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सर्वाधिक
महत्वपूर्ण छायावादोत्तर कवियों में एक
अनेक
मार्मिक प्रसंगों के ज़रिये त्रिलोचन अपने सॉनेट के माध्यम से
मामूली-सी बात में कोई बड़ा और चुटीला व्यंग्य रच जाते हैं ।
मज़ाक करते हैं तो बहुत महीन जिसे आत्मसात करते वक़्त नागफनी
के बीहड़ से गुजरना पड़ता है । त्रिलोचन पूरक हैं एक त्रयी के,
जो बाबा नागार्जुन, और केदार को साथ लेकर बनती है । सर्वाधिक
महत्वपूर्ण छायावादोत्तर हिंदी कवियों में से एक त्रिलोचन ने
गीत, ग़ज़ल, चतुष्पदियाँ, कुंडलियाँ, बरवै, सॉनेट, और मुक्त
छंद की कविताओं से समकालीन हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है ।
सम्भवतः यह पहली बार ही हुआ कि कोई रचनाकार किसी विशिष्ठ
विधारूप का पर्याय बन गया हो । विजातीय कहे जाने वाले काव्य
रूप सॉनेट के साधक कवि त्रिलोचन ने बीसवीं सदी के उत्तरार्ध मे
इतने सॉनेट रचे जितना स्पेन्सर, मिल्टन और शेक्सपीय ने भी नहीं
रचे । उन्होंने सॉनेट का भारतीयकरण किया । रोला छंद को आधार
बनाकर बोल-चाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए सॉनेट को
लोकरंग में रचने का काम त्रिलोचन ने किया ।
चंदभानु भारद्वाज
संपादक,संप्रेषण
119, श्रीजी
नगर,दुर्गापुरा, जयपुर
राजस्थान-302018
संस्कृत की परंपरा के संपोषक
स्मृति, मति और प्रज्ञा की जागृत अन्विति के कारण त्रिलोचन
कविता के ‘ऊँचाए
हाथ’
वे ऊँचाइयाँ नापते हैं, जो सहजगम्य नहीं हैं । स्मृति के कारण
त्रिलोचन में परंपरा के प्रति कृतज्ञता का भाव है, वे संस्कृत
कवियों की उस परंपरा को लेकर चलते हैं, जहाँ कवि अपने से पहले
के उन बड़े कवियों को लेकर चलते हैं जहाँ कवि अपने से पहले के
उन बड़े कवियों को प्रणाम करके ही रचना में प्रवृत होता था ।
कालिदास और तुलसीदास दोनों के प्रति कृतज्ञता त्रिलोचन ने
ज्ञापित की है-कहीं शिप्रावात को अपने में समो लेने की बात
कहकर तो कहीं ‘तुलसी
बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी’
कहकर । पर मति का उपयोग वे इन कवियों की भी जाँच करने मे करते
हैं, छूंछी कृतज्ञता और प्रणति को अस्वीकार करते हैं । मूर्ति
का भंजन करना त्रिलोचन का काम नहीं है, पर मूर्ति की अतीत और
वर्तमान दोनों में स्थिति के प्रति वे सजग़ हैं । इस सजग़ता के
कारण हम तक्रातिवादी आचार्य कुन्तक के शब्दों में उन्हें अवहित
(जागरूक) कवि कह सकते हैं । आत्मकथन की दृष्टि से जैसा कहा गया
है, वे उदात्त श्रेणी में ही रखे जाएंगे, जबकि काव्य में वस्तु
और कथनभंगी की अभिव्यक्ति की दृष्टि से वे अर्थ-कक्त्युस्थ
ध्वनि का कसावट के साथ प्रयोग करने वाले बिरले कवियों में हैं
।
राधावल्लभ
त्रिपाठी
उज्जैन, मध्यप्रदेश
हिंदी जाति की संघर्षशील चेतना
जैसे क्रांति और प्रतिक्रांति, वैसे ही नई कविता और त्रिलोचन
को प्रतिकविता । यदि त्रिलोचन की कविता हिंदी भाषा और हिंदी
जाति की संघर्षशील चेतना की जड़ों को सींचती है तो वह सही अर्थ
मे क्रांतिकारी है, तब प्रतिक्रांति की हैसियत है नई कविता की
। हिंदी जाति में पूँजीपति और ज़मींदार है, किसान हैं, मज़दूर
हैं और मध्यमवर्ग के लोग हैं । संघर्षशील चेतना पूँजीपतियों और
ज़मीदारों की चेतना है । नई कविता शहर और देहात के ग़रीब से
जितना दूर है, त्रिलोचन की कविता उनके उतने पास है । त्रिलोचन
जिस ख़ास अर्थ में आधुनिक हैं, वह यही ग़रीबों से उनकी कविता
का नाता है ।
......
त्रिलोचन की कविता ने हिंदू जाति की संघर्षशील चेतना की जड़ों
को सींचा है और ये जड़ें अतीत के साहित्य मे बहुत गहरे फैली
हुई हैं । त्रिलोचन घुमंतू कवि हैं । वह उन कवियों की याद
दिलाते हैं, जो जनता के बीच रहते थे, एक बस्ती से दूसरी बस्ती
पहुँचकर उसे अपनी कविता सुनाते थे, चरैवेति सिद्धांत का पालन
करते थे, जब उनकी मुक्त दार्शनिक चेतना को पुरोहित वर्ग के
धर्मशास्त्र ने दबोच न लिया था, जब भूस्वामी वर्ग ने उनकी
प्रतिभा ख़रीदकर उन्हें अपना चाटुकार न बना लिया था । जिस
ज्ञानाग्नि से भय दग्ध हुआ, वह दार्शनिक कवियों की देन है,
धर्मशास्त्रियों की देन नहीं है ।
रामविलास शर्मा
वरिष्ठ
आलोचक
आधुनिक
साहित्य की महत्वपूर्ण कड़ी
त्रिलोचन में सृजन की अपार, अकूत, अतुलनीय शक्ति है । (-जानने
वाले ही जानते हैं !)
त्रिलोचन में गहराई को छूने, मर्म को सांस्कृतिक अर्थ में
पकड़ने की बड़ी सहज क्षमता है, हाँ, वह सॉनेट लिखने पर आएँ तो
एक सिलसिले मे सात सौ सॉनेट लिख जाएँगे;
ग़ज़ल की तरफ़ झुकें तो पाँच सो ग़ज़लें लिखकर ही दम लेंगे
(हज़ार वह समय और शक्ति का
‘अपव्यय’
हो :
वस्तुतः कोई भी टेकनिकल मश्क जागरूक शिल्पी-कलाकार के लिए
व्यर्थ नहीं होती;
ख़ैर) गीतों की तरफ़ शुरुआत की थी, आरंभ में तो (तो ख़ुदा ही
जानता है सच-झूठ) कहते हैं कि एक लाख से ऊपर लिख गए थे । मैं
उनको काफ़ी नज़दीक से जानता हूँ, इसलिए इसे कुछ असंभव नहीं
समझता । मगर वह साहित्य के ऐसे हनुमान हैं, जो अपने राम मे ही
रमे रहते हैं । पहाड़ उठाने का जब मौक़ा आता है, तभी पहाड़
उठाते हैं, मगर कुछ इस तरह कि पहाड़ उठाएँ और किसी को पता न
चले कि पहाड़ उठाया करते हैं (...या नहीं तो फिर वे बेहद ही
ग़लती पर होंगे और उनमें मैं सबसे पहले हूँ)
..........
मैं त्रिलोचन के शिल्प और शैली पर बहुत कठोर मत रखते हुए भी,
उनकी कम-से-कम सौ से अधिक चीज़ों को दुनिया के अच्छे-से-अच्छे
शिल्पी की रचनाओं के बराबर निःसंकोच रख सकता हूँ.... त्रिलोचन
खड़ी बोली की हिंदी भाषा और साहित्यिक अभिव्यक्ति के आधुनिक
इतिहास में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर आते हैं ।
शमशेर बहादुर सिंह
वरिष्ठ
कवि
त्रिलोचन की कविता :
द्विवेदी जी की तुक
मैं उन दिनों काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र था तथा
साहित्यिक आयोजनों के प्रति गहरी दिलचस्पी थी और सबों में
हिस्सा भी लेता था । जिस बातको मैं कहने जा रहा हूँ, वह होगी
1954 या 55 की ।
साहित्यिक-संघ की ओर से महापंडित राहुल सांकृत्यायन के सम्मान
में एक गोष्ठी का आयोजन डॉ. रामअवध द्विवेदी जी के निवास स्थान
पर किया गया, जिसमें आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. राजबली
पांडेय आदि कई गणमान्य साहित्यिक उपस्थित थे । श्री ठाकुर
प्रसाद सिंह, केदारनाथ सिंह, त्रिलोचन शास्त्री आदि कई कवि भी
वहाँ उपस्थित थे, अतः आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कवियों
से कविता पाठ का आग्रह किया । सबसे पहले त्रिलोचन शास्त्री को
कहा गया । ‘ना-नू’
करने के बाद कि हमें तो भूला न गया, हमसे भुलाया न गया एक बार,
दो बार, चार बार, छह बार त्रिलोचन अपनी यही पंक्ति कहते रहे और
पसीने-पसीने होते रहे और उपस्थित लोगों ने समझ लिया कि
त्रिलोचन आगे की पंक्ति भूल गए । द्विवेदी जी से न रहा गया, तो
मुस्कराते हुए उन्होंने झट से दूसरी पंक्ति जोड़ दी- तुमसे
खोला न गया, हमसे खुलाया न गया और रोकी हुई हँसी सबों के मुँह
पर अट्टहास बनकर गूँज उठी । त्रिलोचन जी व्यास गद्दी से उठकर
पीछे अस्त-व्यस्त से बैठ गए ।
शंकरदयाल सिंह
(धर्मयुग, 1963)
तीर्थःत्रिलोचन
त्रिलोचन मेरे अग्रज और आत्मीय हैं ।
हिंदी साहित्य का प्रगतिशील लेखन आंदोलन तथा मार्क्सवादी
विचारधारा हम दोनों और अन्य साहित्यकर्मी साथियों के मध्य एक
मजबूत कड़ी है । मेरी तथा उनकी उम्र के फ़ासले को इसी रचनात्मक
वैचारिकता ने पाट रखा है ।..... मेरी दृष्टि में साहित्य संसार
के एक बडे तीर्थ महाकवि त्रिलोचन शास्त्री हैं ।
महेन्द्र फुलकेले
वरिष्ठ आलोचक
निराली
की तरह किंवदती पुरुष
त्रिलोचन ने अपना श्रेष्ठ
साहित्य जीवन के उन संघर्षों में लिखा है जब वे दाने-दाने को
मोहताज़ थे । 1952 से 60 तक का यह समय उनके सर्वाधिक
सर्जनात्मक दिन थे । त्रिलोचन निराला की तरह किंवदती पुरुष थे
। उन्होंने जो किया नहीं, जिया नहीं उसकी भी कल्पना करते थे और
वह उनके लिए हक़ीकत हो जाती थी । वे अपने बारे में स्वयं कथाएँ
गढ़ते थे । त्रिलोचन ने जितना लिखा उसमें से जितना प्रकाशित है
उससे ज़्यादा अप्रकाशित रह गया है । वे नियमित डायरी लिखते थे
। उन्होंने अपने बारे में और अपने साहित्य के बारे में अपनी
कविताओं में जो कहा है, उसी में उनका जीवन उभर कर आता है ।
निराला ने उतना संघर्ष नहीं किया होगा जितना त्रिलोचन ने किया
। वे कई-कई दिन बिना खाए रह जाते थे । पर कोई उनके स्वाभिमान
को ललकार दे तो वे सहने वाले नहीं थे ।
नामवर
सिंह
वरिष्ठ आलोचक
व्यक्तित्व
का लेखा-जोखा कठिन
उनके व्यक्तित्व के इतने
आयाम है कि सबका लेखा-जोखा करना कठिन है । सॉनेट की हिंदी में
लय और छंद क्या हो सकती है इसका आविष्कार उन्होंने किया । उसके
लिए उन्होंने सबसे उपयुक्त छंद रोला को चुना । उन्होंने पश्चिम
के सॉनेट को ऐसे साधा कि वह हिंदी का लगने लगा । उनका
व्यक्तित्व पानी की तरह था जो हर जगह प्रवाह ढूँढ लेता था ।
उनके लिए कुछ भी अस्पृश्य, निषिद्ध और वर्जित नहीं था ।
केदारनाथ
सिंह
वरिष्ठ प्रगतिशील कवि
विश्वविद्यालयों से अधिक साहित्यकार पैदा करने वाला
गाँधी को राष्टपिता इसलिए
कहते हैं क्योंकि वे देश के सबसे कमज़ोर व्यक्ति का ध्यान रखते
थे। त्रिलोचन का ध्यान भी जो सबसे उपेक्षित है उस पर जाता था ।
देश के विश्वविद्यालयों के सभी हिंदी विभागों ने जितने
साहित्यकार पैदा किये उससे अधिक अकेले त्रिलोचन ने तैयार किये
थे । वे साहित्यकारों के सच्चे गुरु थे । साहित्य के ठेकेदारों
ने उन्हें लंबे समय तक कवि माना ही नहीं।...... वाक्य भाषा की
इकाई है, शब्द नहीं । अर्थ-बोध वाक्य से होता है । और त्रिलोचन
ने हिंदी साहित्य में वाक्य की महत्ता साबित की ।
विश्वनाथ
त्रिपाठी
आलोचक
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