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चेहरे की बनावट में मुस्कान
संजीव बख्शी
(बस्तर की
एक यात्रा)
शादी
एक समझौता है,
शादी
एक प्रकार का बंधन है,
एक सामाजिक
आवश्यकता
है,
एक
ज़रूरत
है जो सबके लिए है गरीब,
अमीर सबके लिए । ये बातें आम तौर पर सुनने को मिलते रहती है ।
कितनी तो कसमें खांई
जाती है पर इससे क्या । मीता को ही लें दो साल हो गए हैं उनकी
शादी
को अब तक तू तू मैं मैं होते रहती है ।
जीवेश
न जाने किस बात पर पिनक जाए सब डरते रहते थे । मैं ससुराल आया
था कल ही वापस जाना था बस्तर परिवार लेकर । रायपुर से बस्तर
सड़क रास्ते से ही जाना होता है,
तीन सौ बीस किलो मीटर वह तो किसी तरह एक सूमो गाड़ी की व्यवस्था
हो गई थी। लगे हुए घर में मीता और दामांद जी आए थे ।
यूँ तो
पड़ोस
हमेशा शांत
हुआ करता था पर आज बवंडर मचा हुआ था । सुबह से ही मीता और
जीवेश
की तेज
आवाज़
लड़ने की सारी सीमाओं को तोड़ रही थीं
। न जाने मुझे क्या सूझा मैं उन्हें समझाने चला गया । मीता और
जीवेश
दोनों मुझे मानते थे पर अलग अलग । यह तो बीच पड़ने वाली बात थी
। न किसी ने भेजा था न किसी ने बुलाया था बस यूँही
चला गया था । किसी तरह दोनों को अलग किया,
जानने की
कोशिश
की कि बात क्या है,
पता चला कि दामांद जी आज ही वापस जाना
चाहते हैं और मीता एक
हफ़्ते
रूकना चाहती है । किसी तरह दोनों को
राज़ी
किया कि दोनों हमारे साथ आज बस्तर जाएँगे।
सुन रखा था कि
शादी
के बाद दोनों
हमेशा
लड़ते ही रहते हैं । बस्तर की वादियों को देख कर और अभी जब
बरसात की
शुरूआत
है देख-देख
कर दोनों का दिल भर आएगा,
यह दुनिया उनके झगड़े से भी बाहर है देखेंगे यह मेरा
विश्वास
था ।
बाक़ी
सब मेरी मासूमियत पर
हँस
रहे थे ।
सूमो में सामने की सीट पर हम लोग और पीछे की सीट पर मीता
जीवेश
और पीछे हमारे दोनों बच्चे बैठ गए सामान भी दोनों परिवार का
कुछ अधिक ही था पर सब व्यवस्थित हो गया था। रवाना होते हुए
सबने बाय कहा,
बाय कहते एक लड़ाई जीत ली हो ऐसा महसूस कर
रहा था । बीच की सीट में सन्नाटा था,
यह अभी उन दोनों के लिए
ज़रूरी
भी था । रायपुर से निकले एक घंटे हो रहे थे न मैनें उनसे बात
की न...ख़ैर
उनका तो कोई सवाल ही नहीं । मैनें तय कर लिया था कि कुछ कहना
नहीं है। देखते जाना है,
बस्तर की सीमा लगने में अभी दो घंटे और हैं कांकेर लगते ही
सुंदर-सुंदर
ग्रेनाइट पत्थर की पहाड़ियाँ
और जंगल लुभाना
शुरू
करेंगे फिर
केशकाल
घाटी का तो जवाब ही नहीं । तब तक मौसम भी इतना सुहाना हो जाएगा
कि
जीवेश
को इसकी
तारीफ़
में कुछ तो बोलना ही पड़ेगा । वह पहली बार बस्तर जा रहा था । हम
कांकेर से निकल रहे थे गोविंदपुर के आसपास की मेरी
फ़ेवरेट
पहाड़ियों के बारे में भी मैनें उनसे कुछ नहीं कहा,
दिखाया भी नहीं ।
शीशे
से बाहर वे पहाड़ियों को देख रहे थे पर कुछ कह नहीं रहे थे,
आँखें ख़ुद
पथराई हुई थी । वे एक सुंदर पहाड़ी को देखते उसके सामने एक
गुस्से से भरा पहाड़ खड़ा हो जाता ।
बच्चे पीछे सहमे सहमे बैठे थे,
केशकाल
की घाटी की
शुरूआत
हो चुकी थी कोई टस-से-मस
नहीं हो रहा था । मौसम निहायत ही खूबसूरत हो चुका था हल्की-सी
बारिश
हो रही थी
पहाड़ियों
पर कहीं-कहीं
कुछ बादल ठहर से गए थे,हेयर
पिन टर्निंग से यह
नज़ारा
और भी सुंदर लग रहा था। यह सब
यूँ
ही नहीं निकल देना चाहता था कि मुझे हल्की
आवाज़
सुनाई दी ।
''क्या
यह
केशकाल
की घाटी है
? ''सागौन
के बहुत पुराने झाड़
हैं
जबरदस्त हैं। मैं जानबूझकर चुप रहा सिर्फ
हाँ
कहने की मुद्रा में सिर हिला दिया । सब मन ही मन चाह रहे थे कि
मुझे बात आगे बढ़ानी चाहिए थी,
मुझे भी कम
ख़ुशी
नहीं हुई थी जब
जीवेश
ने
केशकाल
और सागौन का उच्चारण किया । एक बारगी ऐसा भी लगा कि घाटी और
सागौन के होने में मेरा बड़ा हाथ है। एक सफल
प्रशासनिक
अधिकारी की तरह मैं सारा मामला चतुराई से हैंडिल करना चाहता था
। फिर से सब के सब
शांत
हो गए थे ।
सच तो यह था कि घाटी का जादू पूरी तरह से चल चुका था ।
शांत
वातावरण में लगातार बादल का धीरे-धीरे
गर्जन करना बस्तर को सबसे अलग पहचान देता है । गर्जन की
आवाज़
लगातार आ रही थी । बीच बीच में बड़े गर्जन के बाद फिर लगातार
धीरे-धीरे
गर्जन एक संगीत का प्रभाव उत्पन्न कर रहा था । अंधकार गहराने
लगा था,
कोंडागांव में सबने चाय पी उसके बाद के
जंगल में घटाटोप अंधकार में
शीशे
के उसपार ढेर ढेर जुगनू ही दिख रहे थे । सबकी
आँखें
लग गई थी पता ही नहीं चला और हम जगदलपुर में सरकारी क्वार्टर
के पोर्च पर थे । आधी रात के मौसम में इस समय जो ठंडक थी वह
कहीं और की ठंडक से बिलकुल अलग थी मन को लुभाने वाली इस सब के
लिए मन-ही-मन
मैं उन बहुत उँचे-उँचे सभी झाड़ों का आभार मान रहा था जो अभी
अँधेरे
में नहीं दिख रहे थे । कल सुबह इसकी
ज़रूर
चर्चा होगी जब
जीवेश,
मीता बाहर निकलेंगे और बहुत बड़े कम्पाउंड के भीतर बड़े -बड़े
उँचे झाड़ों को देखेंगे सोचते हुए हम सब चुपचाप अंदर चले गए
बिस्तर पर जाते ही नींद लग गई ।
सुबह हम सब के सो कर उठने के पहिले
जीवेश
उठ गए थे बाहर टहल रहे थे झाड़ों नें अपनी उँचाई दिखा डाली थी
कि हम है बस्तर के झाड़ बंगले के बाजू से ही बस्तर क्लब का
एरिया
शुरू
हो जाता था वह भी घने वृक्षों से आच्छादित था । सामने विश्राम
गृह और बाजू से भंगाराम चौक यह सब एक साथ लुभावना
दृश्य
बनाता था कि कोई भी मंत्रमुग्ध हुए बिना
नहीं
रह सकता था । मेरे उठते ही उनकी बातें
शुरू
हो गई जिनमें कल रात की भी बात षामिल थी । ऐसे वृक्ष तो मैनें
कभी देखे नहीं थे । ये तो कुछ भी नहीं मैनें जोड़ा ये
शहर
के वृक्ष हैं
,कल
चलेंगे दंतेवाड़ा की ओर तीरथगढ़,
कुटुम्बसर गुफा के आसपास के जंगल घने और आकर्षक लगते हैं । कल
इस समय कुटुम्बसर गुफा के आसपास के जंगल से
सल्फी
का रस निकलवा कर पी रहे होंगे । उन्हें बताया कि वहाँ
सल्फी
के बहुत वृक्ष हैं,
सुबह मुँह अंधेरे बर्तन लेकर सरपट लोग चढ़ जाते हैं तने के टाप
को काट कर वहाँ बर्तन बांध देते हैं । सूरज निकलने के पहले
पहले भरा बर्तन उतार लिया जाता है । जैसे-जैसे
सूरज चढ़ता है फरमेंनटेशन
होने के कारण रस में खट्टापन आने लगता है तब वह
नशीला
भी होने लगता है । सूर्योदय के पहले तो यह
शर्बत
का
मज़ा
देता है। वहाँ के लोगों के लिए यह बीयर का काम करता है। ताड़ी
और छिंद का रस भी मीठा रहता है इन्हें भी लोग बड़े प्यार से
पीते हैं । मेरी बातों से उसे हल्का-सा
नशा
छा रहा था हालांकि न मैं और नही वो
नशा
का
शौक
रखता था । दोपहर सोने में और
शाम शहर
घूमने में निकल गया ।
रात नेगूराम जब डयूटी में आया उसे भी पता चला कि कल सुबह से
दंतेवाड़ा का कार्यक्रम बन रहा है वह भी साथ चलने के लिए तैयार
हो गया । नेगू राम पास के एक गाँव का आदिवासी युवक था भृत्य
के पद पर कार्यरत था । इस उम्र में भी अब तक दंतेवाड़ा न जा
पाया था । यह जानते ही सबने एक स्वर से कहा नेगू
अवश्य
जाएगा । नेगू में एक
विशेष
प्रकार का भोलापन था जो इधर के लोगों में सामान्य रुप से मिलता
था । एकाएक प्रभावित किए बिना नहीं रह सकता ।
सामान्य क़द
से थोड़ा-सा
लंबा सावला-सा
नेगू.......बस थोड़ी सी और बात उसके बारे में पाठकों को जान
लेना
ज़रूरी
है कि तीन दिन पहले सुबह सुबह जब नेगू डृयूटी पर आया था क्या
बताया अपने परिवार के बारे में । सुबह सुबह हम लोग धूप के
बहाने बाहर बरामदे में बैठे थे नेगू ने बताया था कि
शादी
वाली पत्नी को उसने छोड़ दिया है
''कहाँ
है वह ''पूछने
पर बताया वह गाँव में रहती है माँ की देखभाल करती है दो बच्चे
भी हैं,
खेती भी देखती है । अभी जो साथ रहती है उसे उसने चूडी पहना कर
लाया था बच्चे नहीं है,
रोज़
लड़ते रहती है कहती है एक दिन भाग जाएगी । वह तंग आ गया है ।
ठोस तर्क उसके पास नहीं कि पहले वाली को उसने क्यों छोड़ा बस
नहीं जमा.....और उसके साथ एक छोटी-सी
मुस्कराहट नेगू के चेहरे पर... जैसे सारा कुछ भोलेपन के
गिरफ़्त
में । इसे अपनी पसंद से लाया था इसलिए कुछ नहीं बोल सकता था ।
दोष भी दे तो किसे । थका-
थका सा लगा था यह सब बताते हुए और अब कल वह साथ जाने वाला था,
चलो अच्छा है कुछ चेंज हो जाएगा सब सोच रहे
थे ।
सुबह कोहरा काफ़ी होने से सड़क नहीं दिख रहा था फिर भी धीरे-धीरे
जगदलपुर से निकल गए नेगू भी साथ,
बड़ा प्रसन्न । तीरथ गढ़ का फाल,
कुटुम्बसर की गुफा,
दंतेवाड़ा में मंदिर
दर्शन
के बाद बचेली डिपाजिट
5,
किरंदुल डिपाजिट 14
के अलावा
आकाश
नगर घूमना आनंददायक रहा ।
आकाश
नगर में अपनी आसपास बादलों को घूमते फिरते देखना अलग अनुभव दे
रहा था । मीता और
जीवेश
तो जैसे कभी झगड़ा किए ही नहीं हों हर सिचवेषन का पूरा पूरा
आनंद ले रहे थे ।
रात देर से वापस लौटे अपने अपने कमरे में सोने चले गए,
थोड़ी खटपट होते होते पता नहीं क्या हुआ कि बात बढ़ गई,
रात भर चलता रहा । अपनी बिस्तर पर पड़े पड़े
मैं सोचता रहा कितने ही अरमान से दोनों के माँ,
बाप नें
शादी
करवाई कितना तो खर्च कितने तो
रिश्तेदारों
का लेन-देन,
दान-दहेज
वह अलग । किराएभंडार और रात के खाने का भुगतान उधार लेकर किसी
तरह किया गया । लाईटिंग का भुगतान हो ही नहीं पाया है । पता
नहीं कब नींद लग गई ।
सुबह की चाय साथ बैठ कर ले रहे थे कि नेगू आ गया कह रहा था
''चली गई, सब
कुछ ले कर चली गई,
झाड़ू मार कर चली गई । हर समय उसके चेहरे पर रहने वाली मुस्कान
गायब थी । सब
अवाक्
उसकी ओर देख रहे थे। उसके और उसकी बीबी के बीच के झगड़े के बारे
में सब जानते थे वह
रोज़ रोज़
भाग जाने की धमकी देती थी यह भी सबके जानकारी में थी पर आज ही
इस तरह चली जाएगी कोई नहीं जानता था । सबके सब जब सुनकर गंभीर
हो गए नेगू के चेहरे में एक क्षण के लिए मुस्कान आई और चली गई
,यह उसके चेहरे की बनावट की मुस्कान थी,
इसमें यानी इसके भीतर करुणा थी उसे
सिर्फ मैं पढ़ सकता था। मेरे चेहरे को देखते हुए सबने भी उसे पढ़
लिया। अभी वह उसी कपड़े में था जो कल से पहना हुआ था । पत्नी को
समझने में देर नहीं लगी उससे पूछ रही थी ''क्या
सब कपड़े भी ले गई, '' सोनू,
मोनू में खुसुर-फुसुर
होने लगी बच्चे मम्मी से पूछ रहे थे नेगू खाना कैसे बनाएगा
किसमें खाएगा। सबकी ओर से इस अप्रत्याशित
घटना के लिए उसे सांत्वना मिली पर इस सबसे प्रतिपूर्ति नहीं हो
रही थी । सबके हाव-भाव
जता रहे थे कि इस वक्त उसे
कोई
काम न कहा जाए सब अपने अपने काम में लगे थे । मीता,
जीवेश
के भीतर क्या चल रहा होगा मै कल्पना नहीं कर सकता । चुप-चुप
थोड़ी देर रुक कर नेगू चला गया,
रात वह नहीं आ पाएगा कह गया था ।
उसके जाने के बाद काफ़ी देर तक इस बारे में चर्चा होते रही
हालांकि कोई इससे सहमत नहीं हुए पर मैं दूसरे पक्ष को सामने
रखते हुए कह रहा था कि यहाँ स्त्रियों को कितनी आज़ादी है उसे
बंधन में रहने की
ज़रूरत
नहीं जब चाहे छोड़कर दूसरा मर्द बना लेती हैं.......।
''उसके
फ़ायदे कम और बुराई ज़्यादा हैं,
शादी
एक पवित्र बंधन है,
थोड़ी-मोड़ी
झगड़े का यह मतलब नहीं कि एक दूसरे को छोड़ ही दे''
जीवेश
तर्क दे रहे थे । बच्चे भी नेगू के पक्ष में थे कह रहे थे कि
सब सामान लेकर नहीं जाना था मीता का कहना था कम से कम समाज के
जवाबदार मुखिया के सामने तय करवाया जा सकता था । घर के बड़े
बुजुर्ग की भी कोई जवाबदारी होती है यहाँ कि नहीं वह अपने से
और अपने झगड़े से इस मामले को जोड़ रही थी । मैने यहाँ की
शादी
और उससे जुड़ी परम्परा के बारे में थोड़े में जानकारी उन्हें
देते हुए इसमें अच्छाई कहाँ है बताना चाहता था । पूरे गाँव के
लोग बारात में जाते हैं या गाँव में यदि बारात आयी
हो तो उसके स्वागत में और इंतजाम
में पूरा गाँव रिवाज़
के अनुसार लग जाते हैं ।
घोटुल में अपने जीवन साथी चुनने की जो स्वतंत्रता होती है वह
उच्चकोटि
की कही जा सकती है । हाई सोसाइटी से भी इसकी तुलना की जाती है।
पर यहाँ
अनुशासन
काफ़ी कड़ा रहता है । हाँ यह
ज़रूर
है कि यहाँ भी
शहरी
वातावरण का प्रभाव आने लगा है और इसका तो प्रभाव पड़ता ही है।
पर मूल रुप में जो सोच बनाई गई है वह काबिले
तारीफ़
है। यह भी सहीं है कि यह सब वहीं के लिए संभव है । बातें होती
रही सब मिला कर यह हुआ कि जहाँ के लिए व्यवस्था बनाई गई है
वहीं के लिए ठीक है....। रात में खाने पर,
सोने जाने के पहले यही चर्चा पर रहा ।
सुबह ठीक समय पर नेगू राम को डयूटी पर आया देख कर सबको
आश्चर्य
हुआ । सबसे पहले बच्चों ने ही घेरा...क्यों नेगू भैया क्या
हुआ... कपड़े,
बर्तन...। फिर पत्नी की बारी.... अरे नेगू आराम से आ
जाता....इतनी जल्दी क्या थी....।
फिर अब सबके सब....क्या हुआ का भाव लेकर उसके सामने खड़े थे और
उसे जवाब देना था ।
''सब
व्यवस्था हो गई बाई साब''
कल यहाँ से गया उसके बाद रात में सब ठीक कर लिया नेगूराम कह
रहा था ।
मन ही मन सब सोच रहे थे नेगू राम रात में कपड़े,
ज़रूरी
बर्तन का
इंतजाल
कर लिया होगा। नेगू राम पर से अभी किसी का ध्यान नहीं हटा था
उसके चेहरे पर बनावट की मुस्कुराहट कुछ स्थाई रूप से बनी हुई
थी । वह कह रहा था सब व्यवस्था हो गई दूसरी बना कर ले आया ।
व्यवस्था हो गई में यहाँ तक किसी ने सोचा भी नहीं था...सब
अवाक्...यह
कैसे हो सकता है...पर यह हुआ था ...नेगूराम ने रातों रात चूड़ी
पहना कर घर दूसरी पत्नी ले आया था । अब सब ठीक हो जाएगा....
नेगू कह रहा था,
सब सुन रहे थे कोई और उसके लिए क्या कर सकता था ।
बातें
ख़तम
नहीं हुई थी कभी कोई इसे अच्छा कहता कभी इसमें खामी निकाली
जाती । बहरहाल इस सबसे
जीवेश
मीता पर जो प्रभाव पड़ रहा था वह वैसा ही निर्मल था जैसा वे
यहाँ दूसरे दिन सुबह बाहर बड़े बड़े वृक्षों को देख कर महसूस कर
रहे थे । वे
साफ़-साफ़
महसूस कर रहे थे कि यह सब जो यहाँ आसान है
शहरों
में खासकर मध्यम वर्ग |