vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

त्रिलोचन को याद करते हुए


डॉ. बलदेव

 

न् 1981 जनवरी की बात होनी चाहिए, हमारे पाठक मंच,रायगढ़ में ताप के ताए हुए दिन काव्य संकलन विचार गोष्ठी के लिए आया हुआ था । गोष्ठी की शुरुआत करते हुए मैंने त्रिलोचन की नगई महरा शीर्षक लंबी कविता का पाठ किया था । इस कविता मैं नंगई महरा अपने भाई की विधवा सास से शादी कर लेता है । माँ-बेटी, देवरानी-जेठानी बन जाती हैं । नगई को गाँव छोड़ अन्यत्र जंगल से लगे गाँव में बसना पड़ता है । जात में मिलाने के लिए उसे भात देनी पड़ती है ।

     

कहार जाति की इस व्यवस्था पर त्रिलोचन ने बड़ी जानदार कविता लिखी है, वह यह कि छोटी कही जाने वाली जाति में सामाजिक वंधन बड़े सरल हैं । लखमनी विधवा है, वह भाई की सास है जिसे नगई अपना बना लेता है । कवि त्रिलोचन के शब्दों में-

मेरी आँखों के सामने पंचायत थी

चौकीदार ने पुकारा

नगई और लखमनी

दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए

फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया

अपने दोस मानते हो

मानते हैं – दोनों ने साथ कहा

पूछा गया, डांड़-बाँध तुमको मंज़ूर है

सिर माथे हमको मंज़ूर है – दोनों बोले

पंचों ने कहा, दस रुपये का डांड़ हैं, भात देना होगा

यह भी मंज़ूर है

फिर महरिन जल लायीं, सबको दिया पीने को

नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया

पंचोंने ने हुक़्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो

पंचायत को मानो पंचपरमेसर है

नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ

बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया

धन्य हुआ

और फिर भोज हुआ

नाच और नाटक हुए

 

गोष्ठी, गोष्ठी जैसी हुई, यह कविता अत्यंत सरल थी, श्रोताओं के हृदय में सीधे उतर गई । विद्वानों ने त्रिलोचन के सॉनेट और काव्य शिल्प पर जमकर बहस बाजी की, किंतु इस कविता की ज़रा-सी भी चर्चा न हुई । इसे कविता की शक्तिमत्ता कहें, या कमजोरी, कविता ने किसी ओर चारा नहीं फेंका, राह चलती गुज़र गई । दरअसल यह कविता उतनी सरल नहीं है, जितने दिखने में है, सुनने में है, इसमें नीच कही जाने वाली जातियों के सामाजिक बंधन और उसकी सरलता का स्वस्थ विश्लेषण है, वह भी सरलतम अभिव्यक्ति के रूप में । नगई का यह क्रांतिकारी क़दम है, जिस घर से वह अपने भाई के लिए बेटी लाया है, उसी घर से वह भाई की विधना सास को बिना सिंदूर दिये घर बैठाया है । संबंधों का छीछालेदर किया है, बाप-दादों का कुटका बछैया छोड़क नगई चिरानी पट्टी में आकर बस गया है लेकिन अंततः वह सामाजिक बंधनों को मानता भी है पंचायत को वह परमेश्वर मानता है ।

     

27-28 वर्ष के बाद भी न जाने क्यों यह कविता मेरे ज़ेहन को खाली नहीं करती । इसका भी कारण है, त्रिलोचन की कविता कहन-रस में पगी हुई, अवधी का पंछाही रंग यहाँ उभर-उभर गुलाल छिड़कता नज़र आता है । त्रिलोचन जनपद के कवि हैं, ग्राम्य-जीवन के चटक रंगों को तद्वत तराशने वाले प्रकृति के आदिम गंध से ...... त्रिलोचन ने हिंदी भाषा को जो ताज़गी दी है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। सॉनेट के तो वे बादशाह ही हैं, उनके बिना हिंदी में सॉनेट की चर्चा अधूरी है, इसके बावज़ूद यदि उनके सॉनेट से अलग भी उन्हें एक विराट कवि के रूप में भी देखा जाना चाहिए, जहाँ धरती और आकाश दोनों स्वच्छ हैं, ताजे हैं, अनावृत्त हैं ।

     

नगई-नगरा पढ़ने के बाद मुझे त्रिलोचन के दर्शन की बलवती इच्छा रही कि इतने बड़े त्रिलोचन ने जाने कितने नगई-महरा से आत्मीय संबंध बनाए हुए थे । वे वही त्रिलोचन है, जो कभी अपने को मज़दूर किसान में प्रक्षेपित करते हैं, औऱ कभी अपने को ही भीख माँगने वालों की पंक्ति में खड़ा पाते हैं, अपने भोपाल निवास के दिनों एक शाम मैंने उन्हें अपने लॉन में खड़ा पाया, मैंने हाथ जोड़े, प्रणाम किया । प्रशांत मना कवि ने आशीष दिया-कैसे, मैंने अपना परिचय दिया । पूछा-कैसे आना हुआ ! आजकल प्रशिक्षण चल रहा है, रायगढ़ से आया हूँ, उन्होंने कुछ याद करते हुए सा पूछा- मुकुटधर जी है, हैं, मैंने आपको उनकी दो पुस्तकें भेजी थी, अभी हाँ मिल गई थी, आपने बड़ा काम किया है । मैंने लोचन प्रसाद पांडेय का नाम लिया तो वे अन्वय ताड़ गए, बोले हाँ द्विवेदी युग मे उन्होंने सॉनेट लिखी थी, मैंने देखा उनके संध्याटन का समय हो रहा है, शायद इसीलिए बाहर लॉन में खड़े थे । मेरे लिए उनके दर्शन ही बहुत थे । वह दृश्य आज भी मेरे मन प्राणों को कभी-कभार भिगो देता है ।

(लेखक छायावादी काव्य के जाने-माने आलोचक हैं)

◙◙◙

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google