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जापानी पत्रिका में हिंदी साहित्य
सुरेश सलिल
दुनिया
भर के जिन देशों में,
उनके विश्वविघालयों
में हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन की व्यवस्था है,
उनकी गतिविधियों और
गति-प्रगति की ठीक-ठीक जानकारी हमें प्राय: नहीं हो पाती। यह
तब,
जबकि हमारे यहाँ
से कई सुपरहिट लेखक-प्राध्यापक शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम के
अंतर्गत देशांतर करते
रहे हैं। गत मास तोक्यो की ताकुशोकु युनिवर्सिटी के एक सेमिनार
के सिलसिले में
तोक्यो जाना हुआ तो वहाँ के तीन विश्वविघालयों में हिंदी भाषा
और साहित्य के शिक्षण
और हिंदी साहित्य संबंधी गतिविधियों की एक झलक मिली,
जो अपर्याप्त होने के साथ-साथ
उदास करने वाली भी थी।
हमारी
मेजबान यूनिवर्सिटी के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. तेइजी
साकाता उस भक्त समुदाय के व्यक्ति हैं,
जो प्रत्येक सत्र का समापन वृंदावन
बिहारीलाल की जय के साथ करने में संतोष का अनुभव करते हैं। इसी
से उक्त सेमिनार की
प्रकृति का अनुमान लगाया जा सकता है। ताकुशोकु युनिवर्सिटी के
अतिरिक्त तोक्यो के
जिन दो अन्य विश्वविद्यालयों में अनौपचारिक रूप से हमें जाने
का अवसर मिला,
उनमें से
तोयो यूनिवर्सिटी के भारतीय दर्शन विभाग के प्रोफेसर द्वय-
हाशिमोतो और हिसायोशी
मियामोतो ने हमारी लेखक टीम का स्वागत किया और विभाग के लगभग
सभी छात्रों,
प्राध्यापकों के साथ संवाद का अवसर सुलभ कराया। यद्यपि वे सभी
भारतीय दर्शन से
संदर्भित थे- उनके विषय वेदांग और लोकायत दर्शन थे,
तब भी वहाँ किंचित
साहित्य-चर्चा का संतोष मिला।
प्रोफेसर हाशिमोतो ने जापानी अनुवाद और रोमन
लिप्यंतरण में कबीर वचनावली की एक बहुत खूबसूरत जिल्द अपने
विभाग से प्रकाशित की
है,
जिसके पृष्ठ पलटने का सुयोग तो हमें वहाँ जुटा ही,
प्रयाग शुक्ल,
गंगाप्रसाद
विमल,
रणजीत साहा तथा इस पंक्तिकार को अपनी कतिपय मौलिक-अनूदित
कविताएं प्रस्तुत
करने का संतोष भी हुआ। किन्हीं अर्थों में मेजबान यूनिवर्सिटी
के सेमिनार की तुलना
में इस अनुभव को अधिक आश्वस्तकारी माना जा सकता है। प्रसन्नता
इस बात की हुई कि
तोयो यूनिवर्सिटी में भारतीय दर्शन का अध्ययन और शोध उसकी सही
स्पिरिट में हो रहा
है। तोक्यो की तीसरी यूनिवर्सिटी,
जहां हमें आमंत्रित किया गया- दाइतो बुल्का
यूनिवर्सिटी- मुख्य शहर से थोड़ा हटकर साइतामा सबर्ब में है।
वहाँ के हिंदी प्रोफेसर
हिदीकी इशिदा हिंदी की साहित्यिक गतिविधियों से अपेक्षाकृत
अधिक अवगत नजर आए। उनके
छात्र यद्यपि हमारे यहाँ के प्राइमरी स्तर के हैं,
फिर भी उनके सृजनात्मक सरोकार
ज्यादा जेनुइन,
ज्यादा समकालीन नजर आए। प्रोफेसर इशिदा जापान सोसाइटी फॉर
हिंदी
लिटरेचर के संस्थापक सदस्य हैं और
‘हिंदी
लिटरेचर’
नाम से जापानी की एक पत्रिका भी
संपादित करते हैं।
उक्त पत्रिका का मई
2007
का अंक भौगोलिक सीमाओं के बावजूद
हिंदी साहित्य की समकालीन धड़कनों से जुड़ा हुआ माना जा सकता है।
पत्रिका के इस अंक
की सामग्री दो खंडों में संयोजित है। पहला खंड अनूदित रचनाओं
और दूसरा विवेचनात्मक
लेखों का है। अनुवाद खंड में आधुनिक हिंदी साहित्य की विविध
विधाओं कविता,
कहानी,
निबंध की कुछ बानगियां प्रस्तुत हैं,
जिन्हें विधागत विकासक्रम से देखने में लंबे
अंतराल नजर आ सकते हैं लेकिन यह आश्वस्ति तो होती ही है कि
पत्रिका के संपादकों,
अनुवादकों को विगत सौ वर्षों के हिंदी साहित्य के विकास के
विभिन्न पड़ावों की अघतन
जानकारी है। उदाहरण के लिए
,
मैथिलीशरण गुप्त कृत
‘यशोधरा’
के कुछ अंशों का यूइजी
युकिशिता और महादेवी वर्मा की गघ कृति
‘श्रृंखला
की कड़ियां’
से
‘युद्ध
और नारी’
शीर्षक निबंध का तोमोको किकुची कृत अनुवाद। फिर भी कविता और
निबंध की तुलना में
कहानी को पत्रिका के इस अंक में अपेक्षाकृत अधिक स्थान मिला है
और यह भी आभास होता
है कि कहानी के विकासक्रम की मोटी जानकारी पत्रिका के संपादकों
को है।
सुभद्राकुमारी चौहान की कहानी
‘गौरी’
(अनु.
चिहिरो कोइसई),
मोहन राकेश की
‘कांटेदार
आदमी’
(अनु.
केइको शिराह),
दूर्वा सहाय की
‘प्रेतमुक्ति’(अनु.
शोको
उएकी)अजय नेवरिया की
‘बलि’
(अनु.
हिदीकी इशिदा),
वसु मालवीय की
‘उस्तरा’,
(अनु.
योशिको आ॓कागुची)तथा सुषम बेदी की
‘विभक्त’(अनु.
हिसाको मात्सुकिजोनो)जापानी अनुवाद
में प्रकाशित हैं। पत्रिका के संपादक इशिदा के अनुसार,
जो पुस्तकें,
पत्रिकाएं
उन्हें और उनके विभाग को उपलब्ध हो पाती हैं,
उन्हीं में से अनुवादकगण अपनी रूचि के
अनुसार रचनाओं का चुनाव कर लेते हैं। पत्रिका के इस अंक के
निबंध खंड में औपनिवेशिक
दौर में महिलाओं द्वारा हिंदी क्षेत्र में लिखी गई आत्मकथाओं
पर केंद्रित हिसाए
कोमात्सु का लेख अलग से ध्यान खींचता है। इसके शीर्षक में
यद्यपि हिंदी क्षेत्र को
सीमारेखा माना गया है किंतु यहाँ बांग्ला की नटी विनोदिनी दासी,
रससुंदरी देवी,
देवी शारदा सुंदरी,
निस्तारिनी देवी,
जानकी एग्नेस पेनेलोप मजूमदार,
मराठी की
रमाबाई रानाडे,
पार्वती अठवले,
हिंदी की चारूशीला देवी,
महादेवी वर्मा,
सुभद्राकुमारी चौहान और दुखिनीबाला की आत्मकथात्मक रचनाओं के
आधार पर भारत में
स्त्री विमर्श की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।
पत्रिका में
‘प्यासा’
फिल्म को
आधार बनाकर फिल्मकार गुरूदत्त के सिनेमाबोध पर तोशियो तकाका एक
बहुत अच्छा लेख
प्रकाशित है। इसके साथ ही नाटक,
हिंदी सिनेमा के गीतों के जापानी अनुवाद और जापान
के लोकप्रिय गीतों के हिंदी अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय
आ॓साका विश्वविघालय से
अवकाश प्राप्त प्रोफेसर तोमायो मिजोकामी ने उक्त विश्वविघालय
के फॉरेन स्टडीज विभाग
के छात्रों द्वारा जापान से बाहर प्रस्तुत किए गए हिंदी नाटकों
का एक समीक्षात्मक
विवरण प्रस्तुत किया है।
पत्रिका के संपादक और जापान सोसाइटी फॉर हिंदी लिटरेचर
के संयोजक हिदीकी इशिदा ने हंस पत्रिका के
1990-91
के अंकों में दलित प्रश्न से
संदर्भित प्रकाशित सामग्री की एक विस्तृत विवरणिका यहाँ
प्रस्तुत की है,
जिसका शोध
संदर्भ की दृष्टि से अपना अलग महत्व है। विदेशी शिक्षा
संस्थानों में हिंदी भाषा और
साहित्य के शिक्षण की सीमाएं और समस्याएं अवश्य हैं,
लेकिन अनुभवों के आधार पर इतना
तो माना ही जा सकता है कि अगर आप में एक देश की भाषा,
संस्कृति और साहित्य से जुड़ने
में सच्ची आकांक्षा है तो सीमाएं-समस्याएं बहुत ज्यादा आड़े
नहीं आतीं।
हिंदी
लिटरेचर (मई
2007)
संपा. हिदीकी इशिदा,
संपर्क,
जापान सोसाइटी फॉर हिंदी लिटरेचर,
फैकल्टी ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस,
आइतो बुंदा यूनिवर्सिटी,
560,
इवादोनों
हिमाशिमात्सुयामा,
सायतामा,
जापान
3555-8501

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