|
सोलह लघुकथाएँ
उषा जैन शीरी
गैरज़रूरी
‘‘क्यों
सता रखा है उसे तुमने
?’’
बेटे ने माँ से नई-नवेली पत्नी के
विषय में आक्रोश से भरकर कहा।
अत्यंत संवेदनशील वह नारी जो चींटी भी नहीं मार
सकती थी किसी का दिल दुखाने सताने की तो दूर की बात। हैरत से
पहले तो बेटे को देखती
रही। फिर कुछ न बोल अपने भीतर उतरती चली गई।
बहू कुछ रोज के लिए मायके गई थी। अब
घर में सिर्फ माँ और बेटा ही थे। जो माँ बेटे की पीड़ा की
कल्पना मात्र से काँपने
लगती। हर समय अपनी ममता का सागर उस पर लुटाती। न जाने किस
सूत्र से बेटे के अंदर का
सब कुछ जान लेने वाली माँ अब जैसे राख हो गई थी। बेटे के एक
वाक्य ने उस पर कहर ढा
दिया था। अब बेटे की उपस्थिति को नकारती-छुपाती।।अपने ऊपर
विश्वास मानो खो चुकी थी।
उसके भीतर जैसे सब चूक गया था। वह बीमार रहने लगी।
जिसकी किसी को ज़रूरत नहीं
उसका मर जाना ही अच्छा माँ के हृदय से आवाज आती रही और एक दिन
वह सचमुच मर
गई।
***
डिप्लोमेसी
अरिंजय वैसे तो माँ को काफी फरमाबरदार बेटा लगता लेकिन,
बीवी के सामने
आते ही वह रंग बदल लेता। अकारण ही वह माँ से झगड़ा कर उसके काम
में नुक्स निकालता,
बदतमीज़ी से बोलते हुए बीवी के चेहरे पर आयी खुशी की लाली में
संतुष्टि
खोजता।
बीवी की अनुपस्थिति में जब माँ आँखों में आँसू लिये शिकवा करती
तो वो लाड
में माँ की गोद में सर रख कर कहता,
‘‘ममा
प्लीज,
मेरी खुशी के लिए इतना-सा सहन कर
लिया करें। मेरे आपसे इस टोन में बात करने से जरा रैना खुश हो
जाती है बस ! आपको तो
पता ही है वह कैसी बिगड़ैल घोड़ी है। जरा उसे साध लूँ फिर,
आपको शिकायत का मौका
नहीं मिलेगा।’’
बेटा बीवी से ज्यादा मुझे अपना समझता है माँ के झिलमिलाते
आँसुओं
के पीछे इंद्र धनुष लहरा उठता।
***
ट्रेजेडी
माँ की मृत्यु के बाद पिताजी बिल्कुल अकेले पड़ गए। अपना
आक्रोश
निकालने का जरिया न रहने के कारण वे बेहद घुटन महसूस करते। दिन
भर कमरे से उस कमरे
में बेचैनी से पिंजरे में बंद शेर की तरह चक्कर काटते रहते।
खाने के वे बेहद
शौकीन थे। माँ कितनी भी तब़ीयत खराब होती तब भी उनके लिए कचौरी,
समोसे दही बड़े
बनाती रहती थी। अब ये सब खाने की तीव्र इच्छा होने पर वे होठों
पर जीभ फेर रह जाते।
बहू की दी हुई ब्रेड और दूध दलिया से उन्हें अक्सर उबकाई आती।
किंतु उससे कुछ भी
कहने की उनकी हिम्मत नहीं होती।
पिताजी घोर नास्तिक थे। मंदिर पूजा-पाठ के नाम
से ही उन्हें सख्त चिढ़ थी। समय बिताने का यह जरिया भी उनके
हाथ में न था। उनके हम
उम्र लोग सभी ईश्वर देवी-देवता को मानने वाले थे। इसलिए
विचारों के मेल न खाने से
उनकी उनके साथ भी न पटती। वे हमेशा जवान लोगों में उठना बैठना
चाहते लेकिन जवान लोग
उन्हें तनिक भी लिफ्ट ही न देते।
बुढ़ापे ने उन्हें गले लगा लिया किंतु वे
बुढ़ापे को स्वीकार नहीं कर पाए।
***
औकात
औरत पिटती हुई तड़प रही थी। उसे देखकर पड़ोसी को दया आ गई।
उसने उस
औरत के पति से कहा,
‘‘क्यों
भई क्यों एक अबला पर जुल्म ढा रहे हो ! देखो बेचारी किस
कदर जख्मी हो गई।’’
पति बोला,
‘‘श्रीमान्
पहली बात तो अब यह अबला नहीं मुझसे
ज्यादा कमाती है। इसमें इस बात की फूँक न भर जाए इसीलिए
कभी-कभी दो चार हाथ जमाने
पड़ जाते हैं ताकि,
यह अपनी औकात में रहे। लेकिन आप यहाँ क्यों अपनी करुणा जाया कर
रहे हैं जाइए महाशय उसे अपनी बहन-बेटियों के लिए बचा रखिए।
***
माँ के गाल
‘‘पापा
माँ के गालों पर लाल गुलाब खिलते हैं न
?’’
‘‘कौन
कहता है’’
पापा शक से चौकन्ने हुए आँखों में हरापन और गहरा गया।
माँ के गालों के लाल गुलाब
पीले गुलाबों में परिवर्तित होने लगे। मगर मुन्नी इससे बेखबर
चहकते हुए बोली,
‘‘मैडम
डिसूजा और कौन !’’
पापा की आँखों का भूरापन लौट आया और पीले गुलाब फिर लाल
हो गए।
***
सुरक्षा
‘‘शादी
से पहले मैं कितनी आजाद थी। कॉलेज जाकर मैं क्या करती थी। यह
कोई नहीं पूछता था। लेकिन अब केवल घर के पिंजरे में कैद होकर
रह गई
हूँ।’’
पड़ोसी राकेश नीना की फरियाद सुनकर कुछ कहता इससे पहले ही
पिंजरे में बंद
पक्षी पुकार उठा-‘‘हाय
हलो..हाय...हलो।’’
‘‘अरे
महेश,
ये पक्षी कब ले आये
?
अभी
कल ही तो...
भई पता नहीं क्यों आजाद रहने वाले पक्षियों को पिंजरे में बंद
देखकर मुझे बड़ा दु:ख होता है।
इसमें दु:ख की क्या बात है। महेश ने पत्नी नीना
की ओर देखते हुए कहा।
‘‘कुछ
जानवरों का जन्म कैद में रहने के लिए ही होता है
क्योंकि वे वहीं ज्यादा सुरक्षित रहते हैं।’’
***
बेवजह
रात के बारह बज रहे हैं। शैफाली आज फिर सफेद रंग की मारुति में
आई है।
सरल ने देखा उसके बॉस पी।के। उसे सहारा देकर सीढ़ियों तक
पहुँचा गए हैं।
पत्नी
के कमरे में घुसते ही वह उस पर बरस पड़ा,
‘‘क्या
तुमने मुझे भड़ुवा समझ रखा है जो
मैं यह सब खामोशी से बर्दाश्त करता रहूँगा। नहीं करवानी मुझे
तुमसे नौकरी। कल से घर
बैठो।’’
‘‘नौकरी
तो मैं छोड़ने से रही।’’
‘‘मतलब
?’’
‘‘मतलब
साफ है उसके
लिए मैं तुम्हें छोड़ सकती हूँ।’’
‘‘अब
नौबत यहाँ तक आ पहुँची है
?’’
‘‘ये
तो
तुम्हें पहले ही सोच लेना था जब तुमने प्रमोशन के लिए मुझे
इस्तेमाल किया था। अब
सिर्फ मैं अपने लिए अपने को इस्तेमाल कर रही हूँ। तुम्हारा
गुस्सा बेवजह है।’’
शैफाली ने ठंडे लहजे में कहा और सिंक में चेहरा धोने लगी।
***
सबसे अच्छी मम्मी
नन्हा सोमू बहुत जिद्दी था। जिद चढ़ जाती तो माँ की बाँहों से
फिलल-फिसल जाता,
हाथ पैर फेंकता,
बिल्कुल बेकाबू हो रहता।
मम्मी सुंदर,
जवान
वैसे तो काफी धैर्यवान् थी। अपने दुलारे पर हर माँ की तरह जान
छिड़कती लेकिन इंसानी
फितरत...एकदम अनप्रेडिक्टेबल। क्या कहा जा सकता है कब क्या कर
बैठे। समाज ने उस पर
भले लाख अंकुश लगाए हों।
पापा सुबह जाकर देर रात तक काम से लौटते। मम्मी को
अकेले ही सोमू की देखभाल करनी पड़ती।
आज भी सोमू उखड़ गया था। बरस वो जिद चढ़ी
कभी मम्मी के गाल कभी आँखें कभी बाल नोचे।
चिल्लाए...एकदम बेकाबू। जाने क्या हुआ
मम्मी को पल भी नहीं लगा सोमू को कंस की तरह फर्श पर दे मारा।
सोमू सहमकर चुप हो
गया। मम्मी वो पल याद करती और रोती। साल दर साल बीते सोमू जवान
सुंदर सजीला युवक बन
गया। मम्मी देखती,
गर्व से भर उठती दूसरे ही पल वो पल याद आ जाता। अगर मेरे सोमू
को
कुछ हो जाता
?
सोमू..मातृभक्त सोमू अपनी मम्मी को दुनिया की सबसे अच्छी मम्मी
समझता।
***
माँ और बच्चा
खुले दिल,
खुले विचारों के विदेश से लौटे डॉक्टर पार्थासारथि विवाह को
महज सामाजिक औपचारिकता मानते थे जो उनके लिए निहायत ही
गैरजरूरी बात थी।
ऐसा ही
सोचती थी,
देश की टॉप मॉडल्स में से एक मिस रिया राजन। दोनों के मन मिले
और वो एक
साथ एक ही फ्लैट में देह और मन की दूरियाँ तय कर रहने लगे।
रिया न चाहते हुए भी
प्रेगनेंट हो गई। गर्भपात के प्रयास में ली हुई सभी गोलियाँ
बेअसर ही रहीं। गोलियों
की मार से जन्मा बच्चा एबनॉर्मल था कटे-मुड़े कान,
अष्टावक्र सी टाँगे-बाँहें
!
‘‘मेरे
साथ अमेरिका चलना है तो इससे छुटकारा पाना होगा।’’
डॉक्टर ने दो टूक
फैसला सुनाया।
‘‘क्या
?
’’
रिया की आँखें भय से विस्फारित थी। तुऽम इसे मार
डालना चाहते हो !
इसी की बेहतरी के लिए कह रहा हूँ,
ऐसे आधा अधूरा जीवन लेकर ये
क्या करेगा।
नहीं मैं तुम्हें इसे मारने नहीं दूंगी,
ये मेरा बच्चा है,
इसने
मेरी कोख से जन्म लिया है।’’
रिया का मातृत्व जाग उठा था।
सोच लो ! फिर तुम मेरे
साथ अमेरिका नहीं जा पाओगी। एक तरफ तुम्हारा कैरियर,
सक्सेस तुम्हारी
महत्त्वाकांक्षाएँ है। दूसरी तरफ यह लिजलिजा मांस-पिंड।’’
‘‘छि:
तुम एक इंसान हो
?
मुझे शर्म आ रही है,
अपने पर। घिन आ रही है इस बदन से,
जिसे तुमने छुआ। तुम्हें
मुबारक तुम्हारा कैरियर,
सक्सेस,
महत्त्वाकांक्षाएँ। जैसा भी है मुझे मेरा बच्चा
जान से ज्यादा प्यारा है।
***
प्रश्नचिन्ह
मम्मी ने बंटी से बीस बार सवालों की स्पेलिंग लिखवाई थी,
लेकिन आज फिर
बंटी ने एस डबल्यू ए एल-एल ओ डबल्यू की जगह एस वी ए एल-एल ओ
डबल्यू लिख दिया
था।
नौकरी पेशा मम्मी अक्सर तनावग्रस्त रहती थीं,
मिंकी के हो जाने से उनका
कार्यभार जो बढ़ गया था। सुबह पापा से भी काफी कहा-सुनी हुई
थी। महरी भी आज छुट्टी
कर गई। तनावग्रस्त नौकरीपेशा मम्मी के गरम खून का उबाल निकला
बेचारे बंटी पर मम्मी
ने गुस्से के अतिरेक में किचन से नई खरीदी हुई तेज धार की छुरी
उठाई और बंटी को
उससे गोद डाला। उनके मकान के सामने से गुजरती एक गरीब माँ अपने
भूखे बच्चे को अपने
हिस्से की रोटी खिलाकर जो तृप्ति महसूस कर रही थी उसने
आधुनिकता के तौर-तरीकों पर
प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
***
ममता
‘‘मैं
लेडीज क्लब की एक जरूरी मीटिंग में जा रही हूँ। बाबा उठे तो
उसे
खिलौनों से बहलाना। ज्यादा रोये तो कल लाई हुई टॉफियों में से
एक खिला देना। उससे
बाबा सो जाएगा।’’
पुल के नीचे से इस बीच बहुत-सा पानी बह गया था। तीस साल बाद
वृद्ध माता-पिता अपने इकलौते बेटे को डिएडिक्शन सेंटर ले जा
रहे थे।
मनःचिकित्सक
ने जब माँ से जानना चाहा कि उनके बेटे को नशे की लत कैसे पड़ी।
तो माँ अपराध बोध से
ग्रस्त फूट पड़ी। फिर खामोश हो गई। पति इसे बेटे के प्रति माँ
की ममता समझ पत्नी की
ओर करुणा से देखने लगे।
***
हिसाब
‘‘माँ
आपने दो महीने पहले मार्केट में मुझसे दो सौ सत्तर रुपये लिये
थे।’’
बड़े बिजनेस मैन बेटे ने अलग रहने वाली निम्न मध्यवर्गीय माँ
को याद
दिलाया।
हाँ बेटे मुझे याद है।’’
कहते हुए माँ ने उसी समय सौ के तीन नोट बेटे को
दे दिये।
मेरे पास टूटे नहीं हैं’’
बेटे के ये कहने पर
‘‘कोई
बात नहीं’’
कहकर
माँ बेटे की पसंद का हलवा बनाने रसोई में चली गई।’’
उस दिन भी बेटा माँ से मिलने
आया था। ठेलेवाले के पास बढ़िया सेब देखकर उसने माँ से रुपये
लेकर अपने परिवार के
लिए सेब खरीद लिये।
कुछ दिन बाद मिलने पर जब वह माँ को पैसे लौटाने लगा,
माँ की
आँखों में आँसू आ गये उसके पैसे न लेने पर बेटा बोला,
‘‘ये
तो हिसाब की बात है,
तीस
रुपये इसमें पहले के भी हैं।’’
‘‘बेटे
तू मुझसे हिसाब कर रहा है
?
फिर ऐसा कभी
मत करना। तू किस-किस बात का मुझसे हिसाब करेगा। बोल !
|