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सृजनगाथा

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 सबका अपना आकाश (गीत संग्रह)

 कविता क्रम

 
2

 

चाँदनी रात, नीरव तारे

 

चाँदनी रात, नीरव तारे, मैं एकाकी, पथ सोया है

 

सन्नाटा है या कुहरा है

बढ़ता जाता है गहरा है

इस कुहरे का ही पहरा है

दिन में जो जग था खुल खुला इस श्वेत लहर में खोया है

 

चलती है बवा टहरती है

पत्तों को चंचल करती है

जड़ता पेड़ों की हरती है

स्वर जगता है सो जाता है जिस को दरणी ने बोया है

 

उटती है मन की मौन लहर

धीरे धीरे कुछ ठहर ठहर

भटकी सी पथ पर सिहर सिहर

कुछ चित्रों में कॉच गीतों में सारा इतिहास सँजोया है

 

साँसों की ध्वनि सुन पड़ती है

अपनी ही वॉदी क्या अड़ती है

प्राणों में जा कर गड़ती है

दो ही पैरों की ध्वनि सुनकर किस ने यह जीवन ढोया है

 

  (रचना-काल - 30-11-49)

 ◙◙◙

 

बादल घिर आए

 नवजीवन के सिंहद्वार पर

फूलों भरी राह मिलती कहाँ है

मैं दीप जलाती हूँ

राका आई

शरद का यह नीला आकाश

दीप जलाओ

हरा भरा संसार है

अनोखी यह परिचित मुस्कान

हो गया मुझको विश्वास

गाओ गाओ गान

श्वास श्वास में गान

गान बन कर प्राण

आँसुओं में इस हृदय का

कब कटी है

तुम चले, चलते रहे

एक मधु मुसकान से

आ गई है रात

व्यूह बनते है दलों के

जो उठाई है ध्वजा

कौन विजयी है

अभी चला क्या

मुझको संदेश मिला है

मुझे बुलाता है पहाड़

सो गया था दीप

जोत नई उकसाओ

फूल देखा विजन में

खो गई थी गूँज

आ रही है दूर की

  स्निग्ध श्याम घन की छाया है

 

जब देखा सौंदर्य

मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूँ

हे अनन्यगीत

स्नेह मेरे पास है

चाँदनी रात, नीरव तारे

मैंने भूलों पर भूले की

जीवन स्मृति के पथ

याद रहेगा

उषा आ रही है

न जाने हुई बात क्या

मुझे लगता है

धीरे धीरे पुरवैया लहरानेलगी

संभावनाएँ

आई जो हार

अभिनंदन

मैं तुम्हारा

बीन बजाओ

आँसू बाँधे है मैंने

मैं क्या क्या

दियना छू के तुम जगा दो

तूने आई लुटा दी अबोध

गाओ वही गीत कल के

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