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मुकदमेबाजी का मनोविज्ञान
विवेकी राय
कुछ
शब्दों को सुनकर मन पर एक विचित्र प्रभाव पड़ता है।
मुकदमेबाज़ी उन्हीं शब्दों में से एक है। यह एक धमाका है,
विस्फोट है और जो इसका अभ्यस्त नहीं है, वह सुनते ही चौंक
जायेगा, उसी प्रकार चौंक जायेगा, जैसे डाकू, पिस्तौल और कैंसर
जैसे शब्द चौंका देते हैं, एक धक्का देते हैं। तब ऐसा क्यों
होता है ?
बात यह है कि यह शब्द एक बहुत बीहड़ जगह से जुड़ा है और वह जगह
है कचहरी। यदि किसी सभ्य आदमी के लिए कहें कि यह व्यक्ति
कचहरी-सेवी है अथवा मुकदमेबाज है तो वह बुरा मान जायेगा। कचहरी
जिसका मोटा अर्थ न्यायालय है, क्यों इतनी बदनाम हुई
?
और उसके संसर्ग से मुकदमेबाजी, जिसकी मूल प्रक्रिया अपने हक की
खोज है, क्यों कलंकित हो गई
?
क्या भारतीय जनमानस की परतों में दासता की वे दुर्भाग्यपूर्ण
ऐतिहासिक स्थितियाँ अभी भी दबी पड़ी हैं, जब अँग्रेज़ी राज में
वर्तमान कचहरियों का निर्माण हुआ, उनकी नींव पड़ी और लाख-लाख
निरीह भेड़ों के सिर पर उन्हें आतंकित करते, दबकाते एक-एक,
दो-दो सफेद भेड़िये जिला केन्द्रों पर आकर जम गए
?
हम देखते हैं, प्रत्येक प्रकार के शोषण का जो चक्र कचहरियों के
माध्यम से चला वह अब भी चल रहा है, अपेक्षाकृत अधिक तेज़ी से
चल रहा है। फलतः मुकदमेबाजी के उस रूप की ओर हमारा ध्यान नहीं
जाता है जिस रूप में यह डूबते को सहारा है, अशरण को शरण है,
दलित-पीड़ित की रक्षा है और न्याय की राह है। हमारा संस्कार
उसकी जिस पहचान पर मुहर लगाये बैठा है, वह उसका एकमात्र काला,
कुत्सित पहलू है। यानी छल, धूर्तता, चोरी जूठ और बेईमानी का
बाज़ार है। तब सवाल है कि उसे ऐसा जानकर भी हम वहाँ जाते क्यों
हैं ?
उसमें फँसते क्यों हैं
?
सचमुच यह सवाल बहुत मार्मिक है कि हम मुकदमा क्यों लड़ते हैं
?
बहुत ध्यान से देखने पर चार वृत्तियाँ उसके मूल में काम करती
मिलेंगी वे चार हैं-आत्मरक्षा, आत्म-स्थापना, युयुत्सा और
पलायन । इसमें आत्मरक्षा एक श्रेष्ठ वृत्ति है। इससे प्रेरित
मुकदमेबाजी की निन्दा नहीं की जा सकती। जिसका हल छिन रहा है,
जिस पर अन्याय हो रहा है तथा जो पीड़ित है, वह न्याय के लिए,
हक के लिए न्यायालय में जायेगा ही। चाहे वादी हो चाहे
प्रतिवादी, वास्तव में हक की लड़ाई बहुत अच्छी लगती है, किन्तु
शुद्ध आत्म-रक्षा की प्रेरणा से उठी मुकदमेबाजी में भी कचहरी,
न्याय और कानून की उन प्रक्रियाओं से गुजरना ही पड़ेगा, जिनकी
छूत से सही का रूप बिगड़कर गलत हो जाता है। आखिर काजल की मशहूर
कोठरी बेदाग कैसे छोड़ेगी
?
यह तो बहुत प्रसिद्ध बात है कि मुकदमे में एक सत्य को सिद्ध
करने के लिए दस असत्य खड़े करने पड़ते हैं और यही वह प्रक्रिया
है कि शुद्ध आत्म-रक्षा-प्रेरित मुकदमेबाजी भी अन्ततः ऐसा
प्रपंच-जाल बन जाती है कि उसमें फँसा आदमी बहुत कठिनाई से
उबरता है। सवाल जब बुद्धि और युक्ति से सिद्ध करने का ही है तो
स्याह को सफेद और सफेद को स्याह सिद्ध कर देना कोई कठिन काम
नहीं है। हमारे समाज में गहरे अनुभवसिद्ध ढंग से एक बात
बारंबार कही जाती है कि अच्छे-भले लोगों को कुछ सहकर भी
कचहरियों में पाँव नहीं डालना चाहिए। इस कथन में सचाई है।
मुकदमेबाजी कुल मिलाकर जब एक नशा है, एक व्यसन है, जुआ है, शौक
है, अहंकार-युद्ध है, खर्च का नाच है, दुर्भाग्यपूर्ण व्यवसाय
है, शोषण का अखाड़ा है और दासता-भरी गुहार है, तो उसे दूर से
ही सलाम !
आत्म-रक्षा के लिए उठा आदमी वहाँ जाकर न जाने कितनी आत्महीनता,
आत्मघात, आत्मछल और आत्म-पतन वाले रोगों को पाल लेता है और फिर
वे जन्म-भर पिंड नहीं छोड़ते हैं। जब सत्य से प्रेरित
मुकदमेबाजी की इस आत्म-रक्षा वाली अव्वल सद्वृत्ति का यह हाल
है तो शेष तीन वृत्तियाँ तो प्रकृत्या हीन कोटि की हैं।
काम-क्रोध और ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित मुकदमेबाजी
में युयुत्सा की प्रवृत्ति, लोभ-मोह से प्रेरित मुकदमेबाजी में
पलायन की प्रवृत्ति और अहंकार-प्रेरित में आत्म-स्थापना की
प्रवृत्ति उभरकर सामने आती है। बहुत जटिल है यह अन्तिम
प्रवृत्ति, एकदम मदहोश कर देने वाली । अहंकार जब गरजता है,
आत्म-स्थापना का ज्वार जब उठता है तो मर्यादा और मानवीयता का
बाँध टूट जाता है। गरजने वाला भी उसमें बहकर नष्ट हो जाय, यह
और बात है। कितने लोग अभी भी गरजते हैं कि दुश्मन को वे
‘लन्दन’
तक लड़ा देंगे !
अथवा ऐसा भी होता है कि एक धूर ज़मीन के लिए मुकदमा
लड़ते-लड़ते सारी ज़मीन बिक गई। बड़ा विकट है आदमी का अहं और
उसका बहुमुखी रूप । कुछ लोग जहाँ अपना हक पाने के लिए अथवा
दूसरे का हक हड़पने के लिए सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं, वहाँ ये
आत्म-स्थापना वाले कचहरी-वीर किसी का हक मारने के लिए अथवा
किसी को नाहक परेशान करने के लिए समरभूमि में उतरे हुए हैं। ये
चाँदी का जूता लिए मंडरा रहे हैं, कचहरी के सागर में मगरमच्छ
की तरह पूंछें फटकार रहे हैं। और इनका जो चेहरा तना है, गरदन
ऐंठी है तथा आँखें चढ़ी हैं, उसमें गम्भीर साधना है। कहते हैं,
इस स्वार्थ-संकुल संसार में वे परामर्श के लिए, परहित के लिए,
परोपकार के लिए पसीना बहा रहे हैं। बात गलत है भी नहीं। अपनी
सम्पत्ति की रक्षा करनेवाले और दूसरों की सम्पत्ति हड़पनेवाले
मुकदमेबाजों से पृथक उनकी तीसरी पहचान बहुत स्पष्ट है। इस
पहचान में भी एक जबरदस्त पहचान है लड़नेवाले से अलग लड़ानेवाले
की । सच पूछा जाय तो ‘मुकदमेबाजी’
और ‘मुकदमेबाजी’
शब्द इन्हीं लोगों पर ठीक बैठते हैं। स्वयं लड़ने से अधिक इनका
दिलचस्प खेल यह लड़ानेवाला होता है। लोग समझें वे भी कुछ हैं।
फिर चलते-चलते व्यवसाय बनाम सेवा का एक और काला परदा यदि भीतर
उठ गया तो फिर इस कचहरी मुनि के अन्तरतम का अनुमान भी कठिन
होगा। बड़ा जटिल व्यक्तित्व है इस व्यावसायिक मुकदमेबाजी का।
इनकी भव्य पोशाक और दिव्य दमकती देह अव्यक्त मुकदमेबाजी की गंध
से रहित होती तो दुनिया में पता नहीं कितने अनर्थ होते । यह तो
प्रकृति का एक अच्छा-खासा इंतजाम है कि चट पहचान में आ जाते
हैं। फिर एक सवाल उठता है कि लोग जान-बूझकर मुकदमेबाजों के
चक्कर में क्यों पड़ते हैं
?
इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। जहाँ काम-क्रोध होगा,
लोभ-मोह होगा, ईर्ष्या-द्वेष का पहरा चढ़ा होगा तथा इनसे
अद्भुत युयुत्सा और पलायन की वृत्तियाँ उकसती होंगी वहाँ
कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय कहाँ से होगा
?
मुकदमेबाजों के चक्कर से बचें भी तो मुकदमेबाजी की लपेट क्या
कम खतरनाक है ?
युयुत्सु व्यक्ति, क्रुद्ध-क्षुब्ध या द्वेष-जर्जर व्यक्ति तो
पागल होता है। ऋण लेकर, घर के गहने बेचकर और सर्वस्व स्वाहा
करके भी वह दहकता रहता है। वह बराबर परपक्ष को अर्थात् बैरी को
ठंडा कर देने की बात करता है। युयुत्सा संक्रामक वृत्ति है,
अतः दोनों ओर एक ही स्थिति होती है। फिर उसकी शाखाएँ-उपशाखाएँ
फूटती हैं। कहा भी जाता है, मुकदमे का अन्त नहीं होता, फिर
निष्कर्ष रूप मे कोई तटस्थ प्रेक्षक निर्णय देता है तो वह
निर्णय सदा एक और दो-टूक होता है कि दोनों की आगे चलकर ठंडे हो
गए। युयुत्सा की गरमी जो कचहरी के रास्ते नसों में चढ़ती है
उसका यही हाल होता है। वास्तव में वैर-विद्वेष की सींगें
भाँजनेवाले मुकदमेबाज बैल नम्बरी सिड़ी होते हैं। नाबदान के
मच्छरों की भाँति ये स्टेशनों पर, होटलों में, कचहरियों के
गलियारों में, वकीलबाड़ी में और मुहर्रिर-पेशकार के यहाँ
भनभनाते रहते हैं। मुकदमे की नवैयत में इनका अकाग्र रहता है कि
उसे देख साधकों को ईर्ष्या हो सकती है। लेकिन उस एकाग्रता की
तीक्ष्ण नोक पर टंगी ‘परगित
हानि’
के लक्ष्य को कितना कोसा जाय जिसके चलते उनका जीवन साक्षात्
रौरव नरक है। स्वयं जल रहा है, दूसरों को जला रहा है। फिर यह
एक अन्तहीन आन्तरिक विषचक्र है। पूरा समाज ही इस चक्र की तामस
धूल से आक्रान्त है तथा समष्टि-मन एक कचहरी बना हुआ है।
अब पलायन की चर्चा करें। 10 बजे से लेकर 4 बजे तक के बीच किसी
भी समय कचहरी में जाइए, मुकदमेबाजों की एक अच्छी-खासी भीड़
दिखाई पडे़गी। कोई कहीं लेटा है, कोई बैठा कुछ खा रहा है, कोई
तेज़ी में है, झोंक में है, कोई पुकार की प्रतीक्षा में है,
सुर्ती मल रहा है, चाय पी रहा है, कोई कुछ बेचैनी से खोज रहा
है, शायद वकील को खोज रहा है, इस प्रकार बहत हड़बड़ी है, बहुत
शान्ति है, बहुत मनसायन है, रंग-बिरंगी बातें, रंग-बिरंगे लोग,
अमीरी-गरीबी का मेला, जय-पराजय का मेला, एक ज़िंदा भीड़, नित
नयी-नयी भीड़, एकरस समुद्र और यह भीड़ क्या खो जाने के लिए,
पलायन के लिए सर्वथा उपयुक्त नहीं है
?
मुकदमेबाज कायर भी होता है। भीतर लोभ-मोह का दबाव होता है। वह
पंचपरमेश्वर के सामने जाने से डरता है। आपसी वार्ता से झगड़ा
निपटाने से कतराता है। उसमें मानसिक आलस्य है, शंका है,
अविश्वास है, फिर भागता है कचहरियों की ओर । वकील नामक प्राणी
उसके लिए कुछ कर दें, हाकिम नामक जीव उसके लिए मार्ग निकाल
दें। हाकिम ईश्वर है। पलायन के लिए इससे उत्तम स्थान क्या होगा
?
लोभग्रस्त व्यक्ति, मोहग्रस्त व्यक्ति, चाहे वह वादी है या
प्रतिवादी है, वह परम असन्तुष्ट है। उसमें प्राप्ति के प्रति
असन्तुष्टि है, अप्राप्ति के प्रति असन्तुष्टि है। वह क्या करे
?
वह बेचारा है। लेकिन चुप बैठेगा क्यों
?
फिर वह कितना निरीह है, हीन है, दुःखी है, दरिद्र है, अपूछ है,
मुकदमेबाजी का नशा सटीक कम कर जाता है। साधारण नशा एक-दो तारीख
में गहरा हो जाता है। फिर बेहोशी में कछ याद नहीं रहता-न हानि
और न लाभ। धँसा है कचहरी में, खोया है कचहरी परलोक है, कछ
रुपया खर्चने मात्र से बना-बनाया परलोक । उसमें रहना एक मुक्ति
है। इस संघर्ष वाले यथार्थ लोक से वह लोक कितना-कितना न्यारा
है ?
पूरे उस संसार को दो भागों में बांटें तो एक ओर वादी-प्रतिवादी
यानी जनता है। मुकदमेबाजों का समुदाय है और दूसरी ओर वह मौलिक
संसार है जिसमें सरकारी सेवक हैं, प्राइवेट सेवक हैं और
व्यवसायी हैं। फिर इस व्यवसायी वर्ग में कई वर्ग-नंबर एक वाले,
नंबर दो वाले और नंबर तीन वाले भी। तब इतना खुशनुमा संसार यदि
पलायन के लिए इतने ठाट-बाट से बना-बनाया पड़ा है तो
मुकदमेबाजों के लिए क्या कमी है
?
शहादत और फैसले को मारो गोली, मुकदमेबाज तो चाहता है, बस
तारीखें पड़ा करें। एक कवि की कविता की पंक्तियाँ सुनाकर मैं
यह मुकदमेबाजी मनोविज्ञान समाप्त करूँ। कहा है-
‘ये
तरीख यूँही बदलती रहेगी,
वही फैसले हैं, शहादत वही है।
विवेकी
राय
विवेकी राय मार्ग, गाजीपुर
उत्तरप्रदेश
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