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सृजनगाथा

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

बातचीत दो दशकों की


महावीर अग्रवाल

 

डॉ. महावीर अग्रवाल, हिंदी की जानी-मानी त्रैमासिक लघु-पत्रिका 'सापेक्ष' के संपादक हैं । दुर्ग, छत्तीसगढ़ में रहते हैं । उन्होंने त्रिलोचन जी से पिछले दो दशकों में कम से कम दर्ज़नों बार भेंट की । बतियाया । साथ-साथ कई दिन गुज़ारे, त्रिलोचन जी से जैसा उनका आत्मीय संबंध था शायद ही किसी और लघु-पत्रिका के संपादक से । उन्होंने कम से कम 8 साक्षात्कार लिये हैं इनमें से कई पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हैं । हम यहाँ उनके कई साक्षात्कारों में से ख़ास-खास प्रश्नों के उत्तर यानी संपादित अंश यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, आशा है उनके व्यक्तित्व और कृत्तित्व को समझने का पर्याप्त सुविधा मिलेगी ।- संपादक

 

- आपने सॉनेट लिखना कब प्रारंभ किया ?

- मैंने 1935 में सॉनेट लिखना प्रारंभ किया और 1940 तक लिखता रहा । फिर नौ साल तक सॉनेट नहीं लिखे । उसके बाद 1949 और 1955 में सॉनेट पर काम किया । और फिर 1962 में सॉनेट लिखे। इसी क्रम में 1975 में भी थोड़े से सॉनेट लिखे । यात्रा तो चलती रही है भाई ।

 

- हिंदी और संस्कृत में छंद, चौपाई, दोहा, रोला और कुंडलियों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है । इतना सब होते हुए भी आपने 'सॉनेट' छंद क्यों अपनाया ?

- 'सॉनेट' छंद नहीं है । हमने सॉनेट इसलिए लिया क्योंकि काव्य के साथ इसमें अनुशासन बराबर बना रहता है । और यदि कोई वस्तु अच्छी है तो वह कहीं की भी हो, उसके इस्तेमाल में मैं कोई बुराई नहीं समझता । भोजन, खान-पान और पहनावा भी कई ऐसा है जो बाहर से आये(आलू, टमाटर, अमरुद, पपीता, दाई, सलवार) और हमारी सभ्यता के अँग बन गये । मैं पहनावे और दूसरे क्षेत्रों में विदेश की अच्छी वस्तुओं के उपयोग का पक्षधर हूँ । रोला की तरह मैंने अपने सॉनेटों को देशी रंग देने का प्रयास किया है । फिर हिंदी में सॉनेट लिखना मैंने प्रारंभ नहीं किया । जयशंकर प्रसाद और लोचन प्रसाद पांडेय ने हिंदी में सॉनेट की शुरुआत की । परंतु उनके सॉनेट पढ़ने से ऐसा लगता है कि वे सॉनेट के आंतरिक संगठन को पकड़ नहीं पाए । इसके साथ ही नरेन्द्र शर्मा, बच्चन, और निराला ने भी सॉनेट लिखे हैं ।

 

- हिंदी में सॉनेट के रूपविधान के बारे में बताइए । और यह भी बताएँ कि हिंदी में सॉनेट की संभावना आप किस रूप में देखते हैं ?

- सबसे बड़ी बात मैं मानता हूँ बिषय का निर्वाह । हिंदी में अँग्रेज़ी सॉनेट का कोई असर नहीं है । प्रभाव नहीं है । शेक्सपीयर के सॉनेट में यह पाबंदी रही है कि एक अनुप्रास एक कही बार आयेगा । अन्त्यानुप्रास उस सॉनेट में दुबारा न आये यह उसकी शर्त है । परंतु शेक्सपीयर स्वयं इस शर्त का निर्वाह नही कर सके । इसलिए जो अँग्रेज़ी के सॉनेट पढ़ेंगे वे जान सकेंगे कि हिंदी में मैंने सॉनेट का नवीनीकरण किया है । मैंने लगभग एक हज़ार सॉनेट लिखे । सात सौ के आसपास सॉनेट छपे । बाक़ी ग़ुम गये । हिंदी में भी इतने सॉनेट और किसी ने नहीं लिखे । अँग्रेज़ी में भी वर्डस्-वर्थ के सॉनेट पाँच सो तीस हैं । जहाँ तक हिंदी में सॉनेट की संभावना का प्रश्न है लिखने वाले कम ही नज़र आते हैं । केदारनाथ, दामोदर आदि ने सॉनेट लिखे हैं परंतु विधा कठिन है । अनुवाद का काम हुआ है । रामबहादुर सिंह ने सॉनेट की एक किताब छपा दी । गुलाब खंडेलवाल गायक हैं और अच्छे कवि हैं । परंतु हिंदी में सॉनेट की संभावना बहुत धुँधली पड़ चुकी है । 

 

- 'गुरु कीजै जानकर, पानी पीजै छानकर' आपने कहा है । इसके साथ ही, आपने कई बार स्वीकार किया है, 'तुलसी मेरे काव्य गुरु हैं ।' आपने तुलसीदास को किस तरह जाना है ?

तुलसी अपनी स्वाभाविकता के कारण मेरे काव्य-गुरु हैं । गुरु को माँ के समान होना चाहिए । और तुलसी को जैसे-तैसे मैं पढ़ने लगा उन्होंने मुझे अँगुली पकड़कर चलना सिखाया । जब मैं बहुत छोटा था, मीरा, सुर, तुलसी और कबीर के पद दादी गाया करती थीं । पिता जी पूजा के समय रामचरित मानस का पाठ करते थे और मैं बचपन से ही  उनके पास बैठकर ध्यान से सुना करता था । मुझे बहुत अच्छा लगता था । तुलसी को निरंतर पढ़ते हुए, समझते हुए अच्छे संस्कार विकसित होते हैं । 'मानस' को पढ़ते हुए मन इतना रमा कि आधी से अधिक 'मानस' कंठस्थ हो गई । बिम्बों और प्रतीकों में गुँथी आलंकारिक भाषा का अर्थ पहले देर से समझ में आता था । अब भाव जब खुलने लगते हैं तो मैं मुग्ध हो जाता हूँ । तुलसी से मैंने जीने की कला भी सीखी है ।

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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