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पंजाबी
उपन्यास(धारावाहिक-4)
रेत
हरजीत अटवाल
अनुवादः सुभाष नीरव
(आपने अब तक पढ़ा -
भाग
एक
/
भाग दो
/
तीन
) आगे पढ़िए-संपादक
‘ग्रैश्म
नाइट क्लब’
किसी समय उत्तरी लंदन में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुआ करता था।
आरंभ में यह एक आयरिश क्लब था,
लेकिन यहाँ अंग्रेज भी खुश होकर आया करते। थोड़े-बहुत काले भी
होते। एशियन तो बहुत ही कम आते। इस इलाके में एशियन कम ही थे।
जो थे,
वे नाइट क्लबों के शौकीन नहीं थे क्योंकि क्लबों में पैसे खर्च
होते थे और झगड़ों का डर भी रहता।
हौलोवे रोड पर स्थित यह क्लब वीक-एंड पर ही खुलता। मतलब–
शुक्रवार,
शनिवार और इतवार। शाम के छह बजे से लेकर प्रात: चार बजे तक का
समय था इसके खुलने का। कानूनी तौर पर तो रात दो बजे बन्द हो
जाता,
पर लोग प्रात: चार बजे तक बैठे रहते। बाहर से देखने पर यह इतना
बड़ा नहीं लगता था,
लेकिन अन्दर जाने पर पता चलता था कि यह बहुत बड़ा क्लब था,
जिसमें कई हजार लोग डांस आदि का आनन्द उठा सकते थे।
अन्दर प्रवेश करते ही बायें हाथ पर टिकट खिड़की थी। फिर कुछ
सीढ़ियाँ चढ़कर अन्दर जाने के लिए चौड़े दरवाजे थे,
जिनके आगे तीन-चार बाउंसर खड़े रहते ताकि अगर कोई गड़बड़ करे
तो उसे उठाकर बाहर फेंक सकें। अगर कोई ठीक से कपड़े पहनकर न
आया हो तो उसे रोक सकें। दरवाजे से अन्दर घुसो तो दायें हाथ
डिस्को हॉल था,
जहाँ तेज ताल वाला संगीत चल रहा होता। नौजवान ही इस हॉल में
ज्यादा हुआ करते। चलते संगीत में डिस्क-जोकी अपने कमेंट्स देता
रहता। नाचने वालों के भीतरी जोश को तीखा करता रहता।
यहीं से,
बायीं ओर बालकॉनी के लिए सीढ़ियाँ थीं। बालकॉनी में चिप्स आदि
तथा अन्य खाने-पीने की चीजों की दुकान थी और बालकॉनी में खड़े
होकर पूरे हॉल का नज़ारा देखा जा सकता था। अगर आप डिस्को हॉल
में नहीं जाना चाहते तो सीधा रास्ता बड़े हॉल की ओर जाता था।
हॉल में मेज-कुर्सियाँ भी लगी थीं। खड़े-खड़े बियर पीने का भी
प्रबंध था। बायीं ओर एक लम्बी बार थी। उससे आगे,
डांस फ्लोर। डांस फ्लोर से आगे एक स्टेज था,
जहाँ संगीत चलता था। अगर डी.जे. चलाना हो तो भी,
अगर किसी ग्रुप ने गाना गाना हो,
तो भी। अधिकतर कोई मशहूर ग्रुप ही बुलाया जाता। लोगों को
इकट्ठा करने के लिए किसी नामी ग्रुप को बुलाना पड़ता। वह ग्रुप
कुछ अपने और कुछ दूसरे ग्रुपों के ताजा गाने पेश किया करता।
अधिकतर गाने उनकी अपनी मर्जी के हुआ करते। कभी-कभी फरमाइशी गीत
भी गा देते। ग्रुप के सभी मेंबर बारी-बारी से गीत गाते ताकि
मुख्य गायक थोड़ा दम ले सके। जैसा गीत चल रहा हो,
वैसे ही लोग उठकर डांस फ्लोर पर नाचने के लिए चले जाते। किसी
की मन-पसन्द धुन होती तो नाचने से खुद को रोक पाना उसके लिए
मुश्किल हो जाता। जैसे-जैसे रात गहराने लगती,
गाने वाले प्रेम की गहराइयों की बात करने लगते। संगीत की तान
धीमी होती तो डांस भी धीमा हो जाता। जोड़े एक-दूजे को बांहों
में लेकर झूमते हुए नृत्य कर रहे होते। रोशनियाँ बन्द कर दी
जातीं। कभी ऐसा संगीत भी बजने लगता कि सारा हॉल ही डांस फ्लोर
पर आ जुटता। कभी-कभी लोग गोल-दायरा बनाकर एक-दूजे का हाथ थामे
नृत्य करते। रात के दो बजे नेशनल ऐंथम के साथ नृत्य समाप्त
होता। ‘रानी
अमर रहे’
वाला कौमी तराना सभी क्लबों में नहीं गाया जाता। कम से कम
‘ग्रैश्म’
में तो नहीं ही। यहाँ आयरिश कौमी तराना ही गाया जाता क्योंकि
यहाँ अधिकतर आयरिश ही होते थे।
मैं इस क्लब में जाता रहता था और इससे अच्छी तरह से परिचित था।
नाचना मुझे आता नहीं था। बस,
टांगें-बाहें हिलाकर काम चला लेता था।
‘हैमरस्मिथ
पैले’
में युवा वर्ग अधिक आता। जब तक एक इंडियन लड़की एक जाने-माने
ग्रुप के साथ यहाँ आती रही,
मैं निरंतर ‘हैमरस्मिथ
पैले’
में जाता रहा। वह ताशा बजाया करती थी और कभी-कभी कोई गीत भी
गाती। संगीत खत्म होने पर मैं उसे खोजता रहता ताकि उसका
आटोग्राफ ले सकूँ या कोई बात ही कर सकूँ। लेकिन,
वह छिप जाया करती। जब वह स्टेज पर होती,
मुझसे आँखें मिलते ही शरमा जाती। यहाँ भी इंडियन लड़के कम ही
होते थे।
उस दिन बीटर्स को नाइट क्लब लेकर जाना था। मैंने
‘ग्रैश्म’
में जाना ही पसन्द किया।
‘ग्रैश्म’
का माहौल मुझे अच्छा लगता था। हमें देर हो गयी थी जिसके कारण
टिकट भी मँहगा मिला। घर से निकलते हुए हमें पहले ही देर हो गयी
थी,
उस पर बीटर्स को स्कर्ट पसन्द नहीं आ रही थी जबकि इस बारे में
उसने कभी परवाह नहीं की थी कि उसने क्या पहन रखा है। जब उसने
कैथी की स्कर्ट उधार माँग कर पहनी,
तभी हम जा पाये। पहुँचने में भी आधा घंटा लग गया। हम
‘ग्रैश्म’
पहुँचे तो संगीत की महफिल पूरे यौवन पर थी।
पहले हम डिस्को हॉल में गये। बीटर्स आज एक कमसिन लड़की की तरह
बात कर रही थी। कंधे झटक कर नृत्य करते समय अधिक जोर लगाती।
फिर हम मुख्य हॉल में गये। हॉल भरा पड़ा था। बीटर्स एक खाली
पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी और मैं बियर लेने वालों की कतार में जा
खड़ा हुआ। भीड़ इतनी थी कि बियर लेने के लिए पन्द्रह-बीस मिनट
प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी। कतार में खड़ा मैं देख रहा था कि
बीटर्स को नृत्य के लिए दो-तीन निमंत्रण आये,
पर वह मेरी ओर देखती,
हँसती और ‘न’
करती रही। बीटर्स आज सुन्दर भी बहुत लग रही थी। दो बच्चों की
माँ तो वह वैसे भी नहीं लगती थी। मैं सोचने लगा कि कहीं कोई
उसे मुझसे छीनकर ही न ले जाए। फिर किसी के साथ मुझे लड़ना पड़े।
बीटर्स अच्छा नाच लेती थी। उसे बाल-डांस अच्छी तरह आता था।
स्कूल में सीखा होगा। वह मुझे नृत्य के बारे में बताने की
कोशिश कर रही थी। शोर इतना था कि कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था।
डांस खत्म होने पर मैं वापस बैठकर बियर पीने लगा और बीटर्स
बाथरूम में चली गयी। तभी मेरे पास एक सुन्दर-सी लड़की आ खड़ी
हुई। उसने जांघों तक स्कर्ट पहन रखी थी। उसने मुझे अपने संग
नाचने का न्यौता दिया। न्यौता देते समय वह अपनी जांघ मेरे करीब
लाकर हिलाने लगी थी। मैं उठकर खड़ा हो गया। उसकी जांघें और
छातियाँ बीटर्स से भारी थीं। उसने जिस लहजे में मेरा साथ मांगा
था,
मैं इन्कार नहीं कर पाया। मैं उसके संग चल दिया। नाचते हुए वह
लड़की अपने बारे में बताती रही,
पर कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। बीटर्स लौट आई। वह मेरी ओर
देखे जा रही थी। उसका चेहरा गुस्से में तना पड़ा था। मैंने दूर
से हाथ हिलाया तो वह थोड़ा-सा मुस्कराई। दो गानों तक मैंने उस
लड़की के साथ डांस किया। डांस खत्म कर लड़की अपने दोस्तों के
समूह में जा मिली और मैं बीटर्स के पास आकर बैठ गया। मैंने उसे
चूमा तो वह ठीक हो गयी।
अंत में,
आयरिश नेशनल ऐंथम चला और संगीत का शोर खत्म हुआ। कानों को कुछ
राहत मिली। अब लोगों की हँसी और बातों का शोर-शराबा रह गया था,
जो कि पहले की अपेक्षा कुछ भी नहीं था। बीटर्स बैंड के सदस्यों
से मिलना चाहती थी। उनकी कैसेट्स उसके पास थी। हम स्टेज के
करीब गये तो वे सभी हमसे बड़े चाव से मिले। मुझसे मिलकर वे और
भी खुश थे कि एक इंडियन भी उनका फैन था।
हम घर लौटे तो सुबह चार बजने वाले थे। बच्चे कैथी के पास थे।
इस वक्त उन्हें जगाना हमने उचित नहीं समझा।
मुझे बीटर्स में ऐसी कोई चीज दिखाई नहीं देती थी कि मैं उसके
साथ बंधा रहना चाहता। अपितु,
मेरे अन्दर से कोई आवाज़ उठती रहती कि इसके साथ मैं अपना वक्त
बर्बाद कर रहा हूँ। मुझे इससे बढ़िया लड़की दोस्ती के लिए मिल
सकती थी। फिर भी,
मैं बीटर्स की ओर झुका हुआ था। शायद, इसलिए कि बीटर्स मुझे यूँ
ही नहीं मिली थी,
उसे प्राप्त करने के लिए कैसी मुश्किलें मेरी राह में आ खड़ी
हुई थीं,
उन्हें सर करने में मैंने जो कुछ किया,
वही ‘कुछ’
बीटर्स की ओर मेरे झुकाव के लिए काफी था। जब बीटर्स ने टौमी के
बारे में बताया था,
तो मुझसे सहन नहीं हुआ था। टोमी उसकी सहेली का पति था। उसके
साथ हमदर्दी रखने की एवज़ में नाजायज़ संबंध बनाना चाहता था।
मैंने बीटर्स से पूछा था,
“क्या
टोमी शीला को छोड़कर तेरे संग रहना चाहता है?”
“नहीं,
वह शीला को नहीं छोड़ सकता।"
“फिर,
तुम दोनों को साथ-साथ रखना चाहता है?”
“नहीं,
शीला को छोड़ेगा पर धीरे-धीरे।"
“बीटर्स,
पीटर से लड़ाई किये बग़ैर मैं तेरे तक पहुँचा होता तो तुझे
टोमी के पास जाने देता।"
“इंदर,
वह बहुत अच्छा आदमी है।"
“फिर
तेरे साथ क्यों नहीं खड़ा हुआ?
डरता क्यों घूमता था?
बीटर्स,
पहले तो मैं तेरी खातिर लड़ा था,
अब मैं अपनी खातिर लड़ूंगा और टोमी की अक्ल ठिकाने लगा दूँगा।
लड़ते समय मेरे पास हमदर्दी नहीं हुआ करती।"
“नहीं
इंदर,
तू ऐसा नहीं कर सकता। मैं उसे समझा दूँगी।"
इसके बाद बीटर्स के मुँह से दुबारा टोमी का नाम नहीं सुना।
इसके बाद मैंने टोमी को कहीं देखा भी नहीं। लेकिन,
यह बात मैंने अपने आपको समझा ली कि बीटर्स के साथ रिश्ता लम्बे
समय तक नहीं रह सकता।
जब उसके बच्चे मेरे से कुछ अधिक ही लिपटने-चिपटने लगे तो मैंने
बीटर्स से कहा,
“चल,
एक बच्चा कर लेते हैं।"
वह कई बार मेरे इस प्रस्ताव को दरकिनार कर चुकी थी,
पर एक दिन कहने लगी,
“मेरे
दोनों बच्चे दो अलग-अलग मर्दों से हैं,
और अब तीसरा,
तीसरे से होगा। बन गयी न खुद-ब-खुद यू.एन.ओ.!”
कहकर वह हँसी। फिर बोली,
“इससे
भी बड़ी बात यह है कि तेरे बच्चे का रंग अलग होगा,
और ये उसे स्वीकार नहीं करेंगे,
किसी भी कीमत पर नहीं।"
मेरा दोस्त तरसेम फक्कर कभी-कभी अच्छी बात कर जाता था। वह कहा
करता कि जो मिली-जुली नस्ल के बच्चे आएँगे अर्थात गोरों और
कालों के साझे बच्चे,
वे नस्लवाद को खत्म करेंगे। बीटर्स को यह दलील देने का कोई
फायदा नहीं था। मैंने दोबारा यह बात ही नहीं की। एक बार विवाह
करवाने की बात चली तो उसने कहा,
“क्या
कागज का एक टुकड़ा–
विवाह का सर्टिफिकेट–
दो बंदों को बांध सकता है?”
अब तक बीटर्स के आसपास के लोग मेरे परिचित ही नहीं,
दोस्त भी बन चुके थे। उसकी एक सहेली ऐना अपने पति से लड़-झगड़ कर
कुछ दिन उसके पास रह गयी थी। उसका पति शॉन मेरा ऐसा दोस्त बना
कि बाद में भी कई वर्षों तक दोस्ती की गरमाहट के साथ मिलता
रहा। उसके पहले घर की पड़ोसन मैरी मुझे राह में मिलती तो बताने
लगती,
“पीटर
तुझे पसन्द नहीं करता। कहता है,
एक पाकि (पाकिस्तानी) जॉन को पाल रहा है।"
इस पर मुझे गुस्सा भी आता और हँसी भी।
बीटर्स को काउन्सल ने दूसरा घर दे दिया था। पीटर की समस्या के
चलते कुछ जल्दी मिल गया। वैसे, उसने घर बदलने की अर्जी बहुत
पहले से दे रखी थी। था तो यह भी दो बैड-रूम वाला फ्लैट ही,
पर इसके साथ बगीचा भी था।
‘बगीचा’
सुनने में अच्छा ज़रूर लगता,
पर बीटर्स ने इसकी देखभाल कभी नहीं की थी। बागवानी का उसे कभी
कोई शौक नहीं रहा था। गर्मियों में वहाँ घास उग आती और
सर्दियों में खुद ही मर जाती।
इस फ्लैट की ऊपरली मंजि़ल पर वैस्ट इंडियन परिवार रहता था,
जो हर वक्त शोर भरा संगीत लगाए रखता। उनके शैतान-से बच्चे
शरारतें ही किये जाते। बीटर्स के बराबर वाले फ्लैट में एक
आयरिश लड़की कैथी रहती थी। वह आयरलैंड से भागकर यहाँ आई थी और
यहीं बस गयी थी। आयरलैंड में कुंआरी लड़की के बच्चा ठहर जाना
एक बड़ा गुनाह है और फिर गर्भपात तो है ही कानूनी जुर्म ! कैथी
घर से भागकर अपने बॉय-फ्रेंड के साथ यहाँ आई थी। बॉय-फ्रेंड
छोड़ गया तो वह अकेली रह गयी। अकेली ने ही पॉल को जन्म दिया।
जहाँ बीटर्स दब्बू स्वभाव की थी,
वहीं कैथी लड़ाकू किस्म की औरत थी। किसी से भिड़ने से डरती नहीं
थी। मर्दों के साथ झगड़ा करते समय हाथापाई पर उतर सकने वाली
औरत थी। शायद यही कारण था कि उसके पास कोई मर्द-दोस्त नहीं था।
मेरे देखते एक-दो आये भी,
पर चले गये। मुझसे कैथी बहुत प्यार से पेश आती।
बीटर्स और वह एक-दूसरे के लिए काफी मददगार थीं। उसने बाहर जाना
होता तो अपने बेटे पॉल को बीटर्स के पास छोड़ जाती। ऐसे ही,
कैथी भी डैनी और जॉन को सम्भाल लेती थी। कई बार हम तीनों
इकट्ठा बैठकर दारू भी पीते। ज्यादा पीकर वह गन्दे लतीफे सुनाने
लगती। मुझसे कई बार कहती,
“इंदर,
मेरे लिए कोई मर्द तलाश,
अपने जैसा। गोरे तो धोखेबाज होते हैं,
इस बार मैं इंडियन ट्राई करना चाहती हूँ।"
उस दिन मुझे कंट्रोलर का कार-रेडियो पर सन्देश मिला। उसने
बताया कि तेरे भाई का फोन आया था। कोई ज़रूरी काम था। मैं
थोड़ा चिंतित हो उठा कि प्रितपाल का फोन क्यों आया?
इंडिया में सब ठीकठाक हो। या फिर, यह भी हो सकता था कि साउथाल
गये मुझे बहुत दिन हो गये थे,
फोन भी नहीं कर सका था,
मेरी राजी-खुशी जानने के लिए फोन किया होगा। वक्त मिलने पर
मैंने फोन किया,
“हाँ
भई छोटे,
फोन किया था?”
“तू
तो हमें भूल ही गया है। अच्छा गोरी ने तुझे फँसाया।"
“नहीं
यार,
बिजी बहुत था।"
“मैं
कितनी बार तेरे फ्लैट में गया।"
“मैं
काम पर ही रहा।"
“मक्खन
कह रहा था कि उसने तो तुझे देखा ही नहीं कई दिनों से।"
“मैं
अंधेरे-सवेरे ही घर लौटता हूँ।"
“चल
छोड़ बड़े,
घर आ कभी,
सूबेदार का फोन आया था। कहता है–
तेरे से बात करनी है। बच्चे भी तुझे याद करते हैं।"
“वीक
एंड पर आऊँगा।"
मैं भी हैरान था कि कितने दिन प्रितपाल से मिले बिना गुजर गये।
करीब दो हफ्ते बाद मैं उसके घर का चक्कर लगा ही लिया करता था।
मुझे अपने भतीजों और शैरन की याद आने लगी। बापू जी का फोन भी
आया होगा। उनके फोन का तो मुझे पता था कि वे यही कहेंगे कि मैं
जल्दी विवाह करवाऊँ। इस बार,
हो सकता था कि प्रितपाल ने उनके कान भरे हों,
बीटर्स के बारे में या कुछ और ही।
मैं साउथाल गया। वे सब मुझे इस तरह मिले,
जैसे बरसों बाद मिले हों। दोनों भतीजे अपने शिकवे कर रहे थे और
शैरन के अपने गिले थे। यद्यपि शैरन मेरे लिए छोटी थी क्योंकि
प्रितपाल मेरे से छोटा था,
पर शैरन भी और प्रितपाल भी,
दोनों मेरे साथ ऐसा व्यवहार करते जैसे वे मुझसे बड़े हों। वे
मेरा बहुत फिक्र करते। मैं तो लंडा चिड़ा था,
मेरा क्या था। मुझे उनको लेकर यही फिक्र लगी रहती कि मेरे कारण
उनके घर में किसी किस्म की समस्या खड़ी न हो। प्रितपाल मेरा
भाई ही नहीं,
दोस्त भी था। मेरी खातिर वह बहुत कुछ कर जाता। मैं उदास होता
तो मेरे पास बैठ जाता और काम से छुट्टी कर लेता। मैं कोई गलत
काम करता तो एक बाप की तरह मेरे ऐबों को छुपा जाता। मेरी खातिर
वह शैरन की उपेक्षा तक कर जाता। ऐसी ही कुछ बातें थीं जो मेरे
मन में रहती थीं,
जिनके कारण मैं उनके घर कम ही जाया करता। शैरन कहने लगी,
“भाजी,
आपकी रोटी,
आपके कपड़ों,
आपकी सेहत की हमें बहुत चिंता रहती है। आप फ्लैट बेचकर घर ले
लो और चाबी मुझे दे दो। मैं घर को सम्हालूँगी,
जब तक सम्हालने वाली नहीं आ जाती।"
“वो
फ्लैट बेच दे यार बड़े! कितना फर्क है प्राइस का,
मेरे लोग हैं कुछ।"
“सोचा
तो मैंने भी है कई बार,
फ्लैट का तो ग्राहक भी है मक्खन,
पर टाइम ही नहीं मिल पा रहा।"
“मेरे
पास टाइम ही टाइम है,
बता कैसा घर चाहिए,
कहाँ चाहिए?”
“छोटे,
सच्ची बात कहूँ,
मेरा कुछ भी करने का मूड नहीं। तेरी जो मर्जी हो,
कर दे,
तू ही तलाश दे,
इस वाले को सेल पर लगा दे।"
“यह
तो हो ज& |