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सृजनगाथा

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 सबका अपना आकाश (गीत संग्रह)

 कविता क्रम

 
2

 

हे अनन्य गति

 

हे अनन्य गति, दिवारात्रि हो चाहे सायं प्रात

 

उत्सव समारोह होते ही रहते हैं

सब अपने मन की धारा में बहते हैं

जीवन में समाज का गौरव गहते हैं

कह लेते हैं इन की उन की अपने मन की बात

 

हँसी और आसूँ से धरती भरी हुई

करती है श्रृंगार नई श्री हरी हुई

पत्ते पर दूब के ओस है धरी हुई

डरी हुई है किरण हवा का सहना है आघात

 

गीत फूल ये दो जीवन के दान हैं

साँसों की गति के सरगम है मान हैं

मन में समा गई सुषमा के ध्यान हैं

मधुर तान है व्योमविहारी पक्षी के, दिन रात

 

अस्थिरता है, स्थिरता की क्यों चाह है

जहाँ चाह है सुना है वहाँ राह है

किन्तु राह पर जब भी देखा आह है

साँसों से ही क्यों होता है साँसों का आघात

 

  (रचना-काल - 20-09-49)

 ◙◙◙

 

बादल घिर आए

 नवजीवन के सिंहद्वार पर

फूलों भरी राह मिलती कहाँ है

मैं दीप जलाती हूँ

राका आई

शरद का यह नीला आकाश

दीप जलाओ

हरा भरा संसार है

अनोखी यह परिचित मुस्कान

हो गया मुझको विश्वास

गाओ गाओ गान

श्वास श्वास में गान

गान बन कर प्राण

आँसुओं में इस हृदय का

कब कटी है

तुम चले, चलते रहे

एक मधु मुसकान से

आ गई है रात

व्यूह बनते है दलों के

जो उठाई है ध्वजा

कौन विजयी है

अभी चला क्या

मुझको संदेश मिला है

मुझे बुलाता है पहाड़

सो गया था दीप

जोत नई उकसाओ

फूल देखा विजन में

खो गई थी गूँज

आ रही है दूर की

  स्निग्ध श्याम घन की छाया है

 

जब देखा सौंदर्य

मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूँ

हे अनन्यगीत

स्नेह मेरे पास है

चाँदनी रात, नीरव तारे

मैंने भूलों पर भूले की

जीवन स्मृति के पथ

याद रहेगा

उषा आ रही है

न जाने हुई बात क्या

मुझे लगता है

धीरे धीरे पुरवैया लहरानेलगी

संभावनाएँ

आई जो हार

अभिनंदन

मैं तुम्हारा

बीन बजाओ

आँसू बाँधे है मैंने

मैं क्या क्या

दियना छू के तुम जगा दो

तूने आई लुटा दी अबोध

गाओ वही गीत कल के

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