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अलीगढ़ जनपद के
ग्राम तोछी के डॉ. राजेश कुमार ने उनसे विगत दिनों आत्मीय
बातचीत की थी। श्री राजेश स्वयं सुधी रचनाकार हैं तथा
त्रिलोचन-साहित्य के मर्मज्ञ के रूप में जाने जाते हैं ।
प्रस्तुत साक्षात्कार में साहित्य, देश और समाज के प्रति
त्रिलोचन जी का प्रगतिशील दृष्टिकोण मुखरित हुआ है । हम उस साक्षात्कार को यहाँ
शब्दशः पेश कर रहे हैं- संपादक
ज्वालापुर,
हरिद्वार स्थित लोधामंडी की अति संकुचित गली के अंतिम मकान का
दरवाज़ा खटखटाने पर वरिष्ठ प्रगतिशील कवि त्रिलोचन की वक़ील
पुत्रवधू उषासिंह ने मुझसे अंदर चलने को कहा। दुपहर के वक़्त
का समय है । मैंने लब्धप्रतिष्ठ कवि त्रिलोचन के कमरे में
प्रवेश किया है । वह बीमारी की दशा में बिस्तर पर लेटे हुए
हैं । कवि त्रिलोचन के उस कमरे में बिस्तर पर निराला रचनावली
तथा कुछ पत्र-पत्रिकाएँ हैं । मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ, वे
मुझे गौर से देखते हैं । स्वास्थ्य के बारे में पूछने पर वे
बताते हैं –
“भाईसाहब,
बस बच गए । अल्सर की गंभीर बीमारी में एक्टिव ब्लीडिंग से मेरा
अत्यधिक ख़ून निकल गया । मेरी पुत्रवधू उषासिंह ने जो सेवा की
है, वह प्रशंसनीय तथा बेजोड़ है ।”
इसी बीच मैं उषासिंह जी से कवि त्रिलोचन की बीमारी के विषय में
पूछता हूँ । वे कहती हैं
–
“23
अप्रैल, 2005 को इनको ब्लीडिंग हुआ । मैं सो रही थी, इन्होंने
मुजे नहीं जगाया । पूरा क़मरा ख़ून से लथपथ था । नाली में भी
खून बह रहा था । मैं कुछ सहयोगियों के साथ इन्हें रामकृष्ण
मिशन सेवाश्रम, कनखल ले गई । वहाँ डॉ. हांडा ने इनका उपचार
किया । 4 मई, 2005 को इनकी हालत एकदम सीरियस हुई । मीडिया की
जागरूकता के कारण इन्हें सीएमआई, देहरादून में भरती कराया ।
सरकारी ख़र्चे पर इनकी वहाँ चिकित्सा की गई । 13 मई, 2005 की
शाम को इनकी छुट्टी कर दी गई । अब ये स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं
।”
साहित्य-चर्चा करते ही बहुभाषाविद् कवि त्रिलोचन का
हिंदी-प्रेम प्रकट हो उठता है । वे कहते हैं
–
“पूरे
देश को न अँग्रेज़ी आई है, न आएगी । अपने देश की, महाद्वीप की
भाषाएँ आसानी से सीख सकते हैं । जिस भाषा में आपने गालियाँ दी
हैं, सम्मान किया है, वही भाषा आपकी मुट्ठी में रहेगी । सीखी
हुई भाषा अधूरी रह जाती है । राजेश जी, माहौल की भाषा अच्छी
होती है । अख़बार मेरे लिए दैनिक महाकाव्य है । हिंदी कैसे
सुधरेगी, अख़बार के लेखक इस पर ध्यान ही नहीं देते । इस विषय
पर मैं बराबर सोचता हूँ ।”
महात्मा तुलसीदास की काव्य-संचेतना के बारे में पूछे जाने पर
वे कहते हैं –
“जो
कविता पाठक को बेचैन करती है, वह अच्छी होती है । रामचरितमानस
पढ़ते-पढ़ते मैं आँसू नहीं रोक पाता । यही अनुभव गीता का है ।
पौराणिक कथाएँ भी सांस्कृतिक अभ्युदय के लिए ज़रूरी हैं ।
इतिहास हवा से, दैवकृपा से नहीं होता । तुलसी के राम ऐसे वीर
है, जो मुस्कराहट के साथ लड़ते हैं । आवेश में लड़ना पराजय तय
है । शब्द-भंडार जितना व्यापक तुलसी का है, उतना किसी और का
नहीं। रामचरितमानस जीवन का पर्याय बन गया है । हिंदी में
छंदोबद्ध गद्य लिखने में तुलसी बाबा बेजोड़ हैं ।”
इसी बीच गठबंधन पर आधारित देश की वर्तमान राजनीति के विषय में
मैं उनका अभिमत जानना चाहता हूँ । गंभीरता के साथ वे अपनी
चिंता व्यक्त करते हैं
–
“
सभी दल एक जैसे हैं । कोई दल ऐसा नहीं है, जिसके पास लठैत,
गुंडे न हों । नाना दल लूट के लिए बनते हैं । देश में अराजकता
की स्थिति है । मैं मानता हूँ कि देश मे अराजकता की स्थिति
1947 में ही आ गई थी । देश की जनता पिस रही है । गठबंधन की
राजनीति से देश मे अराजक स्थिति से बचने के प्रयास की आशा थी,
लेकिन स्थिति क्या है । जनता का सर्वत्र शोषण है ।”
प्रगतिशीलता का वास्तविक स्वरूप पूछे जाने पर उनकी राय इस
प्रकार है –
“सम्पन्न
घरों में जीना और उदार होना दुर्लभ संयोग है । गरीबी वह थापी
है, जो कुम्हार के घड़े बनाती है । जो जनजीवन जानता है, वही
सच्चा प्रगतिशील है ।”
गीत, ग़ज़ल, सॉनेट, रुबाई, मुक्त छंद, गीतिनाट्य, कुंडलियाँ,
बरवै, प्रोज पोएट्री इत्यादि काव्य-रूपों के सर्जक कवि
त्रिलोचन को बड़े पुरस्कार न मिल पाने के बारे में मैंने जब
उनसे इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा
–
“मैं
इसका क्या उत्तर दूँ । यह प्रश्न निर्णायकों से पूछिए, वे ही
इसका सही उत्तर दे सकते हैं ।”
इसी दौरान वे देश-विदेश की चर्चा करते हैं
–
“अमेरिका
वाले ऊँचे से ऊँचा पद देते हैं विदेशियों को, जबकि आपके देश
में ऐसा नहीं है । यहाँ अंध जड़ता से लोग मुक्त नहीं है ।
अमेरिका मे अख़बार लेने के लिए निश्चित जगह निर्धारित है,
व्यक्ति वहाँ जाएगा, पैसा डाल देगा । भाऱत में हॉकर लाते हैं
अख़बार । अगर भारत मे ऐसा हो, तो लोग बिना पैसा डाले अख़बार
लेंगे ।”
इसी श्रृंखला में त्रिलोचन विचारमग्न हो जाते हैं । मैं
शांतचित्त से उनके मुखमंडल की ओर निहारता हूँ । मेरे मन का
भाव-लोक, उनकी सर्जनात्मक क्षमता का स्मरण का आनंदित होता है ।
तभी वे अपनी पहलवानी के संस्मरण सुनाते हैं........
“आरंभ
में मुझे पहलवानी का शौक था । स्कूली अध्ययन के दौरान एक
पहलवान से मेरा सामना हुआ । उसने मुझे आसमान दिखाया । स्कूली
था वह। वह चौंथे दर्जे तक पढ़ाई पूरी कर चुका था । उसका नाम
नारायण दुबे था । उसने माथा लड़ाया तो मुझे लगा कि चिनगारी
निकल रही है । वह हमीदपुर के अच्छे पहलवानों में गिना जाता था
। परास्त होने के बाद मैंने उसका रहस्य मालूम किया तो पता चला
कि वह मिट्टी के टायल्स तोड़ता था । शुरू-शुरू में मैंने कच्ची
ईँटें तोड़ीं । बाद में पक्की ईँटें तोड़ना मेरे लिए सहज साध्य
लगने लगा । उस समय मेरी अवस्था सोलह की रही होगी, वह बीस वर्ष
का था । अगले साल मैंने उसे न केवल आसमान दिखाया, बल्कि मेरे
सिर की चोट से वह बेहोश हो गया । तब फिर मेरी पहलवानी में धाक
जम गई । बाद में ईँटें तोड़ना इसलिए बंद कर दीं कि अस्वस्थता
होती है, बहरापन भी आने लगता है । पहलवानी के समय पाँच सौ दण्ड
और एक हज़ार बैठकें नियमित रूप से करता था । बाद में बैठकें
छोड़ दीं । और दौड़ने तैरने का कार्य करता रहा ।”
पहलवानी छोड़ने के बारे में मैंने कवि त्रिलोचन से कारण जानना
चाहा । उन्होंने कहा-
“
पहलवानी मैंने इसलिए छोड़ दी कि पहले बाजी की कुश्ती होती थी,
वज़न की नहीं । दोस्तपुर कस्बे के बग़ल में सहागीया गाँव का
दंगल था । आख़िरी कुश्ती के लिए एक पंजाबी ललकार रहा था । वह
मुंडा था । उसने बाल कटा दिए थे । वह कर रहा था
–
‘कोई
माई का लाल है।’
मैंने उसकी चुनौती स्वीकार की । मैं अधिक से अधिक सत्तर किलो
का था, वह तीन-चार मन का था । वह लंबा-चौड़ा था, बलशाली भी था
। आसमान न दिखा पाया वह, बराबरी पर छूटी कुश्ती । जब वह विजय
प्राप्त न कर सका तो उसने रंदा मारा । कुछेक क्षणों के लिए मैं
बेहोश हो गया । रंदा मारना कुश्ती की बेईमानी थी । जानता था,
लेकिन मैं ख़ुद नहीं मारता था । पहलवानी इसलिए भी छोड़ दी कि
अर्थाभाव भी अधिक था । अपने बलबूते पर कितना ख़र्च कर पाता ।
मैं सेर भर भिगोये चने तथा चालीस-पचास रोटियाँ खा लेता था।”
कालांतर में पहलवानी छोड़ दी । मेरे शिष्यों ने भी मुझसे कहा
कि ‘गुरु
जी, आप हमें पहलवानी के विषय में सिखाते रहिए ।’
मैंने कुछ दिन बाद यह भी छोड़ दिया । कुश्ती पर मैंने बहुत-सी
किताबें पढ़ीं । बंगला में ढेरों पुस्तकें पढ़ी हैं । बंगाल का
एक पहलवान था, वह कई भाषाएँ जानता था । छपरे का पहलवान
वंशूसिंह था । इंदौर का पहलवान कीकर सिंह था । छपरे का और
इंदौर का आधा-आधा पैसा लेते थे । ये झूठी कुश्ती लड़ते थे ।
अच्छे खिलाड़ी यदि बेईमान हो जायँ, तो पूरी टीम हार जाएगी।
इसी क्रम में अटूट वाक्य-विन्यास के प्रवाह को सुव्यवस्थित
करते हुए त्रिलोचन अपना सॉनेट सुनाते हैं-
मित्रों, मैंने साथ तुम्हारा कब छोड़ा था
जब मैं हारा थका नहीं था, लेकिन मेरा
तन भूखा था मन भूखा था, तुम ने टेरा
उत्तर मैंने दिया नहीं तुमको
:
घोड़ा था
तेज़ तुम्हारा, तुम्हें ले उड़ा. मैं पैदल था,
विश्वासी था
‘सौरज
धीरज तेहि रथ चाका’
जिस से विजय श्री मिलती है और पताका
ऊँचे फहराती है. मुझे में जितना बल था
अपनी राह चला आँखों में रहे निराला,
मानदंड़ मानव के तन के मन के, तो भी
पीस परिस्थितियों ने डाला. सोचा, जो भी
हो, आँखों की करुणा का यही शीतल पाला
मन को हरा नहीं करता है. पहले खाना
मिला करे तो कठिन नहीं है बात बनाना.
उनकी थकान और अस्वस्थता को देखकर मैं उन्हें बिस्तर पर लिटाता
हूँ । उनके जीवन-दर्शन की शुचिता तथा कर्त्तव्य की उदात्तीकृत
चेतना का बोध होते ही मुझे उन्हीं की पंक्तियाँ ध्यान में आती
हैं-
“कवि,
ऋषि, देव आदि पीछे हो मानव पहले,
ऐसे रहो कि धऱती बोझ तुम्हारा सह ले
”
मैं चलने को उद्यत होता हूँ । मेरी मानसिक हलचल को भाँप कर वे
बिस्तर से उठने का प्रयास करते हैं । मैं उन्हें सहारा देता
हूँ । मेरे मना करने के बावजूद वे घर के बाहर तक आते हैं । मैं
उनके चरण छूता हूँ । गली के कोने तक पहुँचते-पहुँचते मैं कई
बार पीछे मुड़कर देखता हूँ । क्या दृश्य है, त्रिलोचन मुझे देख
रहे हैं और मैं उन्हें देख रहा हूँ । भारी मन से मैं आगे बढ़ता
हूँ ।
डॉ. राजेश कुमार
प्राध्यापक, हिंदी विभाग
पी.सी. बागला (पीजी) महाविद्यालय
हाथरस, उत्तरप्रदेश
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