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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

शैलेन्द्र चौहान की दो कविताएँ

थोड़ी सी ऊष्मा

प्रक्रिया मे पेड़ बनने की

कोई पौधा चाहता है

थोड़ी सी ऊष्मा, थोड़ा सा जल

और थीड़ी ईमानदारी

परवरिश में

 

ठीक यही

यही सब कुछ

ऊष्मा थोड़ी सी, स्नेह

थोड़ी ईमानदारी

होती है ज़रूरी

संबंधों में भी

आदमी और आदमी के

 

बढ़ते जाते हैं पग

अनुभूति बनी रहती है

आनंद की मन में

बना रहता है प्रवाह

जीवन में

 

सनक जाने की ख़बर

 

मुड़ जाते हैं पैर

अर्धचंद्र की तरह

जैसे हो गया हो

नारू रोग

 

बोझिल होती ज़िंदगी

पनपती कुंठाएँ

टपकने लगता बुढ़ापा असमय

मन और शरीर से

 

कभी याद आती

बेतरतीब बातें

कभी भूलती

सुबह शाम की स्मृतियाँ भी

 

मन नही होता

कुछ करने का ठीक से

घर, बाहर अक्सर

हो जाती तकरार

 

खीझता है आत्मविश्वास

जब नही होती

सहजता संबंधों में

 

कभी किसी बात का

सहज कर लेता यकीन

कभी बात-बात मे टटोलता

कि सही क्या है

 

झिड़कता साथियों को

खीझता असमर्थता पर अपनी

कोसता ज़माने को

सनक गया है

कहते लोग अक्सर

चल देते मुँह फेरकर

शैलेन्द्र चौहान

34/242, प्रताप नगर, सैक्टर-3,

जयपुर, राजस्थान

                                 

                           ◙◙◙

 

हिंदी कविता

 

- डॉ. रंजना अरगड़े

- शैलेन्द्र चौहान

- पंकज त्रिवेदी

- आकांक्षा यादव

- स्वाति चढ्ढा

- गुलशन

 

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