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सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

त्रिलोचन के पत्र


विजेंद्र

 

 त्रिलोचन जी द्वारा कवि विजेंद्र को लिखे गये कुछ ख़ास पत्र, जिसमें दोनों के मध्य संबंधों की परत तो खुलती ही है, त्रिलोचन जी के व्यक्तित्व की ऊँचाइयों का भी पता चलता है- संपादक ।

रांची (बिहार)

6-6-1959

प्रिय भाई,

मैं कलकत्ते की नई कविता गोष्ठी में 27 और 28 जून को शरीक हुआ । विचार गोष्ठी के सभापति थे प्रोफेसर नन्ददुलारे वाजपेयी । प्रो.कल्याणमल लोढ़ा ने आरम्भिक भाषण किया । उनके बाद नामवर सिंह, रमाशंकर तिवारी, त्रिलोचन, मुद्राराक्षस, भगवान सिंह और नन्ददुलारे वाजपेयी बोले । 11 बजे दिन से 9 बजे तक यह सब हुआ । 8 बजे से काव्य गोष्ठी हुई जिसके सभापति थे रामविलास शर्मा । राममनोहर त्रिपाठी, ठाकुर प्रसाद सिंह, मुद्राराक्षस, नागार्जुन, शंभूनाथ सिंह, भगवान सिंह, त्रिलोचन ने अपनी-अपनी कविताएँ पढ़ीं । शाम को मैं जगदीश के साथ उनके घर गया । दूसरे दिन वर्षा की ऐसी झड़ी लगी कि मैं सबेरे की गोष्ठी में न जा सका । शाम को भी वर्षा के कारण विलम्ब से गोष्ठी में पहुँचा । एक भारतीय संस्कृति परिषद है जिसमें उपर्युक्त सभी कवियों ने भाग लिया । सभापति थे जैनेन्द्र कुमार । इसके बाद मुझे मुद्राराक्षस लिवा ले गए । फिर रात जगदीश के यहाँ रहा । दूसरे दिन 3 बजे वहाँ से अपना उद्धार करके चन्द्रदेव सिंह के मकान पर पहुँचा । वहाँ भगवान सिंह मेरी प्रतीक्षा में थे । उन्होंने बताया कि चन्द्रदेव सिंह कल गाँव (बलिया ज़िला में) चले गए । मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? मैंने कहा कि अब मुझे स्टेशन पहुँचाइए । फिर हम आठ बजे के लगभग कालका मेल से मुगलसराय 30 जून के प्रातःकाल उतरे । वाराणसी गए । यहाँ चन्द्रबली सिंह आदि से मिले । चलने लगे तो चुन्नु के हठ के कारण उसकी माँ को भी आना पड़ा । अब, इन लोगों को अगले सप्ताह तक पहुँचाने जाऊँगा । ये लोग यहाँ आकर प्रसन्न हैं । यदि शीघ्र जाना आवश्यक न होता तो यहाँ रहते । भेजो अपनी कविताएँ देखूँ । तुम सब को स्नेहाशीः । सस्नेह

त्रिलोचन

 

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वाराणसी

30-8-1962

आपने संस्कृत की पढ़ाई शुरू की यह सुनकर हर्ष हुआ । अधिक हर्ष यह जानकर हुआ कि आपके आचार्य आपको व्याकरण के पथ में ले चलने को तैयार हैं । आप पढ़ रहे हैं तो परीक्षा के द्वार से क्यों न वाणी-मंदिर में प्रवेश करें । इससे उत्तरदायित्व-बोध जगेगा और पढ़ाई की ओर आप अधिक ध्यान देंगे । व्याकरण का अध्ययन चल जाए तो जैसा आपको आचार्य कहते हैं, अंतिम परीक्षा तक कीजिए । संस्कृत विश्व-विद्यालय, वाराणसी की परीक्षाओं का केंद्र आगरा भी है । वहीं से परीक्षाएँ दीजिए । प्रथमा का फ़ार्म इसी साल भर दीजिए । अभी समय है और परीक्षा फ़रवरी तक होगी । मैं समझता हूँ आप निभा ले जाएंगे । इसी प्रकार आगे भी । संस्कृत का गंभीर ज्ञान आवश्यक है । आप इसके अर्जन में लगे रहें । आप हो सके तो प्राचीन पद्धति से ही परीक्षाएँ दीजिए। अधिक कल्याण उसी में है । वैसे, जैसा आपके आचार्य उचित समझें, ठीक होगा । व्याकरण के अध्ययन के साथ साहित्य का अध्ययन स्वाद बदलने का काम करेगा । इस भावान्तर से अध्ययन की प्रवृत्ति भी पुष्टि होगी । आपको, जो काम आरम्भ से करने का, अब कर रहे हैं । देर आए दुरुस्त आए । कोई भी भाषा सीखने में स्मरण शक्ति का उपयोग दृढनिश्चय से करना होता है, इसका ध्यान रखिए । बाद को सब कुछ सुगम हो जाता है । कविताएँ तो देख गया मैं । सामने होने पर आपके विचार भी जान सकता अकेले में मेरी मति ने जो राह अच्छी समझी, कलम को उसी ओर जाने दिया । फिर कभी कुछ और लिखूँगा । आज तो केवल संशोधित कविता लौटा रहा हूँ । आप को जहाँ पसन्द न आए वहाँ संकोच न करें । कविता जीवन प्रक्रिया है । अतः वह सचेष्ट रचना नहीं । चेष्टा समझने के समय अपना अर्थ प्रमाणित कर सकती है । स्वस्त्यस्तुते कुशलमस्तु ।

सस्नेह

त्रिलोचन

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मुक्तिबोध सृजनपीठ

सागर विश्वविद्यालय, सागर

9-12-88

प्रिय भाई,

आपका 5 दिसम्बर 1988 का पत्र मिला ।

इस अरसे में मैं अंबिकापुर आकाशवाणी कवि सम्मेलन में गया था । इस जगह अभेध जंगल देख चुका था । अब जंगल तो नहीं है । हाँ छिटपुट कुछ जहाँ तहाँ पेड़ है । बिहार का पलामु जिला इससे सटा हुआ है । जहाँ जंगल अभी है इसी कारण अंबिकापुर की रातें अन्य जगहों से ज़्यादा ठंड होती है । आप चूरू और आसपास घूमेंगे तो बहुत सी ध्यान देने योग्य बातें मिलेंगी । यहाँ पर प्रचलित भाषा आपको सोचने विचारने योग्य बहुत सी सामग्री देगी । मारवाड़ी में लिखने वाले कवि अधिक दूर नहीं हैं । उन से मिलें । अच्छा रहेगा । जब वे मारवाड़ी में लिखते हैं तो बिना मेहनत के उत्कृष्ट कवि बन जाते हैं कारण मातृभाषा में लिखने के लिए अनुभूति, जन जीवन और भाषा एक ही स्तर पर मिलते हैं ।

खेजड़े के पेड़ तो भरतपुर में भी थे लेकिन आप जहाँ हैं वहाँ ये पर्याप्त हैं । बुंदेलखंड़ में खेजड़े को रेंजा कहते हैं और अवध में इसी पेड़ का नाम रेंवा है । लताएँ आदि आप के यहाँ ज़रूर होंगी और स्थानीय लोग ही उन्हें बताएंगे ।

जगह बदलना कवि और लेखक के लिए सजा ही नहीं है बल्कि जीवन की नवीनता का अनुसंधान भी है । घना जैसे तो नहीं उससे छोटे पैमाने पर राजस्थान में भी कुछ पक्षी विहार हैं और वह चूरू से बहुत दूर है । मैंने वे इसी वर्ष अनेक वर्षों के अंतराल के बाद उदयपुर तक की यात्रा की । आबू और आसपास के मध्ययुगीन अवशेष कुछ देखें । पुराने वीरों की और नवीन गरीबों की भूमि यह है । आपको जब कभी राजस्थान को देखने का कोई अवसर मिले तो आप ज़रूर घूमा करें। प्रकृति सामाजिक जीवन से बहुत भिन्न नहीं होती ।

आप लोगों ने एक ही अंतर्देशीय में चार हस्तलेख भेज कर मुझे चकित किया था । जानता हूँ यह काम वाचस्पति ने किया होगा और यह जानकर और अच्छा लगा  कि वाचस्पति, शैलेंद्र और जीवन सिंह व्यस्तता के क्षणों में आपके साथ रहे । मैं तो अस्वस्थ था ।

चूरू रहते हुए आप को स्थानीय कवि तो मिलेंगे ही । परिचय धीरे-धीरे होता है । बहुत से आधुनिक हिंदी में लिखने वाले भी मिलेंगे । लेकिन उनका तेवर पुराना भी हो सकता है । उनसे बात करने में उदार रहने की ज़रूरत है और आलोचना को कड़वाहट से बचाना चाहिए । यदि आप को कोई  कवि न मिले तो वहाँ के लोक साहित्य पर ध्यान दें । लोक साहित्य तो बहुत कुछ बिना घोषणा के दे सकते हैं । उषा जी और आपको हम दोनों के हार्दिक आशीर्वाद ।

सस्नेह-त्रिलोचन

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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