|
डॉ. महावीर अग्रवाल, हिंदी की जानी-मानी त्रैमासिक
लघु-पत्रिका 'सापेक्ष'
के संपादक हैं । दुर्ग, छत्तीसगढ़ में रहते हैं । उन्होंने त्रिलोचन जी से पिछले दो
दशकों में कम से कम दर्ज़नों बार भेंट की । बतियाया । साथ-साथ कई दिन गुज़ारे,
त्रिलोचन जी से जैसा उनका आत्मीय संबंध था शायद ही किसी और लघु-पत्रिका के संपादक
से । उन्होंने कम से कम 8 साक्षात्कार लिये हैं इनमें से कई पत्रिकाओं में प्रकाशित
भी हैं । हम यहाँ उनके कई साक्षात्कारों में से ख़ास-खास प्रश्नों के उत्तर यानी
संपादित अंश यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, आशा है उनके व्यक्तित्व और कृत्तित्व को
समझने का पर्याप्त सुविधा मिलेगी ।- संपादक
-
आपने
सॉनेट लिखना कब प्रारंभ किया
?
- मैंने 1935 में सॉनेट लिखना प्रारंभ किया और
1940 तक लिखता रहा । फिर नौ साल तक सॉनेट नहीं लिखे । उसके बाद
1949 और 1955 में सॉनेट पर काम किया । और फिर 1962 में सॉनेट
लिखे। इसी क्रम में 1975 में भी थोड़े से सॉनेट लिखे । यात्रा
तो चलती रही है भाई ।
-
हिंदी और संस्कृत में छंद, चौपाई, दोहा, रोला और कुंडलियों की
बहुत समृद्ध परंपरा रही है । इतना सब होते हुए भी आपने
'सॉनेट'
छंद क्यों अपनाया ?
-
'सॉनेट'
छंद नहीं है । हमने सॉनेट इसलिए लिया क्योंकि काव्य के साथ
इसमें अनुशासन बराबर बना रहता है । और यदि कोई वस्तु अच्छी है
तो वह कहीं की भी हो, उसके इस्तेमाल में मैं कोई बुराई नहीं
समझता । भोजन, खान-पान और पहनावा भी कई ऐसा है जो बाहर से
आये(आलू, टमाटर, अमरुद, पपीता, दाई, सलवार) और हमारी सभ्यता के
अँग बन गये । मैं पहनावे और दूसरे क्षेत्रों में विदेश की
अच्छी वस्तुओं के उपयोग का पक्षधर हूँ । रोला की तरह मैंने
अपने सॉनेटों को देशी रंग देने का प्रयास किया है । फिर हिंदी
में सॉनेट लिखना मैंने प्रारंभ नहीं किया । जयशंकर प्रसाद और
लोचन प्रसाद पांडेय ने हिंदी में सॉनेट की शुरुआत की । परंतु
उनके सॉनेट पढ़ने से ऐसा लगता है कि वे सॉनेट के आंतरिक संगठन
को पकड़ नहीं पाए । इसके साथ ही नरेन्द्र शर्मा, बच्चन, और
निराला ने भी सॉनेट लिखे हैं ।
-
हिंदी में सॉनेट के रूपविधान के बारे में बताइए । और यह भी
बताएँ कि हिंदी में सॉनेट की संभावना आप किस रूप में देखते हैं
?
- सबसे बड़ी बात मैं मानता हूँ बिषय का
निर्वाह । हिंदी में अँग्रेज़ी सॉनेट का कोई असर नहीं है ।
प्रभाव नहीं है । शेक्सपीयर के सॉनेट में यह पाबंदी रही है कि
एक अनुप्रास एक कही बार आयेगा । अन्त्यानुप्रास उस सॉनेट में
दुबारा न आये यह उसकी शर्त है । परंतु शेक्सपीयर स्वयं इस शर्त
का निर्वाह नही कर सके । इसलिए जो अँग्रेज़ी के सॉनेट पढ़ेंगे
वे जान सकेंगे कि हिंदी में मैंने सॉनेट का नवीनीकरण किया है ।
मैंने लगभग एक हज़ार सॉनेट लिखे । सात सौ के आसपास सॉनेट छपे ।
बाक़ी ग़ुम गये । हिंदी में भी इतने सॉनेट और किसी ने नहीं
लिखे । अँग्रेज़ी में भी वर्डस्-वर्थ के सॉनेट पाँच सो तीस हैं
। जहाँ तक हिंदी में सॉनेट की संभावना का प्रश्न है लिखने वाले
कम ही नज़र आते हैं । केदारनाथ, दामोदर आदि ने सॉनेट लिखे हैं
परंतु विधा कठिन है । अनुवाद का काम हुआ है । रामबहादुर सिंह
ने सॉनेट की एक किताब छपा दी । गुलाब खंडेलवाल गायक हैं और
अच्छे कवि हैं । परंतु हिंदी में सॉनेट की संभावना बहुत धुँधली
पड़ चुकी है ।
-
'गुरु कीजै जानकर, पानी पीजै छानकर'
आपने कहा है । इसके साथ ही, आपने कई बार स्वीकार किया है,
'तुलसी मेरे काव्य गुरु हैं ।'
आपने तुलसीदास को किस तरह जाना है ?
- तुलसी अपनी स्वाभाविकता के कारण मेरे
काव्य-गुरु हैं । गुरु को माँ के समान होना चाहिए । और तुलसी
को जैसे-तैसे मैं पढ़ने लगा उन्होंने मुझे अँगुली पकड़कर चलना
सिखाया । जब मैं बहुत छोटा था, मीरा, सुर, तुलसी और कबीर के पद
दादी गाया करती थीं । पिता जी पूजा के समय रामचरित मानस का पाठ
करते थे और मैं बचपन से ही उनके पास बैठकर ध्यान से सुना
करता था । मुझे बहुत अच्छा लगता था । तुलसी को निरंतर पढ़ते
हुए, समझते हुए अच्छे संस्कार विकसित होते हैं । 'मानस'
को पढ़ते हुए मन इतना रमा कि आधी से अधिक 'मानस'
कंठस्थ हो गई । बिम्बों और प्रतीकों में गुँथी आलंकारिक भाषा
का अर्थ पहले देर से समझ में आता था । अब भाव जब खुलने लगते
हैं तो मैं मुग्ध हो जाता हूँ । तुलसी से मैंने जीने की कला भी
सीखी है ।
-
◙◙◙
|