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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

निराला का जन्मकाल


त्रिलोचन

 

 (त्रिलोचन ने यह विचार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग में प्रगट का था तब वे वहाँ पोईट ऑफ केंपस की हैसियत से रह रहे थे । वहाँ पदस्थ प्रो. जैदी के विशेष आग्रह से उन्होंने विद्यार्थियों के समक्ष यह विचार रखा था । उनका निराला जी के साथ घनिष्ठ संबंध था । बड़ी आत्मीयता थी । वे उन्हें बहुत नज़दीक से जानते थे। इतना ही नहीं उनकी कविताओं पर स्वयं निराला से बहुत बातचीत होती रही थी । प्रो. जैदी का तो यहाँ तक मानना था कि निराला के व्यक्तित्व और उनकी रचनाओं को जितना निकट से त्रिलोचन जी जानते रहें हैं उतना निराला के अन्य आलोचक शायद न समझ सके हों । - संपादक)

 

निराला के जन्म पर थोड़ा विवाद है । उनके परिचय में सबसे पुराना संकलन उनकी कविता थी । रामधर त्रिपाठी ने उसमें 1955 लिखा है । तो जब वे 195 विक्रम संवत् में पैदा हुए तो लगभग ये माना जाए कि उनका जन्म 1897 ई. में हुआ । विक्रमसंवत् और ईसवी सन् में 57 साल का अंतर है । डॉ. रामविलास शर्मा ने माना है कि वे सन् 1899 ई. में पैदा हुए । लेकिन निराला की बहुत-सी कविताएँ तथा और कई चीज़ें सबूत के तौर पर देखते हुए मुझे लगता है कि निराला 1897 में ही पैदा हुए होंगे । 1899 मानने का कोई कारण नहीं । रामविलास शर्मा ने माना कि निराला का नाम सातवें दर्ज़े में लिखाया गया । जिसने घर पर कुछ पढ़ा लिखा न हो वह लड़का पढ़ने में अच्छा नहीं होगा । इसलिए पढ़ाई में वो कमज़ोर निकले । उस समय उल्टी गिनती चलती थी । सातवाँ दर्ज़ा उस दर्जे का नाम था जो अब थर्ड क्लास कहा जाता है । सातवें के बाद छठा, पाँचवा, चौंथा, तीसरा, पहला । इसके बाद मेट्रकिलेशन की परीक्षाएँ चलती थीं उसके बाद ये बदल गईं ।

 

तो निराला का जन्मकाल 1897 ई. मानिए या 1899 ई. मानिए दो साल का अंतर है। निराला पर सहज लिखा है कि मेरी पहली कविता जूही की कली सन् 1916 में लिखी गई । ये छपी है तो सबूत मिलता है कि जूही की कली गोरखपुर में गयाप्रसाद शुक्ल के पत्र में छपी । निराला के कई लेख भी उनके अंकों में छपे हैं । बाद में गोरखपुर में प्रशिक्षा ले रहे थे मिडल हिंदी उर्दू दोनों में पास थे । और वहां रहकर ट्रेनिंग ली और ट्रेनिंग लेकर वे अपने जिले उन्नाव में आए और उन्नाव में उन्होंने पत्र निकाला और बाद में तुलसीकविराम से निकाला ।

 

निराला जी की पचासवीं वर्षगाँठ सन् 1947 में मनाई गई । इसके आयोजन में दो व्यक्ति थे। एक तो नंददुलारे बाजपेयी थे । उनके नाम से प्रचारपत्र आदि छपे हुए थे और दूर-दूर से साहित्यकार बुलाए गए थे । नंददुलारे बाजपेयी का नाम मुख्य संयोजक के रूप में था । दो या तीन दिन का उत्सव बनारस में हुआ था । हॉल में नृत्य का भी आयोजन हुआ था और नृत्य के अलावा कुछ नाटकीय प्रदर्शन भी हुआ था तो इसमें नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के लोग आए थे। बड़ी गंभीरता से मनाया गया । दूसरे सज्जन जो सहयोगी थे जिनके विद्यालय से प्रचार हुआ उनका नाम था गंगाधर मिश्र ।

 

       गंगाधर मिश्र की कई किताबें छपी हैं । गीतिकाव्य पर भी उन्होंने काम किया है, निराला पर भी उनकी दो-एक किताबें छपी हैं और उन्हीं के यहाँ निराला ने रहते हुए विनय और अखंडित रामचरितमानस पर लिखा जहाँ विनय का समापन होता है । इसका उन्होंने आधुनिक हिंदी में रूपांतर किया था यह भी पुस्तक के आकार में । उनके यहाँ भाषा विद्यालय से प्रकाशित हुआ था । तो तुलसीदास को उन्होंने आधुनिक हिंदी के कवि के रूप में प्रस्तुत किया । इस तरह के काम अँग्रेज़ी के कवियों के लिए तो बराबर किए गए । माडर्नाइज्ड उसांचर हैं माडर्नाइज्ड स्पेंसर हैं माडर्नाइज्म इंग्लिश में बहुत से वे लोग जिनके यहाँ बहुत से इंग्लिश के लोग आकर पढ़ते हैं । ग्रोवर नाम का एक पोईट हुआ है 1964 में उन सबका उल्लेख भी उसमें आता है । हमारे यहाँ अभी जो व्यंय भाषा रूप मिलते हैं उनका आधुनिक हिंदी में रूपातंर करने की प्रवृत्ति बहुत से लोगों को ये चीज़ अच्छी नहीं लगती । बहरहाल निराला ने जो बहुत या थोड़ा काम किया उसको भी बहुत से लोगों ने यह समझा कि उनके पागलपन के लक्षणों में यह भी एक लक्षण है । अच्छा अब निराला की जयंतियाँ जो मनाईं गईं वो भी पंचमी को मनाईं गईं । कविता का ज़िक्र जो मैंने पहले किया उसमें उनका जो जन्मकाल लिया गया है, वह माघ शुक्ल एकदशी 1955के क़रीब संवत् है जो 1897 ई. होता है ।  माघ शुक्ल एकादशी होने से बसंत पंचमी को मनाने लगे । कहते हैं कि ये सुधा में काम कर रहे थे तो बसंत पंचमी के दिन गुलाबराय भार्गव का जन्म हुआ था और बसंत पंचमी के दिन उत्सव होता था और उनके यहाँ सब लोग आते थे।

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