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अपने
समकालीन कवियों की तरह त्रिलोचन ने भी गद्य रचनाएँ कम नहीं लिखीं लेकिन,
‘देश-काल’
कहानी-संकलन और एक अन्य गद्य पुस्तक के अलावे कोई दूसरी गद्य-पुस्तक नहीं छपी ।
त्रिलोचन जी के वैचारिक, समीक्षात्मक लेखों या डायरी अंशों का छिटपुट प्रकाशन जब भी
हुआ-उसने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया । सम्यक आकलन के लिए उनके संपूर्ण गद्य का
संकलन प्रकाशित होना अनिवार्य है। त्रिलोचन के गद्य को कम-से-कम वे लोग कभी
महत्त्वहीन नहीं मान सकते, जो कवि त्रिलोचन के महत्त्व से परिचित हैं। किसी कवि के
मूल्याँकन में उसके गद्य लेखन की भूमिका अक्सर महत्त्व की साबित होती है। गद्य लेखन
की उपेक्षा किसी भी स्थिति में उक्त कवि के महत्त्व स्थापन में प्रतिकूल नहीं होगी
। इसलिए त्रिलोचन के संपूर्ण गद्य का समवेत प्रकाशन बहुत ज़रूरी है। मुझे खेद है कि
मेरी यह टिप्पणी ‘देश-काल’
तक ही सीमित है।
यह सही है कि उनकी समकालीन कवियों में अज्ञेय, मुक्तिबोध और
नागार्जुन के गद्य को छोड़कर किसी अन्य कवि का गद्य अलग से
महत्त्व हासिल नहीं कर सका। लेकिन उन कवियों का गद्य जो उनकी
कविता की तुलना में अपेक्षाकृत कम है-ज़्यादा ही उपेक्षित रहा।
शमशेर जी के गद्य लेखन का महत्त्व दिनों तक डॉ. रामविलास शर्मा
के ‘प्लॉट
का मोर्चा’
की भूमिका से बोध में टँका रहा। लेकिन अब जब शमशेर जी की
संपूर्ण गद्य रचनाएँ दो खण्डों में सामने आयी हैं- स्थिति में
परिवर्त्तन हुआ है। शमशेर जी के सशक्त गद्य लेखन की स्वीकृति
में कोई हिचक दोष नहीं है। लेकिन इसी आधार पर मैं यह कहना नहीं
चाहूँगा कि हर कवि का गद्य उसकी कविता की तुलना में या
एक-दूसरे की तरह समान महत्त्व का होता है। लेकिन अगर कवि के
रूप में कोई रचनाकार महत्त्वपूर्ण है तो उस कवि के सम्यक्
मूल्याँकन में उसकी गद्य रचनाओं की भूमिका नज़रअंदाज़ नहीं की
जानी चाहिए क्योंकि अक्सर ही वे गद्य रचनाएँ बडी काम की सिद्ध
होती हैं।
यह बात सही है कि मुक्तिबोध, अज्ञेय, शमशेर और नागार्जुन की
कविता और गद्य का जिस तरह समानान्तर महत्त्व है-वही बात
त्रिलोचन
या केदारनाथ अग्रवाल के साथ सिद्ध नहीं होता । इउनकी कविता और
गद्य के महत्त्व में अंतर अपेक्षाकृत अधिक है। इउनकी मूल पहचान
पूरी तरह कविताओं पर भी निर्भर करती है। लेकिन ध्यान देने की
बात यह है कि जो भी गद्य लेखन है-जितना है-उसका महत्त्व कई
दृष्टियों से अत्यन्त उपयोगी और ज़रूरी है। इसलिए भी उनका
संकलन सुलभ होना चाहिए और उसके सम्यक् मूल्याँकन में उसे शामिल
करना चाहिए। तभी उनका आकलन संतुलित हो सकता है।
अगर इस बात को सामान्य कथन के रूप में लिया जाय तो मुझे यह
कहने में तनिक हिचक नहीं होगी कि त्रिलोचन का गद्य-एक कवि का
गद्य में उनकी कविताओं की तरह जातीय बोध की समानताएँ हैं। अपनी
निजी पहचान के बावजूद इतनी समानताएँ अपने समकालीनों में इन्हें
एक साथ रखती है। बहरहाल
!
अगर हम थोड़ा ध्यान से त्रिलोचन जी के गद्य को देखें तो एक बात
स्पष्ट होती है कि उनके गद्य में सचेत लेखन की एक अलक्षित
कोशिश नज़र आती है। उनका गद्य कहीं ऊबड़-खाबड़ या विषम नहीं
–
जैसा निराला या मुक्तिबोध का गद्य है। न ही उनका गद्य अज्ञेय
के गद्य की तरह नफ़ीस है। त्रिलोचन के गद्य में नागार्जुन या
केदारनाथ अग्रवाल वाली हल्की अनगढ़ता और लापरवाही भरा अंदाज़
अवश्य है। लेकिन त्रिलोचन के गद्य का वैशिष्ट्य यह है कि
सावधानता या लापरवाही के बावजूद कहीं भी कृत्रिमता नहीं आयी
है। उनकी कविता में जो सहज प्रवाह या गतिमयता मिलती है-वहाँ वे
इतने सिद्धहस्त हैं कि एक किस्म की बेफ़िक्र लापरवाही के
बावजूद संतुलन दिख पड़ता है। बेफ़िक्र लापरवाही के ऐसे खूबसूरत
संकेत उनके गद्य में प्रायः नहीं मिलते । गो कि राह छोड़ बहने
वाली सहजता भी, कहीं-कहीं बाँध-तोड़ प्रवाह के रूप में आती है
लेकिन वहाँ भी वे अथाह की ओर नहीं बढ़ते। ज़्यादा सच यह कि जल
में तैरने की कला, हाथों पर भरोसा और सचेत कोशिश उनके गद्य में
अलक्षित रूप से मौजूद रहती है। कहीं-कहीं उनकी कोई शैली
सार्थकता और सौंदर्य पैदा करती है तो वही दूसरी जगह दोष बन
जाती है। उदाहरण के लिए
‘ओर’
में प्रकाशित ‘लय
की लोक-परंपरा’
और उनकी इस संकलन की अनेक कहानियों में देखें-लेख में जहाँ
गप्प की दिलचस्प और आत्मीय शैली सहज सौंदर्य बनती है, वही
कहानियों में ज़्यादा या अनावश्यक लगने लगती है। त्रिलोचन में
गद्य सधा है लेकिन वे जगह और ज़रूरत पर मुक्तिबोध की तरह
अतिक्रमण नहीं करते । इसलिए गद्य में वैविध्य और भिन्न
स्तरीयता नहीं मिलती। जबकि बहू भाषाविद होने के कारण ऐसा करना
अपेक्षाकृत आसान था। त्रिलोचन जी हिन्दी के तीनों महत्त्वपूर्ण
भाषा-स्त्रोत- संस्कृत, अवधी और उर्दू को समान रूप से साधने
वाले गिने-चुने समर्थ लोगों में हैं । संस्कृत से भी प्राकृत
रूप परिवर्त्तन और उर्दू के अरबी-फारसी साम्य की बारीक पकड़
रखने वाले त्रिलोचन के पास शब्दों की पूरी कुण्डली बता देने
वाली विलक्षण प्रतिभा है।
त्रिलोचन
की कविताओं में चरित्र, घटना या वर्णन का जो विस्तार मिलता
है-उन पर अगर ध्यान केंद्रित करें तो अपनी अभिधा में वे बेहद
सरल लगते हैं। लेकिन वे सरल होते नहीं हैं। उनके भीतर सहज
प्रवाह की गति और अर्थ-गुंफन की जटिलताएँ मौजूद होती हैं ।
यहाँ हम मलयज की पहचान
‘औसत
भारतीयता’
की बात को शामिल करें। इस
‘औसत
भारतीयता’
के साथ मैं भोजपुरी के एक अन्य शब्द को जोड़ने की इज़ाजत
चाहूँगा-
‘खाँटी
!’
उनकी ‘औसत
भारतीयता’
खाँटी है और परिष्कृत भी।
त्रिलोचन का गद्य एक गद्यकार का गद्य ज़्यादा लगता है। लेकिन
इसका यह अर्थ नहीं कि उनके गद्य में कवि एक़दम अनुपस्थित है।
वह भाषा के बहिरंग पर नहीं अंदरूनी स्तरों पर दिखाई पड़ता है
जैसे- ‘संबंध’
कहानी को लें। इसका चित्रकार अपनी निःसंगता को तोड़कर
जीवनचर्चा की विशेष घटनाओं से संबंध जोड़ता है। लेकिन फिर बदले
हुए रूप में निःसंग होता है तो अपने जीवन की व्यर्थता का बयान
करता है। उस समय उनकी अनुभूति प्रक्रिया एक कवि की हो जाती है।
वह हल्का-सा भावुक होता है। अनुभूति या संवेदना में जो कवि-भाव
हो, भाषा के स्तर पर ऐसा विचलन नहीं होता । वहाँ कविता
अंतर्भुक्त है और दृष्टि में सूक्ष्मता से दीप्त हुई है।
उदाहरण लें-
‘जीवन
ने साँसों से मौन की भाषा में चिल्लाकर पूछा था-कहाँ जाऊँ,
जहाँ संकट न हो । कहाँ जाऊँ, जहाँ दबाब न हो
?’
अथवा ‘उसके
अटूट मौन में गाढ़ा संबंध का अनुमान निश्चित कर लिया।’
ऐसे उदाहरण और हैं- दूसरी कहानियाँ में भी जीवन का
‘साँसों
से’
मौन की भाषा में चिल्लाकर पूछना अर्थगर्भी ही नहीं, चाक्षुष भी
है। जहाँ जो अलक्षित है उसका बिम्बन हुआ है। यहाँ गद्य में
कविता की ऊँचाई आ जाती है-कविता ही आ जाती है। मुश्किल यह है
कि पूरी कहानी वह उत्कर्ष हासिल नहीं कर पाती जो उनकी ऐसी गद्य
क्षमताओं को अद्वितीय बना सके।
त्रिलोचन बातूनी माने जाते हैं और उनसे मिलने वालों के पास
उनके अनेक संस्मरण होते हैं। न सिर्फ़ कहानियों में बल्कि,
लेखों में भी इसके लक्षण दिखाई पड़ते हैं। लोग निर्विवाद मानते
हैं कि त्रिलोचन बातूनी इतने शानदार हैं कि अगर किस्से भी उनकी
ज़ुबान से गुजरें तो सच लगे। उनके आत्मीय, जीवंत और चाक्षुष
कथन में झूठ और सच का फ़र्क घुल-मिल जाता है। ये सुंदर और
दिलचस्प सलीके उनके वैशिष्ट्य को ही नहीं, उनके स्वभाव को भी
संकेतित करते हैं लेकिन त्रिलोचन की ये आदमी और जीवन के
‘सच’
की कहानियाँ हैं । इनमें गप का हिसाब गड़बड़ नहीं होता क्योंकि
समय और विषय का अहसास कहीं ओझल नहीं होता। संतुलित गद्यकार का
समर्थ स्वभाव ही सामने आता है। यहाँ उनकी प्रतिबद्धता के प्रति
सचेत होना भी बहुत काम आता है।
त्रिलोचन के गद्य का प्रभाव-संकेत कई रूपों में व्यंजित होता
है। उनमें एक है बात-दर-बात कातने का बारीक कौशल
!
‘देश-काल’
की पहली कहानी ‘अपनी
इज्जत आप करो’
इसका अच्छा उदाहरण है। बात-दर-बात कातने का बारीक कौशल
जैनेन्द्र जी की तरह विचार-दर-विचार कातनेवाला नहीं है। उसकी
सार्थकता उद्देश्य की प्रतिबद्धता के कारण है और यह कौशल
चित्रण के जीवंत यथार्थ को मूर्त्त करने में दिखाई पड़ता है
। ये बारीक अंकन अलग से असाधारण गद्य क्षमता के प्रमाण तो रखते
हैं मगर अपनी रचना में संपूर्ण व संयोजन की संगति में
श्रेष्ठता हासिल नहीं करते ।
त्रिलोचन
ने एक बार कहा था कि तुलसीदास हिन्दी के सबसे पहले बड़े
गद्यकार हैं । यह अटपटी लगती स्थापना दरअसल त्रिलोचन
की अपनी कथन भंगिमा और रचना स्वभाव का भी सच खोलती हैं। गद्य
की वैसी तात्त्विकता के प्रति त्रिलोचन
ख़ुद सचेत हैं। उनकी इन कहानियों को पढ़ते हुए भले आपको
हिन्दी कहानी का कोई परिदृश्य या कोई प्रवृत्ति याद न आये
लेकिन आपको आश्चर्य होगा-उनकी कहानियाँ हरगिज़ विजातीय नहीं
लगतीं। सच पूछिये तो त्रिलोचन गाँव के जन-संकुल अलाव या बैठके
से आये बड़े ही चतुर सुजान लगेंगे। दूसरे को छलने वाला उनमें
किसी तरह का काइँयापन नहीं है और न ही ख़ुद छले जाने वाला
भोलापन !
त्रिलोचन की अथाह अनुभव संपन्नता में विपुल मानव मानव प्रसंग
हैं, चरित्र हैं और है-संस्मरणों,गपों, किस्सों, कहावतों,
कथाओं, गाथाओं का जख़ीरा। शुरू हुए कि रोचक बहतकहियों का सहज
और आत्मीय सिलसिला रुक नहीं पाता, थक नहीं पाता और न ही ख़त्म
होता है। इन्हीं अर्थों में त्रिलोचन का लेखन-विशेष अर्थ में
मुकम्मिल गद्य है-औसत भारतीयता का खाँटी जातीय गद्य!
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