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साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

 गुलशन की दो कविताएँ

प्रतिनिधि

 

अब पहचानने लगा हूँ तुमको

पिछले कई वर्षों से

साल में एक दो बार

तुम्हारी कुछ झलकियाँ देखता आया हूँ

 

तुम वही हो न

जो राष्ट्रीय स्तर के

हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में

पहली पंक्ति के एकदम बाद

कैमरे के फ़्रेम में एकदम फ़िट

दिख ही जाते हो?

 

और तुम वही हो शायद

जो ग़ज़ल से लेकर भजन तक

शास्त्रीय नृत्य से लेकर गायन तक के

हर बड़े कार्यक्रम में

आर्ट कही जाने वाली फ़िलमों के प्रीमियर में 

दिखने से बचते हो नहीं

चमकते हैं तुम्हारे डिज़ाईनर कपड़े

सूट, टाई, शेरवानी, स्लीवलैस ब्लाउज़, शाल

भाता है तुम्हारे बैठने का अन्दाज़

 

शुरू में लगा मुझे कि

तुम्हें इन सब का बड़ा ज्ञान है

रूचि है शायद तुम्हारी

 

और जिस अन्दाज़ में तुम

ग़ज़ल की मेहफ़िल में

सीर्फ़ ओठ हिलाकर वाह-वाह करते

या भजन सन्ध्या में

एक ऊँगली पर टेककर माथा

ध्यान मग्न रहते

ऐसा लगना था ही मुझे

 

लेकिन अब पहचानने लगा हूँ तुमको

 

तुम वही हो न

जिसके बच्चे विदेश से

यहाँ सीर्फ़ छुट्टियाँ मनाने आते हैं?

वही हो न तुम

जिसे रोमन लिपि में हनुमान चालीसा चाहिए

जिसके यहाँ परम्पराएँ

सीखीं जाती हैं

टीवी पर देखकर सिरियल

 

हाँ तुम वही हो

जो चुनावों से साल भर पहले

कुछ ज़्यादा ही नज़र आते हो

ऐसी जगहों पर जहाँ तुम

हमारे लिए उनके

और उनके लिए हमारे

प्रतिनिधि की तरह दिख सको

हमारे लिए तुम

हमारे जैसों के लिए तुम

महफ़िलों, सन्ध्याओं, पर्फ़ोमैंसज़ में

रूचि के लिए

वो बन जाते हो

जिसके पीछे हम

भागा करते हैं

और इसीलिए शायद

उनके लिए तुम

हमारे प्रतिनिधि बन जाते हो

उनका एक ऐसा चेहरा

जिसमें हम अपना चेहरा देखने का

शौक रखते हों

 

 

फ़र्क इतना होता है

कि हमारी ताप,

हमारी चोट,

हमारी टीस

और हमारी खीस की तुममें

सीर्फ़ छाया होती है

जबकि वास्तव में होते हो तुम

इन सब से रिक्त,

नपुंसक !

 

अब पहचानने लगा हूँ तुमको

भाषा,

धर्म,

संस्कृति

सभ्य-ता

बौद्धिकता के नाम पर

मुझे उसको

और उसे मुझको

बेचने वाले

दलाल हो तुम

 

टिश्यू पेपर

 

टिश्यू पेपर बना रखा है तुमने

मुझे और अपने आस पास के सभी लोगों को

तुम्हारे हर काम में इस्तेमाल किये जाने वाले

तुम्हारी हर गन्दगी को साफ़ करने वाले

 

कोई विशेष हुनर दिखता हैं तुममें

कि हर बार बिना किसी औपचारिकता के

प्रयोग कर जाते हो हमारा अन्दर तक गन्दला कर जाते हो हमें

और खुद साफ़ रहते हो

एकदम क्लीन

 

एक प्रार्थना हैं फिर भी

कि फेंक दिया करो

इस्तेमालशुदा टिश्यू पेपर

फ़्ल्श कर दिया करो

 

बार बार प्रयोग करने से

हमारी गन्दगी तो बढ़ती ही है तुम भी साफ नहीं रह पाते हो

 

अब तो तुमसे

अजीब सी

उबकाई देने वाली बदबू आने लगी है...

    गुलशन कुमार

मॉरीशस

◙◙◙

 

हिंदी कविता

 

- डॉ. रंजना अरगड़े

- पंकज त्रिवेदी

- आकांक्षा यादव

- स्वाति चढ्ढा

- गुलशन

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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