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वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। प्रसंगवश ।।

 

 

राजनीति के निशाने पर 'भारत रत्न'


तनवीर जाफ़री

 

भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' जिसकी घोषणा आमतौर पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर की जाती है, आखिरकार इस वर्ष किसी भी अति प्रतिष्ठित व्यक्ति को नहीं दिया गया। भारत रत्न सम्मान की घोषणा न किए जाने के कारणों के बारे में जो क़यास लगाए जा रहे हैं, उनमें कुछ लोग यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि इस बार भारत रत्न सम्मान के लिए किसी पात्र व्यक्ति का नाम भारत रत्न देने का निर्णय करने वाली चयन समीति के समक्ष नहीं आया, इसलिए यह सम्मान किसी व्यक्ति को नहीं दिया जा सका। जबकि कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत रत्न के दावेदारों की सूची इतनी लम्बी हो गई थी कि उनमें से सम्मान हेतु किस व्यक्ति का चुनाव किया जाए, इस नतीजे पर पहुँच पाना ही मुश्किल हो गया था। भारत रत्न सम्मान किसे दिया जाए और किसे न दिया जाए इसको लेकर सम्भवत: यह पहला अवसर था जबकि टेलीविज़न के कई प्रतिष्ठित चैनल द्वारा इस सिलसिले में एस एम एस के माध्यम से दर्शकों की राय माँगी जा रही थी। देश के कई राजनैतिक दलों के विवादास्पद दावों की वजह से भारत रत्न सम्मान जिसपर कि अक्सर पहले भी उँगलियाँ उठती रही हैं, इस बार भी पूरी तरह से राजनीति का शिकार होते हुए देखा गया।

 

भारत रत्न सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 को प्रथम भारतीय राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा की गई थी। इसके साथ ही तीन अन्य प्रमुख राष्ट्रीय सम्मान पद्म विभूषण, पद्म भूषण तथा पद्म श्री की भी स्थापना की गई थी। इन पुरस्कारों के लिए भारतीय अथवा गैर भारतीय होने जैसी किसी भौगोलिक सीमा का निर्धारण नहीं किया गया था। अब तक भारत रत्न सम्मान देश व दुनिया की 40 प्रमुख हस्तियों को दिया जा चुका है जिसमें दो विदेशी मूल के लोग तथा एक प्राकृतिक भारतीय नागरिक शामिल हैं। विदेशी सम्मान प्राप्त करने वालों में अफ्रीकी राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला तथा अल्बानियाई मूल की मदर टेरेसा का नाम शामिल है। जबकि खान अब्दुल गफ्फार खान को भी उस समय सम्मानित किया गया जबकि वे भारत के बजाए नवनिर्मित राष्ट्र पाकिस्तान के सीमान्त राज्य में रहने वाले भारतीय शुभचिंतक एवं वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे।

 

भारत रत्न प्राप्त करने वाले सौभाग्यशाली लोगों में कुछ और प्रमुख नाम ऐसे हैं जिन्हें पूरा राष्ट्र आदर की नज़रों से देखता है। इनमें कुछ हस्तियाँ तो ऐसी हैं जिन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में भी न केवल अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया बल्कि विश्व स्तर पर आदर, सम्मान व ख्याति भी अर्जित की। इन भारत रत्नों में सर्वपल्ली राधाकृष्णन, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सी वी रमन, पंडित जवाहरलाल नेहरु, गोविन्द वल्लभपंत, पी डी टंडन, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ ज़ाकिर हुसैन, लाल बहादुर शास्त्री, इन्दिरा गांधी, के.कामराज, आचार्य विनोबा भावे, बी आर अम्बेडकर, राजीव गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आंजाद, जे आर डी टाटा, सत्यजीत रे, ए पी जे अब्दुल कलाम, गुलजारी लाल नन्दा, अरुणा आसिफ़ अली, जय प्रकाश नारायण, पंडित रविशंकर, अर्मत्य सेन, लता मंगेशकर तथा बिस्मिल्ला खाँ के नाम शामिल हैं। इसके अतिरिक्त भारत रत्न भगवान दास, सरमोक्षा गुण्डम विश्वेसवरैया, ढोंडो केशव करवे, डॉ वी सी राय, पांडुरंग वामनकने, वी वी गिरी, एम जी रामाचंद्रन, मोरारजी देसाई, एम एस सुब्बालक्ष्मी, चिदंबरम सुब्रमणियम, गोपीनाथ बोरदोलई आदि को भी दिया जा चुका है।

 

भारत रत्न प्राप्त करने वाले उपरोक्त नामों में कई नाम ऐसे हैं जिन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से नवांजा गया है। इससे यह भी साफ़ ज़ाहिर है कि भारत रत्न प्राप्त करने वालों के लिए जीवन अथवा मरण जैसी भी कोई सीमा निर्धारित नहीं है। फिर यह प्रश्न उठता है कि आखिर महात्मा गांधी को अब तक भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया? भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, सुखदेव, राजगुरु, अशफ़ाकउल्लाह जैसे मुजाहिदे आज़ादी क्या भारत रत्न पुरस्कार चयन समिति की नज़रों में भारत रत्न पाने के हक़दार नहीं हैं? क्या सुभाष चन्द्र बोस जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी को भारत रत्न दिया जाना शोभा नहीं देता? अब यदि भारत के इन महान सपूतों के बजाए हम आज के उन नेताओं अथवा भारत रत्न के दावेदारों पर नज़र डालें तो हमें कहीं अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर लोगों को दावा पेश करते हुए देखा जा रहा है तो कहीं कांशीराम को भारत रत्न का सबसे उपयुक्त दावेदार बताकर वोटों की राजनीति की जा रही है। कहीं किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न के लिए उपयुक्त दावेदार बताया जा रहा है तो समाजवादी नेता एवं महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य नरेन्द्र देव के लिए भी समाजवादी विचारधारा के लोगों द्वारा भारत रत्न माँगा जा रहा था। मेरी समझ में यह नहीं आया कि समाजवादियों द्वारा डॉ राम मनोहर लोहिया के बजाए आचार्य नरेन्द्र देव के लिए ही यह सम्मान क्योंकर माँगा गया।

 

इसमें कोई शक नहीं कि भारत रत्न अलंकरण पर पूरी तरह से राजनीति हावी होती जा रही है। कुछ ऐसी ही विवादित परिस्थितियों में एक जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने एक आदेश के तहत 13 जुलाई 1977 से लेकर 26 जनवरी 1980 तक भारत रत्न सम्मान की घोषणा को निलंबित कर दिया गया था। इस बार भारत रत्न पर फिर उस समय राजनीति की शुरुआत हुई जबकि देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भारत रत्न की माँग की गई।

 

किसी बड़े राजनैतिक दल द्वारा सार्वजनिक रूप से इस प्रकार से मीडिया के समक्ष भारत रत्न अलंकरण के लिए अपने दावेदार का नाम घोषित करना शायद भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ था। भाजपा के इस क़दम के बाद तो दावेदारों की गोया झड़ी सी लग गई। मायावती ने काशीराम को भारत रत्न के लिए सबसे उपयुक्त दावेदार बताया तो चौधरी अजीत सिंह अपने पिता पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के लिए भारत रत्न का दावा पेश करने से नहीं चूके। इसी प्रकार समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने आचार्य नरेन्द्र देव का नाम भारत रत्न के लिए प्रस्तावित किया।

 

हालांकि भारत रत्न के उपरोक्त प्रस्तावक दल अथवा प्रस्तावक नेता अपने दावों के समर्थन में कुछ भी बखान क्यों न करें परन्तु भारत रत्न सम्मान चयन समिति के विचार भी प्रस्तावकों के विचारों से मेल खाते हों, यह ज़रूरी नहीं है। उदाहरण के तौर पर नि:सन्देह अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति पर पांच दशकों तक निरंतर छाए रहने वाले एक बड़े राजनैतिक क़द का नाम है। सत्ता पक्ष में रहे हों अथवा विपक्ष में अपनी कुशल राजनैतिक सूझबूझ का उन्होंने हमेशा ही परिचय दिया है। राजनैतिक जीवन से सम्मानजनक बिदाई के रूप में उनके लिए भारत रत्न से अच्छा उपहार और हो भी क्या सकता था? परन्तु वाजपेयी के आलोचकों द्वारा उन्हीं के राजनैतिक जीवन के खाते में कारगिल घुसपैठ, संसद पर हुआ आतंकवादी हमला तथा कंधार विमान अपहरण कांड में कुछ दुर्दान्त आतंकवादियों को बाइज्ंज़त दिल्ली से कंधार पहुँचाया जाना व उन्हीं के शासनकाल में हुए गुजरात दंगे भी शामिल हैं। ऐसे में भारत रत्न जैसे सर्वोच्च भारतीय नागरिक सम्मान को तराज़ू के किस पल्ले पर रखा जा सकता है। ऐसी ही परिस्थितियाँ कांशीराम व चौधरी चरण सिंह के नामों को लेकर उत्पन्न होती हैं। इन बातों से तात्पर्य यही निकलता है कि भारत रत्न जैसा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ऐसे उच्चकोटि के व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जो सर्वमान्य हो, आलोचनाओं का शिकार न हो तथा वास्तव में अपने महान व्यक्तित्व की बदौलत भारत के एक आकर्षक रत्न के रूप में चमकता हुआ दिखाई दे। परन्तु दु:ख की बात यह है कि अब शायद इस देश में ऐसे लोग चिरांग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिल सकेंगे जोकि किसी न किसी कारण किसी न किसी व्यक्ति की आलोचना का केंद्र न हों। इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में विभिन्न स्तरों पर तेंजी से बदलती जा रही विचारधारा और इसी वैचारिक बदलाव के कारण भारत रत्न जैसे अलंकरण को भी ग्रहण लगता जा रहा है।

 

ज़ाहिर है जब राजनैतिक दलों द्वारा भारत रत्न को लेकर राजनैतिक हस्तियों के नामों के इर्द-गिर्द घूमते रहने का प्रयास किया जाएगा तथा इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान को भी राजनीति की सम्पत्ति मान लिया जाएगा, तो ऐसे में मीडिया द्वारा अपनी सक्रियता दिखाना भी लाज़िमी जान पड़ता है। प्रश्न यह है कि यदि वाजपेयी के नाम पर मतभेद हैं तो सचिन तेंदुलकर के नाम पर क़तई नहीं। कांशीराम के नाम पर विवाद हो सकता है परन्तु रतन टाटा के नाम पर हरगिंज नहीं। इसी प्रकार चौ. चरण सिंह के नाम पर किसी को आपत्ति हो सकती है परन्तु नोबेल पुरस्कार विजेता आर के पचौरी के नाम पर शायद किसी को आपत्ति न हो। इसीलिए इस वर्ष मीडिया द्वारा राजनैतिक दलों द्वारा भारत रत्न के लिए उछाले गए नामों के जवाब में कुछ ऐसे नाम उछाले गए जो वास्तव में आम जनता के दिलों को निर्विवाद रूप से छू लेने वाले थे।

 

इन हालात के मद्देनंजर भारत रत्न चयन समिति द्वारा अपने पिछले फ़ैसलों को देखने व उनपर आँसू बहाने के बजाए बेहतर यह होगा कि सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी जैसी श्रेणी के लोगों को भारत रत्न देकर एक बार पुन: इस पुरस्कार की सर्वोच्च गरिमा को क़ायम रखने का प्रयास किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो दिन-प्रतिदिन भारत रत्न का महत्व तो घटेगा ही साथ-साथ यह सर्वोच्च सम्मान पूरी तरह से राजनीति का शिकार भी हो जाएगा। अत: ज़रूरत इस बात की है कि इस सर्वाच्च नागरिक सम्मान के दावों के सर्वोच्च मापदंड को स्थापित किया जाए।

  तनवीर जाफ़री

(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी, शासी परिषद)

22402, नाहन हाऊस, अम्बाला शहर, हरियाणा

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