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त्रिलोचन
की कविता में राजनीति की खोज करनेवाले राजनीति का स्पर्श नहीं पाते। उसमें कला की
खोज करनेवाले कला का आभास नहीं पाते। यह विडम्बनापर्ण स्थिति कला की राजनीति है या
राजनीति की कला, कहना कठिन है। त्रिलोचन की कविता आज की मुख्य धारा की
कविता(अर्थात् प्रगतिशील-यथार्थवादी धारा की कविता) को नयी स्फूर्ति, नयी प्रेरणा,
नया आवेग देने वाली है। इस अर्थ में वह केन्द्रीय महत्त्व रखती है। दूसरी ओर यह
महज़ विडम्बना नहीं कि छायावादोत्तर कविता के इतिहास में, प्रगतिशील-यथार्थवादी
कविता के किसी भी नये-पुराने इतिहास में त्रिलोचन का मूल्याँकन नहीं के बराबर है या
उनका महत्त्व कम करके ही आँका गया है। त्रिलोचन की कविता में राजनीति या कला को खोज
करनेवाले उसमें सीधे जीवन की खोज करना चाहते तो उन्हें त्रिलोचन के काव्यमर्म तक
पहुँचने में कठिनाई न होती और उनके मूल्याँकन के लिए प्रचलित औसत मानदण्डों पर
निर्भर भी नहीं होना पड़ता । अभ्यस्त रुचियाँ मानदण्डों से भी बड़ी बाधा होती
हैं-उन्हें पार कर जीवन-मर्म, जीवन-राग या जीवन-अभिप्राय को पहचानने में कठिनाई
होती है जो किसी भी तरह के साँचे या मुहावरे में सीमित होने से इन्कार करता है।
अभ्यस्त रुचियाँ प्रगतिशील दृष्टिवाले विचारकों–समीक्षकों
की भी कठिनाई हैं और मुक्त चिन्तनवाले कलारसिकों की भी।
त्रिलोचन साहित्यिक मूल्याँकन के किसी भी स्कूल या निकाय के
लिए चुनौती बने रहे हैं। वे विकास का वह सहज-सीधा-स्पष्ट क्रम
भी नहीं दिखाते जो मूल्याँकन की अनेक समस्याओं का सरल समाधान
सुझा पाता है। त्रिलोचन जहाँ जिस रूप में 40 में थे, उससे कुछ
ही भिन्न 50-55 में और बहुत कुछ 85-86 में भी वैसे ही
!
इस स्थिर विकास को क्या कहेंगे
!
क्या इसके भीतर कोई अधिक सूक्ष्म विकासरेखा झिलमिला रही है,
जिसे पहचानने के लिए हमे अपने अब तक के समूचे काव्याभ्यास से
मुक्त होने की ज़रूरत है। त्रिलोचन को जब हम तुलसी और निराला
की परम्परा में देखते हैं तो यह देखकर और भी आश्चर्य होता है
कि तुलसी और निराला का महत्त्व निर्विवाद माननेवाले और कई बार
उन्हीं से अपने मूल्य-मानों की प्रेरणा प्राप्त करनेवाले विज्ञ
आचार्यों तथा समीक्षकों की भी त्रिलोचन में रुचि नहीं। शायद
त्रिलोचन रुचि या पसन्द के लिए ही सबसे बड़ी चुनौती हैं।
प्रसिद्ध पगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल दो-टूक कहतें हैं-
‘त्रिलोचन
जमते नहीं।’
यह निश्छल टिप्पणी अभ्यस्त रुचि की बाधा को स्पष्ट रेखांकित
करनेवाला है।
छायावादोत्तर कवियों में त्रिलोचन
ही एक ऐसे कवि हैं जो प्रगतिशील-यथार्थवादी धारा को समर्थन
देते हुए भी काव्य-व्यापार में शब्द की सत्ता पर आत्यन्तिक बल
देते हैं। यह और बात है कि शब्द का अर्थ उनके लिए शब्द में
निहित एक संपूर्ण जीवन भी होता है। अज्ञेय कहते रहे हों-‘काव्य
सबसे पहले शब्द है। और सबसे अन्त में भी यही बात बच जाती है कि
काव्य शब्द है’-
त्रिलोचन ने शब्द की सत्ता की अनोखी पहचान का प्रमाण देते हुए
उसमें तो जीवन भरा है, वह एक अलग ढंग की चीज़ है। शब्दों में
जीवन भरने के लिए शब्दों में ही नहीं, जीवन में भी धँसने-पैठने
की ज़रूरत होती है। अज्ञेय
के लिए शब्द के उपयोग की सार्थकता शब्द के परिष्कार में रही
है, त्रिलोचन
के लिए शब्द का अर्थ है जीवन से घनिष्ठ साक्षात्कार । शब्द पर
रीझनेवाले, शब्द में क्रीड़ा-वैचित्र्य देखनेवाले रीतिकाल में
ही नहीं, आज के काव्यरसिकों के बीच भी होंगे-पर शब्द या भाषा
में ‘जीवन
की हलचल’
भरी है, यह दृष्टि उन्हें नहीं मिली ।
त्रिलोचन ने शब्द या वाक्य या भाषा में निहित जीवनमर्म को
उद्घाटित करने के लिए ही जैसे कविता का माध्यम चुना हो
!
उन्होंने तुलसी और गालिब से ही भाषा नहीं सीखी, अपने ठीक पहले
के वरिष्ठ या अग्रज समकालीन कवि निराला से भी शब्दानुशासन का
मर्म जाना है। कभी त्रिलोचन
निराला की कविताओं की व्याख्या कर रहे हों-‘राम
की शक्तिपूजा’,
‘सरोज
स्मृति’,
‘वनवेला’
‘रेखा’,
‘प्रेयसी’,
‘हिन्दी
के सुमनों के प्रति’,
‘सम्राट
अष्टम एडवर्ड के प्रति’-जैसी
कविताओं का मर्म समझा रहे हों तो आप देख सकते हैं कि शब्दों की
कैसी अचूक पहचान उन्हें निराला के अभिप्रेत तक पहुँचाती है।
अब जबकि त्रिलोचन मुक्तिबोध-सृजन पीठ के अध्यक्ष होने के बहाने
एक विश्वविद्यालय-परिसर में ही रह रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि
विश्वविद्यालय ने इस दिशा में उनसे कोई फ़ायदा उठाया हो। सम्भव
हो सकता है, भाषा के मर्म की व्याख्या में नहीं । कवि ने ज़रूर
किसी प्रसंग में त्रिलोचन के आलोचनात्मक विवेक का महत्त्व
स्वीकार किया है। निराला के यहाँ खड़ी बोली का कौन-सा शब्द
अवधी की अर्थध्वनि या बलाघात के साथ प्रयुक्त है, त्रिलोचन ही
बता सकते हैं। शब्द वाक्य में है और वाक्य की पूर्णता अपने में
एक प्रकार की जीवनपूर्णता का पर्याय हो सकती है, यह विवेक ही
त्रिलोचन के शब्दानुशासन को एक सम्यक काव्यानुशासन में बदल सका
है।
त्रिलोचन के यहाँ एक़दम अपरिचित-अप्रचलित संस्कृत के तत्सम
शब्द ठेठ देशज तद्भव शब्दों के साथ जितनी सहजता से, अनायास आते
हैं और भाषा की अर्थशक्ति (जहाँ-तहाँ, अर्थव्याप्ति) के कारण
बनते हैं, वह अन्यत्र विरल है। त्रिलोचन की भाषा में पूर्वपाठ
की
स्मृतियाँ एक नयी काँध के साथ आती हैं। क्लासिक कवियों की
यादें यहाँ शब्द-प्रयोगों में खूब रची-बसी हैं पर त्रिलोचन
के प्रयोग का ढंग ही उनसे एक तरह की दूरी भी बनाता है। फिर भी
त्रिलोचन
को पढ़ते हुए यह अनुभव तो हम करेंगे ही कि त्रिलोचन
ने तुलसी, गालिब और निराला के अतिरिक्त जिनसे ग्रहण किया है,
उनकी सूची काफ़ी बड़ी है। पर यह ग्रहण त्रिलोचन
के मौलिक सृजन का ही अन्तर्मार्ग है-कई बार भाषा के लिए
मुक्ति-मार्ग भी। एक तरह से देखा जाय तो भाषा के मामले में
त्रिलोचन
के लिए आदर्श शिक्षक स्वयं जीवन है जो शब्दो में आरपार लहराता
है। त्रिलोचन
शब्द संग्रह के ही एक सॉनेट में कहते हैं- उन लहरों पर हूँ
जिनके तल में भाषाएँ /
कितनी बैठ चुकी हैं। त्रिलोचन
भाषा में साफ़-सीधे अनुभव को ही नहीं, उसमें मौन विचरने वाली
ध्वनियों को भी पहचानते हैं। त्रिलोचन
से शब्द लेकर कहें तो संवादपूर्ण भाषा ही उनका मुख्य सरोकार
है। यहाँ संवाद का अर्थ है-हृदय संवाद या उससे भी आगे जीवन
संवाद ! ‘जीवन
संदेश’
चाहे कहने में अटपटा लगे, अपर्याप्त
भी, पर त्रिलोचन
खास अर्थ में ‘जीवन
संदेश’
के भी कवि हैं। वे प्रकृति-प्रेम सौन्दर्य और जीवन की तमाम
गतिविधियों को शब्द देते हुए एक कोई पते की बात ज़रूर कहते
हैं, जिसे संदेश कहा जा सके। यह संदेश सूक्ति में ढला हुआ, पर
अधिक अर्थमय होता है। भाषा का मर्म जाननेलाले कई बार उलझन में
हो सकते हैं कि संकेत महत्त्वपूर्ण है या संकेतित
!
रूप महत्त्वपूर्ण है या भाव
!
रूप भाव है या भाव रूप
!
त्रिलोचन शब्द-मर्म के पारखी, प्रयोक्ता और व्याख्याता भी हैं।
एक सॉनेट में यह व्याख्या भी हम देख सकेंगे-
शब्दकार, इन शब्दों में जीवन होता है
ये भी चलते-फिरते और बात करते हैं
तोष, रोष-जब भावों से भरते हैं
तब वैसे ही अर्थों का व्यंजन होता है
.........
.........
शब्दों में भी हाड़-माँस है जीवन धरकर
वे भी जीवधारियों के स्वर यन्त्र सँभाले
स्फुट अस्फुट दो धाराओं में प्रवहमान हैं
रात और दिन-द्यावा पृथिवी में विचरण कर
झलकाते हैं दुनिया के सब खेल निराले
और मनोहर काल स्रोत के सन्निधान हैं
यह जितनी ‘शब्द’
की व्याख्या है उतनी ही
‘शब्द’
में निहित जीवन या जीवन के अभिप्रायों की व्याख्या है। इसलिए
त्रिलोचन जब ‘शब्द’
पर अतिशय बल देते हैं तो अपनी समूची जीवन-आस्था का ही प्रमाण
देते हैं। कलावाद को यह छूट नहीं है कि वह इस बल का
उपयोग अपने पक्ष में करे। शब्द पर अधिक बल को यहाँ अन्यथा
उपयोग की छूट नहीं है। जो अज्ञेय में ही शब्द-विवेक देखकर
सन्तुष्ट हैं । उन्हें त्रिलोचन में कविता भी नहीं दिखाई देती।
त्रिलोचन में कविता कहाँ है, यह सवाल
प्रगतिशील, गैर प्रगतिशील सभी खेमों में प्रायः उठा करता है।
त्रिलोचन
में काव्यत्व देखने के लिए आधुनिकतावाद के आतंक में बनी हुई
काव्यात्मकता की अवधारणा में निश्चित हेरफेर करने की ज़रूरत
होगी, औसत प्रगतिशील की माँग के साथ बनी काव्यात्मकता की
अवधारणा में भी। कल्पित सूक्ष्मता या जटिलता के हम शायद इतने
अभ्यस्त हो चुके हैं कि शब्दों में बहती हुई जीवनधारा हमें
प्रभावित नहीं करती । त्रिलोचन
मानवीय संबंध या व्यवहार में, प्रकृति जीवन और सामान्य अर्थ
में संघर्षमय कठिन जीवन में पड़ी हुई गाँठों से अनभिज्ञ हों,
ऐसा नहीं है। उनके शब्दों की ओर और शब्दों के प्रति उनके रुख
की ओर ध्यान देंगे तो ये गाँठें, ये सूक्ष्म जटिलताएँ भी
दिखायी देंगी। त्रिलोचन
की भाषा जटिलताओं को खोलती भी है, वह उनका आतंक नहीं पैदा
करती, न उन्हें अलंकरण बनाती है। त्रिलोचन
के सॉनेटों में आत्मभर्त्सना के कठिन क्षणों को ठीक पहचाना
गया है। भीख माँगते उसी त्रिलोचन
को देखा कल/जिसको
समझे था है तो है यह फ़ौलादी । विक्षोभ और आत्मसंयम के इस
द्वन्द में ऐसा बहुत कुछ प्रकट है, जिसे शब्दों में कह पाना
कठिन है। ‘शब्द’
से अक्सर त्रिलोचन का जो संवाद होता है उसके पीछे बड़ा अर्थ
छिपा है-
बोले मुझसे शब्द-यहाँ से वहाँ, वहाँ से
और वहाँ तक मौन तरंगित हम चलते हैं
यह अपनार आकाश हमारा अपना घर है
हम जीवन के शूल फूल सब कहाँ कहाँ से
कहाँ कहाँ चुपचाप डालते हैं जलते हैं
तभी अदम्य प्रकाश विश्व जीवन का वर है
त्रिलोचन के यहाँ शब्द से संवाद के क्षण बार-बार आते हैं।
लम्बी इतिवृत्तप्रधान कविता
‘नगई
महरा’
में अचानक ये पंक्तियाँ आती हैं-
‘ऐसा
कम होता है बहुत कम/जब
शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें।’
कविता की मुक्ति मनुष्य की मुक्ति की ही तरह है-इस तथ्य की ओर
निराला ने जो संकेत किया है, उसे त्रिलोचन की कविता व्यवहार
में सबसे अधिक प्रमाणित करती है। त्रिलोचन के सन्दर्भ में यह
बात भी याद रखने की है कि भाषा का अर्थ भाषा ही नहीं, वह समझ
भी है जो ‘आदमी
को आदमी से जोड़ती’
है। त्रिलोचन वस्तुमयता में ही भाषा की मुक्ति खोजते हैं।
थ्योडोर अडोर्नों ने कल्पना और वस्तु के सम्बन्धों की व्याख्या
करते हुए स्पष्ट करना चाहा है कि सौंदर्यमूलक वक्रता को भी
वस्तुमयता का आधार चाहिए। त्रिलोचन की ताकत उस वस्तुमयता में
है जो रूप और भाव के द्वैत को पाटती है। इस विशेषता के प्रकाश
में देखें तो त्रिलोचन की सपाट भाषा की अपनी धार भी दिखायी
देगी और अपनी प्रच्छन्न तहें भी । रूपवाद का आश्रय न लेकर भी
त्रिलोचन की भाषा यथा आवश्यकता छोड़ना या छिपाना जानती है।
‘चम्पा
काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’
कविता में यह कला अद्भुत तड़प के साथ व्यक्त हुई है। कविता के
सीधे सरल या अबोध आरम्भ में आगे के जिस हादसे की ख़बर या उसका
पूर्वाभास है उसे सुनने के लिए उपयुक्त काल चाहिए-महज़ काग़ज
पर अक्षर देखनेवाली आँखें नहीं। बजर गिरे में जितना कहा गया है
उससे ज़्यादा अनकहा है और वह कम महत्त्वपूर्ण नहीं।
त्रिलोचन की शब्द-संवेदना से परिचित होने के लिए विविध छंदों
तथा रूपप्रकारों में भाषिक बनावट पर ध्यान देना चाहिए। शब्द की
सार्थकता प्रयोग की विशिष्टता में नहीं, उसमें धड़कते हुए जीवन
की परख या पहचान में ही है। छन्द और लय, उक्ति और अर्थ के भेद
के बावजूद भाषा पर त्रिलोचन की पकड़ ज़िंदगी पर पकड़ का ही
उदाहरण है।
‘मँजर
गये आम /
कोइलिया न बोली’-‘आख
मूँदे,पेट पर सिर टेक/गाय
करती है घमौनी बंधी जड़ से/पेड़
की छाया खड़ी दीवार पर है’
त्रिलोचन की भाषा इस तथ्य को उजागर करती है कि जाने शब्द भी
चुने जाते हैं। उसके पीछे वस्तु की समझ भी काम करती है, उसकी
अर्थध्वनि भी। ‘दिगन्त’
के एक सॉनेट में भाषा की ऐन्द्रिक क्षमता देखें तो यह तथ्य
अधिक पुष्ट होगा-
मेंहदी की अरधान उड़ी। देखा, फिर ठहरा;
कपिश गहगहे विमल फूल खिलखिला रहे हैं
पिला रहे हैं
अमृत घ्राण को।....
वर्षा सीकर भरी हवा, मेंहदी की मँह मँह
...जी करता है मैं अंजली भरकर पी जाऊँ
वृक्ष लताएँ पौधे तृण धरती पर डह डह
करप रहे हैं। मेघ-नगर में ज्योत्स्ना टह टह
उग आई अब। आँखें सहस कहाँ से लाऊँ
तद्भव शब्दों की मार्मिक व्यंजकता में जीने की समूची ललक या
विकलता प्रकट है। जाड़े की धूप की व्यंजना त्रिलोचन के कई
सॉनेटों में है जहाँ धूप के बहाने एक समस्त जीवन व्यापार
व्यंजित है। प्रकृति में जीवन का यह साक्षात्कार जिन शब्दों
में सम्भव हुआ है वे त्रिलोचन की शब्द-संवेदना और जीवन-विवेक
के सहज परिचायक हैं। ‘बहुत
दिनों बाद खुला आसमान’-जैसी
निराला की कविता की याद यहाँ स्वाभाविक है पर त्रिलोचन का अपना
रंग भाषा में निहित पूरे जीवन-व्यापार पर छाया है-
जाड़े का दिन, धूप खिली है आसमान की
नील लता पर, प्राची में, थोड़ा सा ऊपर
सूरज उठकर चला गया है,...
प्रिय लगती है बहुत, घमौनी;
घाम देखकर
लोग कहीं जमते हैं, गायें और बकरियाँ
खड़ी धूप में मौज लिया करती हैं, सर्दी
इसी तरह जाती है, घर से मीन-मेख कर
आती है महिलाएँ, आती हैं सुन्दरियाँ,
कुत्ते करते रहते हैं आवारागर्दी
वही धूप पेड़ों के पत्तों की हरियाली
ओप रही है, कितने रंग निखार रही है
रंग रंग के फूलों में, उड़ती चिड़ियों के
रोएँ, डैने चमकाती हैं, जो खुशहाली
चौपायों में है उठकर ललकार रही है
सुस्ती को, जब तब दिख गए पवन के झोंके।
इसी विशिष्ट चित्रमयता को, जिसे स्वभावोक्ति कहकर टाला जा सकता
था, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कविता में गोचर रूपों का विधान
कहते हैं। कविता इस विधान के लिए
“प्रायः
ऐसे रूपों और व्यापारों को ही लेती है जो स्वाभाविक होते हैं
और संसार में सबसे अधिक मनुष्यों को दिखायी पड़ते हैं।”
(रसमीमांसा
पृ.33)।
त्रिलोचन
के ही साक्ष्य पर शमशेर ने स्पष्ट करना चाहा है कि छन्द और
मुक्त छन्द, नयी कविता और गीत के बीच का दो-टूक विभाजन
भ्रान्तिमूलक है। शमशेर की दृष्टि में त्रिलोचन जहाँ क्लासिक
शिल्प को साधना चाहते हैं वहाँ भी परिणाम रूप में उससे कलात्मक
मुक्ति उपलब्ध करते हुए। जैसा पहले कहा गया, क्लासिक की यादें
त्रिलोचन की दुनिया में खूब हैं।
‘शिरीष
का फूल’-और
वह भी ‘कर्णार्पित’-पाठक
तुरन्त मूल स्रोत तक पहुँचना चाहेगा। पर त्रिलोचन हैं कि एक
बेपरवाह झटके से उसे वर्तमान मे ला देते हैं।
‘धरा
पर वहीं पड़ा है !’उज्ज्यनी
के कवि ने जिसे विभात वायु कहा था-वही हवा कवि को समय-समय पर
छूती है पर कवि इस यथार्थ की अनदेखी नहीं करता कि-
‘हालाहल
की ज्वाला/भस्मसात्
कर रही पृथक्कृत समप्रदाय में/एकाधिक
मानवता को/अब
पहलेवाला निष्कलंक उल्लास नहीं।’
रूप-प्रकार की समझ या संवेदना केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन
में किस प्रकार काम करती है, इस संबंध में शमशेर की टिप्पणी है
: “केदार
और त्रिलोचन निःसन्देह
‘रूप-प्रकार
को भली प्रकार समझते हैं। मगर वे इसलिए रूप-प्रकारवादी नहीं
हैं कि वे रूप-प्रकार |