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ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
भूख से लड़ती,धूप
में तपती
कर्मठ सुकोमल नारी को देखा है
ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
गला सूखा,
जीभ प्यासी
फिर भी अपने जिगर के टुकड़े को
वक्ष से लगाकर पयपान कराते देखा है
ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
मैली कुचैली तार-तार
फटी साड़ी में सहम कर
तनमन छुपाते देखा है,
ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
खुद भूखे पेट रहकर भी
पेट की ज्वाला भड़कने पर भी
घरवालों को भरपेट खिलाते देखा है
ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
फूस की झोंपड़ी में
तेज ऑंधी-पानी में
खुद भीगते हुए भी
अपने बच्चे को बचाते देखा हैं
ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
हर नई सुबह
सुनहरे भविष्य के सूर्य के उगने के इंतजार में
आशान्वित होते देखा है
ऑंसू को मुस्कान में ढलते देखा है
स्वाति चढ्ढा
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