vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। अपनी बात ।।

 

 

 

 

।।संपादक को सिर्फ़ संपादक ही बचा सकता है।।

 

संपादक कहाँ है ? शायद उसका अपहरण हो चुका है, या फिर वह धीमी मौत के बिस्तर में अंतिम साँसे गिन रहा है । बाज़ार उसे लीलने को उद्यत है । मालिक की अति व्यवसायिक महत्वाकांक्षा संपादक का गला घोंटने को उद्यत है । राजनीति की महाकाय विकृति उसे मटियामेट करने पर आमादा है । रोटी के बजाय पराठों और पूरी-किचोरियों की चाहत से संपादक स्वधर्म को भी बिसार चुका है । लगता है, जैसे हमारी मनीषा संपादक से मुक्ति से छुटकारा पाने का आत्महंता निर्णय ले चुकी हो । जो कुछ नये ज़माने की महाव्याधि से मुक्त हैं वे इतने अहमन्य हैं कि संपादन के स्वधर्म से सर्वथा दूरी बनाकर कल्पित स्वर्ग में विचरण कर रहे हैं, और क़ागजीमुद्रा नामक दैत्य है कि उन्हें अपंग बना चुका है या फिर उन्होंने अपनी रीढ़ ही तोड़कर संघर्षों के बदले सुविधा नामक प्रेयसी के आगे नतमस्तक हो चुके हैं । वह दिन दूर नहीं, जब संपादक का नामोनिशान शब्दाकोश से ही मिट जायेगा।

 

संपादक में समयदृष्टा का बोध होता है और संपादन कर्म में युगदिग्दर्शन तथा पथप्रदर्शन भी। संपादक को शुरू से भारतीय अस्मिता का प्रमुख प्रहरी माना जाता रहा है । संपादक कहने से हमारे अंतःचक्षु में सबसे पहले हरिजन के गाँधी जी, कवि वचन सुधा के भारतेंदु, सरस्वती के महावीर प्रसाद द्विवेदी या पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, कर्मवीर माखन लाल चतुर्वेदी या सप्रे जी, हंस के प्रेमचंद, स्वदेश के फ़िराक और  धर्मयुग के धर्मवीर भारती का ओजस्वी तेज़वान चेहरा दिपदिपाने लगता है । हाल के दिनों पर विचार करें तो अज्ञेय, रघुवीर सहाय सहित साहित्य अमृत के पं.विद्यानिवास मिश्र, दिनमान के श्रीकांत वर्मा, अक्षरा, वागर्थ तथा नया ज्ञानोदय जैसी तीन-तीन पत्रिकाओं के संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय का व्यक्तित्व हमें लुभाने लगता हैं । ये चेहरे कहाँ खो गये ? क्या अब संपादक नामक भूमिका को तिलाजंलि दी जा चुकी है?

 

पत्रकारिता यदि प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ है तो पत्रकार उस स्तम्भ का सबसे बड़ा पहरेदार । ऐसे में संपादक को हम चौथे स्तम्भ के सेनापति के रूप में देख सकते हैं । कहने का साफ़ मतलब है कि वह ऐसा हो जो पत्रकारिता को गति दे सके । जाहिर है इस गति में समय, देश, काल, सभ्यता की आलोचनात्मक परीक्षण विवेक न हो तो वह मीना बाज़ार में कोई साईकिल चलाकर करतब दिखानेवाले की परिक्रमा से अधिक कुछ भी नही होगी । वह गोल-गोल घुमता रहता है । सात दिन, सात रात । आप जानते हैं वह कहीं नहीं पहुँच पाता । संपादक की चाल-चलन ऐसी नहीं होती । वह सरल रेखा में चलता है, पर पूरे वृत का सिंहावलोकन करते हुए। सरल रेखा के सहारे वह समाज को उस जगह पहुँचाता है, जो उसकी मंज़िल हो । दूसरे मायने में वह समाज को सही मंज़िल तक साथ देने वाला हमसफ़र है । वह केवल पथदर्शक नहीं। यदि ऐसा होता तो वह केवल पर्यटन विभाग का गाईड से ज़्यादा कुछ नहीं होता । वह समाज के साथ स्वयं चलता है । इसलिए समाज भी उसके साथ चलता है ।

 

संपादक पहले स्वयं बड़ा रचनाकार होता है । वह रचनाकारों (पत्रकार, संवाददाता या लेखक) का भी रचनाकार होता है । वह रचनाकारों के अनर्जित विवेक, भावुक निर्णय से कहीं अधिक विवेक और बौद्धिक निश्चय से भी लैश व्यक्ति होता है जो उनकी चुकों से समाज को बचाता चलता है । क्या वह ऐसे समय रचनाकारों का गुरू जैसा नहीं दिखाई देता ! इस वरिष्ठता का कौशल वह अनुभव के ताप से अर्जित करता है न कि केवल उम्र की ढलान से । अनुभव ऐसा कि जहाँ वह समस्त पूर्वाग्रह से मुक्त हो। संपादक वह घर है जिसके अगाड़ी या पिछाड़ी, कहीं भी ऐसा द्वार या खिड़की नहीं होती जहाँ पूर्वाग्रह चोरी से भी घुस सके । संपादक का मतलब नीर-क्षीर विवेकी। सर्वथा और सर्वदा तटस्थ । संपादक अभिव्यक्ति के परिसर में सबसे अधिक सत्याग्रही होता है । संपादक होना गांधी होना है । संपादक होना ईसा होना है । संपादक होना मुसा होना है। संपादक कबीर का दूसरा नाम है। कबीर साईं से इतना ही माँगता है जितना जिसमें साधु भी भूखा ना जाय और वह भी भूखा ना रहे । संपादक स्वयं भूखा रहता है पर साधु को भूखे पेट नहीं देख सकता । वह चदरिया को ज्यों की त्यों नहीं धर देता । आगे बढ़कर चादर को और अधिक चमकाने का उद्योग भी करता है । संपादक होना तुलसी बनना है । तुलसी ने दिशाहारा समाज को दिशाबद्ध किया ।

 

संपादक सच्चा लोकनायक होता है । वह कुरुचि के तूफ़ान में धँसे लोकमानस को उबारता है । पाठक-समाज के लिए वह अक्षयवट की तरह छाँव जुटाता है । वह वर्तमान को सुरक्षित भविष्य की ओर गतिशील बनाये रखने के लिए सदैव उन्मुखीकरण में संलग्न रहता है । वह एक वैद्य की तरह हर व्याधि में विचारों, मंतव्यों की देसी दवा देने तत्पर रहता है । अपनी प्रतिभावान् दृष्टि से अपने भूगोल की मानसिकता का मनोवैज्ञानिक अनुमान लगाकर उन्हें संस्कारित करता है, सही मार्ग का पता बताता है ।

 

 संपादक को हाशिये में रखने का मतलब मनुष्य, समाज और देश को हाशिये में रखना भी है । संपादक को ख़ारिज करने में मनुष्य के भविष्य को भी ख़ारिज करने का आशय निहित होता है । और इतना ही नहीं, ऐसे करने में सबसे उपेक्षित, सबसे पीड़ित, सबसे दमित लोगों की भी उपेक्षा अपने आप जुड़ता चला जाता है । इस रूप में यह कदाचरण उपेक्षितों के विरूद्ध एक घनीभूत षडयंत्र भी है। संपादक प्रजातंत्र का सबसे सतर्क मित्र है । संपादक के रूप में विपदाग्रस्त मनुष्य या विडम्बना की मारी जनता के पास एक ऐसा साथी होता है, जिससे वह अपनी दुखड़ा बता सकता है, जिसके समक्ष वह अपने घावों को दिखा सकता है । जाने क्यों, पर मुझे इस वक्त अपने शहर रायगढ़ के बुजुर्ग संपादक और कवि गुरुदेव काश्यप चौबे का जिक्र करना लाज़िमी लगता है । यूँ तो देश के नक्शे में रायगढ़ बहुत छोटी-सी जगह घेरती है । मैं पिछले बीस-तीस साल से देख रहा हूँ कि उनके द्वारा संपादित दैनिक रायगढ़-संदेश के संपादकीय की प्रतीक्षा हर रिक्शावाला, खोमचेवाला, मज़दूर बड़े भोर से करता है । तो ऐसी होती है संपादक की विश्वसनीयता, जहाँ एक अनपढ़ भी औरों से पढ़वाकर संपादक की आकृति और प्रकृति को वरेण्य मानता है । बेशक उनके जैसे संपादक और भी होंगे पर मुझे उन्हें पढ़ने का सौभाग्य अब तक नहीं मिला ।

 

संपादक ऐसी आवाज़ है, जो कार्यपालिका, व्यवस्थापालिका और कई बार न्यायपालिका की रतौंधी और श्रवणदोष की दुरभिसंधियों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ता है । अभिव्यक्ति का हर ख़तरा उठाता है । लाचार तंत्र को आगाह करता है । चुके उपक्रमों को ताक़ीद करता है । संपादक उस संकल्प का नाम है, संपादक वह नेतृत्व है, जो प्रजातंत्र के कृष्णपक्षों को अपनी साधना से शुक्लपक्षों में तब्दील करता है । संपादक की दृष्टि समाज, देश और युग की दृष्टि मानी जाती है ।

 

आज का बाज़ार संपादक से शर्त रखता है कि वह अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ले, कानों पर पर रूई ठूँस ले और मुँह पर लगाम लगा दे। वह जैसे-जैसे संपादक की कुर्सी के क़रीब आता जाये, अपनी बुद्धि और विवेक के प्रश्नों को एक पोटली में बाँधकर टाँगता चला जाय । वह प्रबंधन का मंत्र जपता जाय । अपने भीतर सामान बेचने की आक्षरिक चेतना और कलाप्रवीणता को जगाता जाय । आज जो जितना बड़ा मैनेजर है, वह उतना ही बड़ा संपादक है । यह इस दौर का यथार्थ है ।

 

लघुपत्रिकाओं के संपादकों और खासकर साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक से यह आशा की जाती थी कि वे कोने-कग़रों की वाणी की पहचान करेंगे । बौद्धिक अनुशासन से नये उभार को प्रमुखता देंगे । ऐसा हुआ भी, परन्तु पिछले एक-डेढ़ दशक से जिस तरह हम लघुपत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं के पृष्ठों से गुज़र रहे हैं, उससे यह नहीं कहा जा सकता है कि वह अपने मिशन में निरंतर बना हुआ है । आज का संपादक मिशन का लीडर नहीं, कमीशन का सबसे बड़ा लतखोर दलाल है और संपादक के रुप में यह उसकी सबसे बड़ी हार है । संपादन आज अनुभवी पत्रकारों की मज़बूरी का पर्याय बन चुका है । आज का संपादक वह सब करता है जो उसे नहीं करना चाहिए । आज का संपादक वह नहीं करता जिसे समाज सदैव उसे उत्तरदायित्व के रूप में समाज सौंपता है । वह एक शौक जैसा है । संपादक के बारे में एक जुमला यह भी उछाला जाता है कि संपादक असफल रचनाकार का अगला पायदान है । यदि ऐसा कहा जाता है तो यह बेमानी नहीं है। आज की साहित्यिक पत्रकारिता को देखें तो हमें संपादन कर्म के सबसे बचकाने दौर से गुज़रने जैसा होगा । नयी तकनीक ने पत्रिका प्रकाशन को इतना सारल्य बना दिया है कि गली-मौहल्लों से कुकुरमुत्तों की तरह संपादक उमड़ रहे हैं । यदि ऐसा न होता तो कोई भी संपादक कम-से-कम अखिल भारतीय स्तर पर अपनी उपस्थिति रेखांकित कर पाता । बात तकनीक, सीधे-सीधे कहें तो इंटरनेट आधारित वेब पत्रिकाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है । यहाँ योग्य संपादकों का आना अभी शुरू नहीं हुआ है । जो भी वहाँ है, कंटेंट संपादक हैं । संपूर्ण संपादक नहीं । नौसिखियों के भरोसे भले ही हम हिंदी के हज़ारों पृष्ठों को इंटरनेट पर स्थापित करने का दावा कर सकते हैं पर सच्चाई तो यही है कि वहाँ ईमानदार, विधाविज्ञ, और तटस्थ संपादकों का शुभागमन हुआ ही नहीं है । कहने को इंटरनेट विश्व दृष्टि देता है किन्तु स्वनामधन्य पत्रिकाओं के संपादक भी कुनबेबाजी, निजी कुंठाओं से मुक्त नहीं दिखाई देते और भाजी-पाला की तरह पुराने नामों को दोहराये जा रहे हैं । अधिकांश पत्रिकाओं में संपादकीय ऐसे गायब है, जैसे गधे के सिर से सिंग। कई बार रचनाओं का चयन देखकर भी माथा पीट लेने का मन होता है और मात्र रचनाओं का चयन पश्चात प्रकाशन कार्य ही संपादकत्व का प्रमाण नहीं । 

 

संपादक का नैतिक कार्य नयी और चमकदार भाषिकी गढ़ना भी है । संपादक होना सामाजिकी का संरक्षण प्रदान करना भी है। संपादक समाज का सबसे जागरुक और सतर्क राजनीतिज्ञ है । उस अर्थ में नहीं, जिस अर्थ में हम उन्हें गली-मोहल्लों, विधानसभाओं और संसदों की कुर्सी-कामिनी के गुंताडे में लार टपकाते देखते रहते हैं, बल्कि उस अर्थ में,  जिसमें हमें चाणक्य सबसे पहले स्मरण हो आते हैं । इस परिप्रेक्ष्य में वह वादों, अपवादों, मठों, गुटों, की बजबजाती नाली से उपजा जीव तो हो ही नहीं सकता । माना वह किसी सिद्धांतिकी का प्रबल समर्थक हो तो भी बहुसंख्यक समाज के मति के अनुरुप ही उसकी कमजोरियों को हतोत्साहित करता है ।  

 

संपादक व्यवसायी नहीं । जिस दिन से उसे व्यवसाय का हिस्सा बनाया जा रहा है, उस दिन से वहाँ गंदी नाली का पानी बह रहा है । वहाँ केवल सडांध है । वहाँ न विचार है न संवाद । ऐसे में, उसे कैसे बचाया जा सकता है कि उसे डायरिया न हो। मलेरिया ना हो । व्यवसाय वह मादा ऐनाफिलीज है जिसके काटते ही संपादक मैनेजर हो जाता है । संपादक को बचाने का काम केवल संपादक कर सकता है । मालिक नहीं । मैनेजर नहीं ।

 

बाज़ार यदि सबसे बड़ा समुद्री तूफ़ान है और जिसमें सारा समाज डूबने के लिए सवार है तो पत्रकारिता उस सारे समाज को बचाकर किनारे ले पहुँचानेवाला जहाज है और उस जहाज को सिर्फ़ संपादक ही बचा सकता है । अपने संपूर्ण संघर्ष से । अपने सारे छुद्र विकलताओं से परे जाकर..... फिलहाल तो यही संपादक का स्वधर्म है ।

जयप्रकाश मानस

 ◙◙◙

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google