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सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 सबका अपना आकाश (गीत संग्रह)

 कविता क्रम

 
2

  

एक मधु मसकान से

 

एक मधु मसकान से

लिख दो जगत की यह कहानी

यह नया पतझर, रहे झर

वे पुराने भाव वे स्वर

मिट रहे वे चित्र घन के

रवि गया जिन को बिरच कर

रात में जो स्वप्न देखा

पुष्ट जिस की भाव-रेखा

जा रही है रात तुम को मूर्ति है अपनी बनानी

 

रात में मन मन अलग थे

स्वप्न रचना में बिलग थे

ताल लय में नव उदय था

भिन्न भाषा भिन्न जग थे

अब उषा की स्निग्ध स्मृति में

एक सृति मे एक स्थिति में

एक भू पर भिन्न कृति में एक सरिता है बहानी

 

देश के ये बंध तोड़ो

जाति के ये बंध तोड़ो

वर्ण वर्ण खिले सुमन दल

रुचिर रुचिर सुंगध जोड़ो

रूप में हो तेज संचय

तेज में नव प्राण परिचय

सब बिराजें एक रचना में वही है पास लानी

 (रचना-काल - 31-10-48)

 ◙◙◙

 

बादल घिर आए

 नवजीवन के सिंहद्वार पर

फूलों भरी राह मिलती कहाँ है

मैं दीप जलाती हूँ

राका आई

शरद का यह नीला आकाश

दीप जलाओ

हरा भरा संसार है

अनोखी यह परिचित मुस्कान

हो गया मुझको विश्वास

गाओ गाओ गान

श्वास श्वास में गान

गान बन कर प्राण

आँसुओं में इस हृदय का

कब कटी है

तुम चले, चलते रहे

एक मधु मुसकान से

आ गई है रात

व्यूह बनते है दलों के

जो उठाई है ध्वजा

कौन विजयी है

अभी चला क्या

मुझको संदेश मिला है

मुझे बुलाता है पहाड़

सो गया था दीप

जोत नई उकसाओ

फूल देखा विजन में

खो गई थी गूँज

आ रही है दूर की

  स्निग्ध श्याम घन की छाया है

 

जब देखा सौंदर्य

मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूँ

हे अनन्यगीत

स्नेह मेरे पास है

चाँदनी रात, नीरव तारे

मैंने भूलों पर भूले की

जीवन स्मृति के पथ

याद रहेगा

उषा आ रही है

न जाने हुई बात क्या

मुझे लगता है

धीरे धीरे पुरवैया लहरानेलगी

संभावनाएँ

आई जो हार

अभिनंदन

मैं तुम्हारा

बीन बजाओ

आँसू बाँधे है मैंने

मैं क्या क्या

दियना छू के तुम जगा दो

तूने आई लुटा दी अबोध

गाओ वही गीत कल के

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