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जिस
त्रिलोचन
ने जीवन के भीषण
ताप से तापे हुए दिनों की गाथा धरती और दिगन्त तक विस्तृत दृश्य जगत् से संबंद्ध और
शब्दबद्ध किया है उसे कोई या वह स्वयं अपने को मात्र इस या उस जनपद का कवि कहें तो
उसे कण में और पिण्ड में ही ब्रह्माण्ड-दर्शनिक परम्परा को ही जोड़ना पडे़गा । जैसे
पांडेपुर गाँव व्यवस्था की होली को दग्ध होते एक किसान के माध्यम से प्रेमचंद से
पूरे ग्रामीण भारत की कथा-यथा कह देते हैं। उसी तरह त्रिलोचन
ने
प्रगतिशील कविता में भारत के ग्रामीण जनता का प्रतिनिधित्व किया है।
यहाँ त्रिलोचन
के उस प्रकाशित(क्योंकि बहुत अंश अभी तक अप्रकाशित हैं) काव्य
की समीक्षा नहीं की गई है जिसका रचना काल तीन-चार दशकों के बीच
है । न व्याख्या, न मूल्याँकन या आलोचना । यह तो उनके काव्य पर
दृष्टि निक्षेप मात्र है। व्यावसायिक समीक्षक भले ही पुस्तकों
के पुलिंदे चुटकियों में उड़ाकर उन्हें पत्र-पत्रिकाओं के
पैराग्राफों में लटका दे, परंतु उस कलाबाजी का साहित्य चिन्तन
से क्या संबंध ?
उसमें तो त्रिलोचन
काव्य के अंतर्जगत् और बहिर्जगत् की जटिल स्थूल-सूक्ष्म
स्थितियों, दशाओं और अनुभूतियों से निर्मित विषय वस्तु का
निरीक्षण परीक्षण करना होगा। सॉनेट, ग़ज़ल, रूबाई और अन्य छन्द
साधनों की प्रयोग-सफलता और असफलता पर विचार करना होगा। उसके
अन्यत्र शब्द संगठन और संरचना की साँगोपांग जाँच-पड़ताल होनी
चाहिए। उनके प्रकृति एवं मानव जीवन से संबंद्ध बिम्बों और
प्रतीकों का विवेचन विश्लेषण भी उसका एक आवश्यक और अनिवार्य
अंग होगा। उनकी संगति और समीपता की परख का प्रश्न भी उठेगा और
फिर संपूर्ण प्रगतिशील काव्य परम्परा में जो अर्धशती पार कर
चुकी है उनके स्थान और महत्त्व का निर्धारण करना पडे़गा।
शास्त्री जी साधक और सिद्ध कवि हैं। मैं समझता हूँ कि इन दोनों
विशेषताओं की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है। यह अच्छा ही
हुआ कि उनका अधिकांश काव्य आठवें और नवें दशक में पाठकों के
सम्मुख आया जब प्रगतिशील कविता की एक पूरी नयी पीढ़ी के द्वारा
समृद्ध हो रही है, क्योंकि प्रगतिशील काव्य के मूल्याँकन का
कार्य भी इस दौर में एक नये उत्साह से शुरू हुआ है। हालाँकि
यही कहा जा सकता है कि अभी उसका दागबेल भर पड़ी है।
समकालीन प्रमुख प्रगतिशील कवियों
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मुक्तिबोध, नागार्जून, केदार और शमशेर के साथ त्रिलोचन प्रथम
पंक्ति के कवि हैं । इन पाँच शीर्षस्थ कवियों की अपनी-अपनी
विशिष्टतायें हैं। उन सबका यहाँ उल्लेख न कर केवल त्रिलोचन पर
ही ध्यान केंद्रित करना पड़ेगा । इसके पहले की कविता पर कुछ
कहने के पहले अपनी क्षणिक प्रतिक्रिया से आपको परिचित कराना
चाहूँगा।
त्रिलोचन को पढ़कर कभी मन उमगता है, कभी कलेजा मसोसने लगता है,
देश का पूरा अतीत बाँह पकड़कर अपनी ओर खींचने लगता है । एक
पूरा राष्ट्र शरीर धारण कर सामने खड़ा हो जाता है, कहीं उसकी
सिहरन और रोमाँच, कहीं बुद्धि का तज़ुर्बा और अनुभव दूर-दूर
प्रवेशों के दृश्यों की पेंटिंग, कालिदास और देव के अभिसार ही
नहीं, कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का स्वाभिमान, घाघ और भड्डरी का
लोक चातुर्य और लोक अनुभव, सेनापति और पंत का प्रकृति-निरीक्षण
और निराला की शिल्प चेतना आदि कितनी ही चीज़ें एक साथ मिलेंगी
।
महानगरों में आ बसे हम अक्सर जो तरह-तरह के ढोंग रचते रहते हैं
त्रिलोचन का उनसे दूर का भी रिश्ता नहीं है। उनकी कविता पढ़ते
ही दूर तक हरे खेतों में फैली हुई पछुआ की लहरों में हिलती
सरसों की कतारें आँखों में तैरने लगती हैं। बस वह पोखर पर
नहाने का आनन्द, जेठ की धूप में और लू में पैदल चलते यात्री जो
नीम की छाह में लोटा डोर-फाँसकर ठंडा पानी पीते और जुड़ाते
हैं। दोनों ओर रस्सी पकड़े खेत सींचते किसान दम्पति, खेत काटने
के बाद विश्राम करती युवतियाँ। (कालिदास ने भी उन्हें देखा था)
पंचायत को डाँड़ देते नगई महरा कूचे में पड़ी शुकिया बुढ़िया
की वीभत्स लाश, सूर्योदय-सूर्यास्त, उजेले पाख की चाँदनी
रातें, लसोड़े, पाकड़ी, नाम, ढाक, जामुन और पीपल के पेड़ सब
उनके आत्मीय हैं। उनके ही क्यों भारत के ग्रामीण जनों के
आत्मीय हैं। माता-पिता के द्वारा उनके जन्म-दिन पर रोपा गया
नीम का पेड़, कटहल के फूलों की महक भी पार्श्व भूमि में या
टपके हुए आमों के आस्वादन के बीच उभरे और पनपे प्रेम की बातें
भी त्रिलोचन विस्मृत कर नहीं पाते, निःसंकोच भाव से उन्हें
अक्षरों में उतारते आते हैं। छोटे बच्चे, कोयल, गौरैया, बिल्ली
के बच्चे ये सब उनके काव्य के विषय हैं, बहुतों की यह ख़ाम
ख़याली है कि 8 वें दशक के प्रगतिशील युवाओं ने इन्हें पहली
बार काव्य में उतारा है।
त्रिलोचन के जिस प्रेम का अपने काव्य में चित्रण किया है वह
कोट के बटन होल में लगी गुलाब की कली का फैलनेबिल उच्च
मध्यवर्गीय प्रेम या उसकी याद नहीं है वह तो अनेक स्थलों पर
अभाव ग्रस्त मन मसोसते श्रमिक दाम्पत्य का व्यथाग्रस्त अनुराग
है जो गाँव के ग्वेड़े पर जाते हुए पत्नी की उसी एक फ़रमाइश को
भी न पूरा करवाने के पछतावे और दुख से पीड़ित है नौकरी में शहर
में खटता हुआ किसान युवक जो अब मजदूर बनकर दिन भर मशीनों में
उलझा रहता है और शाम बुझाता है, उसे यदि इस जीवन संघर्ष में
पीछे गाँव में छूटी हुई उस पत्नी का ध्यान भी कई दिन बाद आये
तो क्या आश्चर्य।त्रिलोचन काव्य में निराला के सही
उत्तराधिकारी हैं।
जगदीश जी का कुत्ता, अष्टग्रही आदि कविताओं का व्यंग्य पैना और
धारदार है। प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है तथा
‘अपघात’
जैसे अनेक कविकाओं का काव्य पैना और धारदार है। अपने परम
आत्मीय (क्योंकि उनका पुरस्कृत काव्य उन्हीं को समर्पित है)
प्रगतिशील आलोचक मित्र पर उन्होंने जो कृपा की है वह तो उनका
प्रेमपूर्ण उपालंभ है। राग का ही दूसरा नाम आलोचना है। इनमें
से कुछ पंक्तियों में कुछ क्षोभ भी मुखर हुआ है, परंतु आखिर आप
कवि से मूल्याँकन के लिए कितनी प्रतीक्षा और धैर्य चाहते हैं।
लोकगीतों के माधुर्य को निचोड़ कर त्रिलोचन ने जो गीत लिखे हैं
उनसे मन नहीं भरता । इच्छा होती है उनकी संख्या और अधिक
होती।लहरों में साथ रहे कोई
‘दिन
ये फूल हैं’
जैसे यहाँ भी ग्रामीण पार्श्वभूमि साथ लगी आई है-
‘आओ
इस आम के तले
यहाँ घास पर बैठे हम
जी चाही बात कुछ चले।’
कबीर, तुलसी, गालिब आदि कवियों के साथ-साथ उन्होंने गाँधी,
माओ, सुभाष को भी याद किया है। तेनसिंह हिलैरी आदि की प्रशंसा
भी की है क्योंकि उनका कार्य मानव पुरुषार्थ का प्रतीक है।
बापू की हत्या उन्हें विचलित करती है, परंतु चीन के आक्रमण के
बावजूद वह माओ महानता से इन्कार नहीं कर पाते।
‘मोहरों
में भोपाल’
‘केन
किनारे की चट्टानें’
‘बाढ़
में दशाश्वमेध’ ‘राजघाट
का पुल’,‘ओड़िहार
की बाराह प्रतिमा’
आदि कितनी ही कवितायें कवि की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को प्रमाणित
करती हैं। त्रिलोचन संकोची या ऐकान्तिक तथा अन्तर्मुखी
प्रवृत्ति के न तो व्यक्ति हैं न कवि । फिर भी उनके सीधे-सादे
रूप देश और व्यवहार को देखकर उनकी गहराई का पता अक्सर लोगों को
नहीं लगता और उर्दू का यह शेर उन पर चस्पां होता है।
असगर
को मिले लेकिन असगर को नहीं देखा
अपने अशआरों में कुछ-कुछ वो नुमाया है
!
कभी-कभी उनको पढ़कर उन पर गुस्सा भी आता है उनकी भी आत्म
स्वीकृति व्यवस्था
पर टिप्पणी है, भीख माँगने की बात भी प्रश्न उठाती है कि वह
युग कब आयेगा, जब इतने श्रेष्ठ कवि को अस्तित्व संकट में पड़कर
यह जिल्लत बर्दाश्त नहीं करनी पड़ेगी। वहाँ त्रिलोचन हिन्दी के
अभावग्रस्त साहित्यकार के मूर्तिमान रूप हैं। परन्तु यह भी
सवाल उठता है कि फिर उनमें क्रोध क्यों नहीं जन्मा ऐसा
आत्मसंयम और पीड़ाओं को आत्मसात करने वाला आत्मदमन किस काम का
जो लावा बनकर न फूट पड़े। उनमें प्रेमचंद के ही समान जगत् केवल
मानव ही नहीं, प्राणिमात्र नहीं, विश्व के प्रति गहरा ममत्व
भाव है परंतु हम उनकी लेखनी से उस बज्र प्रहार की भी आशा और
इच्छा रखते हैं जो इस कुत्सित व्यवस्था पर हथौड़ों का प्रहार
भर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दे। यहाँ त्रिलोचन थोड़ा हमें निराश
करते हैं । हो सकता है कि अभी तक अप्रकाशित काव्य में कुछ ऐसे
अंश हों।
त्रिलोचन के अपने काव्य सिद्धान्त हैं उनका अपना काव्यशास्त्र
है जो उनकी कविताओं में बिखरा है। जिस तरह उनके जीवनानुभव और
जीवन सिद्धान्त सर्वत्र उनकी कृतियों में विद्यमान हैं।
शास्त्री नये शास्त्र की आकांक्षा और निर्माण कर सकता है पर वह
शास्त्र की न तो उपेक्षा कर सकता है न उसका विरोध। क्योंकि
उसका महत्त्व उनसे अधिक कोई नहीं जानता ।
त्रिलोचन
की भाषा सामान्यतया सरल और सहज है । अवधी के छंदों ने उसे और
अति मधुर और समृद्ध बनाया है। परंतु कहीं-कहीं अवधी के
अप्रचलित प्रयोग भी हैं जो अनेक प्रदेशों में दुर्बोध ही माने
जायेंगे।लेकिन बसेरा जैसे प्रयोग समझ में आ जाता हैं। संस्कृत
के शब्दों का प्रयोग कुछ ही कविताओं में हैं। परंतु वह वहाँ
कवि के संस्कृत ज्ञान को देखते हुए उनका यह संयम श्लाघनीय है।
प्रगतिशील कविता को व्यापक भाव भूमि देने में जो कार्य इस कवि
पंचायतन् ने किया है उसमें त्रिलोचन का भी योगदान भी किसी से
न्यून नहीं है। प्रगतिशीलता केवल मारो काटो की छूट और
‘हाय
जुल्म’
की क्रन्दन ध्वनि का शोर मात्र नहीं है उसमें संपूर्ण मानव
जीवन की सभी वृत्तियों और मनोभावों के चित्रण का पूर्ण अवकाश
और स्थान है इसे इन कवियों के काव्य का पारायण रेखांकित करता
है। युवा पीढ़ी के लिये इसीलिए त्रिलोचन की कविता पथ प्रदर्शक
भी है और एक चेतावनी भी है।
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