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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। कविता ।।

 

 

शरद रंजन शरद की दो कविताएँ

 

बीस सौ पचास

भर रहा हूँ
देह और धरती के
हर चुल्लू में पानी

नहीं तो आधे
पड़ जाएँगे प्यास के माथे

रख रहा हूँ आग
बचा-बचाकर
हर जली हुई तीली के साथ
क्योंकि प्रकाश की कई पीढ़ियाँ
लेने जा रही है संन्यास

साँसों से चुरा-चुराकर
हवा को रोके रखा है फेफड़ों में
प्राण और वायु का रिश्ता
छूट जाने वाले दिनों के लिए

कंकरीट हो रही सतह को
कुरेद-कुरेदकर
जमा की है मिट्टी
सारे के सारे नाख़ूनों में
कि रेत होने जा रहा है
इस जीवन का सबकुछ

आकाश के कुछ रूमाल
रखने हैं कई-कई साल
जब तलवों को आएगी नींद
चलते-चलते कहीं टिककर
सपने देखने होंगे इन्हीं पर

अरबों पैरों से लग-लगकर
फट रही पृथ्वी की बिवाइयों में
भर रहा हूँ मोम-सा विश्वास
कि देख सके यह दुनिया
सन् बीस सौ पचास !

 

इसी पृथ्वी पर

इसी पृथ्वी पर
इतने सारे जीव
आदमी पशु-पक्षी कीट-पतंग
जीवन के ढेर सारे रंग

पृथ्वी पर ही
पहाड़ पानी आग
उसकी मिट्टी और आकाश

इसी पर
बारिश में जैसे छाता ताने हुए
ग्रह नक्षत्र

बिखरी आकाशगंगा
घेरता अनन्त
यहीं पुण्य और पाप
जन्म इसी पर
यहीं अवसान

इसी धरणी को
सिर आँखों पर बिठाये शेषनाग
अगोरे दिकपाल
गिरे नहीं फिर भी
झुके नहीं इसका माथ
थामे हुए इसको
गर्भ से ही अनवरत
मेरे दो हाथ।

 

   शरद रंजन शरद

  ◙◙◙

 

हिंदी कविता

- नंद चतुर्वेदी

- शरद रंजन शरद

- शीला गुजराल

-  डॉ. राजेन्द्र सोनी

 

 

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