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उडिया
कहानी
बहते बादल
नंदिनी शतपथी
राधा की कोमल-मुलायम हथेली धीरे-धीरे सख्त हो गई है। कई जगहों
पर सख्त
पड़ गई चमड़ी। नाखूनों में मिट्टी,
हल्दी,
मसाले के निशान। आँखों के नीचे काला
पड़ने लगा है। चेहरे पर भी कई दाग पड़ गए हैं। कई बार सोचा है
राधा ने,
ट्रंक में
सँभालकर रखा गमकौआ साबुन निकालकर कम-से-कम हाथ-मुँह धो लेगी।
ननद-जिठानी के साथ तो
साबुन लेकर नदी जाने में लाज आती है। तिस पर इतने लोगों के आगे
नहाकर कपड़े बदलना
तो मुश्किल काम है,
भला ऐसे में साबुन लगाना!
कुएँ पर तो हमेशा लोग रहते हैं।
मर्द-औरत बार-बार आते-जाते रहते हैं। इतने बड़े टोले में उनके
घर के पिछवाड़े
ले-देकर एक ही बावड़ी है। कोई दतून करते हुए हाथ में लोटा लिए
हुए आ जाती है तो
किसी घर से गगरी-मटकी कमर पर धरे बहू-बेटियाँ आकर खड़ी हो जाती
हैं;
दोपहर में भी
फाँका नहीं मिलता। उस दिन सारा काम खत्म करके साबुन लेकर खूब
सहमी हुई-सी कुएँ पर
गई थी राधा। कुछ देर खड़ी होकर चारों-ओर नजर दौड़ाई उसने। सहसा
किसी ने पीछे से
आवाज दी,
‘‘किसकी
राह तक रही हो,
भौजी
?‘‘
चौंकते हुए पीछे मुड़कर देखा राधा ने।
छोटी खिड़की के उस ओर से खिलखिलाकर हँस पड़ी पड़ोस के घर की
ननद-सी शैला। सिर का
पल्लू ठीक करते हुए घर की ओर भागी राधा।
एक दृश्य समाप्त हो गया। राधा को लगता
है,
उसके जन्म से लेकर आज तक कैमरेवाला उसके पीछे-पीछे चलते हुए
सारी घटनाओं का
सिनेमा बनाता जा रहा है। कई बार बैठी-बैठी मन-ही-मन वही सिनेमा
देख जाती राधा-जिस
तरह बचपन में पिताजी के साथ जाकर सिनेमा देखा करती थी वह।
क्या आज की घटना की
तसवीर खींच ली होगी उस अदृश्य कैमरेवाले ने अपने कैमरे से
?
काफी आगे जो जोड़ना
पड़ेगा उस फिल्म में। पर आज जैसा दृश्य फिर कभी मिलना उसके लिए
संभव नहीं होगा। आज
अमित आया था। अपनी पत्नी को साथ लेकर राधा को देखने। यदि
सुपरिटेंडेंट साहब ने पहले
से न बताया होता तो राधा उन्हें पहचान ही न पाती। पहचानती भी
कैसे ?
एक साल के छौने
को छोड़कर आई थी वह। छोड़कर कहाँ आई थी,
बल्कि उससे छीन लिया गया था।
उस दिन
बहुत जोरों की गर्मी पड़ रही थी। घर का सारा काम खत्म
करते-करते वह काफी थक चुकी
थी। थोड़ी देर लेटकर आराम करने वह अपने कमरे में चली आई। बेटा
अमित खा-पीकर सो रहा
था। राधा बिस्तर पर बैठी ही थी कि उसकी नींद खुल गई। माँ का
पल्लू पकड़कर
खींच-खींचकर उसे उठाने लगा अमित। राधा उसे समझाने-बुझाने लगी,
लड़ियाने लगी,
तरह-तरह के गीत सुनाकर,
सुलाने की कोशिश करने लगी। किंतु सब बेकार गया। गुस्से में
एक थप्पड़ जड़ दिया राधा ने।
घर-द्वार कँपाकर दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा अमित।
दूसरे कमरे में दरवाजा अधखुला करके सो रही थीं सास,
झटपट उठ बैठीं। उस समय राधा खाट
से उठकर बेटे को मनाने की केशिश कर रही थी-और सास के डर से
काँपती भी जा रही थी !
सास धम्म से कमरे में आईं और उसके हाथों से बेटे को छीन ले
गईं।
ढं.........ढं.....करके बज उठा अस्पताल का घड़ियाल। राधा ने
सुना सात। शाम के
सात बज गए। बाहर रात का भोजन लेकर आनेवाली ट्रॉली की आवाज
सुनाई दे रही
है-परोसनेवालियों की बातचीत भी। मुलायम पनीले अँधेरे को ज्यादा
देर तक पकड़ रखने को
आतुर थी राधा। और थोड़ा-सा सिनेमा देखा जा सकता है निश्चिंत
हो। उसने बत्ती नहीं
जलाई। आकाश में यहाँ-वहाँ निकले नन्हें-नन्हें एकाकी तारे मानो
उसे जरा-सी रोशनी
देने के लिए धकियाकर बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हों।
अमित वैगरह गाड़ी में बैठ
चुके होंगे। यहाँ के लोग कहते थे स्टेशन ज्यादा दूर नहीं है।
हालाँकि कि कभी वह
स्टेशन से ही यहाँ आई थी। लेकिन बहुत दिन पहले की बात है। आज
कुछ ठीक-ठीक याद नहीं।
उसी दिन इस चहारदीवारी से बाहर नहीं गई राधा।
उस दिन उसके हाथों से बेटे को
छीनकर चिल्ला उठी थीं सास,’’राक्षसी,
लगता है जान ही ले लेगी बच्चे की। दिन-भर रानी
बनी खाट पर लेटी रहेगी। बच्चा जरा रो पड़ा तो मारने लगी। चल
निकल जा,
इस घर से
।’’
उसके बाद घूँसे,
लात,
चुटिया पकड़कर खींचना। बुखार में पड़ी-पड़ी कमजोर हो
गई थी राधा। तिस पर दिन-भर का काम। सह न पाकर नीचे गिर पड़ी।
ट्रंक का कोना लगकर
सिर से खून बहने लगा। दादी माँ के गले से लिपटकर लगातार रोता
जा रहा था
अमित।
बहुत मुश्किल से खुद को सँभालकर खड़े होने की कोशिश की राधा
ने। सास
फिर दौड़ आईं हाथ उठाकर। अब धैर्य नहीं रहा। बदन में जितनी भी
ताकत बची थी,
सब
लगाकर सास का हाथ जोर से पकड़ लिया राधा ने।
‘‘अरे,
मुझे मार डाला रे ! दौड़ो
रे,
कहाँ हैं सब
?’’
सास की चीत्कार से टोला-पड़ोस के लोगों की दोपहर की पतली नींद
उड़ गई। पूरा कमरा भर गया लोगों से। सास ने सुबकते हुए कहा,
‘‘दो
अक्षर पढ़ गई है
तो क्या मेरी जान ले लेगी। बच्चा जिद कर रहा था तो उसे मारे
डाल रही थी। मैं समझाने
आई तो मेरा हाथ मोड़कर मारने को झपट पड़ी। तुम सब न आये होते
तो अब तक मार चुकी
होती। आज यह राक्षसी यहाँ से न गई तो मैं इस घर का पानी तक
नहीं छूऊँगी।’’
राधा
हतप्रध-सी खड़ी थी। सिर की चोट से खून बह रहा था। क्या किसी की
नजर नहीं पड़ रही इस
पर ?
कहाँ,
कोई तो नहीं पूछ रहा कि उसका सिर कैसे फटा
?
क्रोध और अभिमान से उसकी
आँखों से आँसू भी सूख गए। चुपचाप सुन गई तरह-तरह की गालियाँ।
बाप-भाई से लेकर उस तक
अश्राव्य भाषा में लगातार गालियाँ बरस गईं। बुद्धू-सी सिर्फ
देखती ही रह गई
वह।
राधा के कमरे की बत्ती सहसा जल उठी। सभी थाली लेकर खाने बैठ
चुकी हैं। जैबुन
नाम की जो मुसलमान लड़की हाल ही में यहाँ आई है,
वह थाली की रोटी तोड़-तोड़कर
चारों-ओर फेंकती रहती है,
और कभी चिल्ला-चिल्लाकर तो कभी चुपचाप रोती रहती है। जिस
दिन से वह लड़की आई है,
कुछ खाना ही नहीं चाहती। साहब लोगों को और नर्सों को काफी
परेशान कर चुकी है।
पास रखी थाली की ओर राधा ने। रोजाना की तरह रोटियाँ और
मिलवा सब्जी। कटोरी में पनीली दाल थोड़ी-सी। इतनी सब्जी उसे
मिली होती तो कितना
स्वदिष्ट पकाती वह। भला-यहाँ कोई पागल-पागलियों के लिए मन से
खाना क्यों पकाएगा।
शुरू-शुरू में वह भी नहीं खाती थी। खाने को जी ही नहीं करता
था। पर बिना खाये आखिर
कितने दिनों तक रहा जा सकता है !
रात को आँखों के आगे से एक-एक करके सिनेमा का
दृश्य बदलता जा रहा है। थाली को हाथ रखकर लौटा लाई वह। उस दिन
शाम को घर लौटकर पति
ने सारी बातें सास से सुनीं। सच-झूठ जानने को भी उनमें सब्र
नहीं था। रसोई के सामने
जो भी लकड़ी मिली,
उसे उठाकर दहाड़ते हुए वे उसकी ओर लपके। डर से उसकी आँखें मुँद
गईं। दो घंटे से वह एक ही जगह पर खड़ी है। लोगों की भीड़ के
कारण हाथ-पैर काँपने पर
भी वह बैठ नहीं पा रही है।
मार से राधा का सिर फट गया। हाथ-पैर से खून निकलने
लगा। कुछ देर बाद वह बेहोश हो गई। बहुत मुश्किल से शायद किसी
की खींचा खाँची से जब
वह उठकर बैठी,
उसका बक्सा और बिस्तर बाहर चबूतरे पर रखा था। बैलगाड़ी के पास
खड़े
पति ने कहा,
‘‘अब
देर मत कर ! जा,
जाकर बैठ गाड़ी में। तुझे छोड़कर आने पर ही शांति
होगी इस घर में।’’
उसके बाद पिता का घर। पहले काफी दिनों तक रोती रही राधा। मन
हमेशा अमित के लिए छटपटाता रहता। थोड़े दिनों के बाद कुछ याद
नहीं रहा। कभी-कभी
राधा मन-ही-मन रोती,
और कभी गुमसुम बैठी रहती। सबने कहा उसका दिमाग खराब हो गया है।
वह पागल हो गई है। उसका इलाज करवाओ।
बहुत विरोध किया राधा ने। उसका अंतस
हाहाकार कर उठा-‘हे
प्रभु ! क्या इस दुनियाँ में कोई भी समझदार आदमी नहीं है
?
क्या
मैं इसी तरह एक जगह से दूसरी जगह बहकर जीती रहूँगी
?
और बहती-बहती कहाँ बिला
जाऊँगी,
कोई जानना भी नहीं चाहेगा
?’
उसके भाई ने थोड़ा-सा विरोध किया था। राँची
गई तो वहाँ पागलों के बीच रहते-रहते वाकई पगला जाएगी। फिर ठीक
नहीं हो सकेगी। किंतु
राधा आ गई-उसे यहाँ ले आया गया। शुरू-शुरू में भैया आये थे
एकाध बार देखने ! फिर वे
भी नहीं आए। पति के पास,
भैया के पास डॉक्टरों ने पत्र लिखा-
‘‘राधा
अच्छी हो गई
है। अब उसे ले जा सकते हैं।’’
कई साल बीत गए-अब तक कोई जवाब नहीं आया।
आज
अमित के आने की खबर सुनकर राधा का मन नाच उठा था। इतने दिनों
बाद प्रभु जगन्नाथ ने
अपनी पुकार सुनी। आखिर है तो बेटा ही ! बड़ा होकर लोगों से
सारी बातें सुनी होंगी।
माँ पर हुए अत्याचार की बात सुनकर उसका दिल जरूर रोया होगा। आज
वह अमित के साथ लौट
जाएगी। ससुराल या मायके नहीं जाएगी।
अमित आश्चर्य और भय-मिली आँखों से माँ को
देख रहा था। उसकी पत्नी भी। अमित को सिर से पैर तक एक बार सहला
गयी राधा। बहू को
लड़ प्यार किया। कुछ डर या घृणा से शायद पीछे सरक आई वह!
‘‘अब
मेरा दिमाग
बिलकुल ठीक है,
बेटे ! डॉक्टर साहब कई चिट्ठियाँ लिख चुके हैं घर। कोई मुझे
लेने
नहीं आता। तू आज डॉक्टर से कहकर मुझे लिवा चल। मैं तेरे ही पास
रहूँगी। तुम लोगों
का सारा काम करूँगी। कुछ नहीं माँगूँगी तुमसे। भला मुझे अब
जरूरत है ही किस चीज की
?
तेरे ही खातिर रो-रोकर पागल हो गई थी। अब तो तू अपने पैरों पर
खड़ा हो गया है
प्रभु जगन्नाथ,
तेरी खूब उन्नति करें। मुझे यहाँ से ले चल बेटे !’’
अमित के
दोनों हाथ जोर से पकड़कर बच्चों की तरह मना कर रही थी राधा।
अमित
किंकर्तव्यविमूढ़-सा अपनी पत्नी इरा की ओर देख रहा था। उसने
सुना था कि उसकी माँ
काँके अस्पताल में बहुत सालों से है। जमशेदपुर से राँची ज्यादा
दूर नहीं है। उसने
सोचा कि छुट्टी के दिन पत्नी के साथ घूम आएगा और माँ को भी देख
आएगा। कुछ फल-फूल
खाने-पीने की चीजें लेकर। इस तरह अचानक आपदा आ जाएगी,
इसकी तो आशंका तक उसने नहीं
की थी। अब तो गाड़ी का समय भी हो चला है।
अमित को कमरे के एक कोने में बुला ले
गई इरा और धीरे-धीरे बोली,‘‘तुम्हें
देखकर शायद उसका पागलपन बढ़ गया है। समझाकर कह
दो दुबारा लिवा ले जाऊँगा।’’
राधा ने सब कुछ सुन लिया। घर से बाहर निकलते समय जो
आँखें सूख चुकी थीं,
उनमें आँसुओं की बाढ़ उमड़ पड़ी। उन झिलमिलाती आँखों से राधा
देख रही थी-अमित और इरा उसकी ओर पीठ किए चले जा रहे हैं दूर,
और दूर।
आकाश में
चाँद निकला है। सफेद बादलों के टुकड़े उसके नीचे-नीचे बहते जा
रहे हैं। कहाँ जा रहे
हैं ये
?
कौन बहाए लिए जा रहा है उन्हें
?
क्या उसी की तरह असहाय,
अवांछित हैं ये
?
राधा इरा को एक कोने में बुला ले गई। अति आग्रह से उसका हाथ
अपने हाथों में
लेकर उसने उसका कुशलक्षेम पूछा। अमित उसे प्यार करता है या
नहीं-उससे अच्छा सलूक
करता है न
?
पहले कुछ चकित हुई इरा ! उसके बाद समझ गई- शायद खुद से मेरी
तुलना कर
रही हैं सास। सिर हिलाकर एक तृप्ति-भरी मुस्कान छोड़ी इरा ने।
राधा समझ गई-इरा सुखी
है। उसके जीवन की पुनरावृत्ति शत्रु के जीवन में भी न हो ।
किंतु कौन सुनेगा
उसकी बात
?
बचपन में राधा ने देखा है कि घर का सारा काम वही करती रही है।
पर घर में
खाने की कोई अच्छी चीज आती तो माँ पहले भैया और छोटे भाई-बहनों
को देतीं।
पर्व-त्यौहारों में जब पिता जी कपड़े लाते तो छटा-छटाया कपड़ा
उसी के हिस्से में
पड़ता। उन दिनों कितना बुखार चढ़ा था राधा को। आँखें तक नहीं
खुल रही थीं। प्यास से
गला सूख गया था। बूँद-भर पानी पिलाने को कोई नजदीक नहीं आ रहा
था-डॉ। बुलाने की बात
कौन पूछता है
?
पर भैया को कहीं खरोंच तक लग जाती तो घर-भर में हल्ला मच जाता।
इतने
कष्ट में भी राधा बच गई थी। और हैरान-सी सोचती थी,
उसने क्या किया है
?
उसका कसूर
क्या है
?
उसे दूसरों से हीन क्यों समझा जा रहा है
?
फिर भी उसने कभी किसी पर अपना
आक्रोश प्रकट नहीं किया। कभी दुःखी नहीं हुई-अनजाने ही नसीब को
स्वीकार कर लिया था
उसने।
अनुवादः राजेन्द्र मिश्र
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