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(पूर्वांश पढ़ें)
निःसंगता, रिक्तता आदि की भावनाएँ
छायावादी कवियों में बहुधा पायी जाती हैं। परन्तु जिस उत्तमता
से अपनी यथार्थ भावनाओं को इस कवि ने रखा है, वह देखिए
:
आज में अकेला हूँ
अकेले रहा नहीं जाता
रहा नहीं जाता।
जीवन मिला है यह
रतन मिला है यह
धूल में
कि
फूल में
मिला है
तो
मिला है यह
मोल-तोल इसका
अकेले कहा नहीं जाता ।
सुख आये दुख आये
दिन आये रात आये
फूल में
कि
धूल में
आये
जैसे
जब आये
सुख दुख एक भी
अकेले सहा नहीं जाता
चरण हैं चलता हूँ
चलता हूँ चलता हूँ
फूल में
कि
धूल में
चलता
मन
चलता हूँ
ओखी धार दिन की
अकेले धार दिन की
अकेले बहा नहीं जाता।
ऐसे कितने ही पद्य उदाहरण रूप में दिये जा सकता हैं। चाहता हूँ
कि पाठक उसे स्वयं ही पढ़ें। परन्तु फिर भी कुछ बातें विस्तार
से कह देना आवश्यक है। उनमें से एक है कि कवि संघर्ष कर रहा
है। उस संघर्ष को केवल व्यक्तिगत सत्य ही नहीं, सामाजिक
वास्तविकता मानकर उसके प्रति बहुत ईमानदार रहना चाहता है
:
न अपने सुख की, न अपने दुःख की भावनाओं को, अतिरेक्पूर्ण
व्यंजना दे रहा है, मात्र चाहता है गति, क्योंकि उसे डर हैं-
पत्ते केवल पतझर आने पर ही नहीं झरा करते हैं
जीवन का रस जभी सूख जाता है तभी बिना कुछ झिझके
बिना मुहूर्त-प्रतीक्षा के ही झर जाते हैं
इस जीवन का मोल बहुत है मोल कूतना सहज नहीं है
फिर भी इस जीवन की दुनिया में अपमान हुआ करता है
इतना जिसका पार नहीं है।
इसलिए वह कह उठता है
:
अभी तुम्हारी शक्ति शेष है
अभी तुम्हारी साँस शेष है
अभी तुम्हारा कार्य शेष है
मत अलसाओ
मत चुप बैठो
तुम्हें पुकार रहा है कोई
ऐसी ही प्रकृति के मनुष्यों को-
खुले हुए अंगों को सहलाकर
अपनी प्रभा से नव प्रकाश भर
बालिका-सी सरदी की धूप यह
तम-मन को ताजा कर देती है
नीम बाँस पीपल लहटोरे के
पेड़ हरे निर्मल पत्तों वाले
खड़े खड़े बरसों का प्यार भरे
मुझको अविराम चँवर करते हैं
इतना-सा प्यार यह दुलार यह
पाता हूँ प्रतिदिन मैं बिना कहे बिना सुने
किसी का आभार भी बिना सुने
पाता हूँ जैसे पुरस्कार यह ।
इसी संघर्ष के माध्यम से विश्वास पाने का कारण प्रकृति के
प्रति उसका दुःख आत्मरत निविड़ भावनाओं का न रहकर, अधिक स्वस्थ
और आसक्ति-पूर्ण हो गया है, जिसके कारण आत्मानुराग के अभिशापों
का स्वर नहीं, प्रत्युक्त अधिक व्यापक मानवीयता का वरद कर उसे
प्राप्त है। इस वस्तून्मुख, बाह्मपेक्षी, आत्मोत्सर्गमयी
प्रवृत्ति के कारण उसकी भावनाएँ उदार और भव्य हो गयी हैं।
पढ़ने पर अभिव्यक्ति के पीछे किसी गहराई का अन्दाज़ा हो जाता
है, क्योंकि कवि उसी भावना के मनोविज्ञान से लिखता जा रहा है।
यह उत्तेजना-प्रियता ही एक प्रकार की सेंटिमेंटैलिटी को
उत्पन्न करती है, जिसमें भावना की गहराई, उसकी मन्थर
निश्चयपूर्ण गति न रहकर, मात्र क्षणस्थायी उभाड़ रहता है। कवि
त्रिलोचन में इस सेंटिमैंटैलिटी का लेश भी नहीं है, और न हमेशा
इमजेज़ के सहारे चलने की गहरी प्रवृत्ति, जो हमें गिरिजाकुमार
माथुर में मिलती है। उसके जीवन में अन्तर्मुखता की ओर ले
जानेवाला फ्रस्ट्रेशन कम है। संघर्ष उसे आत्म-ध्वंस की ओर नहीं
ले जाता, वरन् निर्माण की ओर ही प्रवृत करता है। वही उसे
बाह्मोन्मुख भी बनाता है। यह फ्रस्ट्रशेन न होने के कारण कुछ
अन्य भी है, जो यहाँ महत्त्वपूर्ण नहीं है। पर इतना सही है कि
उससे उसका व्यक्तित्व अन्य इसी श्रेणी के कवियों की अपेक्षा
अधिक सरल हो गया है।
केदारनाथ अग्रवाल, गिरिजाकुमार माथुर, भवानीप्रसाद मिश्र, आदि
नये उठते हुए कवियों में त्रिलोचन
का स्थान महत्वपूर्ण है, भाव की दृष्टि से और टेकनीक की
दृष्टि से। भवानीप्रसाद मिश्र की भावनाओं में जो भव्य व्यापक
औदार्य है, और जो गद्य का टेकनीक है, वह त्रिलोचन
में भी है, परन्तु अधिक सधे हुए और सँवारे हुए रूप में । शायद
इस तटस्थता न होने के कारण बहुत अच्छे प्रकार से आरम्भ हो।
भवानीप्रसाद में इतनी तटस्थता न होने के कारण बहुत अच्छे
प्रकार से आरम्भ हुई कविता भी अन्त में शिथिल हो जाती है,
कभी-कभी । पर त्रिलोचन
टेकनीक के प्रति सचेतन अधिक हैं। मैं यह नहीं कहता कि उनके
काव्य में शिथिल पंक्तियाँ नहीं हैं। पर सूक्ष्मता यत्र-तत्र
प्रत्येक कविता में बिखरी पड़ी है, और यही वह चीज़ है जिसमें
बड़ी-बड़ी सम्भावनाएँ छिपी हुई हैं।
प्राच्य क्लासीकल स्ट्रेन और पाश्चात्य प्रोज टेकनीक का वे
समन्वय किया चाहते हैं। उसका प्रथम चरण ही धरती का काव्य है,
हम केवल इतना कह सकते हैं उसका प्रथम ही धरती की काव्य है, हम
केवल इतना कह सकते हैं । साथ ही साथ एक बात यह भी सही है कि
भाषा के सुपरिष्कृत रूप और स्वर की गीतात्मकता के पीछे जो
गीतात्मक भाव है, वह बुद्धि द्वारा काफ़ी अनुशासित है। यह भी
कदाचित् निराला जी की एक विशेषता है, जो त्रिलोचन
में भी मिलती है। परन्तु यह बुद्धि-वृत्ति उनके काव्य को नहीं
बिगाड़ती, केवल उन्हें इस श्रेणी के कवियों से कुछ भिन्न कर
देती है। इसको संयम और अनुशासन भी कह सकते हैं। और इसके दो
बहुत बड़े लाभ भी है;
एक तो यह, कि जीवन की समग्रता के प्रति कवि की नित्य दृष्टि
रहती है दूसरे, उस भावना में एक प्रकार की मूक आलोचक दृष्टि भी
मिली रहती है। आज के युग का यह एक अनिवार्य सत्य है कि हम उस
भावनात्मकता को चरम नहीं समझते, बल्कि उसे, जो इन क्षणों से
बना हुआ वास्तविक जीवन है। अतः हमारी भावना उस क्षण की सीमा
में रहकर भी अपने आलोचक को खो नहीं देती, और स्वयं के प्रति
रहनेवाले आग्रह को यदि पूर्णरूप से खो नहीं देती तो ढाँक जरूर
लेती है। इसी आलोचक भावना के कारण यदि हमने छायावादी अतिरेक खो
दिया है, तो जीवन के ढँके हुए भाग को खोलने का प्रयास भी कर
रहे हैं, और शैली-भेद उत्पन्न कर चुके हैं। उसी का एक रूप है
मनोवैज्ञानिक काव्य, जो त्रिलोचन
में प्रमुखता से है। उदाहरणतः-
जब जिस छन मैं
हारा, हारा, हारा
मैंने तुम्हें पुकारा
तुम आये
मुसकाये
पूछा-
कमज़ोरी है ?
बोला-नहीं, नहीं है
किसने तुमसे कहा कि मुझको कमजोरी है
तुम सुनकर
मुसकाये
मुझको रहे देखते
मुझको मिला सहारा
जब जिस छन मैं
हारा, हारा, हारा।
अथवा -
सन्ध्या के मौन में
स्वर
दिवाचर के निशाचर के
स्थलचर के जलचर के नभचर के
एक पल को जा समाये
सन्ध्या के मौन में स्वर
खो गये भव-चेतना-स्वर नयन का रूप धरकर
खो गये
सन्ध्या के मौन में स्वर
सबने अपना-अपना दिन देखा
एक एक चित्र एक-एक रेखा
सबने देखा समझा फिर देखा
फिर स्थल पर
अवनत शिर
पथ पर प्रति अंक देखते हुए
जन-जन ने आगामी कल का सौन्दर्य देखा
मन-मन में क्षण-क्षण को रूप-कल्पना करके पहुँचे घर
खो गये सन्ध्या के मौन में स्वर।
इस प्रकार का काव्य मन-ही-मन पढ़कर रसोत्पादन होता रहता है।
कारण यह कि अनुभूति-समानता के आधार पर ही इसका आन्तरिक महत्व
समझा जा सकता है, अन्यथा नहीं। और बगैर इस तटस्थता के इस
पद्धति का काव्य निर्मित ही नहीं हो सकता है।
इस प्रकार के काव्य में भी त्रिलोचन
निराशा और दुःख की कालिमा से दूर हैं । उनकी संक्षिप्त शैली
पाठक की कल्पना को उकसाकर से अपने समीप ले आती है।
त्रिलोचन
हारना नहीं चाहते। हारते भी हैं तो काव्य में फौरन उसे मान कर
(बातचीत में बिल्कुल ही नहीं मानते) जय-पथ पर चल देते हैं।
इसीलिए कहते हैं :
आज का यह तिमिर
करता शक्ति-दान
समझने मानव लग है
शक्ति-ज्ञान
स्वत्व, जीवन,
प्रगति, सामंजस्य, मान
हो चला संघर्ष
इससे जगत् -
का अधिवास !
छा गये बादल,
छिपे तारे, ढँका आकाश
कहाँ शेष प्रकाश !
इसीलिए कवि जन-जीवन की ओर अधिक अग्रसर होता है।
‘तारकों
से ज्योति चलकर भूमितल पर आ रही है’
वाली कविता तथा किसानों के जीवन का चित्रण इसी के उदाहरण हैं। धरती
के गीतों में काव्य-सौंदर्य सर्वत्र निखर उठा है। जहाँ कवि
कहता है-
चाहता हूँ जय,
पराजय की कल्पाना
से
होता है भय।
चाहता हूँ जय
मुझे अभी रूप
चाहिए
अभी रंग चाहिए
अभी मुझे
आँखों का अर्थ
जान पड़ता है
अभी कहाँ मुझे
शांति मिली।
वहीं यह भी सच है कि-
भस्मावृत लूकी-सा
मैं इस अन्धकार
में
पड़ा हुआ हूँ
अपनी चेतना की
ज्वाला
परिसीमित
उठकर।
वहीं उसे कहना
पड़ता है-
अन्धकार में देख
रहा हूँ
जीवन की बनती
रेखाएँ
आयें बाधाएँ सब
आयें
पर न मिटेंगी
किसी काल में
ये बनने वाली
रेखाएँ।
इसका उसे विश्वास है। इस लेख में मैंने धरती का परिचय देने की
ही कोशिश की है। छद्म-काव्य का सम्पूर्ण अभाव जिससे हो, उसे ही
तो मौलिक ईमानदारी कहना चाहिए। मेरा विश्वास है कि धरती का
हिन्दी में उचित आदर होगा । पुस्तक मे प्रेस की भूलें बहुत
अधिक हैं। जगह-जगह अशुद्वियाँ हैं।
(समीक्षा की
समस्याएँ/मुक्तिबोध, प्रथम
संस्करण,1982 से)
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