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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

सुपरिचित कवि की कहानियाँ


डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

सुपरिचित कवि त्रिलोचन की बीस कहानियाँ का संकलन देश काल अनेक कारणों से महत्त्वपूर्ण और रेखांकनीय है। यदि इस बात को छोड़ भी दें कि त्रिलोचन का कवि रूप इतना अधिक चर्चित रहा है, कि उनके कृतित्व के अन्य आयाम महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अनदेखे रह गए हैं, तो भी इस बात पर ध्यान जाए बग़ैर नहीं रहेगा कि इतने महत्वपूर्ण कवि ने कहानियाँ क्यों लिखीं, और वे कहानियाँ कैसी हैं। त्रिलोचन जिस तरह हिंदी कवियों की बड़ी भीड़ में अकेले पहचाने जाते हैं, उनकी कहानियाँ भी प्रचलित हिंदी कहानी के सुपरिचित पथ का अनुसरण करने से बचती नज़र आती हैं। और बचने का यह प्रयास सायास नहीं है । यह महत्वपूर्ण है।

 

त्रिलोचन की इन कहानियों में उनका जनपद अपनी तमाम खूबियों (और कमियों) के साथ पूरी तरह उपस्थित है। इस अर्थ में ये कहानियाँ केवल त्रिलोचन  के जनपद की हैं, और त्रिलोचन  की क़लम से ही इन कहानियों का सृजन संभव था। कवि त्रिलोचन  की विचाराधारा और जन पक्षधरता भी इन कहानियों में अपने पूरे दम-खम के साथ मौजूद है। सहज-सरल त्रिलोचन अपनी बात की ताकत में इस हद तक विश्वास करते हैं कि वे उसे जस-का-तस रखते हैं, प्रभावशाली बनाने के लिए लटकों-झटकों का कतई इस्तेमाल नहीं करते । आज की कहानी के परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में यह बात बहुत महत्व की है। त्रिलोचन  की अनेक कहानियाँ अपनी सरलता में इस शताब्दी के प्रारम्भ की रचना होने का आभास देती हैं। पर इसी सरलता के प्रवाह में जब अचाचक रचनाकार कोई बड़ी बात कह जाता है तब हम महसूस करते हैं कि जो कहानी हम पढ़ रहे हैं वह आज की कहानी है।

 

संकलन की तुलना और परख करने वाली यह कहानी काफ़ी दूर तक ऐसी ही 1920-25 के ज़माने की कहानी लगती है। नारायणपुर गाँव की चौपाल में एक दिन यह सवाल उठता है कि इन दोनों भाइयों में कौन बड़ा वीर है, और अंत में फैसला भी इन पर ही छोड़ दिया जाता है। तय यह होता है कि इनमें से कोई एक आधी रात के वक्त महादेव घाट जाए और किसी मुरदे के दाएँ हाथ में धागा बाँध कर चला आवे, फिर दूसरा जाए, बँधा हुआ धागा काट लाए। अब इस कहानी में कुछ भी विशेष नहीं लगता। न इस बात में कि आधी रात के व़क्त समर सिंह धागा बाँधने चला गया है। इस बात में भी बहुतों को पुरानी हिंदी कहानी की चमत्कारप्रियता दिखाई दे सकती है कि वहाँ पहले से ही तेज सिंह एक मुरदे के रूप में लेटा हुआ था। कहानी का अंत क्या है, इसका उल्लेख न करते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि तेज सिंह अपनी बात कहते हुए बताता है कि जब वह श्मशान की तरफ़ आ रहा था तो उसे रास्ते में एक भूखा शेर मिला । तेजसिंह कहता है कि मुझे भी इसके लिए अफ़सोस है कि परमात्मा ने मुझे आहार बन जाने की निर्बलता क्यों नहीं दी ?’ और निर्बलता के अभाव की यह पीड़ा ही मानों वीरता को नए सिरे से परिभाषित कर इस कहानी को महत्वपूर्ण बना जाती है। कुछ इसी तरह की कहानी महाप्रयाण भी है जहाँ एक महाराज प्रजा की दशा जानने  के लिए रात-रात घूमा करते हैं । वे एक माँ-बेटे का संवाद सुनते हैं जहाँ मरणासन्न बेटा माँ से कहता है - तुम लोग आग में जल जाओ; पानी में डूब जाओ, पहाड़ से गिरकर मर जाओ; परंतु आदमी होकर आदमी का दिया हुआ अपमान सुख से मत रहो। यह बेटा (वासुदेव) महाराज से भी कहता है राजन् । आधिपत्य का मोह छोड़िए। आदमी जिससे संपूर्ण मानवता को अपनाये, वह कीजिये। जो लोग हिंदी कविता के वर्तमान से परिचित हैं उन्हें यह बताने की ज़रूरत नहीं कि इतनी बड़ी बात त्रिलोचन का चरित्र ही कह सकता है। वासुदेव से थोड़ा भिन्न चरित्र है  ‘जिउधन का। साठ से ऊपर की वय का यह ग्रामीण अक्खड़ भी है और तेज तथा एक हद तकचालू भी। दारोगा, किसी की शिकायत पर, उसके यहाँ शराब बनाने के सामान की तलाशी लेने आता हो तो वह सब कुछ इधर-उधर सरका देता है और फिर दरोगा से बिना दबे, पूरी दबंगता से पेश आता है। उसकी पूरी कहानी कह चुकने के बाद लेखक मानो उसके व्यक्तित्व का विश्लेषण करता है-जिउधन आदमी अच्छा है । जिससे भेंट होती है उसी से बोलता है। जो जैसा व्यवहार उससे करता है वैसा ही वह भी करता है। जिस ढंग के आदमी को पाता है उस ढंग की बात करता है।

 

ऐसा नहीं कि त्रिलोचन की सारी कहानियाँ इसी तरह की सीधी कहानियाँ हैं। व्यवस्था की चिंता में उन्होंने व्यंग्य किया है, पर एक संदेश के साथ। व्यंग्य की धार परखनी हो तोउपलब्धि कहानी पढ़ें। एक गरीब विधवा के शोषण के लिए किस तरह ब्राह्मण और क्षत्रिय दो व्यक्ति हाथ मिला लेते हैं, देखते ही बनता है। सुकुल जब तक विधवा पंडाइन को बरबाद करने का उपक्रम करता है, उसका चरित्र शुक्ल ही प्रतीत होता है, पर अंत में रामनाथ सिंह और शुक्ल जब अपना हिसाब-किताब करते हैं तब सुकुल के  ‘बम्हनपन की कलई खुलती हैं। इससे भी अधिक तीखा और तिलमिला देने वाला व्यंग्य है लघुकथा बाल बच्चे में । सम्राट पहले तो दुर्ग विजय के अभियान के क्रम में ग़रीब किसान को तलवार के घाट उतारता है् और फिर अनाथ बच्चों पर यह कहकर कि  ‘इनका पालन को। ये राष्ट्र के बच्चे हैं । संकट के समय राष्ट्र इनसे काम लेगा दया दिखाता है।

 

कथ्य की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी है  ‘अपनी इज़्जत आप करो । कहानी बहुत कुशलता और सहज कलात्मकता से किताबी ज्ञान तथा अनुभव जन्य ज्ञान को आमने-सामने रख एक की निरर्थकता व दूसरे की सार्थकता प्रतिपादित करती है। वस्तुतः त्रिलोचन किताबी ज्ञान का क़दम-क़दम पर मखौल उड़ाते हैं। वे इस देश के आम आदमी की श्रेष्ठता के मुखर पक्षधर जो हैं। वे जानते हैं कि उनके जनपद और इस महादेश का अनपढ़ आदमी अक्षर-शून्य भले हो, अनुभव संपन्न तो है।

 

अपने चरित्रों से सुपरिचित होने के कारण त्रिलोचन की अनेक कहानियाँ कहीं-कहीं रेखाचित्र होने का आभास देने लगती हैं। एक उदाहरण रूपरेखा कहानी से देना चाहता हूँ।  ‘कंधे उनके बराबर सीधे हैं, खड़े होते हैं तो जरा आगे झुके हुए-छाती भी बाँहों के उठान के बराबर है। उठी हुई नाक-सुइलार ठोड़ी खड़े होते हैं तो हथेलियाँ आगे को खुली होती हैं, या दोनों पंजों को आपस में लड़ाते रहते हैं । आँखों पर चश्मा, देखने का ढंग गंभीर और कुछ भी बोलने के समय मुसकराना-हलके और फिर धीरे-धीरे गंभीर होने के लिए प्रयत्नशील। जिउधन का रेखाचित्र (पृ.80) भी ऐसा ही हैं।

 

जैसे मैंने प्रारम्भ में कहा, त्रिलोचन की इन कहानियों में उनका जनपद पूरी तरह मुखर है। पर जनपद का रस-रूप गंध अपनी ताकतवर और कद्दावर उपस्थिति के कारण एक दिक्कत भी पैदा करता है। मेरे जैसा पाठक, जो त्रिलोचन जी के जनपद से बहत दूर का निवासी है, ठेठ आंचलिक शब्दावली की वजह से उस जनपद से परिचित होते-होते रह जाता है।  ‘देशकाल कहानी को पढ़ते हुए इस अपूर्णता का एहसास सबसे अधिक हुआ। इस तरह की दिक्कत से पार पाने का एक तरीकाफूटनोट हो सकता था।

 

आज जब उत्तर आधुनिकता के दबाव और शोर में हिंदी का बहुत सारा लेखन नितांत दुर्बोध और अपठनीय होता जा रहा है, तथाकथित कलात्मकता के आतंक तले कविता-कहानी अपनी मूल आकृति खोते जा रहे हैं, विचारधारा के आग्रह के कारण रचना बयान मे तब्दील होती जा रही हैं, त्रिलोचन की ये कहानियाँ गहरी आश्वस्ति और संतुष्टि देती हैं।

(कृति- देशकाल/राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. नयी दिल्ली/पहला संस्करण : पृष्ठ 130 : मूल्य 35-00

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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