तो अगले ही पल टूटता नज़र आता। वह स्वभाव से अन्तर्मुखी थे, सभा-सम्मेलनों में मुश्किल से ही जाते थे पर उनकी ठहाका लगाने की आदत मशहूर थी। यह एक रोचक तथ्य है कि प्रेमचन्द जिस दौर के थे, वह दौर खुलकर स्वतन्त्रता-आन्दोलन में भाग लेने का था पर प्रेमचन्द की क़लम समाज की आन्तरिक विसंगतियों और बुराईयों पर ही ज़्यादा चली, जिसे कि आधुनिक साहित्य में दलित-विमर्श, नारी-विमर्श इत्यादि रूपों में देखा जाता है ।

 

                     

माता-पिता के असमय वियोग के चलते प्रेमचन्द को शिक्षा पाने में भी काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा एक मौलवी की देख-रेख में एक मदरसे में हुई, जहाँ उन्होंने उर्दू सीखी। पिता की मृत्यु के समय वे बनारस में नवीं कक्षा में अध्ययनरत थे   उनकी मौत के बाद तो रहा-सहा आर्थिक सम्बल भी टूट गया। टयूशन पढ़ाकर और रात में कुप्पी के सामने बैठकर पढ़ने वाले प्रेमचन्द ने किसी प्रकार बी. . तक की शिक्षा ग्रहण की। मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करके जीविकोपार्जन की ख़ातिर उन्होंने स्कूल मास्टर की नौकरी ज्वाइन कर ली एवं फिर बी. . पास करने के बाद सब डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स हुए। 1901 से प्रेमचन्द ने उपन्यास लिखना शुरू किया तो सन्  1097 में अपनी पहली कहानी 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन' लिखी तो कालान्तर में अपना प्रथम कहानी संग्रह 'सप्तरोज़' लिखा 1907 से 1917 तक प्रेमचन्द उर्दू में लिखते रहे।

 

सन् 1918 में 'सेवासदन' के रूप में उन्होंने हिन्दी का अपना प्रथम उपन्यास लिखा। उस वक्त हिन्दी में छायावाद अकार ग्रहण कर रहा था। निराला, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत और महादेवी जैसे रचनाकार अपने चरम पर थे पर इसके बावजूद उनकी रचनाओं में स्वतन्त्रता आन्दोलन और सामाजिक सुधार प्रतिबिम्बित होते नहीं दिखते थे। इसके विपरीत प्रेमचन्द की रचनाओं में वैयतिक्तता नहीं वरन् सामाजिकता प्रतिबिम्बित होती थी। उर्दू में वे नवाब राय के नाम से लिखते थे पर 1910 में अपनी कहानी ''सोजे--वतन'' की जब्ती के बाद उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से प्रेमचन्द नाम से लिखना आरम्भ कर दिया 'सोज--वतन' की जब्ती के बाद उन्होंने लिखा कि- मै विद्रोही हूँ, जग में विद्रोह कराने आया हूँ- क्रान्ति-क्रान्ति का सरल सुनहरा, राग सुनाने आया हूँ।

 

प्रेमचन्द एक लम्बे समय तक सरकारी नौकर भी नहीं रह सके फरवरी 1921 में उन्होंने इससे इस्तीफ़ा दे दिया यह वह दौर था जब गाँधी जी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन अपने चरम पर था। उनके आह्वान पर तमाम लोगों ने सरकारी नौकरियाँ और उपाधियाँ त्याग दी थीं 12 फरवरी 1921 को गोरखपुर में घटित चौरी-चौरा काण्ड, जिसमें आन्दोलनकारियों &