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भाग-7
एक नये समीक्षक को
सलाह
जार्ज बर्नार्ड शॉ
(उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में गोल्डिंग ब्राइट नामक एक युवक
नाट्य समीक्षा
से संबंधित सिद्धांत के विनियोग की व्यावहारिक शिक्षा
प्राप्त करने के उद्देश्य से अँगरेज़ी भाषा के विश्वविख्यात नाटककार
जार्ज बर्नार्ड शॉ के समक्ष पत्रों के माध्यम से उपस्थित हुए । शॉ ने
उनके मनोबल को ऊँचा किया । शॉ को भी ब्राइट की बालसुलभ भावुकता और
उत्कंठा ने प्रभावित किया । गोल्डिंग को दी गई सलाहें बाद में
'ऐडवाइस टु ए यंग
क्रिटिक'
नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुईं । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर
ई.जे.वेस्ट ने किया है । इस कृति की भूमिका उन्होंने 5 सितम्बर 1955 को
लिखा थी । 14 वर्ष पूर्व पटना में ए.एन.कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्षा
डॉ. सरोज सिन्हा ने इसका अनुवाद किया और अनुदित कृति का नाम दिय़ा -
एक नये समीक्षक को सलाह
। हम इसे साहित्यिक हित में संपूर्णतः प्रकाशित
कर रहे हैं। इस महान कृति को अब
धारावाहिक रूप से आगे पढ़ सकते हैं । प्रस्तुत है इस धारावाहिक की
छठवीं कड़ी - संपादक)
प्रिय श्री ब्राइट,
यह
बच्चों का इस प्रकार का मामला है जिसमें अपने माता-पिता के
प्रति वे नृशंस रूप से निर्दयी हो जाते हैं। पहला काम जो आपको
करना चाहिए वह यह कि अपनी विमाता की स्थिति के विषय में आप
अपने दिमाग से सारे पूर्वाग्रहों को निकाल दें। यह जानने का
प्रयास ही न करें कि वह कौन है या क्या है या क्या थी या आपके
भाई-बहन उसे पसन्द करते हैं या नापसन्द आपके पिता को अधिकार है
कि वे जिस स्त्री को चाहते हैं उससे विवाह करके सुखी रहें और
उस स्त्री के विचारों को सभी दूसरों के विचारों के सम्बन्ध में
अपेक्षाकृत प्राथमिकता दें। यह बात विवाद से परे है। सचमुच यह
परिवार की घटनाओं का बहुत दुखद मोड़ है, लेकिन यह कोई शिकायत
नहीं है। अगर आप से गलत रूप से लेंगे तो बेकार आप सिर्फ़ अपने
को ही क्षति पहुँचाएँगे, क्योंकि विवाह की वास्तविकता कोतो
स्वीकारना ही होगा(विवाह को रद्द करने की माँग करना युक्तिसंगत
हो, तब भी) । इसके अवाले, अपने पिता के उनके बच्चे के साथ
सम्बन्धों को विरोधपूर्ण और अप्रिय (घृणित) बनाकर आप ऐसी
परिस्थिति उत्पन्न कर देंगे कि स्वाभाविक रूप से अपनी पत्नी के
प्रति ही उन्हें अधिक सहानुभूति होगी। ऐसे दबाव का परिणाम यह
होगा कि अपने आखिरी समय में वे अपनी पत्नी को अपेक्षाकृत गलत
रूप से अधिक हिस्सा दे देंगे।
आपकी जगह पर किसी दूसरे आदमी के लिए साल भर में पचास पौंड काफी
रक़म है, लेकिन आप इससे घोड़ागाड़ी नहीं ले सकते, तीन शिलिंग
छह पेंस का भोजन नहीं ले सकते, सात शिलिंग छह पेंस देकर
क्राइटेरियन होटल के टेबुल पर नहीं बैठ सकते, न तो इससे किसी
स्टॉल पर जा सकते हैं और न ही
‘ह्वाइट
हॉल कोर्ट’
में प्लैट ही से सकते हैं;
लेकिन अपनी पत्नी और परिवार के साथ इतनी ही रक़म पर जीवनयापन
कर रहे शहरी क्लर्क की अपेक्षा आप अच्छी तरह रह सकते हैं। इतना
प्राप्त कर लेने के बाद आपको पिताजी पर कोई अधिकार नहीं रह
जाता, यद्यपि देहात की प्रतिवर्ष दो हजार पौंड की ज़िंदगी से
आपको अलग हो जाना चाहिए। मैं मानता हूँ
‘रिजेण्ट’
के ‘पार्क
ब्रिरेस’
में घर लेना आपकी आय सीमा के बाह की बात है। इसलिए आप ब्रिटिश
म्यूजियम के पास एक सस्ते कमरे की व्यवस्था कर लें, क्योंकि आप
इसे पा सकते हैं। और गृहस्वामिनी के साथ प्रातःकालीन जलपान की
व्यवस्था भी कर सकते हैं। तब कोई सस्ता रेस्तरों ढूँढ़ लें;
या सस्ते में भोजन कर लेने की कला सीख लें;
उदाहरण के लिए ‘गेटी’
में । म्यूजियम लाइब्रेरी का टिकट
लेकर सामुदायिक उष्णता-व्यवस्था, प्रसाधन(शौचालय) व्यवस्था,
बिजली की रोशनी, आरामदेह सीट, अपरिमित पुस्तकें, स्याही और
ब्लॉटिंग पेपर की सभी निःशुल्क सुविधाओं का लाभ उठाते हुए
प्रतिदिन आठ बजे तक नाटक का अध्ययन करते रहें। जब आप इस
सुनिश्चित मार्ग पर पचास पौंड के अन्दर के खर्च पर व्यवस्थित
हो जाएँ तो आप अपने पिता को लिखें कि व खर्च भेजना बिल्कुल
बन्द कर दें।
श्रीमती टैन-मेरा मतलब श्रीमती ब्राइट से है- से अपने मतभेदों
के लिए अपने को गलाया न करें। इसे भूल जाएँ और ऐसी कामना करने
की कोशिश करें कि आपके पिताजी सामाजिक रूप से सुखी और सकुशल
रहें। पैसे खत्म होने के पहले खर्च भेजने की व्यवस्था को
समाप्त कराकर आप सिर्फ यही सिद्ध नहीं करेंगे कि निकृष्ट काम
का भी सदुपयोग दुनिया का सामना कर सकते हैं;
आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अपने को और अपने पिताजी को अपनी
क्षमता दिखा देने के बाद आप बहुत अच्छा लिखने लगेंगे। जिस क्षम
आप अपने पिताजी को आभास दे देंगे कि आप उनके बिना अपना सब खर्च
स्वयं चला सकते हैं, वे आपको महत्व देने लगेंगे, तब मुझे यह
कहन का शायद ही कोई जरूरत रहे कि आपकी उम्र में आदमी को इस बात
की कोई परवाह नहीं करनी चाहिए।
अच्छी सलाह देने के लिए आप मुझे क्षमा करें। मुझे कोई संदेह
नहीं कि ऐसी सलाह आपको बहुत मिली है, लेकिन आपने जो कुछ लिखा
है, उस पर इसके अलावा मैं कह ही क्या सकता हूँ
?
‘वाइल्ड’
पर आपने बहुत बड़ा कुठाराघात किया है। उनका
‘आइ
हैव एण्ज्वॉएड माइसेल्फ वेरी मच’
में एक आइरिश मैन का अपना तौर-तरीका है। वे सारा श्रेय
अभिनेताओं को दे देते हैं और लेखक के रूप में ख्याति बनाने का
अपना तरीका अपनाते हैं।
एलेक्जेण्डर द्वारा मेरी रचना को लेने के विषय में सभी स्तम्भ
गलत हैं। इस मामले की सही बात सिर्फ इस सप्ताह के
‘वर्ल्ड’
में है।
(क्रमशः अगले अंकों में )
आपका विश्वासी
जी.बर्नार्ड शॉ
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