|
देर
रात नाटक की रिहर्सल के बाद लौटी हूँ, सर्दी का साम्राज्य फैला है, सन्नाटा आँख
मूँदे बैठा है और ज़ोर की भूख लगी है। खाने की प्लेट लगाकर माइक्रोवेव में रखती हूँ
और कमरे में आकर अंधेरे में सोए हुए लैपटॉप को जगाती हूँ... अलग-अलग मैसेंजरों पर
कुछ संदेश प्रकट होने लगते हैं। एक एक कर पढ़ती हूँ–
जबलपुर से गिरीश बिल्लोरे मुकुल का संदेश है- ‘बहुत
दुःख की बात है त्रिलोचन नहीं रहे।'
वे संदेश लिखकर जा चुके हैं। जी टॉक पर हरी बत्ती के साथ चाँद हदियाबादी नीदरलैंड
से प्रकट होते हैं- ‘दुखद
समाचार है, पूर्णिमा जी, एक युग का अंत हो गया।'
मॉस्को से अनिल जनविजय के संदेश हैं ‘त्रिलोचन
के निधन की ख़बर मिली आपको?’...
आश्चर्य में हूँ गाँव की
मिट्टी में रचा बसा सीधा-सादा कवि और लोकप्रियता का इतना
व्यापक विस्तार...बस तीन ही घंटे बाद घर लौटी हूँ... दुनिया भर
में ख़बर व्याप गई है। पिछले सात सालों से इस काम में हूँ किसी
साहित्यकार के जाने की ख़बर इस तरह आग सी नहीं फैली।
आखिर त्रिलोचन
में ख़ास क्या था कि एक घंटा बीतते न बीतते उनके देहांत का
समाचार दुनिया के हर कोने में पहुँच चुका था। त्रिलोचन की
कविता वह कड़ी थी जो फ़ैशनेबल और आधुनिक कहलाने वाले इंसान की
रूह को भी भारत की मिट्टी से जोड़ती थी। उनके लेखन में जीवन के
सच को सम्मान के साथ स्वीकारने का वह जज़्बा था जो प्रवासियों
को हर मुश्किल में संभालता था और जीवन की प्रेरणा शक्ति देता
था। उनका एक सॉनेट है-
एक विरोधाभास त्रिलोचन है। मै उसका
रंग-ढंग देखता रहा हूँ। बात कुछ नई
नहीं मिली है। घोर निराशा में भी मुसका
कर बोला,
कुछ बात नहीं है अभी तो कई
और तमाशे मैं देखूँगा। मेरी छाती
वज्र की बनी है,
प्रहार हो,
फिर प्रहार हो,
बस न कहूँगा। अधीरता है मुझे न'
भाती
दुख की चढी नदी का स्वाभाविक उतार हो।
संवत पर संवत बीते,
वह
कहीं न टिहटा,
पाँवों में चक्कर था। द्रवित देखने वाले
थे। परास्त हो यहाँ से हटा,
वहाँ से हटा,
खुश थे जलते घर से हाथ सेंकने वाले।
औरों का दुख दर्द वह नहीं सह पाता है।
यथाशक्ति जितना बनता है कर जाता है।
उनकी यह जिजीविषा यह हिम्मत और यह ताकत अनेक कविताओं में अनेक
जगह देखी जा सकती है। यही लोगों को उनकी कविता के नज़दीक लाती
है और अपना बनाती है। शायद यही कारण था कि त्रिलोचन देश-परदेश
सबके दिलों में इतनी गहराई से जा बसा थे।
पिछले
कुछ दिनों से लगातार उनके विषय में कुछ चिट्ठों पर समाचार आते
रहे थे। उनकी बीमारी के, उनसे मिलने वालों के, उनके वीडियो,
उनके ऑडियो। पत्रकार इरफ़ान के ब्लॉग पर इनका एक छोटा व अच्छा
संग्रह था। कथाकार उदय प्रकाश के ब्लॉग पर भी एक वीडियो था। पर
उनके बेहतर होने के समाचार भी आ रहे थे पंखुड़ी सिंह का फ़ोटो
इसका गवाह था- अपने बाबा को, देहांत के केवल 10 घंटे पहले ही,
कुछ लिखते हुए संजोया लिया है उन्होंने इस चित्र में। इसी से
पता लगता है कि वे कितने जीवट वाले व्यक्ति थे। यह फ़ोटो है
डॉ. मान्धाता सिंह के चिट्ठे
‘चिंतन’
पर। कुछ व्यक्तिगत जानकारी भी है। अलग अलग चिट्ठों पर नगई महरा
है, काले अच्छर न चीन्हने वाली चंपा है और अलग-अलग भेस में
त्रिलोचन है।
विकिपीडिया का
मुखपृष्ठ देखती हूँ वहाँ अभी तक समाचार नहीं लगा है। मुखपृष्ठ
पर समाचार दिखाने के लिए पहले भीतर का पृष्ठ बनाना होता है।
मैं पृष्ठ बनाने की तैयारी शुरू करती हूँ –
अंतर्जाल पर त्रिलोचन से संबंधित समाचार अभी सब जगह नहीं
पहुँचे हैं। बीबीसी के जालघर पर यह प्रकाशित हो चुका है उसका
लिंक देते हुए मुखपृष्ट पर समाचार देती हूँ फ़ोटो ढूँढनी है वह
मिलती है ‘छाया’
ब्लॉग पर। पंखुड़ी सिंह की ही खींची हुई एक और फोटो- जीवंत
चेहरा चमकदार आँखें। लेखक टैंपलेट में प्रमुख जानकारिया डालकर
विकिपीडिया पर लगाती हूँ और मुखपृष्ठ पर समाचार प्रकट हो जाता
है।
अंदर कुछ और
लिखना है जो भी अंतरजाल पर मिल जाए क्योंकि इस समय इसके सिवा
और कोई ज़रिया नहीं है उनके विषय में जानकारी प्राप्त करने का।
याहू जागरण पर भी एक समाचार मिलता है, रेडियो डॉयशेवेले पर भी।
पृष्ठ आकार लेने लगा है। सबसे अधिक जानकारी कविता कोष में है
उनका जीवन परिचय तो है ही ढेर सी कविताएँ भी हैं। अपनी किताबों
की शेल्फ़ पर देखती हूँ ‘त्रिलोचन
की प्रतिनिधि कविताएँ’
में कुछ जानकारी है। कुछ पुरानी पत्रिकाओं में यत्र-तत्र। सबको
इकट्ठा कर तैयार हो चुका है विकिपीडिया का पृष्ठ भी। आशा है
कल तक और भी जानकारी आ जाएगी वेब पर, भारत से जुड़े लोगों से
मैंसेंजरों पर भी बात हो सकेगी। सुबह के तीन बज चुके हैं। सब
कुछ बंदकर चल पड़ती हूँ निद्रा देवी के पास।
अगले दिन वेब पर
खोज शुरू होती है। पिछली रात से आज दोपहर तक त्रिलोचन पर दी
जाने वाली सामग्री में ढेर-सा उबाल आया है। हर अख़बार में
चित्र हैं विभिन्न पत्रिकाओं पर नोट हैं। अलग अलग चिट्ठों पर
भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्री है बस त्रिलोचन लिख कर सर्च भर
डालने की देर है। लगभग 10,000 पन्ने वेब पर पहुँच चुके हैं।
पहली चिंता होती
है अभिव्यक्ति के अगले अंक के त्वरित बदलाव की। कहानियों में
त्रिलोचन की कहानी चाहिए तो उनका एकमात्र कहानी संग्रह
‘देशकाल’
कहाँ मिलेगा। बहुत से लोगों को संदेश भेजती हूँ। किसी स्कूल के
पुस्तकालय में, किसी पत्रकार के दफ़्तर में किसी लेखक के
व्यक्तिगत संग्रह में –
कहीं नहीं मिल रहा है उनका कहानी संग्रह। निराशा... निराशा...
सारी सुविधाओं के रहते इतने बड़े कवि-लेखक की एक किताब खोजना
मुश्किल हो रहा है। हरिद्वार में के. के. बुधकर जी दिखाई देते
हैं उन्हें भी संदेश देती हूँ..., वे संकोच में हैं अभी जिस घर
में शोक हुआ हो वहाँ जाकर किताब के विषय में कैसे बात करें।
इंसानियत भी कोई चीज़ होती है।
थोड़ी देर में
दिल्ली से अविनाश वाचस्पति का संदेश मिलता है किताब एक मित्र
के पास मिल गई है रात तक कहानी स्कैन कर के भेज रहे हैं। सफलता
की लहर सी फैल जाती है- रात तक कहानी हाज़िर है मेल बाक्स
में... किसी पाठक ने एक लेख भेजा है लखनऊ से, अनिल जनविजय
मास्को से याद कर रहे हैं अपने दोस्त त्रिलोचन को... लेख फटाफट
ट्रांसफ़र हो रहे हैं- लखनऊ से... दिल्ली से... मास्को से...
शारजाह, शारजाह से कुवैत... कुवैत से वापस शारजाह, दीपिका जोशी
संध्या अंतिम समय की प्रूफरीडिंग में लगी हैं और मैं कहानी के
लिए ग्राफ़िक तैयार करने में... अश्विन गाँधी बहुत सी तस्वीरें
भेज रहे हैं...ऐसा चेहरा चाहिए या ऐसा या ऐसा... बैकग्राउंड के
लिए कैसा फ़ोटो चहिए...वे फ़िलहाल कैनाडा में नहीं इगतपुरी में
हैं... आखिर में फोटो के अंतिम चुनाव होते हैं। फ़ोटोशॉप में
काम जारी है कि जर्मनी के ऑग्सबुर्ग शहर से गुराम ब्रौन (वे
जन्म से जार्जियाई हैं लेकिन दिल से हिंदुस्तानी। राजकपूर,
हिंदी सिनेमा और हिंदी साहित्य के शौकीन) हमें ऑन लाइन देखकर
हिन्दी में पूछते हैं, ‘आप
लोग अभी तक जागे हैं, सोए नहीं?’
‘नहीं
हम अपने कवि को श्रद्धांजलि देने में लगे हैं।‘
मैं उन्हें त्रिलोचन के विषय में बताती हूँ। वे कहते हैं-
‘हमारी
भाषा में ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है कि वे अपने देश और समाज
का कर्ज़ चुका कर चले गए।‘
हाँ वे चले ही तो
गए हैं। लेकिन सिर्फ़ धरती से...केवल पार्थिव शरीर से गए हैं
वे। उनका कर्मविलास तो यहीं हैं...वे अपने परिचितों की यादों
में है... अपने प्रशंसकों की प्रेरणा में हैं...साहित्य के
सफ़ों में हैं... अंतर्जाल की आत्मा में हैं... नगई महरा में
हैं... काले अच्छर नहीं चीन्हती चंपा में हैं और भारत की आत्मा
में हैं ...यहीं हैं वे और सदा रहेंगे।
(लेखिका वेब-पत्रिका
अभिव्यक्ति की संपादिका हैं)
◙◙◙
|