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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। व्याकरण।।

 

 

एक शब्द

आँखें


डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

 

आँखों की महिमा बड़ी विचित्र है। यह बताने की तो कोई आवश्यकता है ही नहीं कि आँखों की जीवन जगत में क्या महत्व है। इसकी महत्ता कोई आँख वाला नहीं बता सकता। यदि महत्व जानना है तो उससे पूछिये जिसके पास आँखें नहीं है। आँखें हैं तो सारा जहान देखा जा सकता है। सारा जहान आँखों में समा सकता है। आँखें छोटी भले ही हों, हैं बड़ी क्षमता वाली। तभी तो आँखों ही आँखों में जाने क्या से क्या हो जाता है।

 

आँखें आती है, आँखें जाती हैं लेकिन न आँखों का आना अच्छा होता है और न जाना ही। दोनों स्थितियाँ दुखद है। आँखें खुलती हैं, आँखें मुंदती हैं। आँखें खुल गईं तो तो आप संसार को समझ गये। कितनी ही मुसीबतों से बच गये क्योंकि आँखें कई बार तमाम ठोकरें खाने के बाद ही खुलती हैं। ठोकरों के बाद भी जिसकी आँखें नहीं खुलती, उसका बरबाद होना सुनिश्चित है। पर जब आँखें मुंद दी तो सारा भविष्य समाप्त हो गया । फिर काहे की काया, काहे की माया। मुंदीं सो मुंदीं। आँखें मुंदने के बार कोई पीड़ा नहीं रहती । पर आप सोचें कि स्वंय आँख मूंद कर परेशानियों से बच जायें तो संभव नहीं है। सत्य से आँख मूंदना कठिन होता है। कब तक आप आँख मूंदकर रह सकते हैं। इसलिये आँखें खोलकर काम करना चाहिए। जिम्मेदारियों को निभाना चाहिये।

 

आँखें जब किसी से लग जाती हैं-तो आदमी का चैन चला जाता है। जिससे लगती हैं फिर नहीं-दिखता है, बेचैनी बनी रहती है। लगी आँखें इतिहास बना देती हैं। लैला-मजनू हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, आदि ऐतिहासिक घटनायें लगी आँखों की देन हैं । ऐसी लगी आँखों को जबान या हाथ-पाँव की ज़रूरत नहीं होती । आँखों ही आँखों में बातें हो जाती है। मिलना जुलना हो जाता है। इतना ख्याल नीची हो जायें। स्वयं आँखें नीचे करके बात करना तो शील और मर्यादा की बात है किन्तु किसी दुष्कृत्य से आँखें नीचे होना बदनामी की बात है। कभी-कभी कोई आदमी किसी की आँखों की किरकिरी बन जाता है तब आँखें उसे देखना नहीं चाहती । उससे दूर रहती हैं। लेकिन जब किन्हीं कारणों से आँखें दुखती हैं तो लगता है कि इससे अच्छा है फूट जायें । लोग बुरी नज़र वालों के लिये तो मनौती करते हैं कि उसकी आँखें फूट जायें । आँखें फूटने पर देखने का प्रश्न ही नहीं है।

      

क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं। सामने वाले को हम आँख चढ़ाकर देखते हैं और अत्यधिक क्रोध में तो आँखों से चिनगारी ही फूटने लगती है। क्रोध में चाहे जिसे आँखें दिखाते-फिरते हैं। कभी-कभी तो जब आँखों में खून ही उतर आता है तो आदमी कुछ भी कर बैठता है। इनसे बचना ज़रूरी है क्योंकि जो इनकी आँखों में चढ़ जाता है उसकी खैर नहीं होती वह आँखें तरेर-तरेर कर दूसरों को आँखें बताता फिरता है।

 

आँखें पानी में तैरती हैं। आँखों का पानी गया तो सम्मान भी गया। इसलिये आँखों का पानी बचाना चाहिये। आँखों का पथराना जड़ता-कठोरता का सूचक है। आँखों का लगना अच्छा लगता है पर आँखें लग जाने पर फिर आँखें ही नहीं लगती। नींद हराम हो जाती है. ऐसे में कछ लोग आँखों का काँटा भी बन जाते हैं। हम किसी को आँखों में रखना चाहते हैं क्योंकि वह आँखों की पुतली बनकर आँखों में झूलता रहता है। भले ही आँखों का यह तारा अपने स्नेही की आँखों में धूल झोककर अलग खड़ा हो जाये।

 

हम जिसे आँखों में बसाते हैं उसे आँखों में रमाकर रखते हैं । एक पल को भी आँखें उससे बिछुड़ना नहीं चाहतीं। यदि बिछुड़न का कष्ट सहना पड़े तो आँखें भरभर आती हैं। उन डबडबाई आँखों से आँख की पीर समझी जा सकती है और तब पीड़ित आँखें कहती हैं कि यदि आँखें फूट जाती तो हम भी कहते कि आँख फूटी पीर गई। क्योंकि प्रेमी को देखने की लालच में न आँखें झपकती हैं, न स्थिर रहती हैं। हर क्षण ये आँखें  उसी को ढूँढती रहती हैं। इस आँख मिचौली में जो बीच में आकर व्यवधान खड़ा करता है। वह आँखों का काँटा बनकर उन आँखों में गढ़ने लगता है। आँख आँखों का शील और मर्यादा तोड़कर प्रेम के प्रवाह में ऐसे-ऐसे कारनामें करती हैं कि न आँखों पर किसी के डाटने का असर होता है और न आँखों पर नियंत्रण होता है। आँखों ही आँखों में मुसकुराना, आँख मारकर आँखों ही आँखों में इशारा करना, बतियाना, आँखों का अपने प्यारे-उजियारें के इशारों पर नाचना, आँखों के तीर और पिचकारी से एक दूसरे को पीड़ित या प्रयत्न करना इनके बाँये हाथ का खेल है। ये जरा देर को एक दूसरे से अलग हुये कि लगता है युगों से अलग हैं। पत्ते की ओट को भी ये पहाड़ की ओट मानते हैं। आँख ओट पहाड़ ओर शायद इसीलिये कहा गया होगा।

   डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

एम.आई.जी. 12

चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश 

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