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सृजनगाथा

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

एक दृष्टि में अनेक व्यक्ति


त्रिलोचन

 

स्मृति-लेखा ऐसे व्यक्तियों पर लिखी गई है जो स्मृतिशेष हो गए हैं। स्मृतिशेष व्यक्तियों की अनेक कोटियाँ हो सकते हैं। जो अपने परिवार की ही स्मृति में शेष हों और परिवार भी काल पा कर अपनी स्मृति के क्षेत्र से उन्हें मुक्त कर चलते हैं। इन लोगों की कृतित्व-सीमा परिवार के दायरे से बाहर नहीं जाती। उनके बैर-विरोध और मेलजोल शेष समाज से संबद्ध हो सकते हैं। लेकिन उनका शेष समाज से अनुकूल संबंध नगण्य या उपेक्षणीय हो सकता है। ऐसे लोगों से ज़रा भिन्न, वे लोग हो सकते हैं जो स्वहित के साथ परहित का भी ध्यान रखें। यह परहित उन को अपने दायरे के अंदर कुछ दिन के लिए स्मृति में रखता है।

 

अनेक ऐतिहासिक कहे जाने वाले व्यक्ति आज स्मृति के अंग नहीं है। उन को हम इतिहास के संदर्भ से ही पढ़ कर जानते हैं। वे सामान्य जन-जीवन के अंग अब नहीं हैं। अतीत का अनुसंधान करने वाले कुछ रचनाकारों का भाव-संबंध उन में पाया जा सकता है, या यह संबंध सामयिक जीवन-प्रश्नों के विनियोजन के कारण ही पाठकों की समझ में आता है।

 

अज्ञेय ने जिन स्मृतिशेष व्यक्तियों पर लेखनी चलाई है वे कृतिशेष भी हैं। ऐसे व्यक्ति सामान्य पाठकों के लिए जिज्ञास्य हो सकते हैं। यदि उनका स्वाध्याय उनके आस्वाद को कृति के अनुकूल रखता है तो वे आनंद भी पा सकते हैं। रचनाकार अद्यतनीनता के संदृब्ध विकास का अभिलाषी और प्रयासी होने पर अतीत साहित्य और साहित्यकार का परिशीलन भी अपने लिए अनिवार्य करेगा।

 

स्मृति-लेखा में अज्ञेय ने सरोजनी नायडू को छोड़ कर हिंदी साहित्यकारों पर ही स्मृति-लेख तैयार किए हैं : स्मृति-लेख का यहाँ वह अर्थ नहीं जिसे संस्कृत में चरमश्लोक या अँग्रेज़ी मेंएपिटाफ़ कहते हैं। इसमें अज्ञेय इन साहित्कारों पर विचार करते हुए अपने अलगाव को कहीं स्पष्ट कहीं अस्पष्ट दे जाते हैं। ये लेख तात्विक विवेचन अथवा समीक्षा के अंतर्गत नहीं आएँगें। इन में सहमति और विमति दोनों का संतुलित और संक्षिप्त वर्णन आ जाता है। फिर भी ये व्यक्ति-निर्भर ललित निबंध है। निबंधों के शीर्षक सब के सब विशेषणों में हैं : क्रम-सूची में सामान्य पाठकों के विचार से छोटे कोष्ठक में व्यक्तियों के नाम दिए गए हैं। ये विशेषण यदि सर्वत्र अर्थप्रकाशक होते तो नामों को देने की आवश्यता न पड़ती । कुछ विशेषण सर्वविदित हैं जैसे-भारत कोकिला, सरोजनी नायडू के लिए, राष्ट्रकवि, मैथिलीशरण गुप्त के लिए, उपन्यास सम्राट, प्रेमचंद के लिए, वसंत का अग्रदूत, निराला के लिए, बीसवीं सदी का वाणभट्ट, हजारीप्रसाद द्विवेदी के लिए, कुछ विशेषण लेखक की निजी रुचि या धारणा को व्यक्त करते हैं। अर्थात् उनकी जातीय स्वीकृति संदिग्ध है। सुमित्रानंदन पंत के लिए स्वर-सिद्ध, दिनकर के लिए समय-सूर्य, बालकृष्ण शर्मा नवीन के लिए असीम और ससीम के बीच, एक भारतीय आत्माः एक चुनौती यह पूरा विशेषण, (माखनलाल चतुर्वेदी) सर्वेविदित और सर्वमान्य है;  विशेषतया कवि-समाज में। इसमें नाम देना अधिक सार्थक नहीं। सारी किताब पर रिव्यू न कर के मैं वसंत का अग्रदूत की ही चर्चा उचित मानता हूँ । हिंदी के सुमनों के प्रति कविता में एक पंक्ति आती है- मैं ही वसंत का अग्रदूत । स्मृति-लेखों का विशेषण इसी पंक्ति से लिया गया है। हिंदी में आलोचकों, समीक्षकों द्वारा यह पंक्ति इसी आशय से उद्धृत हुई है और होती रही है। लोग अग्रदूत को गौरव का स्थान देते हैं। यहाँ वसंत का अग्रदूत पतझर को कहा गया है। पतझर साफ़ है कि ह्वास अर्थ देता है। चमत्कार उन लोगों का है जिन्होंने ह्वास को गौरव मान लिया है। रचनाकार होते हुए, अज्ञेय भी इस दलदल से निकल नहीं पाए; नहीं तो यह कैसे लिख देते....दूसरी ओर दृढ़ विश्वासपूर्वक हिंदी के सुमनों के प्रति संबोधित हो कर एक आहत किंतु अखंड आत्मविश्वास के साथ यह भी कह सकते थे, मैं ही वसंत का अग्रदूत। स्पष्ट है कि यहाँसंबोधित नहीं है, और वे संबोधन भी नहीं करते । संबोधन कोई और कर रहा है।

 

निराला के तुलसीदास काव्य की उन्होंने प्रशंसा की है। उनकी उद्धृत तुलसीदास की दो पंक्तियाँ

यह जागा कवि अशेष छविधर / इसका स्वर भर भारती मुखर होयेंगी

इसमें ऊपर की एक पंक्ति छोड़ दी गई है वह पंक्ति है-देशकाल के शर से बिंध कर। पंक्तियों का चुनाव, जान पड़ता है, लेखक ने जानबूझ कर किया है। उद्धरण अपूर्ण है, और उचित नहीं।

 

तुलसीदास, पुस्तकाकार प्रकाशित होने पर, उन्होंने 1938 में पढ़ा। हिंदी पत्रिकाओं के पाठक जानते हैं कितुलसीदास सुधा (मासिक) में 1934 और 1935 के पाँच अंकों में प्रकाशित हुआ था । किताब 1938 में छपी।

 

स्मृति-लेखा के सभी निबंधों में लेखक सहानुभूतिशील मिलता है, विरोध से भरसक वह बचा है, कहीं उसकी शारीरिक या रचनात्मक प्रशंसा हुआ है तो उसे भी देता चलता है। यही कारण है कि मैंने इन निबंधों को ललित निबंध माना ।

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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