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कविता में हाट बाज़ार
परमानंद
श्रीवास्तव
वैश्वीकरण
के साथ बाजारवाद,
चंचल पूंजी उपभोक्ता समय के नए-नए रूप प्रकट हैं। बाजार
का ग्लैमर कविता की चुप्पी में भी पहचाना जा सकता है। वैश्विक
बाजारवाद में गांवों
के हाट गुम हैं। अब शॉपिंग मॉल में एक्सीलेटर से ही प्रवेश
संभव है,
जहां कपड़े,
प्रसाधन सामग्री,
स्किन केयर,
शेविंग क्रीम,
शहद,
जूते चप्पल मौजूद हैं और वह
ट्राली,
जो आपको बाहर तक ले जाती है। जरूरत से अधिक भरोसा आप विज्ञापन
पर कर रहे
हैं और देशी-विदेशी ब्रांड का फायदा उठा रहे हैं। एक कबीलाई
कविता में बाजार इस तरह
आता है-
तुम कैसे खरीद-फरोख्त कर सकते हो/ अपनी स्नेहिल छुअन की गरमाहट
से भरी धरती की/ यह
विचार हमारे लिए निहायत बेगाना है...।’
हमारे समय की युवा कथाकार पंखुरी राय की
कविता
‘वीर
बाजार’
(नया
ज्ञानोदय/अक्टूबर2007)
इस विडंबना को विलक्षण ढंग से खोलती
है। ‘यह
पुलिस की ज्यादती थी कि उसने डंडे के जोर से मंगल बाजार उठा
दिया/ ...वहां
क्यों नहीं बाकायदा,
बाजाप्ता बिठाया जाता है/साप्ताहिक बाजार/ मंगलवार को नहीं,
वीरवार को सही/ क्यों नहीं साढ़े तीन-चार से सौदा सुलुफ
के/बाजार में पहुंचने का जोर
हो/...खबर हो सबको कि हर मौसम,
हर वीरवार को लगेगा बाजार/... कि हमारी हडि्डयों में
ताकत बनी रहे मडुंआ की रोटी/और तीसी की चटनी की/...
युवा कवि कुमार वीरेन्द्र की
कविता में
‘बरेली’
की जगह
‘मुंबई’
क्या आकस्मिक है?
कविता है,
‘अरे
झुमका बिका रे
मुंबई के बाजार में।’(विलाप
नहीं) कविता के एक टुकड़े में बिकने की विडम्बना है-
‘हां,
झुमका बिका रे मुंबई के बाजार में/.. सब जानते हैं/ माई का
झुमका/ गांव
में/जिन कठिन परिस्थितियों में रखा जाता रहा है/ वैसी अभी हैं
नहीं/! यह समय है कि
बाजार केंद्रीय हो उठा है। आर चेतनक्रांति
‘मॉल’
कविता में बाजार की क्रूरता का
विमर्श बनाते हैं।
‘पहले
उन्होंने सिद्ध किया/ कि यही लोक अंतिम है/ न कोई दुनिया
है/ न कोई और जीवन/ यही योनि पहली है,
यही आखिरी।’
पूंजी की कॉरपोरेट दुनिया में
हाट-बाजार जीवन को बदल रहे हैं।
वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह बाजार जाकर नक्शा
खरीदते हैं। नक्शे में नदियां है,
गडेरिए हैं,
युद्ध के मैदान हैं पर नहीं है तो
कवि का अपना घर। बाजार घर को गुम कर देता है। रघुवीर सहाय के
यहां सर्वग्रासी बाजार
प्रायोजित है। अमेरिकी बिग बाजार है जहां पिज्जा,
हैमवर्गर,
प्राणहीन मुस्कान एक
हैं। इसके बरक्स कस्बे में दाल-रोटी जैसा विषय बाजार को घर में
निरस्त करता है।
रंजना जायसवाल की कविता
‘रोटी-दाल’
में सरसों-अरहर-संवाद पिज्जाहट,
बिग बाजार से
अलग आख्यान बनता है।
‘खेत
की नमी में/ शान से इठलाती सरसों ने/ मेड़ पर खड़ी अरहर से
कहा/ तुम कितनी काली और बदसूरत और खुरदुरी हो/ कुछ लगाती क्यों
नहीं/ मल्टीनेशनल्स
के इतने सारे प्रोडक्ट्स तो हैं।’
ब्रांड होंगे चमत्कार- यहां तो दाल-रोटी जीवन का
यथार्थ है। इसके लिए होटल क्या,
ढाबा भी बेकार है। विचारक शामलाल ने हमारे समय को
उपभोक्ता वस्तुओं का कार्निवाल कहा है। एक विशाल मंडी। यह मंडी
संस्कृति है जिसमें
सीडी कैसेट विस्मयप्रद है। रिमोट से आप कुमार गंधर्व,
भीमसेन जोशी,
आबिदा परवीन,
ताहिरा सैयद सभी को सुन सकते हैं। बाजार घर में आ गया है,
घर बाजार में।
युवा
कवि कुमार मुकुल के लिए बाजार पारचूनी दुकानों में सिमट आया
है। इस ठेठ कस्बाई
बाजार में भूंजे की दुकानों के पास चना-मूंगफली-मकई मटर सबकी
जगह है। दूसरी आ॓र
अपार्टमेंट्स में बिग बाजार सजा है। वहीं तनिष्क ज्वेलरी का
शो-रूम है। कनाट प्लेस
में मार्केटिंग करती जींस-पैंटधारी लड़कियां भी दिख जाएंगी-
जलेबी-कचौड़ी खातीं।
बाजारवाद और विज्ञापन संस्कृति अभिन्न हैं। कविता में बाजार के
लिए बड़ा स्पेस है,
जो निसर्ग है,
सहज है,
छूट जाने वाला है। हरिश्चन्द्र पांडे के शब्द हैं- उठेगी वह/
जैसे घोंसले से चिड़िया/ जैसे समुद्र से मानसून/ जैसे मिट्टी से
घास/ और फिर गिरेगी
वह/ जैसे चोंच से तिनका/जैसे बादलों से पानी/जैसे थन से
दूध/...।’
इस समय में जीवन
का बड़ा हिस्सा बाजार में अलग-अलग पैकेजों में बिक रहा है।
अशोक वाजपेयी हमारे
समय के महत्वपूर्ण कलाविद हैं जिनकी कविता
‘मल्लिकार्जुन
मंसूर’
में ये पंक्तियां
हाट-बाजार का भेद खोलती हैं-
‘अपने
भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में/ हलका सा झुककर/
रखते हैं/ कल के कंधे पर अपना हाथ/ ठिठक कर सुलगाते हैं अपनी
बीड़ी/ चल पड़ते हैं फिर
किसी अप्रत्याशित पड़ाव की आ॓र/...रात के अदृश्य घर का दरवाजा
खोलकर।’
सुरों में
बाजार के ग्लैमर के विरूद्ध कविता एक कारगर युक्ति है।
‘बेच
खरीद के इस जमाने में’
कविता में ज्ञानेंद्रपति लिखते हैं- चली आती हैं आइंस्टाइन की
अगाध आंखें/ नीलामी
पर चढ़ने/ उनकी बगल में पिकासो की यशस्वी कूची है/ और एल्विस
प्रेस्ले का वीर्यस्व
जांघिया/ एक दिन नीलामी की ऊंची टेबुल पर,
काठ के हथौड़े के नीचे/ कौन जाने जो
तुम्हारे बच्चों के अस्फुट मेधावी मस्तिष्क की बगल में हो/ वॉन
गॉग का कटा कान/और
ब्रह्मा का छिन्न पांचवां शीष! दूसरी आ॓र पड़ा है टूथपेस्ट का
सुहाना विज्ञापन-पट।’
यह है कविता में हाट-बाजार का वृतांत।
आज बांग्ला के बड़े कवि शंख घोष तसलीमा
नसरीन के निर्वासन के विरूद्ध भारतीय लेखकों और
संस्कृतिकर्मियों का साझा बयान जारी
कर रहे हैं।
‘उल्टा
खेल’
में तसलीमा की काव्य पंक्तियां बाजार की क्रूरतम विडम्बना
को पहली बार उत्तेजक शब्द दे रही हैं-
मैंने उस दिन रमना में देखा एक लड़का/लड़की
खरीद रहा है/ मेरी भी वही इच्छा होती है,
दस पांच रूपए में एक लड़का खरीद लाऊं/...
मेरी बड़ी इच्छा होती है लड़का खरीदने की/ जवान-जवान लड़के/ छाती
पर उगे घने बाल/’
यह
आक्रामक प्रतिक्रिया से अधिक है। तसलीमा ही लिख सकती हैं- पेटू
मर्द स्त्री को नरम
गाय का मांस समझते हैं- वे स्त्री को समझते हैं आम का मुरब्बा
या उबला अंडा या दूध
से बना संदेश! यह है बाजार का खेल- जहां सब कुछ बिक रहा है।
मूल्य और आदर्श भी।
गांधीवाद की जगह गांधीगिरी शब्द ज्यादा मूल्यवान है। बाजार वह
आग है जो वस्तुओं से
पहले ग्राहक या उपभोक्ता को जलाती है।
बाजार केंद्रीय है,
मनुष्य विस्थापित है।
रातोंरात सिंधी कराची से बेदखल किए जा रहे हैं। युवा आलोचक
प्रफुल्ल कोलख्यान की
टिप्पणी है-
‘जनतंत्र
का बाजार के प्रति बर्ताव- यहां यह प्रवृत्ति अन्तर्निहत है
कि वह बाजार की उपयोगिता को खारिज नहीं करता बल्कि समाज हित से
संपृक्त रखता है।
जबकि बाजारवाद समाज और उसके सदस्यों के आम हितों को अपने
पूंजीवादी चरित्र में
अंतर्भुक्त कर अंतत: पूंजी की सामाजिकता को वैयक्तिता में
बदलने में रूचि रखता है।
नीलेश रघुवंशी के लिए-
‘पिता
और नोट के बीच/ सफर करते हैं/ मां के तंगहाल सपने/ नोट
को तोड़ने-तुड़वाने से पहले हिचकती है मां।’
यह है आदमी की जिंदगी में देखते-देखते
बाजार का बढ़ता प्रभुत्व या हस्तक्षेप।
बाजार अब हाईटेक है। उसके अनंत प्रलोभन
हैं।
‘सुबह
होती है शाम होती है’
नाटक में रत्ना सपन से पूछती है,
‘अगर
तुम्हे दो
लाख रूपए और अपनी टांग में से कोई एक चुनना हो तो क्या लोगो?
सपन का सवाल-
‘दांई
या
बांई’।
रत्ना-
‘कोई
भी’।
सपन-
‘टांग’।
रत्ना-‘तीन
लाख,
चार लाख पांच लाख!’
सपन-
‘दस
लाख रूपए मिलें तो ले लूंगा।...’
यह है समय कि लोग दस-पांच लाख मिलने पर टांग देने
को तैयार हैं।
बाजार है तो ट्रैफिक जाम है। धरना प्रदर्शन है,
जुलूस और पोस्टर
हैं। नरेंद्र जैन की कविता में मकई के दाने हैं,
मौसम का आखिरी भुट्टा है,
सदी का
आखिरी भुट्टा,
जिसमें सैकड़ों दाने हैं। यह भी हाट-बाजार का ही प्रसंग है।
अपने-अपने
दुस्वप्न हैं,
यहीं बीड़ी बन रही है,
सूप में लिए तेंदू पत्ते,
तंबाखू। बाजार से
गुजरती खड़खड़िया बस है। रोटी की ताजी गंध। धरती के गर्भ में जल
का स्रोत। बिसलरी,
रेलनीर का समय है। आंगन में बिखरे चावल। कोठरी का धुआं। बाजार
और घर-बेघर। यह है
समय। जीवनानुभव में हाट-बाजार की अनिवार्यता है। अभी हुए
विस्फोट में कचहरी में बूट
पॉलिश करता बारह साल का लड़का इसी बाजार में जान गंवाने को
अभिशप्त है।
कभी
महाकवि रहते थे- काशी में- चादर बुनते थे। अब कबीर सूत मिल है,
कबीर मार्केट है।
कबीर होटल। एक स्टेशन का नाम है कबीर। बाजार हमें बेघर करता
है। घर हमें बाजार में
नीलाम कर देता है। निर्मला पुतुल के लिए बाजार संस्कृति को
ध्वस्त करता है।
‘
वे
दबे पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में/ वे तुम्हारे नृत्य की
बड़ाई करते हैं/ वे
तुम्हारी आंखों की प्रशंसा में/ कसीदे पढ़ते हैं/... सौदागर हैं
वे-समझो/पहचानों
उन्हें बिटिया मुर्मू... पहचानों/ पहाड़ों पर आग वे ही लगाते
है/...कलकत्ता और नेपाल
के बाजारों में/उतरती हैं/नगाड़ों की आवाजें।’
अरूंधती की कविता में धीमा बोलने वाली
लड़कियां कूड़े में गायब हो जाती हैं। एयरपोर्ट की ड्यूटी फ्री
दुकानों में खरीदारी
असंभव है। अंग्रेजी कययित्री लक्ष्मीकंतन साटनी लहरों की तह पर
तह विकट चुन्नटदार
सिसकियां,
चकरियां,
स्त्री ऊर्जा की फसल छोड़ जाती हैं।
एक कविता में बाजार
समय-असमय बिखर जाता है। हाथ लगते हैं- अपराध,
जुर्म,
अभियोग। बाजार जरूरी है,
पर
बाजारवाद समय की त्रासदी है। आत्मा बिक रही है। दिल बिक रहा
है। किडनी बिक रही है।
आंखें बिक रही हैं। पहाड़ों की चोटियों पर जमी बर्फ बिक रही है।
पृथ्वी की त्वचा बिक
रही है। ग्रह नक्षत्र बिक रहे हैं। रूद्राक्ष की माला की
लड़ियां ऊंचे दामों पर बिक
रही हैं। जीवन के बियावान का अकेलापन बिक रहा है। कविता बेध्य
है। बेधक है बाजार-
जो नृशंस है। तवे पर रोटी,
जांते की धुन,
हीर रांझा- सभी बाजार के ग्रास हैं।
युवा कथाकार क्षमा शर्मा बाल मजदूरों के यौनिक उत्पीड़न पर
लिखती हैं तो निठारी
कांड याद आता है। निठारी थाने कर बस रूकी तो लगा- मैं एक हिस्र
बाजार में हूं। जहां
नरकंकाल बिक रहे हैं। यह खेल पश्चिम बंगाल तक है। नंदी ग्राम
में जमीन का अधिकार
बाजार का सामंतवाद ही तो है। धरती में से नरमुंड निकल आते हैं।
खून सने हाथ के
पंजे। पैर। जूते-मोजे। मृत्यु ठिठकी खड़ी है। कोई नायक ही अब
उसका पहला कौर होगा।
कविता में हाट-बाजार का आख्यान जटिल है। आने वाले समय में सब
कुछ बाजार के हवाले
होगा। चांद सितारे भी।
परमानंद श्रीवास्तव
बी 70, आवास
विकास कॉलोनी, सूरजकुंड
गोरखपुर-273015
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