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हिन्दी
के
प्रगतिशील कवियों में त्रिलोचन, नागार्जुन और केदार की तिकड़ी सबसे अलग दिखाई पड़ती
है। तीनों में गँवई-गाँव की छाप, गाँव के सहज लोक की छटा, सादगी और अकृत्रिमता
पद-पद पर मिलती है। यह बात केवल इनकी कविता के सन्दर्भ में ही नहीं, इनके व्यक्ति
और जीवन, इनकी फक्कड़ाना बोली-बात और उसके कहने के ढंग पर भी लागू होती है।
त्रिलोचन
के साथ जो एक खास बात और है, वह है उनकी रचना का छंद । हिन्दी
की छंद-पद्धति में मूलतः इटली में पैदा हुआ छंद सॉनेट
अँग्रेज़ी के ज़रिए किसी मरखने बैल की तरह उत्तर-छायावादी
रचनाओं में घुस आया । इसे साधने की चेष्टा तो बहुतों ने की,
लेकिन साध पाए उसे दो ही-एक बच्चन और दूसरे त्रिलोचन। छंद के
लिहाज से सॉनेट और त्रिलोचन जैसे एक-दूसरे के पर्याय हो गए
हैं। सॉनेट कहें तो त्रिलोचन की याद आती है, और त्रिलोचन की
याद करें तो सॉनेट की।
त्रिलोचन की कविता मूलतः गाँव की धरती की कविता है। वहीं उनकी
प्रेरणा का उत्स है। ऐसा हो नहीं सकता कि वे गाँव से दूर रहें
और गाँव वाले उन्हें देखकर
‘बात
कोई बिन पूछे’
जाने दें । वे कहते हैं-
निरघिन, तुम लोगों से रूखा होकर जाना
अलग असंभव है मेरे मन की खुशहाली
रुपयों की मुहताज नहीं है गाने गाना
तुम लोगों का रहता, इसकी आदत डाली
(पृ.14)
उन्हें वही राह पसंद आती है जहाँ
‘मेड़
ऊँची है और खेत में पानी नीचे है’
और जहाँ ‘धनखर
होने से धरती धानी लहराती है।’
अपनी धरती और अपने देश भारत के सम्मान की चिन्ता वे भारतेन्दु
के समान ही करते हैं। उनका मानना है कि
‘भारत
का सम्मान हमारी जीवन-भाषा है’
और ‘वैचक्तिक
अभ्युत्थानों की अभिलाषा देशोत्थान के लिए’
ही होनी चाहिए। (पृ.19) । त्रिलोचन को इस बात का क्षोभ है कि
हमारी सामाजिक-व्यवस्था उसी को ऊपर नहीं उठने देती जो, मिहनत
करता है। जो काम करने वाले हैं वे डर-डर कर रहते हैं और जो
‘हर-हर
कर अपना घर भरने वाले’
हैं वे समाज में छाए हुए हैं
?
वे पूछते हैं कि-
‘हाथों
के दिन आएँगे। कब तक आएँगे,
यह तो कोई नहीं बताता....’
‘हाथ
कहाँ हैं वंचक हाथों के चक्के में
बंधक है बंधुए कहलाते हैं’
(पृ.98)
त्रिलोचन की कविता गहन आत्मविश्लेषण की कविता भी है
‘अपनी
मुट्ठियों में पड़े स्वर्ण-क्षणों को’
उन्होंने ‘रेत
कणों-सा खिसक जाने’
दिया है, लेकिन ‘पछतावे
की झाँई मुख पर’
नहीं आती। अपने समृद्ध अनुभवों और अपनी समर्थ प्रतिभा के
बावजूद उन्हें अनुभव होता है कि जीवन का बहुत-सा उन्होंने
व्यर्थ गँवा दिया। ‘शायद
नहीं कुछ चूक हो गई-
कुछभी किया नहीं, जब अपना लेखा जोखा
किया, बात उतराई, खुल कर आगे आई,
इधर-उधर में रहा, गाँठ का भी सब खोया।
जो कुछ जोड़ा था, वह सब धोखा ही धोखा
सिद्ध हुआ है.........
(पृ. 24)
स्वदोष दर्शन बिरले ही करते हैं और निंदा तो कोई सुनना ही नहीं
चाहता । कबीर की तरह ‘त्रिलोचन’
जैसे बिरले मिलेंगे जो
‘निंदक
नियरे राखिए’
के मूल्य को समझते हों । त्रिलोचन की यह वाणी इस संदर्भ में
बड़ी महत्त्वपूर्ण है -
कड़वी से कड़वी भाषा में दोष बताओ
मुझ को मेरे;
सदा रहूँगा मैं आभारी
जहाँ-जहाँ मैं चूका, थी मेरी लाचारी
निर्बलता पर तरस न खाओ और सताओ
.....मैं फिर अपने को देखूँगा, फिर जो उतरन
इधर-उधर की, इनकी-उनकी संचित की है
फेंक-फाँक दूँगा । मैंने कब वंचित की है
वृत्ति आत्मविश्लेषण की.......
(पृ. 69)
बुरों को फलता देख उन्हें दुख होता है, लेकिन हताशा में आकर
बुराई के साथ हो लेना उन्हें पसन्द नहीं । उनके जीवन की कामना
निर्मलता की यात्रा में है। ऐसी निर्मलता में, जो दूसरों का
मैल धोकर उन्हें भी पावन कर दे-
वर्षों का जल जितनी देर पात पर ठहरा,
उतनी देर रहे जीवन, जग का मल धो दे
....हाथ उठें तो अशरण जन को काम्य शरण दें
चरण चलें तो पद-पद विश्व को खिला दें
एक नई श्री से। जीवन के तार मिला दें
(पृ. 59)
चाहे जितने संघर्ष जीवन में आए, उनका हृदय भृगु प्रहार को जैसे
विष्णु ने सहा, वे सहर्ष उन्हें स्वीकार करते हैं। हर पराजय
उनके लिए एक परीक्षा भर है-युद्ध और शांति का प्रश्न प्रगतिशील
कवि की एक शाश्वत चिन्ता है। मार्क्सवाद के शत्रु अपने तर्कों
में प्रायः मार्क्सवादी दर्शन को संघर्ष एवं रक्तपात के ज़रिए
परिवर्तन का हामी बताकर आरोप लगाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि
मार्क्सवाद की मूलभूत चिन्ता ही एक ऐसे समाज की स्थापना है
जहाँ समता और न्याय पर आधारित सुख और शांति का साम्राज्य हो।
अन्य प्रगतिशील कवियों की तुलना में त्रिलोचन का स्वर केवल
राजनीति नहीं, दर्शन के स्तर पर भी शांति की महत्ता को देखता
है। मनुष्य के स्वभाव से ही वे हिंसा और लड़ाई को मुक्त करने
की चाह रखते हैं। वे कहते हैं-
कहो जबान लड़ाने से क्या मिल जाता है।
ज्ञान ?
नहीं। अधिकार ?
नहीं। तो प्यार ?
वह, नहीं।
हम लड़ने को लड़ते हैं संतोष है कहीं
दूर देश में द्वंद्व हमारे घर आता है
अधिकारों का नशा सिराओं में भाता है।
(पृ. 53)
वे ‘अपने-अपने
क्षेत्र बनाकर,‘सेनाओं
के ब्यूह’
रचकर ‘मानवता
पर नित्य’
होने वाले प्रहारों पर क्षोभ व्यक्त करते हैं।’
(पृ. 87)। वे यह भी देखते हैं कि कहीं इस सब के मूल में
विज्ञान से विकसित वह तकनीकी है, जिसके ज़रिए नये उपनिवेशवाद
का जन्म हो रहा है। उनका मूलभूत प्रश्न यह है कि विज्ञान का
आना तो ठीक है, लेकिन उसे मानवता का दास होना चाहिए, या मनुष्य
को गुलाम बना देने वाला स्वामी
?
अनुचर है ?
अनुचर है ?
बोलो नाश तुम्हारा
अनुचर है विज्ञान ?
या तुम्हीं बिके हुए हो
उसके हाथों । अनुकंपा से टिके हुए हो
उसकी.....
(पृ. 57)
-लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि वे जनता के मुक्तिसंघर्ष को
ठंडी शांति के बस्ते में डाल दें। न्याय के लिए मुक्तिकामी
जनता के संघर्ष की पक्षधरता उनमें स्पष्ट है।
‘वियतनाम’
के संघर्ष में वे ‘दीनों,
दलितों की जय’
देखते हैं, ‘हाइड्रोजन
बम’
वाले उपनिवेशवाद के मोहाभिमान की कमर टूटती देख उन्हें
नव-मानवता के उदय की विजय का विश्वास होता है। वे कहते हैं-
निर्भर मानव पंक्ति आज तैयार खड़ी है
लाली फैल चली है सम्मुख सूर्योदय है।
नई प्रतिज्ञा मानव भाषा दुहराती है
आशा भीतर-बाहर चारों ओर लड़ी है।
(पृ.
43)
प्रकृति की ओर त्रिलोचन
की दृष्टि कम गई है, लेकिन उसकी सुन्दरता को वे रोमानी नज़रिए
से कम खेत-खलिहान, किसान के जीवन के अंग के रूप में ही अधिक
देखते हैं। बसंत का स्वागत करते वे
‘स्वागत
है, स्वागत, बसंतप्रिय आओ आओ’
कहते हैं, लेकिन ‘हलवाही
किसान’
के जीवन से उसे जोड़ना नहीं भूलते । अंत होता है इन पंक्तियों
में - ‘खेती
के ऊपर सोते का पानी जमा
/
नये भाव से नये राग से कवि गाता है।
पंत और निराला की तरह त्रिलोचन भी बादलों की देख मुग्ध होते
हैं। ‘इधर
घनों के खेल व्योम में नए निराले’
में उनकी कल्पनाशीलता का परिचय मिलता है, लेकिन ज़मीन से
ज़्यादा जुड़े होने के कारण कल्पनाओं के आसमान में वे नहीं
विचरते । इसका बीज त्रिलोचन की वह यथार्थवादी दृष्टि है, जो
उन्हें, उनकी रचना को धरती के यथार्थ से हमेशा जोड़े रखती है।
उनके लिए साहित्य केवल सपने का खेल नहीं है-
देख हैं साहित्य विधाताओं ने सपने
आँख खोलने पर जो नहीं दिखाई देते
(पृ. 97)
भाषा, छंद, भाव पर लिखी त्रिलोचन की रचना में एक ओर जहाँ इनके
पीछे भागने वालों पर व्यंग्य है, वही दूसरी ओर इनका दुरुपयोग
करने वालों, इनकी अवहेलना करने वालों पर भी व्यंग्य है। मनमाना
लेखन कोई आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन मनमाने की तुक्कड़
जोड़ते व्यंग्य करते भी त्रिलोचन के किसान-मन में-
‘फिर
नभ में उमड़ा-घुमड़ा मेघों का मेला/सन्नाटा
छा गया, धरा पर अंकुर आगे’-
कहते हुए अंततः धरती ही आ समाती है।
कविता में जीवन के विस्तार को त्रिलोचन केवल शब्द, वाक् या
उनके ही शब्दों में नाम की सीमा में नहीं देखते । अभिधान, नाम
या ज्ञान की सार्थकता वर्ण्य विषय को स्मृतियों में साकार कर
देने, छाप देने में, सूत्र रूप में वे वाक् के साथ अर्थ की
संपृक्तता को देखते हैं।
‘फूल
नाम है एक’
कविता की ये पंक्तियाँ इस दृष्टि से बड़ी अर्थपूर्ण हैं-
फूल नाम है एक वनस्पतियों की स्थति का
और नाम का सूत्र समीप खींच लाता है,
ज्ञान नाम को छोड़ नहीं सकता है। स्मृति का
रेखांकन है चित्र, नाम के गुण गाता है
(पृ. 86)
गाँव की ज़मीन, खेत किसान और किसानी स्वभाव के कारण त्रिलोचन
का मन नागार्जुन से बहुत जुड़ाव का अनुभव करता है। अपनी
कविताओं में ‘कवि
से नहीं जान पड़ते’
नागार्जुन की प्राकृत छवि और उनके जुझारू स्वभाव को त्रिलोचन
अनेकशः याद करते हैं । नागार्जुन को वे
‘अत्याचार
अनय पर’
कोड़ा बरसाने वाले, ‘सर्वमंगला’
के ध्यानी, ‘कठिन
शाप भी देता है, यों बरतनी हैं’
(पृ. 65) ‘प्रबुद्ध
जनता का स्वर’,
जनता का कवि (पृ.68) ।
‘अभाव’
और ‘विषम
परिस्थितियों से’ ‘जम
कर लड़ने वाले साथी के रूप में देखते हैं। यह मैत्री
समानधर्मिता की है। उलटकर कहें तो नागार्जुन की वैसी कवि में
आप ख़ुद त्रिलोचन को भी समाया हुआ देख सकते हैं।
(काव्य-संग्रह-‘फूल
नाम है एक’/त्रिलोचन/राजकमल
प्रकाशन प्रा.लि. नई दिल्ली/1985/मूल्य-30
रुपये
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