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सृजनगाथा

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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

त्रिलोचन यानी 'त्रिलोचन'


ज्ञानेन्द्र पति

 

 त्रिलोचन नहीं रहे। यह खबर अप्रत्याशित नहीं थी। पिछले दिनों उनकी बीमारी ख़बरों में रही थी। शर-शय्या पर पड़े भीष्म का चित्र मन की आँखों के आगे उभरता था। वार्ध्दक्य के अलावा बीमारी भी खास नहीं थी। धरती धांगने और दिगंत तक विहरने वाले तन-मन को बाहर से तालाबंद कोठरी का क्रूर एकांत दिया गया था। वह हरिद्वार हो या गाजियाबाद, तख्त पर पड़ा शरीर मन-ही-मन बनारस की धरती पर और सुल्तानपुर के आकाश में भटकता रहता था। पास कोई नहीं। 'जन-संग-ऊष्मा' में जीने वाला मन पछाड़ें खाता था। बोलना-ही-बोलना और भाषा के भेद खोलते रहना जिसका स्वभाव था, उस मुँह पर चुप्पी की पट्टी कस दी गई थी। हमारे समय में स्मृति के मूर्तिमान् स्वरूप त्रिलोचन स्मृति-अंश से विगलित हो रहे थे।

 

त्रिलोचन की काया तो गई, पर उनका किया ज्योति-लेख की तरह समय के सांवले पृष्ठ पर लिखा हुआ है। उनके लिखे पर यों तो नामवर सिंह से प्रभाकर श्रोत्रिय तक अनेक लोगों ने कुछ-न-कुछ लिखा है, चंद्रबली सिंह और रामविलास शर्मा ने भी, लेकिन जो शमशेर कह गए हैं, कम-से-कम शब्दों में मर्मोद्घाटन वहाँ है, 'तुमने धरती का पद्य पढ़ा है? सहजता ही उसके प्राण हैं।' त्रिलोचन का काव्य वस्तुत: सहजता की कठिन साधना है। शमशेर के ही अनन्य शब्द हैं, त्रिलोचन के व्यक्तित्व और कृतित्व को एक साथ रूपायित करने वाले 'सॉनेट और त्रिलोचन: काठी दोनों की है एक। कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता।'

 

त्रिलोचन के हाथों हिंदी ने पश्चिमी काव्य-रूप सॉनेट को वक्ष से लगाकर अपना बना लिया। सॉनेट तो त्रिलोचन से पहले भी लिखे गए थे। चतुर्दशपदियाँ प्रसाद ने लिखी थीं, पंत ने भी। लेकिन यह हिंदी में पहली बार हुआ था कि बकौल त्रिलोचन-

 

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा

 सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला...

 

सॉनेट का यह पथ जनपदों के जीवन के बीच से गुज़रता है। त्रिलोचन जनपद के कवि हैं। भारत का लोक-जीवन उनके शब्द-शब्द में धड़कता है। त्रिलोचन का जन्म-जनपद अवध है। अवधी के महाकवि तुलसीदास उनके प्रथम और प्रमुख शिक्षक हैं। तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी स्वीकारते हैं। अवध के ही 'निराला' उनके दूसरे प्रेरणा-पुरुष हैं। लेकिन अवधी के अलावा भोजपुरी, बुंदेलखंडी और हिंदी क्षेत्र की दूसरी बोलियों के शब्द भी उनकी भाषिकता में अबरक के ज़र्रों की तरह चमकते हैं। यह लोक का महाजीवन है। दिगंत-व्यापी। दिगंतरों तक फैला हुआ। त्रिलोचन की कविता एक बूंद की तरह नहीं रची जाती, जैसा 'अज्ञेय' के यहाँ है, एक स्वयं-संपूर्ण संरचना। त्रिलोचन की कविता की संरचना एक लहर की तरह है। एक लहर दूसरी से जुड़ती है और जीवन का महासागर ठाठें मारता नज़र आता है। यह इस तरह है कि मुक्तकों की कविता, त्रिलोचन के यहाँ महाकाव्यात्मकता अर्जित करती है। जैसा कि अपनी तरह से मुक्तिबोध के यहाँ संभव होता है। नहीं होती, खत्म कभी कविता नहीं होती... मुक्तिबोध कहते हैं।

 

मुक्तिबोध की कविता का रूपबंध शिथिल है, संरचनाएं प्रदीर्घ और आपस में उलझती हुईं; स्वप्न-शैली, बल्कि दु:स्वप्न-शैली। त्रिलोचन 'अंधेरे में' नहीं जीते, उनके यहाँ तो धूप सुंदर/ धूप में जग-रूप सुंदर...। उनकी आंखें हमेशा खुली रहती हैं। वह सावधान द्रष्टा हैं, सौंदर्य स्रष्टा भी। ध्वनियों के संग्राहक, क्रियाओं के निरीक्षक। उनका कवि-व्यक्तित्व मुक्तिबोध से सर्वथा भिन्न है। जो समान है, वह है असीम को आकारने की कोशिश। 'कठिन प्रकार' के बावजूद उनकी कविता की संरचना बंद नहीं, बल्कि खुली हुई है। यह भी अलक्षित न जाना चाहिए कि सॉनेट के पश्चिमी काव्य-रूप को, रोला छंद का आश्रय लेकर वह किस तरह भारतीय जीवन-गति से स्पंदित करते हैं। रेनासां से लेकर मॉडर्निज्म के प्रस्थान-बिंदु तक, शेक्सपीयर से बॉदलेयर तक, सॉनेट ने व्यक्ति-मन के माध्यम से युग-मन को अभिव्यक्त किया है।

 

त्रिलोचन के यहाँ जग-जीवन के नाभिक से युग-बोध मुखरित होता है, जिसके संपुट में व्यक्ति-मन भी अनभिव्यक्त नहीं रहता। आज मैं अकेला हूँ। अकेले रहा नहीं जाता... से लेकर भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल... तक उसकी मुद्राएँ अनेक हैं, दुर्लभ आत्म-व्यंग्य की भी। परंपरा, बल्कि परंपराओं की चेतना के साथ आधुनिक (आधुनिकतावादी नहीं) भावबोध का संगुंफन त्रिलोचन की कविता की वैचारिकी निर्मित करता है।

 

ऐसे में, स्वाभाविक है कि त्रिलोचन की कविता का भाषिक पाट चौड़ा हो; वहाँ 'द्यावापृथवी' और 'रोदसी' जैसे ॠग्वैदिक शब्दों के पड़ोस से 'दौंगरा' और 'अरघान' जैसे देशज शब्दों को कोई उज्र न हो। त्रिलोचन शास्त्री हों, लेकिन उनके यहाँ शास्त्र भी लोक से छनकर आता है। उनके शब्द धरती पर पैदल घूमकर, जन-जीवन में धँसकर, उगाहे गए हैं; जीवन की ख़राद पर तराशे गए। तभी तो शमशेर जैसे शब्द-साधक कवि को कहना पड़ता है, शब्द का परिष्कार/स्वयं दिशा है-/वही मेरी आत्मा हो/आधी दूर तक/तब भी/तू बहुत दूर है बहुत आगे/त्रिलोचन...

 

हिंदी कविता को त्रिलोचन का योगदान सॉनेट तक सीमित नहीं। वह मुक्तछंद के भी अन्यतम कवि हैं। यदि 'निराला' की जूही की कली को मुक्तछंद का प्रस्थान-बिंदु माना जाए, तो कहा जा सकता है कि पहले दौर में मुक्तछंद अलंकृति से मुक्त नहीं। अनलंकृत, रिपोर्ताज होने के करीब तक पहुँचे हुए मुक्तछंद से हमारी मुलाकात 'निराला' की स्फटिक शिला में होती है। मुक्तछंद का तीसरा, परिपक्वप्रज्ञ दौर 'निराला' के नये पत्ते संग्रह में दिखता है। रानी और कानी, महंगू महँगा रहा, झींगुर डटकर बोला जैसी कविताएँ जन और जमीन के निकटतम हैं। मुक्तछंद के इस जनोन्मुख उत्थान को त्रिलोचन नई ऊँचाई तक पहुँचाते हैं। ऐसे में, स्वाभाविक है कि अद्वितीयता की चिंता किए बगैर (अद्वितीयता की चिंता 'अज्ञेय' को ही मुबारक) सहज ही अनन्यता अर्जित करने वाले त्रिलोचन का प्रभाव आगे की कवि-पीढ़ियां लें और कविगण उसे अपनी-अपनी तरह से समंजित-परिष्कृत-विकसित करें। जिस तरह 'निराला' के प्रभाव को अपने सर्जनात्मक स्नायु-तंत्र में धारण कर त्रिलोचन और जानकीवल्लभ शास्त्री ने उसे अलग-अलग परिणतियों तक पहुँचाया; उसी तरह, आज के कविता-समय को त्रिलोचन का प्रभाव लेकर विजेंद्र और 'आगे-आगे कवि त्रिलोचन, पीछे-पीछे मैं' ('बाघ' शीर्षक कविता में) कहने वाले केदारनाथ सिंह जैसे कवि सक्रिय हैं।

 

विजेंद्र के यहाँ जनपदीयता, ऐद्रिंय जागरूकता, वर्जना-मुक्त भाषिक संभार और आत्मिक तल में विन्यस्त जन-हितैषणा त्रिलोचन की याद दिलाते हैं; तो केदारनाथ सिंह के इंद्रिय-बोध-संपन्न लोक-रंग से त्रिलोचन की गंध आती है। हिंदी की आगामी कविता के नए रंग-रूपों में त्रिलोचन हजारहा प्रकट होंगे, उन्हें चीन्हा जाए या नहीं।

 ज्ञानेन्द्र पति

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